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Thursday, 10 December 2015

ढ़ाई लाख रुपये की कीमत तुम क्या जानो सांसद जी..!


टूकड़े टूकड़े हो बिखर चुकी मर्यादा,
इसको दोनो पक्षों ने ही तोड़ा है।
संदीप कुमार मिश्र :  दरअसल ये अंधायुग जिसे धरमवीर भारती जी ने लिखा है उसकी चंद लाइने हैं,जिन्हे पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे कि इस देश का आम आदमी आजादी के बाद फिर से एक नए अंधेयूग में आ गया है,जहां कौरव और पांडवो की तरह ही हमारे नेता सत्ता पाने की ज़द्दोज़हद में अपनो के ही दुश्मन बन गए हैं।लेकिन विडंबना देखिए कि इस दुश्मनी का खामियाजा किसी और को नहीं जनता जनार्दन को बनना पड़ रहा है।ये जानकर बड़ी हैरानी होगी आपको कि संसद की कार्यवाही एक मिनट ना चलने से ढ़ाई लाख रुपये का नुकसान होता है।

दरअसल लोकतंत्र का मंदिर होता है संसद,जहां जनता के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधी,जनता की सहुलियतों और बुनियादी सुविधाओं को पूरा करने के लिए बहस करते हैं और सरकार से मांग कर क्षेत्र और देश के विकास में सहभागी बनते है।लेकिन विड़ंबना देखिए कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत जहां कि संसद में सांसद अपने काम के लिए कम,हंगामे के लिए ज्यादा पहचाने जाने लगे हैं।ये बातें हम सब को जानना बहुत जरुरी है,क्योंकि राह चलते किसी आम आदमी से आप पूछ लें की संसद की कार्वाही ना चलने से आपका क्या नुकसान होता है तो उसे पता नहीं होगा।जिसे जानना हर किसी को बेहद जरुरी है कि आपका कितना नुकसान होता है।तो दोस्तों जान लिजिए संसद की कार्यवाही 1 मिनट ना चलने से ढ़ाई लाख रुपये का शुद्ध नुकसान आम आदमी का होता है।

संसद में शायद ही ऐसा कोई नेता होगा या सांसद होगा जो करोड़पती नहीं होगा।इसलिए उनके लिए हंगामा करने से कोई नुकसान नहीं होगा लेकिन आम आदमी जो एक एक रोटी के लिए दिन रात एक कर के मेहनत करता है उससे कोई ढ़ाई लाख के रुपये के महत्व के बारे में आप पूछें तो यकीन मानिए एक आदमी की रोजी रोटी का अच्छा जुगाड़ इन ढ़ाई लाख रुपयों से हो सकता है।ऐसे में आप किसी आदमी से जाकर कहें कि संसद की कार्यवाही पर प्रति मिनट ढाई लाख रुपये खर्च होता है और वो पैसा आपकी कमाई से जाता है,जिसका सांसद नुकसान कर रहे हैं तो हर कोई हैरान हो जाएगा।

इतना जानने के बाद आपके मन में एक उत्सुकता जरुर होगी कि आखिर ये ढाई लाख रुपये का आंकड़ा कहां से आया।तो साब आपको बता दें कि साल 2012 में उस वक्त की यूपीए सरकार ने सदन को यही बताया था कि संसद की प्रति मिनट कार्यवाही पर ढ़ाई लाख रुपये खर्च होते हैं। संसद की एक घंटे की कार्यवाही पर ड़ेढ़ करोड़ रुपये और पूरे दिन के काम पर करीब नौ करोड़ रुपये खर्च होते हैं।अब यहां गौर करने वाली बात ये है कि  ये आंकड़ा सन 2012 का है,जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी।जरा सोचिए कि 2012 से लेकर 2015 तक देश में महंगाई किस स्तर पर पहुंच चुकी है।ऐसे में समय के साथ संसद की कार्यवाही का खर्च भी बढ़ चुका होगा लेकिन हमारे माननीय सांसद लगता है कि ढाई लाख के आंकड़े को  भूल चुके हैं।

