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Monday, 5 August 2019

श्रीनगर में कर्फ्यू का मतलब ?



संदीप कुमार मिश्र- भारत का स्वर्ग कहे जाने वाले श्रीनगर में कर्फ्यू लगा दिया गया है। कश्मीर के तकरीबन सभी नेताओं को नजरबंद कर दिया गया हैं।हमारी सेना और सुरक्षाबलों की गश्त तेज हो गई है।जिससे बेचैन होकर वहां के नेता लगातार ट्वीट कर रहे हैं- माहौल काफी गरम है। उनका कहना है कि-"कुछ बताया नहीं गया उन्हें ! ये जो हो रहा है, वो क्या है और क्यों है, पता नहीं चल रहा है."अब उन्हें कौन कहे कि आपको बताकर क्या हो जाएगा ?और यदि आपको बता ही दिया जाए तो क्या होगा ? आजादी के सात दशक बाद भी अब तक हुआ क्या ? तब तो हर बार बताया गया था न ? लेकिन हुआ क्या,आपकी लगातार धमकियां मिलती रही और पूर्व की हमारी सरकारें सत्ता मद में चूर सोती रही !

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि श्रीनगर में एक सिनेमा हॉल तक नहीं है,मॉल तो छोड़ ही दिजिए। शाम होते ही घाटी में सन्नाटा पसर जाता है,70 साल से अधिक हो गये देश को आज़ाद हुए लेकिन वहां के चंद सियासी परिवारों ने धरती के स्वर्ग को नर्क बना दिया है..और यही वजह है कि वो चाहते हैं कि कश्मीर की हालत जस की तस बनी रहे। लेकिन समय ने करवट ली और अब वहां के ज्यादातर लोग जो चाहते हैं कि माहौल बदले वो डर से कुछ कह नहीं पाते।जिस कश्मीर में किसी फौजी को कहीं घेरकर गला काट दिया जाता है, किसी इंफॉर्मर को डुबो डुबोकर मार दिया जाता है और सारा वीडियो वायरल कर दिया जाता है कि जो हिम्मत थोड़ी जुटा रहा होता है, वो डर कर बैठ जाता है – आप कह सकते हैं कि 70 साल से यही होता आया है।

कश्मीर के अलगाववादी नेता जो  भारत के पैसे पर ऐश तो करते हैं, घूमते-फिरते मौज करते हैं, लेकिन गाते पाकिस्तान की हैं।इन कश्मीरी नेताओं की औलादें तो विदेशों में पढती और रहती हैं। लेकिन कश्मीर की आम आबादी के हालात जस के तस हैं। यकिनन वहां के जो फर्जी राजनेता बने बैठे हैं, वो कश्मीर के विशेष अधिकार हनन के नाम पर भोलेभाले कश्मीरीयों में डर बनाकर हालात को खतरनाक बनाए रखने का स्वांग रचते हैं। मुमकिन है नई सरकार मोदी सरकार की अगुवाई में कश्मीर में एक नई भोर हो जिससे वहां के नौजवान को नई दिशा और दशा मिले और आनेवाली नस्ल 21वीं सदी का हिन्दुस्तान देख पाए।


Wednesday, 17 July 2019

जानिए सावन में कांवड़ का महत्व,कांवड़ यात्रा,कितने प्रकार के कांवड़ और क्या है कांवड़ के नियम



