Saturday, 17 October 2015

रामराज्य के श्रीराम का जीवन चरित



                         ।।ऊं नमो नारायणाय रां रामाय नम:।।
संदीप कुमार मिश्र:  नवरात्र का पावन अवसर है देश में जहां शक्ति की आराधना हो रही है वहीं मर्यादापुरुषोत्म प्रभू श्रीराम का भी गुणगान हो रहा है।भगवान के भक्त प्रभू का गुणगान करने के लिए निरंतर नवरात्र के नौ दिनों तक श्रीरामचरित मानस का पाठ करते हैं और प्रक्षू श्रीराम जी महाराज के कृपा पात्र बनते हैं। आईए हम महाराजाधिराज प्रभू श्रीराम का गुणगान करें करें और जाने  दशरथनंदन के बारे में वो सब कुछ सरल भाव में जिससे हमारा जीवन मायारुपी संसार में रहते हुए भी श्रीराम का कृपापात्र बना रहे।क्योंकि मानस में कहा गया है-

                    ।मंगल भवन अमंगल हारी।द्बवहु सुदसरथ अचरबिहारी।



प्रभू श्रीराम भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे आदिपुरुष हैं,जो मानव मात्र की भलाई के लिए मानवीय रूप में इस धराधाम पर अवतरित हुए। मानव अस्तित्व की कठिनाइयों और कष्टों का उन्होंने स्वयं वरण किया जिससे कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों का संरक्षण किया जा सके और दुष्टों को दंड दिया जा सके। रामावतार भगवान विष्णु के सर्वाधिक महत्वपूर्ण अवतारों में सबसे सर्वोपरि है।
गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज के अनुसार श्रीराम नाम के दो अक्षरों में 'रा' तथा '' ताली की आवाज  की तरह हैं, जो हमारे मन के संदेह के पंछियों को हमसे दूर ले जाती हैं।ये हमें देवत्व शक्ति के प्रति विश्वास से ओत-प्रोत करते हैं। इस प्रकार वेदांत वैद्य जिस अनंत सच्चिदानंद तत्व में योगिवृंद रमण करते हैं।उसी को परम ब्रह्म श्रीराम कहते हैं।जैसा कि राम पूर्वतापिन्युपनिषद में कहा गया है-
     ।रमन्ते योगिनोअनन्ते नित्यानंदे चिदात्मनि। इति रामपदेनासौ परंब्रह्मभिधीयते।



हमारे संपूर्ण भारतीय समाज के लिए समान आदर्श के रूप में भगवान श्रीरामचन्द्र जी को को उत्तर से लेकर दक्षिण तक सभी लोगों ने स्वीकार किया है।आपको ये जानकर हैरानी होगी कि गुरु गोविंदसिंहजी ने भी रामकथा लिखी है।पूर्व की ओर कृतिवास रामायण तो वहीं महाराष्ट्र में भावार्थ रामायण चलती है। और हिन्दी में गोस्वामी तुलसी दासकृत  श्रीरामचरितमानस सर्वत्र प्रसिद्ध है। सुदूर दक्षिण में महाकवि कम्बन द्वारा लिखित कम्ब रामायण अत्यंत महत्वपूर्ण भक्तिपूर्ण ग्रंथ है।स्वयं गोस्वामी जी ने रामचरितमानस में राम ग्रंथों के विस्तार का वर्णन किया है-                                                                                 ।।नाना भांति राम अवतारा।रामायण सत कोटि अपारा॥




                          समुद्र इव गाम्भीर्ये धैर्यण हिमवानिव।

जब हम प्रभू श्रीराम जी के जीवन पर दृष्टि डालते हैं तो उसमें हमें कहीं भी अपूर्णता नजर नहीं आती है।जिस समय जैसा कार्य करना चाहिए रामजी ने उस समय वैसा ही किया।क्योंकि रामजी रीति, नीति, प्रीति और भीति को भलिभांति जानते हैं। राम परिपूर्ण हैं, आदर्श हैं। प्रभू का दिखाया हर एक नियम हमारे लिए त्याग का एक सुंदर आदर्श जनमानस में स्थापित करता है।

