Monday, 11 January 2016

स्वामी विवेकानंद: भारतीय पुनर्जागरण के महान सेवक

"मेरे बंधू बोलो " भारत की भूमि मेरा परम स्वर्ग है, भारत का कल्याण मेरा कर्त्तव्य है, और दिन रात जपो और प्रार्थना करो, हे गोरिश्वर, हे जगज्जनी, मुझे पुरुष्तव प्रदान करो
                                                                                                       -- स्वामी विवेकानंद

संदीप कुमार मिश्र:  दोस्तों आज से 153 साल पहले हमारे देश में एक ऐसे असामान्य योगी ने भारत भूमि पर अवतार लिया था,जिन्होने संपूर्ण विश्व को भारतवर्ष के प्राचीन वैभव और ज्ञान की रौशनी से जगमग कर दिया।जी हां साथियों, 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म कोलकाता में हुआ था। बीते डेढ़ सौ साल में वक्त बदल गया, विरासत और सियासत बदल गई। एक गुलाम मुल्क, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बन गया।और आज भी स्वामी जी के हर वाक्य कथन देश की सूवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा श्रोत है।

दरअसल भारतीय संस्कृति की वो तासीर, वसुधैव कुटुम्बकम की वो अलख जो 122 साल पहले नरेन्द्र की आवाजों से जली थी वो आज जिंदा है। स्वामी विवेकानंद की जयंती पर देश उन्हें नमन करता है, वंदन करता है और कोटिश: साधूवाद करता है

आपको पता है दोस्तों धर्म संसद में भाषण देने से पहले स्वामी विवेकानंद जी सिर्फ नरेंद्र थे।जिन्होने वड़ी कठीनाईयों से मुश्किलों का सामना करते हुए जापान, चीन और कनाडा की यात्रा करते हुए अमेरिका पहुंचे थे।आपको जानकर हैरानी होगी कि स्वामी जी को धर्म संसद में बोलने का अवसर भी नहीं दिया जा रहा था, लेकिन जब उन्होंने अमेरिका के भाइयों और बहनों के संबोधन से अपना भाषण शुरू किया तो पूरे दो मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो में तालियां गूंज सुनाई देती रही। इसके बाद धर्म संसद स्वामी जी को सम्मोहित होकर सिर्फ सुनती रही। यहां तक की अमेरिकी मीडिया ने उन्हें भारत से आया 'तूफानी संन्यासी' 'दैवीय वक्ता' और 'पश्चिमी दुनिया के लिए भारतीय ज्ञान का दूत' जैसे शब्दों से सम्मान दिया।

दोस्तों अमेरिका पर पूज्य स्वामी विवेकानंदजी ने जो अपना प्रभाव छोड़ा इसकी झलक आज भी वहां कायम है।तभी तो, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जब भारतीय संसद को संबोधित किया था तो स्वामी विवेकानंद का संदेश उनकी जुबान पर भी था।

एक साधारण से दिखने वाले हिंदू धर्म के प्रतीक के रूप में जब गेरुए कपड़े से अमेरिका का पहला परिचय हुआ तो वो कोई और नहीं स्वामी विवेकानंद ने ही करवाया था।कहते हैं कि  उनके भाषण ने अमेरिका पर ऐसी छाप छोड़ी कि गेरुए कपड़े अमेरिकी फैशन में शुमार किए जाने लगे। शिकागो-भाषण से ही दुनिया ने ये जाना कि भारत गरीब देश जरूर है,लेकिन आध्यात्मिक ज्ञान में वो बहुत अमीर है।स्वामी विवेकानंद के भाषण से भारत के बारे में अमेरिका ही नहीं संपूर्ण विश्व की सोच बदल कर रख दी।