15वीं लोकसभा का हाल देखने के बाद आम जनमानस को ये उम्मीद थी कि इस लोकसभा में हालात में सुधार होगा।और संसद में कार्य सुचारु रुप से चलेगा लेकिन अब तक ऐसा नजर नहीं आया।दरअसल 16वीं लोकसभा में अब तक नुकसान पर नजर ड़ालें तो - पहले सत्र में हुए हंगामे के कारण 16 मिनट बर्बाद हुए यानी 40 लाख का नुकसान हुआ।वहीं दूसरे सत्र में 13 घंटे 51 मिनट बर्बाद हुए यानी 20 करोड़ 7 लाख का नुकसान।तीसरे सत्र में 3 घंटे, 28 मिनट काम नहीं हुआ यानी 5 करोड़ 20 लाख का नुकसान। चौथे सत्र में 7 घंटे, 4 मिनट बर्बाद हुए यानी 10 करोड़ 60 लाख रुपये का नुकसान।पांचवे सत्र में 119 घंटे बर्बाद हुए यानी 178 करोड़ 50 लाख का नुकसान हुआ।
छठवें और वर्तमान सत्र में भी काम बड़ी ही धिमी गती से हो रहा है।जिसकी वजह से हमारी और आपकी जेब से हर मिनट ढाई लाख रुपये की बर्बादी हो रही हैं।एक मिनट में ढाई लाख रुपये का नुकसान हमारा आपका हो जाए तो रातों की नींद और दिन का चैन उड़ जाता है लेकिन अफसोस कि हमारे नेता जी लोगों को ये बात समझ नहीं आती।

बहरहाल संसद में जिस प्रकार से प्रतिदिन हंगामा हो रहा है,उससे देश के अधिकांश लोगों में  निराश और उदासी हैं। सियासी बयानबाजियों के बीच आखिर संसद में काम कब होगा, कोई नहीं जानता। कब सांसद उनके ऊपर होने वाले प्रति मिनट ढाई लाख के खर्च का ऐहसास करेंगे, कोई नहीं जानता।ये बात विपक्ष और सरकार दोनो को समझनी होगी कि आपकी लड़ाई में आखिर नुकसान किसका हो रहा हैजिसके आप प्रतिनिधि हैं,जिनको आपसे ढ़ेरों उम्मीदे हैं।


अंतत : जरा सोचिए कि गरीब लोगों के पसीने की गाढ़ी कमाई को बर्बाद करने वाली हमारे नेताओं की प्रवृत्ति देश को किस दिशा में ले जा रही है।जनप्रतिनिधि यानि हमारे सांसदो के उग्र और बेतुके रवयै को देखकर मन में हजारों सवाल उठते हैं,कि कभी तो देश हित में भी सोच लिया करो।  बड़े दुख से मन में कुछ सवाल उठते हैं कि क्या सांसदों और हंगामा पार्टी वालों को देश की जनता को आश्वस्त करने की कोई ईमानदार कोशिश नहीं करनी चाहिए? कि हम जनता के प्रतिनिधि जनता के हित के लिए ही कार्य करेंगे,अन्यथा हमें जनप्रतिनिधि बने रहने का कोई हक नहीं है...?