सावन में शिव भक्त कांवड़ यात्रा निकालते हैं।चारो तरफ बम-बम भोले की गूंज ही सुनाई देती है।आईए जानते हैं कितने प्रकार के होते हैं कांवड़-
1-सामान्य कांवड़
सामान्य कांवड़िये कांवड़ यात्रा के दौरान जहां चाहें वहीं रुककर आराम कर सकते हैं।आश्रम करने के लिए कई जगह पंडाल लगे होते हैं,जहां कांवडिये विश्राम करके आगे की यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं।
2-डाक कांवड़
डाक कांवड़िया कांवड़ यात्रा की शुरुआत से शिव को जलाभिषेक तक बिना रुके लगातार चलते रहते हैं।उनके लिए अलग से रास्ता बनाया जाता है जिससे कि वो शिवलिंग तक बिना रुके चलते रहें।
3-खड़ी कांवड़
खड़ी कांवड़ उठाने वाले के साथ कोई न कोई सहयोगी जरुर चलता है।जब वो आराम करते हैं तो सहयोगी अपने कंधे पर उनकी कांवड़ को लेकर चलने के अंदाज में हिलाता रहता है।
4-दांडी कांवड़
नदी तट से लेकर शिवधाम तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं।दांड़ी कांवड़ में कांवड़ पथ की दूरी को अपने शरीर की लंबाई से लेटकर नापते हुए यात्रा पूरी की जाती है।ये सबसे मुश्किल यात्रा होती है इसमें एक महिने का वक्त लग जाता है।
कांवड़ के नियम
कांवड़ यात्रा करने वालों के लिए शुद्ध शाकाहार अनिवार्य है।कांवड़ को बिना स्नान के छू भी नहीं सकते।चमड़े का स्पर्श वर्जित है।वाहन,चारपाई का प्रयोग मना है।वृक्ष के नीचे कांवड़ नहीं रखना होता है।अपने सीर के उपर से कांवड़ ले जाना भी वर्जित है।
 कांवड़ यात्रा से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है
 सच्ची श्रद्धा से कांधे पर कांवड़ रखकर बोलबम का नारा लगाते हुए पैदल यात्रा करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल प्राप्त होता है।सभी पापों का अंत हो जाता है और जन्म मरण के बंधन से मुक्ति मिल जाती है।शिवभक्त को मृत्यु के बाद शिवलोक की प्राप्ती होती है
।।ऊं नम:शिवाय।।



जानिए असाध्य रोग से मुक्ति पाने के लिए सावन में किससे करें शिव का अभिषेक




संदीप कुमार मिश्र- किसी लंबी बीमारी से परेशान व्यक्ति पर सावन के महीने में होगी महादेव कृपा।आईए जाने शारीरिक रोग या पीड़ा के हिसाब से भगवान शिव पर क्या करें अर्पित-
1-बार-बार बीमार होने पर
 सावन के महिने में भगवान शिव को कुशा अर्पित करें।कुशा को गंगा जल में मिलाकर शिवलिंग अर्पित करें और महादेव से अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें।
2-संतान सुख की प्राप्ति के लिए
सावन माह में कच्चे दूध में बास के पत्ते को पीसकर मिलाएं और शिवलिंग का अभिषेक करें और भगवान शिव से संतान प्राप्ति की प्रार्थना और कामना करें।
3-टीबी रोग से मुक्ति पाने के लिए
टीबी के मरीज को शिव चतुर्दशी के दिन भगवान शिव का शहद से अभिषेक करें।ऐसा आप सावन के प्रत्येक सोमवार को भी करें।लाभ होगा।
4-नई-नई बीमारी होने पर
एक के बाद एक नई बीमारी होने पर आप शिवलिंग पर भांग और धतूरा अर्पित करें।
5-लंबे से बुखार होने पर
त्रयोदशी और चतुर्दशी तिथि पर शिव मंदिर में शिवलिंग जल चढ़ाएं।
6- पैसे की तंगी से मुक्ति के लिए
सावन में प्रतिदिन सुबह स्नान करके शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर शहर मिश्रित जल अर्पित करें।आय में वृद्धि और आर्थिक स्थिति बेहर होगी।
7- वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए
वैवाहिक जीवन में कलह और कष्ट से मुक्ति पाने के लिए महादेव पर शहद मिला हुआ जल अर्पित करें।संभव हो तो पति-पत्नी मिलकर शिवलिंग का अभिषेक करें।
8-परीक्षा में सफलता पाने के लिए
विद्यार्थियों को भगवान शिव का अभिषेक दूध मिश्रित मिश्री से करना चाहिए।भोलेनाथ हो जाएंगे प्रसन्न।
9-व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए
गन्ने के रस से भगवान शिव का करें अभिषेक।व्यापार में होगी तरक्की और महादेव की आप पर हो जाएगी कृपा।
नोट-ये सभी उपाय आप करते रहें और साथ ही डाक्टर से परामर्थ और सलाह लेकर दवाओऔं का सेवन निरंतर करते रहे।