कैसे गए अमेरिका स्वामी विवेकानंद जी

मित्रों अमेरिका जाने से पहले नरेंद्र नाथ यानि स्वामी जी मद्रास में थे।तभी स्वामी जी समाचार पत्रों के माध्यम से शिकागो में हो रही धर्म संसद के बारे जानकारी पायी थी। कहते हैं नरेंद्रनाथ को उनके गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने सपने में आकर धर्म संसद में जाने का संदेश दिया था।लेकिन नरेंद्र नाथ के पास पश्चिम देशों में जाने के लिए पैसे नहीं थे।जिसके बाद नरेंद्र नाथ ने खेत्री के महाराज से संपर्क साधा और उन्हीं की सलाह पर अपना नाम स्वामी विवेकानंद रख लिया। और महाराजा खेत्री के सहयोग से ही 31 मई 1893 को स्वामी विवेकानंद, चीन-जापान और कनाडा होते हुए अमेरिका की यात्रा पर निकल पड़े।

स्वामी जी को धर्म संसद में नहीं बुलाया गया

जब 30 जुलाई 1893 को स्वामी जी अमेरिका के शिकागो पहुंचे,तो वो ये जानकर परेशान हो गए कि सिर्फ जानी-मानी संस्थाओं के प्रतिनिधियों को ही विश्व धर्म संसद में बोलने का अवसर मिलेगा।जिसके बाद स्वामी जी ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन हेनरी राइट से संपर्क किया,जान हेनरी ने ही स्वामी जी को हार्वर्ड में भाषण देने के लिए बुलाया। जॉन हेनरी राइट ने कहा कि स्वामी जी से परिचय पूछना ऐसा ही है जैसे सूरज से पूछा जाए कि स्वर्ग में वो किस अधिकार से चमक रहा है। इसके बाद प्रोफेसर राइट ने धर्म संसद के चेयरमैन को चिट्ठी लिखी, जिसमें उन्होंने लिखा था कि ये व्यक्ति हमारे सभी प्रोफेसरों के ज्ञान से भी ज्यादा ज्ञानी है।और फिर स्वामी विवेकानंद जी को धर्मसंसद में किसी संस्था के नहीं बल्कि भारत के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल किया गया।

धर्म संसद में स्वामी जी का अद्भूत भाषण

जब 11 सितंबर 1893 को शिकागो में धर्मसंसद शुरू हुई।तब स्वामी विवेकानंद का नाम पुकारा गया और सकुचाते हुए स्वामी विवेकानंद मंच पर पहुंचे।स्वामी जी घबराए हुए थे।उनके माथे पर आए पसीने को उन्होंने पोंछा।संसद में बैठे लोगों को लगा कि भारत से आया ये नौजवान संन्यासी कुछ बोल नहीं पाएगा। आंतत: स्वामी जी ने अपने गुरु का स्मरण किया और फिर उनके मुंह से जो बोल निकले, उसे धर्म संसद सुनती रह गई। इसके बाद तो स्वामी विवेकानंद ने ज्ञान से भरा ऐसा ओजस्वी भाषण दिया कि इतिहास बन गया।

स्वामी जी के भाषण में उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का दिया गया वैदिक दर्शन का ज्ञान था। और उस ज्ञान में दुनिया को शांति से जीने का संदेश छुपा था। स्वामी जी के इसी भाषण में वो संदेश भी है जिसमें स्वामी विवेकानंद ने कट्टरता और हिंसा की जमकर आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि सांप्रदायिकता कट्टरता और उसी की भयानक उपज धर्मांधता ने लंबे वक्त से इस सुंदर धरती को जकड़ रखा है। ऐसे लोगों ने धरती को हिंसा से भर दिया है। कितनी ही बार उसे मानव रक्त से रंग दिया, सभ्यताओं को तबाह किया और सभी देशों को निराशा के गर्त में धकेल दिया।

दोस्तों हाथ बांधे हुआ उनका पोज शिकागो पोज के नाम से जाना जाने लगा। स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक भाषण के बाद इसे थॉमस हैरीसन नाम के फोटोग्राफर ने खींचा था। हैरीसन ने स्वामी जी की आठ तस्वीरें ली थीं जिनमें से पांच पर स्वामी जी ने अपने हस्ताक्षर भी किए थे। अगले तीन साल तक स्वामी विवेकानंद अमेरिका में और लंदन में वेदांत की शिक्षाओं का प्रसार करते रहे और भारत की ख्याति और विश्व गुरु की छवी गढ़ते रहे।