मनतंत्र से देश नहीं चलता, मारा जा रहा गरीबों का हक

संदीप कुमार मिश्र : एक के बाद एक संसद की कार्यवाही लगातार बाधित हो रही है,कभी किसी मुद्दे पर तो कभी किसी।मोटी मोटी तनख्वाह पाने वाले पूंजीपती सांसद संसद में हंगामा करके गरीबों का हक मार रहे हैं।नेताओं का तो कुछ नहीं जा रहा लेकिन जनता की गाढ़ी कमाई हंगामें की भेंट चढ़ रही है।जिसकी जवाबदेही कोई भी पार्टी लेने को तैयार नहीं है।सरकार विपक्ष से संसद चलने का आग्रह कर रही है,और विपक्ष लगातार संसद की कार्यवाही को हंगामें की भेंट चढ़ा रहा है जिसकी वजह से जनहीत के तमाम महत्वपूर्ण बिल पास नहीं हो पा रहे है।ये सही है कि लोकतंत्र में विपक्ष को आवाज उठाने का हक है,विरोध करने का अधिकार है लेकिन ऐसे भी विरोध का क्या फायदा कि संसद ठप्प हो जाए।
दरअसल कांग्रेस लगातार संसद के शीतसत्र में हंगामा कर रही है,क्योंकि सरकार ने कहीं ना कहीं उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है,जिसकी वजह से संसद नहीं चल पा रही है,जिसके जवाब में आज प्रधानमंत्री को संसद में बोलना ही पड़ा।जब लगातार संसद हंगामें की भेंट चढ़ रहा था तो कहीं ना कहीं आजिज होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रत्यतक्ष रुप से कांग्रेस पर जमकर निशाना साधा।प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि ये दुख की बात है कि संसद नहीं चल रही है।एक समाचार पत्र के कार्यक्रम में पीएम मोदी का कहना था कि मनतंत्र से देश नहीं चल सकता और लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा मनतंत्र से ही है।लोकतंत्र किसी की मर्जी और पसंद के अनुसार काम नहीं कर सकता है।
क्योंकि लगातार संसद की कार्यवाही में बाधा पड़ने से हक गरीबों का मारा जाता है।संसद की कार्यवाही अगर शुचारु रुप से चलती तो सिप्फ जीएसटी ही नहीं,और भी गरीबों की भलाई से संबंधीत अटके हुए काम संसद में पास हो पाते। आपको बता दें कि कांग्रेसी सांसदों के कथित बदले की राजनीतिके विरोध में हंगामा किए जाने की वजह से संसद के दोनों सदनों की कार्यवाही बीते तीन दिनों से लगातार बाधित हो रही है और संसद में किसी भी प्रकार का काम नहीं हो पा रहा है।
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में ये भी कहा कि अगर ईमानदारी से कोशिश की जाए तो बदलाव मुमकिन है। देश के विकास के लिए भागीदारी बहुत जरूरी है। हर छोटे काम के लिए सरकार पर निर्भरता ठीक नहीं। हम भारत की विकास यात्रा को एक जन आंदोलन बनाएं। पीएम का ये भी कहना था कि जन सामर्थ्य को स्वीकार करें, तभी वह सच्चे अर्थ में लोकतंत्र में परिणत होता है।

अंतत: कांग्रेस सहीत अन्य सभी विपक्षी पार्टीयों को सोचने की जरुरत है कि संसद की कार्यवाही पर नजर सिर्फ देश की जनता की ही नहीं,विश्व भर की लगी रहती है।ऐसे में संसद की कार्यवाही को ठप करके हम क्या साबीत करना चाहते हैं।लोकतंत्र को सही मायने में समझने की जरुरत है,और संविधान की बाते करने भर से काम नहीं चल सकता बव्कि उसे सही मायने में क्रियान्वीत करने की जरुरत है।देश आगे बढ़ रहा है,अपनी पहचान को भारत नीत नई उंचाईंयों पर ले जा रहा है,जिसमें हम सब सहयोगी की भूमिका में रहें ना कि निराशा पैदा करें।वरना चुनाव तो हर पांच साल बाद आता ही है,हिसाब देश की सम्मानित जनता कर ही लेगी।

Wednesday, 9 December 2015

मैं इंदिरा की बहू हूं, किसी से नहीं डरती : चाहे भले जीएसटी लटक जाए…!


