Tuesday, 5 January 2016

क्यों ना हो मीडिया से मोहभंग..?



संदीप कुमार मिश्र: ये कहने मे अच्छा तो नहीं लगता कि मीडिया अपने रास्ते से भटक गई है,पत्रकारिता अब पूर्ण रुप से व्यवसाय हो गया है।जो सिर्फ टीआरपी से ही मतलब रखता है।देश भक्ति,सामाजिक सरोकार,जनभावना,मानवीय पहलू जैसी तमाम बातों को दिखाना न्यूज चैनलों के लिए विशुद्ध रुप से टीआरपी की मारामारी है,एक ऐसी ओछी जल्दबाजी,कि सबसे पहले खबर किस चैनल पर ब्रेक होती है,बड़ी बड़ी ब्रेकिंग न्यूज,प्लेट्स बनाकर परोस दी जाती है कि सबसे पहले हमारे चैनल ने दिखाई आपको ये खबर। ओह!अफसोस होता है....।

अफसोस इसलिए भी कि मैं भी खुद को पत्रकार कहता हूं।तकलीफ तभी थोड़ी ज्यादा बढ़ जाती है।वरना 125 के भारत में कितने लोग जानते हैं मीडिया की हकिकत।शर्म से सिर तब और झुक जाता है जब,कोई महिला पत्रकार शहीद जवान के घर जाकर शहीद की बीबी और बच्चों से पूछती है कि अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन आपके पापा कैसे शहीद हुए,क्या शहीद होने से पहले आपके पास कोई फोन आया था,और भी ना जाने क्या-क्या...कलेजा फट जाता है,कि देश ने अपना एक लाला खो दिया,एक औरत ने अपना पति,और एक बच्चे के सिर से उठ गया पिता का साया और हमारे रिपोर्टर कहते हैं अच्छा तो नहीं लग रहा,लेकिन देश जानना चाहता है... वगैरह,वगैरह....।क्यों झुठ बोलते हैं तथाकथित पत्रकार और चैनल वाले महोदय जी।ये क्यों नहीं कहते कि आपको ये दिखाना इसलिए जरुरी है कि आपकी टीआरपी इस हफ्ते औरों से बढ़ जाएगी।खैर आप यहीं नहीं रुकते......आपके साहस की दाद देनी पड़ेगी कि आपका बस चले तो आप देश की हिफाजत से भी अपनी वाहवाही के लिए समझौता कर दें।

अब अतीत में क्या जाएं दोस्तों आपको नफरत हो जाएगी इन न्यूज चैनलों से,लेकिन पठानकोट में हुई आतंकी वारदात को ही ले लें आप।देश जहां शहीद हुए सात जवानो के गम में शरीक हो रहा था,शोक मना रहा था तो वहीं तमाम बड़े-बड़े चैनल वाले अपने शो में आतंकी देश पाकिस्तान के कुछ विश्लेषकों के साथ डिवेट पर बैठकर तू तू मैं मैं कर रहे थे।जिससे हासिल कुछ नहीं होना था, लेकिन हां टीआरपी जरुर बढ़नी थी। मीडिया के आकाओं को ये जरुर बताना चाहिए कि क्या चैनल पर डिवेट करके और आक्रामकता दिखाने भर से शहीदों का सम्मान हो जाएगा..? क्योंकि इस प्रकार से पाकिस्तानी मेहमानों के ज़रिये कहीं पाकिस्तान विरोधी कुंठा को हवा तो नहीं दी जा रही है। इस कुंठा को हवा तो कभी भी दी जा सकती है लेकिन ऐसा करके क्या हम वाक़ई शहादत का सम्मान कर रहे हैं? क्या ये पाकिस्तानी मेहमान कुछ नई बात कह रहे हैं? चैनलों पर पाकिस्तान से कौन लोग बुलाये जा रहे हैं? क्या वही लोग हैं जो इधर के हर सवाल को तू तू मैं मैं में बदल देते हैं और इधर के वक़्ता भी उन पर टूट पड़ते हैं। कोई किसी को सुनने वाला नहीं।इस डिवेट में कोई किसी को बोलने नहीं देता। इस घटना पर दोनों देशों के जिम्मेदार लोग बोल रहे होते तो भी बात समझ आती लेकिन वही बोले जा रहे हैं, जिन्हें घटना की पूरी जानकारी तक नहीं। जिनका मक़सद इतना ही है कि टीवी की बहस में पाकिस्तान को अच्छे से सुना देना।

ये तो चैनलों पर बैठकर बेहूदा चर्चा का हाल है।अब जरा इसके दूसरे पहलू पर आते हैं।जहां चैनलों के तथाकथित तेज तर्रार रिपोर्टर मौका-ए-वारदात पर जब रिपोर्टिंग करते हैं तो उन्हें एक बार आप सुन लिजिए,कि किस प्रकार से ना चाहते हुए भी आतंकियों के आकाओं तक किस प्रकार से खबर हमारे चैनल वाले उन तक पहुंचाते हैं और वो अपने मंसूबे में कामयाब होते हैं।दरअसल सवाल उठता है कि मीडिया के पास एकमात्र यही तरीका बचा है..? हमारी अपनी कमियों और भूल से ही हुई चूक पर कोई सवाल क्यों नहीं है हमारे पास ?

बड़ा सवाल इसलिए भी उठता है कि मीडिया किस दिशा में जा रहा है।हम क्या दिखाना चाहते हैं...? हमारी जिम्मेदारी क्या है..?उन्हें निभाने का रास्ता हम कैसे अख्तियार कर रहे हैं..?क्या हम अपनी रिपोर्टींग और सुत्रों के माद्यम से जाने अनजाने में खबरों को आतंकियों तक नहीं पहुंचा रहे है..? क्या हमारे लिए शहादत पर शोक मनाने का यही एक तरीका बचा है..?

नहीं साब...शायद नहीं...। हमें गर्व है अपने जवानों पर,उनकी शहादत पर।उनकी सजग निगांहों की वजह से हमारी सिमाएं सुरक्षित हैं।ऐसे में चैनल पर तू तू मैं मैं करने से बात नहीं बनती है।इससे शहादत आहत होती है,अफसोस होता है। अफसोस की मीडिया कब तक और कहां तक गिरेगी..? हमारे सवालों की हकिकत क्या है? बस यही कि हम पूछते जा रहे हैं..पूछते जा रहे हैं...।चाहे बेशक उनके जवाब देने का माद्दा किसी में ना हो।


अंतत: लगता है कि अब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी विश्वसनियता पूरी तरह से खोता जा रहा है,जिसे बचाये रखने के लिए इसके व्यवसायिकरण को रोक कर खबरिकरण पर ध्यान देने की जरुर है,खबरो की तह तक जाना जरुरी है, लेकिन देश की एकता और अखंडता को ताक पर रख कर नहीं,किसी मर्यादा का उलंघन करके नहीं,किसी का मान मर्दन करके नहीं।दिखाने के लिए खबरों को मत दिखाएं,सच्चाई को हीं बयां करें,वर्ना पत्रकारिता पर से पूरी तरह से जनता का विश्वास उठते देर नहीं लगेगी।जो काफी हद तक उठ चूकी है...।