15 जनवरी 1897 को विवेकानंद अमेरिका से श्रीलंका पहुंचे। उनका जोरदार स्वागत हुआ। इसके बाद वो रामेश्वरम से रेल के रास्ते आगे बढ़े। रास्ते में लोग रेल रोककर उनका भाषण सुनने की जिद करते थे। विवेकानंद विदेशों में भारत के आध्यात्मिक ज्ञान की बात करते थे लेकिन भारत में वो विकास की बात करते थे। गरीबी, जाति व्यवस्था और साम्राज्यवाद को खत्म करने की बात करते थे।

शिकागो की धर्म संसद से भारत लौटने पर 1 मई 1897 को स्वामी विवेकानंद ने राम कृष्ण मिशन की नींव रखी। राम कृष्ण मिशन नए भारत के निर्माण के लिए अस्पताल, स्कूल, कॉलेज और साफ-सफाई के काम से जुड़ गया। स्वामी विवेकानंद नौजवानों के आदर्श बन गए। 1898 में उन्होंने बेलूर मठ की स्थापना की। 4 जुलाई 1902 को बेलूर मठ में ही स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया लेकिन उनके कहे शब्द आज भी देश के सभी युवाओं के लिए प्रेरणा देते हैं,स्वामी जी का मूल मंत्र ही था-
।उठो जागो और लक्ष्य तक पहुंचने से पहले रुको मत।

नरेंद्रनाथ के स्वामी विवेकानंद बनने की राह-

12 जनवरी 1863 को कोलकाता हाईकोर्ट में वकील विश्वनाथ दत्त और उनकी पत्नी भुवनेश्वरी देवी के घर में नरेंद्र नाथ का जन्म हुआ था। विश्वनाथ दत्त प्रगतिशील सोच वाले शख्स थे, जबकि भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों की थीं। नरेंद्र नाथ के जीवन पर माता और पिता दोनों की सोच का बेहद गहरा प्रभाव था।बचपन में चंचल स्वभाव वाले नरेंद्र बड़े होकर एक धीर-गंभीर और पढ़ने में रुचि रखने वाले नौजवान में बदल गए। धर्म, दर्शन, साहित्य, इतिहास और विज्ञान हर विषय में उनकी रुचि थी। नरेंद्र ने शास्त्रीय संगीत भी सीखा और 1881 में जनरल एसेंबली इंस्टीट्यूशन नाम से जाने जाने वाले स्कॉटिश चर्च कॉलेज से चित्रकला की परीक्षा पास की। 1884 में उन्हें कला में स्नातक की डिग्री मिली। उनकी बहुमुखी प्रतिभा देख कर जनरल एसेंबली इंस्टीट्यूशन के प्रिसिंपल विलियम हेस्टी ने उन्हें जीनियस कहा था।

ईश्वर की तलाश ने स्वामी जी को ब्रह्म समाज के केशुब चंद्र सेन और देवेंद्रनाथ टैगोर वाले धड़े से जोड़ दिया। नरेंद्रनाथ की जिज्ञासा जब यहां भी शांत नहीं हुई।उसके बाद वो रामकृष्ण परमहंस जी से मिले और यहीं से एक शिष्य से गुरु की मुलाकात तय हो गई। कहते हैं गुरु बीनु ज्ञान ना उपजै,कुछ ऐसा ही स्वामी विवेकानंद जी के साथ भी हुआ, जबतक कि उनकी मुलाकात राम कृष्ण परमहंस से नहीं हुई थी।