राम ने ईश्वर होते हुए भी मानव का रूप रचकर समस्त मानव जाति को मानवता का पाठ पढ़ाया। मानवता का उत्कृष्ट आदर्श स्थापित किया। उपनिषदों में राम नाम, अथवा अक्षर ब्रह्म हैं और इसका तात्पर्य तत्वमसि महावाक्य है-'' का अर्थ तत्‌(परमात्मा) है '' का अर्थ त्वम्‌(जीवात्मा) है तथा की मात्रा () असि की द्योतक है।हमारे जीवन में राम नाम उसी प्रकार जीवनधारा है जिस प्रकार दुध में धवलता।
 राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है।कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है॥

मनुष्य के जीवन में आने वाले सभी संबंधों को पूर्ण और उत्तम रूप से निभाने की शिक्षा देने वाले प्रभु श्री रामचन्द्रजी के समान दूसरा कोई चरित्र नहीं है।आदि कवि वाल्मीकि जी  ने भी  उनके संबंध में कहा है कि वे गाम्भीर्य में समुद्र के समान हैं।
महान राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने 'यशोधरा' में राम के आदर्शमय महान जीवन के विषय में कितना सहज और सरस भाव में लिखा हैश्रीराम का चरित्र नरत्व के लिए तेजोमय दीप स्तंभ है। वस्तुतः भगवान राम मर्यादा के परमादर्श के रूप में प्रतिष्ठित हैं। श्रीराम सदैव कर्तव्यनिष्ठा के प्रति आस्थावान रहे हैं। उन्होंने कभी भी लोक-मर्यादा के प्रति दौर्बल्य प्रकट नहीं होने दिया। इस प्रकार मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में श्रीराम सर्वत्र व्याप्त हैं। श्रीराम जी के चार रूप दर्शाए गए हैं।मर्यादा पुरुषोत्तम दशरथ-नंदन, अंतर्यामी, सौपाधिक ईश्वर तथा निर्विशेष ब्रह्म। लेकिन इन सबमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का चरित्र सर्वाधिक पूजनीय है।इसीलिए सर्वोपरि है रामावतार।

श्री राम का उज्जवल स्वरूप,सूर्य के तेज से भी अधिक प्रकाशमान है।राम का नाम सभी को भव सागर से पार लगा देता है। राम की भक्ति ही जीवन का आधार है।जिसकी डो़र को थामे हुए भक्त सभी कठिनाईयों से पार पा लेता है और उनकी भक्ति में लीन होकर जीवन को सदाचारी रूप में व्यतीत करते हुए  मोक्ष को पाता है।श्री राम जी हमारे प्रमुख देवों में से एक हैं जिनकी पूजा आराधना करने से सभी कष्ट और संकट क्षणभर में नष्ट हो जाते हैं।राम जी के स्मरण मात्र से ही सारी विपदाएं समाप्त हो जाती हैं। ऐसे अदभुत स्वरूप के गुणी प्रभु राम जी विष्णु भगवान के प्रमुख अवतारों में से एक हैं। संसार को पापियों से मुक्त करने के लिए भगवान श्री राम जी का अवतरण इस धराधआम पर होता है। उनका आगमन समस्त भक्तों के लिए मुक्ति का मार्ग रहा है,त्रेता युग में अवतरित हुए, भारत भूमि पर जन्मे, मर्यादापुरूषोतम थे श्री राम।
राम जी की जीवन गाथा को अनेकानेक ऋषियों ने अपने ग्रंथों में उतारा है। इनके जीवनकाल एवं पराक्रम, को महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत महाकाव्य रामायण के रूप में लिखा गया है।तो वहीं श्री राम जी के जीवनवृत पर तुलसीदास जी महाराज ने भी भक्ति काव्य श्री रामचरितमानस की रचना की। यह दोनों ही महाग्रंथ सनातन धर्म के पवित्र धार्मिक ग्रंथ हैं।