संदीप कुमार मिश्र : संसद की शीत सत्र एक बार फिर हंगामें की भेंट चढने को तैयार है...जिसके लिए तरोताजा मुद्दा तैयार हुआ वो है हेराल्ड का।जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी शामिल हैं।जब बात साब गांधी परिवार की हो तो सभी मुद्दे गौंड हो जाते है इस देश में।अब कांहे की असहिष्णुता,कांहे का विकास की बात और कांहें का जीएसटी।सत्र के आगाज से पहले कुछ उम्मीद थी कि जीएसटी बिल पास हो जाएगा लेकिन जिस प्रकार से संसद में लगातार हंगामा हो रहा उसे देखकर नहीं लगता कि कोई भी महत्वपूर्ण कार्य इस बार भी संसद में हो पाएगा।अब तो ऐसा लगने लगा है कि संसद के शीत सत्र में गर्मी का एहसास देने के लिए कांग्रेस ने कमर कस ली है,इसके लिए चाहे भले ही जनता की गाढ़ी कमाई का सत्यानाश हो जाए।

दरअसल नेशनल हेराल्ड के विवादास्पद मामले पर जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा कि , मैं इंदिरा की बहू हूं, किसी से नहीं डरती...और अपनी मां के सुर मे सुर मिलाते हुए राहुल गांधी ने कहा कि सरकार बदले की भावना से कारवाई कर रही है और मेरा मुंह बंद कराना चाहती है, मगर मैं चुप नहीं रहूंगा...।इस तरह की बातें बहुत कुछ कह जाती हैं और ये अहसास करा देती हैं कि संसद में क्या होने वाला है।

अब साब इस प्रकार के दोनों बयानों से ये तो जाहिर हो गया कि सरकार और विपक्ष की जिस खाई को प्रधानमंत्री मोदी भरना चाहते थे वो कांग्रेस के सांसदों के तेवर देखकर संभव नहीं लगता। और यही कारण है कि संसद के शीतसत्र में ना तो जीएसटी बिल पास होगा और ना ही कोई और महत्वपूर्ण कार्य हो पाएगा।वहीं बीजेपी कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि कोई भी राजनीतिक दल कारोबार को कैसे कर सकती है। जबकि बीजेपी पर पलटवार करते हुए कपिल सिब्बल ने कहा कि बीजेपी भी केनस्टार म्युचुअल फंड में पैसा लगा चुकी है, और डिविडेंड भी हासिल किया है।साथ ही सिब्बल ने ये भी कहा कि बीजेपी ने भी एक अखबार चलाया हुआ है, और इनकमटैक्स के रिर्टन में घाटा भी दर्शाया था।

दरअसल इस पूरे मामले में खुद सुब्रमण्यम स्वामी ने चुनाव आयोग से पूछा था कि किसी भी राजनीतिक दल के पैसे खर्च करने के नियम क्या हैं,जिसके जबाब में चुनाव आयोग ने स्पस्ट कहा कि किसी भी राजनीतिक दल के पास पैसा कैसे आता है, उसका तो नियम है लेकिन कोई भी दल उसे कैसे खर्च करता है,इसका कोई भी प्रावधान नहीं है। ऐसे में किसी दल द्वारा लोन देना, लोन माफ करना कोई अपराध नहीं है...आपको बता दें कि यंग इंडियन ने कंपनी एक्ट के माध्यम से एसोसिएट जर्नल्स का अधिग्रहण किया था। जिसका दो तिहाई बहुमत से शेयर होल्डरों ने प्रस्ताव पास किया और यह सब एक्ट्रा ऑडिनरी जेनरल मींटिंग में हुआ।वहीं कांग्रेस का ये कहना है कि यंग इंडियन सेक्शन 25 कंपनी है, यानि यह चैरिटी के लिए है और प्रॉफिट या कोई डिविडेंट नहीं ले सकती। ऐसे में सोनिया या राहुल पर फायदा उठाने का आरोप किसी भी सूरतेहाल में नहीं लगाया जा सकता।