दोस्तों स्वामी विवेकानंद अगर ज्ञान की रौशनी थे तो रामकृष्ण परमहंस वो प्रकाश पुंज थे जिनके ज्ञान की रौशनी ने नरेंद्रनाथ को स्वामी विवेकानंद बना दिया।कहते हैं अपने कॉलेज के प्रिंसिपल से रामकृष्ण परमहंस के बारे में सुनकर, नवंबर 1881 को वो उनसे मिलने दक्षिणेश्वर के काली मंदिर पहुंचे थे। जहां पहुंचकर रामकृष्ण परमहंस से भी नरेंद्र नाथ ने वही सवाल किया जो वो औरों से पहले भी कर चुके थे, कि क्या आपने भगवान को देखा है? रामकृष्ण परमहंस ने जवाब दिया-हां मैंने देखा है, मैं भगवान को उतना ही साफ देख रहा हूं जितना कि तुम्हें देख सकता हूं। फर्क सिर्फ इतना है कि मैं उन्हें तुमसे ज्यादा गहराई से महसूस कर सकता हूं।

रामकृष्ण परमहंस के जवाब से नरेंद्रनाथ प्रभावित तो हुए लेकिन शुरुआत में वो उनकी सोच को समझ नहीं सके। हालांकि इस मुलाकात के बाद उन्होंने नियम से रामकृष्ण परमहंस के पास जाना शुरू कर दिया। तर्क-वितर्क में वो रामकृष्ण परहमंस का विरोध करते थे, तब उन्हें यही जवाब मिलता था कि सत्य को सभी कोण से देखने की कोशिश करो।

1884 में स्वामी जी के पिता का देहांत हो गया।जिसके बाद अमीर घर के नरेंद्र एकाएक गरीब हो गए। उनके घर पर उधार चुकाने की मांग करने वालों की भीड़ जमा होने लगी। नरेंद्र ने रोजगार तलाशने की भी कोशिश की लेकिन नाकाम रहने पर वो रामकृष्ण परमहंस के पास लौट आए। उन्होंने परमहंस से कहा कि वो मां काली से उनके परिवार की माली हालत सुधारने के लिए प्रार्थना करें। रामकृष्ण परमहंस ने कहा कि वो खुद काली मां से प्रार्थना क्यों नहीं करते। कहा जाता है कि नरेंद्र तीन बार काली मंदिर में गए लेकिन हर बार उन्होंने अपने लिए ज्ञान और भक्ति मांगी। इस आध्यात्मिक तजुर्बे के बाद नरेंद्र ने सांसारिक मोह का त्याग कर दिया और राम कृष्ण परमहंस को अपना गुरु मान लिया। राम कृष्ण परमहंस ने स्वामी विवेकानंद को जीवन का ज्ञान दिया। 16 अगस्त 1886 को रामकृष्ण परमहंस के निधन के दो साल बाद नरेंद्र भारत भ्रमण के लिए निकल पड़े।

ये वो वक्त था जब स्वामी जी भारत भ्रमण के दौरान देश में फैली गरीबी, पिछड़ेपन को देखकर विचलित हो उठे। छह साल तक नरेंद्रनाथ भारत की समस्या और आध्यात्म के गूढ़ सवालों पर विचार करते रहे। कहा जाता है कि इसी यात्रा के अंत में कन्याकुमारी में नरेंद्र को ये ज्ञान मिला कि नए भारत के निर्माण से ही देश की समस्या दूर किया जा सकती है। भारत के पुनर्निर्माण का लगाव ही उन्हें शिकागो की धर्मसंसद तक ले गया।

अंतत: स्वामी विवेकानंद जी की सीख,ज्ञान,दर्शन,उपदेश की हम जीवन में उतार लें तो कोई एसी शक्ति नहीं है जो हमारो विकास को रोक सके,हमारे समाज को सुंदर बनने से रोक सके।
संत विवेकानंद अमर तुम,
अमर तुम्हारी दिव्य वाणी l
तुम्हे सदा ही शीश नवाते,
भारत का प्राणी प्राणी ll
स्वामी विवेकानंद जी को शत शत नमन