Thursday, 17 December 2015

13 साल की रेखा और जिम्मेदारी 8 भाई-बहनो की ।

संदीप कुमार मिश्र : कहते हैं आपके अन्दर हौंसला,जज्बा और जूनून हो तो आप कुछ भी हासिल कर सकते हैं। किस्से कहानियां तो हम अक्सर पढ़ते रहते हैं लेकिन आपको एक ऐसी हकिकत बताते हैं जिसे जानकर आप गमगीन हो जाएंगे। वो मासूम लाचार भी है और बेबस भी लेकिन कमजोर कतई नहीं।दरअसल ये कहानी है राजस्‍थान के मालवीय नगर की। ये कहानी है 13 साल की मासूम बच्‍ची रेखा की। जो अपने 8 भाई-बहनों का लालन-पालन अकेले ही कर रही है।

दरअसल रेखा और उसके 8 भाई-बहनो के माता-पिता ताराचंद और सीतादेवी बीती दिपावली से कुछ दिन पहले ही घर छोड़कर ना जाने कहां चले गए।मालविय नगर की कुंडा बस्ती, जहां अपने पांच बेटों और चार बेटियों के साथ किसी तरह किराए के मकान में रह रहे थे रेखा के माता-पिता। मजदूरी करके किसी तरह घर चला रहे थे लेकिन अचानक ना जाने ऐसा क्या हुआ कि दोनो घर छोड़कर चले गए।इस बात की जानकारी ना बच्चों को पता चली ना ही किसी रिश्तेदार को।मा-पिता के घर से जाने के बाद घर की सारी जिम्मेदारी बड़ी होने के कारण 13साल  की रेखा पर आन पड़ी।जिसके बाद खुद से लेकर अपने सात महिने के भाई विकास सहित नौ बच्चों की जिम्मेदारी तब से लेकर अब तक सिर्फ और सिर्फ अपने माता-पिता की राह ताकते रहते हैं।

उम्मीदों ने जब सात छोड़ दिया और माता पिता की कोई खोज खबर नहीं मिली तो फिर रेखा ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली और भाई नेतराम (11), जानकी (9) और आंचली (7) को स्कूल भेजने के साथ ही  पवन (5), प्रकाश (4), प्रेम (4), मंजू (2) और 7 महिने के विकास की घर में ही देखभाल करने लगी। जब इस बात की खबर मकान मालिक आशीष शर्मा ने पुलिस को की तो मौके पर पहुंची पुलिस ने देखा कि कुछ बच्चे घर में खेल रहे हैं और कुछ स्कूल से लौट रहे थे।पुलिस की टीम सभी को साथ लेकर थाने गई और फिर थाने से बाल कल्याण समिति के निर्देश पर रेखा और जानकी को बालिका गृह, नेतराम को किशोर गृह और बाकी बच्चों को शिशु गृह भेज दिया।

कहते हैं जिसका कोई नहीं उसका ईश्वर होता है और वही राह दिखाता है।बहरहाल बच्चों के पिता से जब फोन पर बात करने की कोशिश की गई तो फोन बंद मिला। वहीं जब गांव में बड़े भाइयों से बात की तो उन लोगों ने बच्चों की जिम्मेदारी संभालने से ही मना कर दिया।जिसके बाद चाइल्ड लाइन ने बच्चों को शिशुगृह, किशोर और बालिका गृह पहुंचाया।

अंतत: ईश्वर किसी को ऐसे दिन ना दिखाये...बचपन ना छिने किसी का...क्योंकि ऐसे में अपने भी हो जाते हैं पराये...लेकिन 13 साल की रेखा के हौंसले को सलाम...जिसने इतनी कम उम्र में  काम कर दिखाया जो बड़े करने से दूर भाग गए...।