साथियों रामचन्द्र जी का संपूर्ण जीवन ही एक आदर्श रहा है। वह मर्यादापुरूषोतम कहलाए अपने कर्त्वय पालन के लिए, राम एक आदर्श पुरुष हैं।राम जी का जन्म पौराणिक काल में जैसा की हम सब जानते हैं अयोध्या यानी की अवधधाम के राजा दशरथ और रानी कौशल्या के सबसे बडे पुत्र के रूप में हुआ था। लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न राम जी के भाई थे।श्री राम जी का विवाह राजा जनक की पुत्री सीता जी के साथ हुआ था जो लक्ष्मी का अवतार मानी जाती हैं। हनुमान, भगवान राम के, सबसे बडे भक्त माने जाते है।
सर्वविदित है कि कैकेयी के वरदानों से बाधित होकर राजा दशरथ द्वारा रामजी को चौदह वर्ष का वनवास प्राप्त होता है।राम पिता की आज्ञा का पालन कर पत्नी एवं भाई लक्ष्मण समेत वनवास को चले जाते हैं। और वनवास के दौरान ही वह रावण का वध करके सभी को राक्षसों के अत्याचारों से मुक्त करते हैं और धर्म की पुन: स्थापना करते हैं।रामनाम की सर्वव्यापकता उनके अस्तित्व का प्रमाण है।

अपने सर्वधर्मसमभाव की भावना से ही राम एक आदर्श पुत्र, पति और प्रजापालक थे। तेजस्वी, बुद्धिमान, पराक्रमी, विद्वान, नीति-निपुण और मर्यादा पुरुषोत्तम थे। वनवास समाप्त होने के पश्चात वह अयोध्या के राजा बनते हैं और उनके राज्य को रामराज्य कहा जाता है। आपको जानकर हैरानी होगी कि रामजी के शासन काल में  कोई दरिद्र, दुःखी या दीन नहीं था। सभी समभाव से एक दूसरे के साथ रहते थे।छुआछूत का भेदभाव नहीं था।चारों वर्णों के लोग साथ-साथ सुख पूर्वक रहते थे।
संसार में नाना प्रकार के रोग, शोक, जन्म, मृत्यु, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार में फंसे मानव को सही मार्ग पर लाने के लिए प्रभु अवतरण लेते हैं।प्रभु श्रीराम जी पालक और सृष्टि के नियामक तत्व है।जो साकार रूप धारण कर अयोध्या में आए और अपने स्वरूप के दर्शन जनमानस को करवाए।

प्रभू श्रीराम जी ने ही सामाजिक क्रान्ति की नींव रखी।हमारे सामने ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जैसे नौका चलानेवाला केवट, भक्त शबरी, वानर जाति के सुग्रीव और अंगद, जामवंत, पक्षी जटायु आदि सब जन के साथ श्रीरामजी प्रेमपूर्ण सद्भाव और मैत्री का व्यवहार करते हैं, वहीं दूसरी ओर रामसेतु लंकाविजय सामूहिक एकता की विजय के प्रतीक के रुप में देखा जा सकता है।
भगवान राम आदर्श व्यक्तित्व के प्रतीक हैं। परिदृश्य अतीत का हो या वर्तमान का जनमानस ने रामजी के आदर्शों को खूब समझा-परखा है। लेकिन भगवान राम की प्रासंगिकता को संक्रमित करने का काम भी किया है। रामजी का पूरा जीवन आदर्शों, संघर्षों से भरा पड़ा है।उसे अगर हम अपना लें तो हमारा जीवन स्वर्ग बन जाए।लेकिन जनमानस तो सिर्फ रामजी की पूजा में व्यस्त है। यहाँ तक की हिंसा से भी उसे परहेज नहीं है।राम सिर्फ एक आदर्श पुत्र ही नहीं,आदर्श पति और भाई भी थे।आज कहीं कहीं इस आदर्शवाद से हम दूर होते जा रहे हैं।जो व्यक्ति संयमित, मर्यादित और संस्कारित जीवन जीता है,निःस्वार्थ भाव से उसी में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों की झलक परिलक्षित हो सकती है।रामजी के आदर्श लक्ष्मण रेखा की उस मर्यादा के समान है जो लांघी गई तो अनर्थ ही अनर्थ और सीमा की मर्यादा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। प्रजा का सच्चा जनसेवक राम जैसा आदर्श सद्चरित्र आज के युग में दुर्लभ है।क्योंकि हम राम को तो मानते हैं लेकिन राम की नहीं मानते है और ऐसी सोच को बदलना बेहद जरुरी है। हमारे जनप्रतिनिधि आज जनसेवा की बजाए स्वसेवा में ज्यादा विश्वास करते हैं, जबकि भगवान राम ने खुद मर्यादा का पालन करते हुए स्वयं को तकलीफ और दुःख देते हुए प्रजा को सुखी रखा। क्योंकि उनके लिए जनसेवा सर्वोपरि थी।राम जैसे आदर्श और मर्यादा यदि हममें होती तो आज स्त्रियों को अग्नि परीक्षा से नहीं गुजरना पड़ता। राम के चरित्र को केवल एक प्रतिशत ही हम अपने जीवन में आत्मसात कर लें, तो हम आज विश्व मंच पर सुशोभित हो जाएंगे।मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम समसामयिक है। भारतीय जनमानस के रोम-रोम में बसे श्रीराम की महिमा अपरंपार है।भगवान श्री विष्णुजी के बाद श्री नारायणजी के इस अवतार की आनंद अनुभूति के लिए देवाधिदेव स्वयंभू श्री महादेव ग्यारहवें रुद्र बनकर श्री मारुति नंदन के रूप में निकल पड़े।यहां तक कि भोलेनाथ स्वयं माता उमाजी को बताते हैं कि मैं तो राम नाम में ही वरण करता हूँ। जिस नाम के महान प्रभाव ने पत्थरों को तारा है, हमारी अंतिम यात्रा के समय भी इसी ' राम नाम सत्य है ' के घोष ने हमारी जीवनयात्रा पूर्ण की है।सच कहें तो श्रीराम जी की महिमा अपरंपार है।