Tuesday, 9 July 2019

सावन विशेष 2019: सावन में शुभ संयोग/जाने क्यों है विशेष इस बार सावन



संदीप कुमार मिश्र: इस बार सावन की शुरुआत 17 जुलाई 2019 से हो रही है।महादेव की कृपा पाने के लिए भक्त जप,तप,व्रत बड़े ही भक्ति भाव से करते हैं।सावन का पवित्र मास में त्योहारों की भी शुरुआत हो जाती है।कहते हैं कि सावन का पवित्र मास भगवान शिव की अराधना का पवित्र महिना है।जहां भी नजर जाती है बर कोई भगवान शिव की पूजा अर्चना में लीन नजर आता है।सावन में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा बड़े ही भक्ति भाव के साथ होती है ।

कहा जाता है कि सावन में जो भक्त माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा विधि विधान से करते हैं उन्हें महादेव की कृपा मिलती है।आपको बता दें कि सावन का पहला सोमवार 22 जुलाई को है।
सावन के पवित्र महीने में भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया जाता है। इस बार सावन का महिना अतिविशेष है क्योंकि इस बार सावन के 4 सोमवार होंगे। सावन का अंतिम दिन 15 अगस्त को है और इस दिन स्वतंत्रतता दिवस के साथ रक्षाबंधन भी है।

शुभ संयोग की बात करें तो इस बार सावन में-
पहला सोमवार- श्रावण कृष्ण पंचमी तिथि
दूसरा सोमवार- त्रयोदशी प्रदोष व्रत के साथ ही सर्वार्थ अमृत सिद्धि योग
तीसरा सोमवार- नागपंचमी के शुभयोग      
चौथा सोमवार- त्रयोदशी तिथि के शुभ संयोग में मनाई जाएगी।
ये सभी तिथियां साधक को मनवांछित फल देने वाली हैं।इसलिए इसबार सावन में शिव की विशेष कृपा उनके भक्तों पर बनी रहेगी।ऊं नम: शिवाय।।




देवशयनी एकादशी विशेष: भगवान श्रीहरि के शयन में जाते ही रुक जाते हैं सभी शुभ मांगलिक कार्य



संदीप कुमार मिश्र: हमारे धर्म शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी जो कि 12 जुलाई 2019 से शुरु हो रही है।इसी समय भगवान विष्णु शयन में चले जाते हैं। जगत के पालनहार प्रभु श्रीहरि के शयन में जाने ही हिन्दू धर्म में सभी प्रकार के मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाता है और पुन: भगवान 8 नवंबर को जागेंग जिसके बाद चार माह तक चतुर्मास की साधना शुरु होगी।
सनातन धर्म शास्त्रों में देवशयन एकादशी का महत्व
हिन्दू धर्म शास्त्रों में एकादशी को पदमा, नामा, देवशयन एकादशी के नाम से भी लोग जानते है।देवशयनी एकादशी को ईश वंदना का विशेष पर्व कहा गया है। इसकी विशेषता इसलिए भी ज्यादा होती है क्योंकि साधक चार माह की अवधि में एक स्थान पर साधना करते है।इस दौरान जप,तप,व्रत का महत्व बढ़ जाता है।इसबार 12 जुलाई 2019 से 8 नवंबर 2019 तक चतुर्मास रहेगा।ऐसा हमारे पंचाग बता रहे हैं।
देवशयनी एकादशी पर भगवान श्रीहरि के पूजन का विशेष महत्व
इस विशेष अवसर पर भगवान विष्णु के विग्रह का पंचामृत में स्नान कराना चाहिएऔर फिर धूप दीप दिखलाते हुए पूजन करना चाहिए।विद्वान ये भी कहते हैं कि साधक भगवान श्रीहरि के शयन स्थान पर बिस्तर बिछाएं और उसपर पीले रंग का रेशमी कपड़ा बिछाएं। ऐसा कहा जाता है कि इस अवधि में भगवान विष्णु पाताल में राजा बलि के यहां विश्राम करते हैं। चार माह बाद कार्तिक शुक्लपक्ष की एकादशी को प्रभु के जागने के बाद मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाते हैं।
स्कंद पुराण में ऐसा वर्णित है कि भगवान  विष्णु के विश्राम करने की अवधि में माता लक्ष्मी और भगवान श्री हरि की आराधना की जाती है।इसलिए साधक को पूजन भजन अवश्य करना चाहिए।
इस अवधि में जाने क्या करें
इस विशेष अवसर पर साधक को  पृथ्वी पर सोना चाहिए और पूर्णरुपेण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए साथ ही   तेल,दूध और दही का त्याग करके   गुड़ शहद, नमक का सेवन करना चाहिए।भूलकर भी   शाक-चावल का सेवन नहीं करना चाहिए।धर्म की जय हो।।

