आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है।
'संबोधन' के इस पहले अंक में हम विश्लेषण कर रहे हैं कि कैसे समसामयिक घटनाक्रम और वैश्विक नीतियां भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को प्रभावित कर रही हैं। चाहे वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की बढ़ती साख हो या देश के भीतर सांस्कृतिक प्रतीकों का पुनरुत्थान, यह साफ है कि आधुनिकता का रास्ता पश्चिम से होकर नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति के संवर्धन से ही निकलेगा।