राम चार भाईयों में से सबसे बड़े थे। इनके भाइयों के नाम लक्ष्मण जिन्हें भगवान शेषनागजी का अवतार माना जाता है। भरत जिन्हें भगवान ब्रह्मा जी का अवतार माना जाता है और शत्रुघ्नजी जिन्हें भगवान शिवजी का अवतार माना जाता है।राम बचपन से ही शान्त स्वाभाव के वीर पुरूष थे।उन्होने मर्यादाओं को हमेशा सर्वोच्च स्थान दिया था।इसी कारण उन्हे मर्यादा पुरूषोत्तमराम के नाम से जगत में जाना जाता है। उनका राज्य न्यायप्रिय और खुशहाल माना जाता था।इसलिए भारत में जब भी सुराज की बात होती है तो रामराज या रामराज्य का उदाहरण दिया जाता है।धर्म के मार्ग पर चलने वाले राम ने अपने तीनो भाइयों के साथ गुरू वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की। किशोरवय में विश्वामित्र उन्हे वन में राक्षसों द्वारा मचाए जा रहे उत्पात को समाप्त करने के लिए ले गये,जहां रामजी के साथ उनके छोटे भाई लक्ष्मण भी इस काम में उनके साथ थे और ताड़का नामक राक्षसी का वध किया। राम ने उस समय ताड़का नामक राक्षसी को मारा और  मारीच को पलायन के लिए मजबूर किया। इस दौरान ही विश्वामित्रजी उन्हें मिथिला ले गये।जहां विदेह राजा जनकजी ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के लिए एक समारोह का आयोजन किया था। जिस आयोजन में शर्त थी कि जो भी शिवजी के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा उसी शूरवीर के साथ  सीताजी का विवाह किया जाएगा।बहुत सारे राजा महाराजा उस समारोह में पधारे थे।बहुत से राजाओं के प्रयत्न के बाद भी जब धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाना तो दूर धनुष उठा तक नहीं सके तब विश्वामित्र की आज्ञा पाकर राम ने धनुष उठा कर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयत्न किया। उनकी प्रत्यंचा चढाने के प्रयत्न में ही वह महान धनुष घोर ध्वनि करते हुए टूट गया।महर्षि परशुराम ने जब इस घोर ध्वनि को सुना तो वहां गये और अपने गुरू यानी शिव का धनुष टूटने पर रोष व्यक्त करने लगे।जहां लक्ष्मण जी के उग्र स्वाभाव के कारण उनका वादविवाद परशुराम से हुआ। तब रामजी ने बीच-बचाव किया। इस प्रकार सीता का विवाह रामजी से संपन्न हुआ और परशुराम सहित समस्त लोगो ने आशीर्वाद दिया। अयोध्या में रामजी माता सीता के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। लोग राम को बहुत चाहते थे,उनकी मृदुल, जनसेवायुक्त भावना और न्यायप्रियता के कारण उनकी विशेष लोकप्रियता थी। राजा दशरथ वानप्रस्थ की ओर अग्रसर हो रहे थे, इसलिए उन्होने राज्यभार राम को सौंपनें का सोचा जिसे सुनकर जनता में भी सुख की लहर दौड़ गई की उनके प्रिय राजा,उनके प्रिय राजकुमार को राजा नियुक्त करनेवाले हैं। उस समय राम के अन्य दो भाई भरत और शत्रुघ्न अपने ननिहाल कैकेय गए हुए थे। कैकेयी की दासी मंथरा ने कैकेयी को भरमाया कि राजा तुम्हारे साथ गलत कर रहें है। तुम राजा की प्रिय रानी हो तो तुम्हारी संतान को राजा बनना चाहिए पर राजा दशरथ राम को राजा बनाना चाहते हैं।केयी चाहती थी उनके पु्त्र भरत राजा बनें इसलिए उन्होने राजा दशरथ द्वारा रामजी को चौदह वर्ष का वनवास दिलाया।रामजी ने अपने पिता की आज्ञा का पालन किया और पत्नी सीता सहित भाई लक्ष्मण के साथ वनवास गये।