Wednesday, 17 April 2019

सियासत, समीकरण और सम्मान



संदीप कुमार मिश्र- लोकतंत्र में चुनाव किसी उत्सव से कम नहीं होता है। सम्मानित जनतंत्र अपना प्रधान सेवक अपने मत के द्वारा चुनती है जिससे कि लोकतंत्र मजबूत हो,उसका और देश का सम्मान बना रहे। 
लेकिन सियासत में पार्टीयां समीकरण के आधार पर चुनाव लड़ती हैं मसलन किस लोकसभा / विधान सभा में किस बिरादरी का कितना प्रतिशत प्रभाव है,किसे प्रत्याशी बनाने से फलां वर्ग का वोट मिलेगा,किसका कितना रसूख है. .जैसे तमाम बातों पर गौर करके... !
सियासत का ये समीकरण जीत के लिहाज से ठीक भी है क्योंकि हारने के लिए कोई लड़ता तो है नहीं..जनता जनार्दन भी अपने हिसाब से बढ़चढ़ कर वोट की चोट करती है।खासकर जातीय बाहुल्यता के आधार पर(आज के राजनीति के हिसाब से तो 100% कह ही सकते हैं) हिन्दीभाषी राज्यों में विशेषकर...
मुद्दे चाहे कैसे भी हों मसलन, -रोज़गार,शिक्षा,स्वास्थ्य, सड़क,बिजली,पानी,राष्ट्र,सुरक्षा...कुछ भी हो, ये सब कुछ उस वक्त लुप्तप्राय हो जाते हैं जब बात जातिवाद और समीकरण की हो जाती है। 
ऐसे में आंकड़ों के इस गणित में मानवीयता, सम्मान, भावनाओं की अहमियत खत्म सी प्रतीत होने लगती है...शायद यही वजह है कि स्थानीय के स्थान पर बाहरी प्रत्याशी का चलन अब ज्यादा बढ़ चला है। खासकर प्रत्याशी में थोड़ी चमक दमक हो तो और भी। 
समीकरण बैठाते-बैठाते पार्टियों के मुखिया ये भूल कर बैठते हैं कि जो कार्यकर्ता अपना जीवन सेवा और समर्पित कार्यकर्ता के रुप में बिता चुका है उसके सम्मान को कितनी ठेस पहुंचती होगी..यही भावना जब प्रबल हो जाती है तो हार होते देर नहीं लगती...क्योंकि बात जब सम्मान की हो तो समझौता कम ही हो पाता है...। 
फूट डालकर राज करने की परंपरा आज भी जारी है थोड़ा कम या ज़्यादा हो सकता है लेकिन सियासत में इस परंपरा के पुरोधा आज भी विद्यमान हैं। किसी दल का नाम लेना ठीक नहीं है लेकिन इस देश की सम्मानित जनता सब जानती है कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है.. ! 
21वीं सदी का भारत विश्व में अपनी सशक्त पहचान बनाये, अपना सर्वोत्कृष्ट प्रदर्शन करे इसके लिए  जरुरी है कि बुनियाद मजबूत हो, और वो बुनियाद है सवा सौ करोड़ भारतीयों का सशक्त होना। ये तभी संभव हो पाएगा जब समीकरण से उपर उठाकर हमारे राजनेता विचार करना प्रारंभ करेंगे। 
यकीनन ऐसा संभव है लेकिन तब, जब नेता का सरोकार जनहित से,जनहित के लिए हो...नेता पांच साल में एक बार अपने लोकसभा/ विधानसभा क्षेत्र में सिर्फ वोट मांगने ना जाकर बार-बार जाएं,हर बार जाए..क्योंकि लोकतंत्र तब तक मजबूत नहीं हो सकता जब तक उसका जनतंत्र मजबूत ना हो और जनतंत्र तभी मजबूत होगा जब लोकतंत्र के रक्षक(नेता)जन के मध्य रहेंगे,उनकी समस्याओं के समाधान के लिए कार्य करेंगे।ना कि अपने फार्म हाउस बनाने,स्विस बैंक में धन जमा करने,कोठी अटारी और बैंक बैलेंस के लिए काम करें,....
अंतत: लोकतंत्र के इस महाउत्सव में आप सभी भागीदार बने,बढ़ चढ़ कर हिस्सा लें,अपने लिए मजबूत सरकार का चयन करें,ना कि मजबूर सरकार का....एक संविधान,एक प्रधान,एक विधान का चयन करें और हम सब भारतीय हैं.... कह कर स्वयं पर गर्व करें...।
!!भारत माता की जय!!
!!प्रणाम!!
संदीप कुमार मिश्र-

Wednesday, 10 April 2019

ये लोकतंत्र किसका है...?चलो वोट करें...!


