Tuesday, 19 January 2016

21 वीं सदी में भी अंधविश्वास का बढ़ रहा प्रकोप

संदीप कुमार मिश्र: आज हम इक्कीसवीं सदी में जी रहे हैं...विकास के नए नए किर्तिमान गढ़ रहे हैं...देश-विदेश में सपेरों का देश कहा जाने वाला भारत कंप्यूटर और माउस से खेलने वाला देश बन गया है।बावजूद इसके हम कुछ रुढ़ीवादी परंपराओं,रीति-रिवाजों में जकड़े हुए हैं।सरकार के तमाम प्रयासों और कोशिशों के बाद भी सदियों पूरानी कुछ परम्पराओं का हम दमन नहीं कर पा रहे हैं...जो एक अभिशाप की तरह हमारे माथे पर लगा हुआ है...जिसके चलते पति रहते हमारे देश की पूज्यनीय महिलाओं को अशुभ और डायन बताया जाता है...।
दरअसल हमारे देश के ग्रामीण इलाकों में खासकर आदिवासी महिलाएं आज भी एक गहरे संकट से गुजर रही हैं।जी हां सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी महिलाओं को अशुभ और डायन बताना अब तक जारी है।जिसका सबसे घातक परिणाम होता है कि महिलाओं को डायन बताकर मार दिया जाता है।वहीं अगर कोई स्त्री विधवा या परित्यक्ता है, तो समाज से उसे पूरी तरह बहिष्कृत करने की कोशिश की जाती है। ऐसी सैकड़ों घटनाएं आपको देखने सुनने को मिल जाएंगी।
हमारे देश के अधिकांशत: गांवो और आदिवासी इलाकों में स्त्रीयों को लेकर तरह-तरह के रीति-रिवाज, परंपराएं और अंधविश्वास में जकड़ी हुई है। अब तो इन परंपराओं और अंधविश्वासों का एक यह नया रूप देखने को मिल रहा है,दरअसल जो महिलाएं लीक से हटकर काम कर रही हैं, समाज उनके खिलाफ ज्यादा कठोर रुख अपना रहा है। आपको याद होगा कि कैसे असम के कार्बी आंगलांग जिले की राष्ट्रीय एथलीट देबजानी बोरा को डायन बताकर उनके साथ मारपीट की गई थी। देबजानी का अपराध यह था कि राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं में उसने पदक जीते, जिससे उसका गांव चर्चा में आ गया।
जहां ऐसी सोच हो,वहां कोई गांव समाज कितना विकसीत हो सकता है आप समझ सकते हैं।देबजानी के साथ घटा यह एक ऐसा अजीबोगरीब मामला था जिसमें देश-दुनिया की जानकारी रखने वाली एथलीट को डायन कहा गया और प्रताड़ित किया गया । इस प्रकार की घटनाओं के मूल में एक सबसे बड़ा कारण निरक्षरता भी है।जिस वजह से ये घटनाएं समाज से कम नहीं हो रही है।जागरूकता की अनेकों कोशिश के बावजूद भी हमारा समाज महिलाओं को डायन कहकर प्रताड़ित करने से बाज नहीं आ रहा है।इस प्रकार की घटनाएं साबित करती हैं कि सामाजिक चेतना की जाग्रति के दावों और कानूनों की कड़ाई के बावजूद जादू-टोने और अंधविश्वास की रूढ़ियों के बीच ऐसी कुप्रथाएं अब भी जीवित हैं। हर साल सैकड़ों ग्रामीण महिलाएं इन कुरीतियों का शिकार होती हैं।
राष्ट्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के पिछले आंकड़ों के अनुसार, 2013 में देश के दूरदराज के इलाकों में जादू-टोने और अंधविश्वासों से जकड़े समाज ने एक सौ साठ महिलाओं को डायन कहकर मार दिया था। पिछले तीन-चार वर्षों में डायन के नाम पर लगभग 525 महिलाओं की हत्या की जा चुकी है। जहां तक डायन कहकर मार दी जाने वाली महिलाओं का प्रश्न है, उनकी सुरक्षा के संबंध में महिला-बाल विकास मंत्रालय की दलील है कि डायन के नाम पर प्रताड़ना और हत्या की घटनाएं भारतीय दंड संहिता के तहत दंडनीय अपराध हैं। यानी भले ही इस बारे में मंत्रालय के पास अपनी कोई योजना न हो, लेकिन अगर पहले से कायम कानूनों को ठीक से लागू किया जाए तो समस्या का समाधान हो सकता है।
लेकिन विडंबना देखिए कि ऐसे मामलों की जानकारी हमारी सरकारों को होते हुए भी इनकी रोकथाम नहीं हो रही है। दरअसल इस प्रकार की कुप्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सरकार की तरफ से भी कोई संरक्षण नहीं मिल पाता है,इस वजह से भी ऐसी प्रथाओं पर लगाम नहीं लग पा रही है।जिस वजह से ओझाओं, बाबाओं और तांत्रिकों की दुकानदारी पर लगाम नहीं लग पाती। यही वजह है कि कहीं महिलाओं को डायन तो कहीं डाकन, तेनी या टोनी, पनव्ती, मनहूस और ऐसे ही नामों से लांछित कर उसे समाज से बहिष्कृत किया जाता है।
आपको ये जानकर और भी अचंभा होगा कि तमाम मामलों में तो परिवार वाले और रिश्तेदार भी इन प्रथाओं को बढ़ाने का काम कर रहे हैं।बड़ा सवाल ये उठता है कि हमारे समाज में फैली इन कुरीतियों और अंधविश्वासों को कैसे खत्म किया जाए।निश्चित तौर पर शिक्षा का विस्तार करना तो है ही साथ ही इसका एक उपाय कानून बनाना भी हो सकता है। जिसमें अंधश्रद्धा फैलाने वालों को दंडित करने का प्रावधान हो। ब्रिटिश राज में 1829 में लॉर्ड बेंटिक ने जब तक सती प्रथा के विरोध में कानून नहीं बनाया, तब तक कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि पति के साथ चिता में उसकी विधवा को जला डालना एक अंधविश्वास है और कायदे से इसके लिए महिला को सती होने के लिए मजबूर करने वाले लोगों और समाज को दंडित किया जाना चाहिए।
अंतत: कहना गलत नहीं होगा कि इस अज्ञानता के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने और सख्त कानून की जरुरत है।उम्मीद की जानी चाहिए कि ऐसी कुप्रथाओं में कमी आ पाएगी।सरकार के साथ ही हम सब की भी जिम्मेदारी है कि देश को स्वस्थ और सुंदर बनाने के लिए एक आंदोलन छेड़ा जाए और अंधविश्वास की इस बिमारी का दाहसंस्कार कर दिया जाए..।