वनवास के समय, रावण ने सीता का हरण किया था। रावण एक राक्षस और लंका का राजा था।रामायण के अनुसार, सीता और लक्ष्मण कुटिया में अकेले थे।तब एक हिरण की वाणी सुनकर सीताजी परेशान हो गयी।वह हिरण रावण का मामा मारीच था।.उसने रावण के कहने पर सुनहरे हिरण का रूप बनाया। सीताजी उसे देख कर मोहित हो गई और श्रीरामजी से उस हिरण का शिकार करने का अनुरोध किया।श्रीराम अपनी भार्या की इच्छा पूरी करने चल पडे, और लखनलाल जी से सीता की रक्षा करने को कहा। मारीच श्रीराम को बहुत दूर ले गया और मौका मिलते ही श्रीराम ने तीर चलाया और हिरण बने मारीच का वध किया। मरते मरते मारीच ने ज़ोर से "हे सीता ! हे लक्ष्मण" की आवाज़ लगायी।उस आवाज़ को सुन मातासीता चिन्तित हो गयीं। और उन्होंने लक्ष्मण को श्रीराम के पास जाने को कहा। लक्ष्मण जी जाना नहीं चाहते थे। पर अपनी भाभी की बात को इंकार कर सके। लक्ष्मण ने जाने से पहले एक रेखा खींची जो लक्ष्मण रेखा के नाम से प्रसिद्ध है।इसी समय रावण माता जानकी का हरण कर ले जाता है।जिसके बाद रामजी अपने भाई लक्ष्मण के साथ सीता की खोज मे दर-दर भटकते हुए हनुमानजी और सुग्रीव नामक दो वानरों से मिले। हनुमानजी प्रभू राम जी महाराज के सबसे बडे भक्त बने। माता सीता को वापिस प्राप्त करने के लिए भगवन राम ने हनुमान और वानर सेना की मदद से रावण के सभी बंधू-बांधवो और उसके वंशजोँ को पराजित किया ।भगवान राम ने जहां रावण को युद्ध में परास्त किया, वहीं उसके छोटे भाई विभीषण को लंका का राजा बना दिया।राम, सीता, लक्ष्मण और अपनी वानरी सेना के साथ  पुष्पक विमान से अयोध्या कि ओर प्रस्थान किया।जहां सबसे मिलने के बाद श्रीराम जी महाराज और मातासीता का अयोध्या मे राज्याभिषेक हुआ।जिसके बाद संपुर्ण राज्य कुशलता से समय व्यतीत करने लगा।

मानस में कहा गया कि राम चरित सुनहीं जे गावहीं,सुख संपत्ति नाना विधि पावहीं इसलिए दोस्तों नवरात्र के इस पावन समय में रामजी का गुणगान,उनकी मर्यादित कथा,सुनने का विधान हमारे र्म ग्रंथों में बताया गया है।यही वो समय था जब राम जी महाराज ने शक्ति की आराधना कर रावण को पराजित किया था।संपूर्ण संसार में रामराज्य की स्थापना की थी।जिसकी आवश्यकता एक बार फिर हमारे समाज को है।प्रेम से बोलिए-मर्यादापुरुषोत्तम राजा रामचंद जी महाराज की जय।।।