संदीप कुमार मिश्र- जिस लोकतंत्र में हम जी रहे हैं...उस पर विचार करें तो ये सोचना स्वाभाविक सा है कि हमारा लोकतंत्र लोक-सुख का लोकतंत्र है...या लोक-दुख का...।हम जो स्वतंत्रता भोग रहे हैं...वह नैतिक स्वतंत्रता है...या अराजक...!
लोकतंत्र में कहते हैं कि बैलेट, बुलेट से ज्यादा ताकतवर होता है...लेकिन कई लोकतांत्रिक देशों में बुलेट ही ज्यादा ताकतवर रहा है जैसे हमारे पड़ोसी मुल्क में...
खैर भारत भी उसका अपवाद नहीं रहा है...ये सच है कि लोकतंत्र में मत या मतदाता नहीं...संख्या जीतती है...ये सही है कि लोकतंत्र अपने आदर्श रूप में जनता...और सत्ता के बीच संवाद की स्थापना करता है...लेकिन सही मायने में ये तभी संभव है जब सत्ता में बैठे लोग... लोकतांत्रिक मर्यादा में रहते हुए जनता जनार्दन से बेहतर संवाद स्थापित करें...
अब सवाल ये उठता है कि ...क्या लोकतंत्र जन और सत्ता के बीच संवाद है...स्वभाविक उत्तर होगा हां...क्योंकि संसद और विधानसभाओं में यह संवाद जनता की तरफ से जन-प्रतिनिधि करते हैं...अब प्रश्न है कि...यह संवाद जनता के हित...लाभ या सुख से जुड़ा है...या जनता के कष्ट और दुख से...?
तंत्र कोई भी हो...विडंबना ये है कि सत्ता सर्वप्रथम अपना ही सुख सुरक्षित रखती है...। सत्तासीन लोगों को न गैस का संकट...न उसकी कीमत बढ़ने-घटने का डर...उनके लिए न आधार कार्ड के लिए कतार में खड़े होकर कार्ड बनवाने का संकट...न राशन कार्ड...मतदाता पहचान पत्र, पैन कार्ड, आईडी कार्ड, पासपोर्ट बनवाने  का संकट...लोकतंत्र का लोक...चाहे युवा हो या वरिष्ठ नागरिक...उस पर व्यवस्था की कोई दया नहीं...संवेदना नहीं...बदलाव के इस दौर में आज भी एक वृद्ध स्त्री या पुरुष अपनी वरिष्ठता का झुर्रीदार चेहरा लिए याचक की तरह खड़े नजर आ जाएंगे...रेलवे की टिकट खिड़कियों पर...आधार कार्ड की लाइन में...बैंक में पेंशन काउंटर पर या आयकर के दफ्तरों के सामने...जिन लोगों के साथ रात-दिन काम करके एक सामान्य लोकसेवक रिटायर होता है...उसके साथी उसकी पेंशन और भविष्यनिधि से हिस्सा मांगते हैं...इन भ्रष्टाचार की ही देन है पूर्व में हुए अनेकानेक घोटाले...कहना गलत नहीं होगा कि आम नागरिक छोटे-छोटे भ्रष्टाचारों से त्रस्त है...तो खास आदमी बड़े-बड़े भ्रष्टाचारों से भी मुक्त हैं...।
दरअसल हमने शायद आचरण की पवित्रता के बजाय कदाचरण की कालिमा का लोकतंत्र बना रखा है...हमने अपने धनतंत्र से जनतंत्र को बंदी बना रखा है...कानून तो गरीबों के दलन या दमन के लिए है...अमीर तो कानून पर भी राज करते हैं...और सात समंदर पार जाकर मौज करते हैं...
आज़ादी के सात दशक बाद भी भारत जैसे विशाल देश में मकड़ी के जाले की तरह तने कानूनों में उलझता कौन आ रहा है...? केवल गरीब...समाज का दबा कुचला शोषित वंचित जन सामान्य...!
क्योंकि सवाल ये है कि ...जिस लोकतंत्र में हम जी रहे हैं...उसकी संसद यानी व्यवस्थापिका-विधायिका क्या हमारे सुख की रचना की व्यवस्था या विधान बनाती है...? कहा तो जाता है कि...कानून सत्ता और जनता के बीच एक प्रकार का अनुबंध है...लेकिन क्या सत्ता इस अनुबंध का पालन करती है...सत्ता में बैठने वाले चाहे बैलेट से जाएं या बुलेट से...वे तो अपने को जन...जनतंत्र और विधान- संविधान सबसे ऊपर ही मानते रहे हैं...
पुलिस का एक सिपाही या पटवारी रिश्वत लेते जिस तत्परता से पकड़ा जाता है...वैसी तत्परता से क्या कोई नेता...नौकरशाह या सत्ताधारी कभी पकड़ा गया...
यही वजह है कि हाल के वर्षों में लोकतंत्र के इस दुखद पहलू को युवाशक्ति ने समझा है...युवा जब सड़क से संसद तक और जनपथ से राजपथ तक पहुंचा तो...सरकारों को लगने लगा कि...एक ऐसी जनशक्ति का उदय होने लगा है...जो बूढ़े गिद्धों,वंशवादीयों को लोकतंत्र का मांस नोंचने नहीं देगी...
लोकतंत्र में विवाद...संवाद जैसे शब्द कुछ पढ़े-लिखे शब्दखोरों के लिए हैं...क्योंकि किसान बहस नहीं करता...सिर्फ काम करता है...मजदूर बहस करता भी है तो...काम के पैसों की...मगर काम पैसों से ज्यादा करता है...सांसद, विधायक, दफ्तरों में बैठे नौकरशाह बहस ही करते हैं...मीटिंग, सेमिनार, इन सबसे फुर्सत ही नहीं... इसलिए वे सिर्फ बहस करते हैं...काम नहीं...बहस उनका सुख है...जनता का दुख...नियम-कानून बनाना उनका सुख है...जनता का दुख...यह कैसा लोक- कल्याणकारी गणतंत्र है...जहां सत्ता के गणपति तो लंबोदर हो रहे हैं...और जनता चूहों की तरह अनाज के सड़े दानों के लिए भी मोहताज है...?
*अगर हमारे सात दशक से अधिक बड़े गणतंत्र में आज भी आम आदमी मजबूर है तो...यह मजबूरी किसने पैदा की...
*हमने देखा है अमीरों के लिए तो विश्व बैंक के कर्ज-कपाट खुले हैं...लेकिन कर्ज का धन जन के फर्ज पर कितना लगाया जा रहा है...
आज सत्ता के सिंहासन पर बैठना चुनौती भरा अवश्य है....विकास का मंत्र भी आकर्षक है...लेकिन सबसे बड़ा विकास तभी संभव है...जब जनता खुश रहे...सुखी रहे और लगे कि यह जनता के सुख का लोकतंत्र है...।
बहरहाल आज़ादी के सात दशक से अधिक बड़े गणतंत्र में *आज भी देश का आम आदमी मजबूर है तो सवाल ये है कि...यह मजबूरी किसने पैदा की...?
*अमीरों के लिए बैंक के दरवाजे खोल कर रखे गए जिससे वो आम आदमी की गाढ़ी कमाई लेकर भाग सके तो ये हालात किसने पैदा किए...?
*21वीं सदी के भारत में आज भी घोषणा पत्र में गरीबी दूर करने की बात हो रही है तो कमी कहां रह गयी. .? *बेरोजगारी सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है तो जिम्मेदार कौन है. .?
*आज भी भ्रष्टाचार पर लगाम क्यों नहीं लग पा रहा है,जिम्मेदारी किसकी है. ..?
*देश के अन्नदाता की हालत जस की तस बनी हुई है. कैसे सुधरेंगे उनके हालात. .?
*विश्वबैंक या फिर टैक्स के धन का जन के फर्ज पर कितना लगाया जा रहा है...?
आईए लोकतंत्र को शक्ति प्रदान करने के लिए सही नेतृत्व का चुनाव करें, और एक मजबूत सरकार के लिए वोट करें ना कि मजबूर सरकार के लिए..।क्योंकि भारत सशक्त होगा तो हम भी समृद्ध होंगे...जय हिन्द

वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...