खैर कांग्रेस और सरकार की इस लड़ाई में नुकसान जनता का है क्योंकि संसद का शीतकालीन सत्र नहीं चलने से जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण बिल पास नहीं हो पाएंगे।अब लगता कुछ ऐसा है कि 19 दिसंबर तक कांग्रेस इस मुद्दे को किसी न किसी तरह जिंदा रखेगी, क्योंकि कांग्रेस ने यह तय कर लिया है कि राहुल और सोनिया अदालत में पेश होंगें और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा नहीं खटखटाऐंगे। यानि ये मान लिया जाए कि हेराल्ड की लड़ाई लंबी चलने वाली है।क्योंकि कहीं ना कहीं ऐसा लगता है कि कांग्रेस नहीं चाहती है कि संसद के शीतकालीन सत्र में जीएसटी पारित हो। यदि शीतकालीन सत्र में जीएसटी पास नहीं होता है, तो यह 2016 के अप्रैल से लागू भी नहीं हो पाएगा।

अंतत: विपक्ष और सरकार की लड़ाई में नुकसान जनता का हो रहा है।जिसपर सभी विपक्षी दलों को सोचने की जरुरत है, और खासकर सत्तापक्ष को ज्यादा।क्योंकि सरकार आप हैं,और जनता की जवादेही आपकी ही होगी।विपक्ष का क्या है 44 से 4 पर आ जाएंगे लेकिन आप ने तो अच्छे दिन का वादा किया था उसका क्या होगा,...ये तो आपको ही सोचना होगा,जनता सब जानती है..लोकतंत्र का महाउत्सव पांच साल बाद फिर आता है...तब जवाब देना भारी पड़ जाएगा जनाब...।सोचिए....क्या करना है...?


हेराल्ड के जिन्न ने कांग्रेस को बनाया असहिष्णु...!


संदीप कुमार मिश्र : दोस्तों ये कहना तो ठीक नहीं लगता लेकिन कहना तो पड़ेगा ही कि जब संसद में भी शोर हंगामा बरपने लगे और जनता की गाढ़ी कमाई पानी की तरह बाया जाए तो तकलीप तो होगी ही।दरअसल आपको याद होगा कि बिहार चुनाव से शुरु हुआ असहिष्णुता का पिछले दिनों काफी सुर्खीयों में रहा।लेकिन अब कुछ शांत हो गया है,क्योंकि फिलहाल किसी राज्य में चुनाव नहीं हैं,लेकिन उस वक्त विपक्ष ने मोदी सरकार पर एक के बाद एक अनेकों शब्दों के व्यंग वाण छोड़े जो अब भी सुनने को मिल यदा कदा मिल ही जाती है।मोदी सरकार पर लगातार आरोप लगते रहे कि नई सरकार बनने के बाद देश में असहिष्णुता बढ़ी है।

लेकिन अफसोस की जिस पार्टी ने असहिष्णुता पर सबसे ज्यादा देश में बवाल काटा वो थी कांग्रेस। जो अब खुद सबसे बड़ी असहिष्णु होती नजर आ रही है।अब संसद में जिस तरह का हंगामा चल रहा है उसे देखकर तो यही कहा जाएगा।अब ऐसा क्यों कहना पड़ रहा है ये भी जान लिजिए।दरअसल नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके सुपुत्र कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी की याचिका हाईकोर्ट में खारिज क्या हुई साब पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी झल्ला उठी। अब साब याचिका खारिज होने का मतलब तो आपर जानते हैं कि सोनिया गांधी और राहुल बाबा को कोर्ट में पेश होना होगा। आप सोच सकते हैं कि आखिर गांधी परिवार कैसे कोर्ट में हाजिर होता,बस फिर क्या था,कांग्रेस पार्टी का असहिष्णु चेहरा सामने आ गया।जो दूसरे को तो असहिष्णु बताते हैं लेकिन जब बात अपने पर आती है तो बसससससस...।

समझ में नहीं आता कि जब खुद कोर्ट में पेश होने की बारी आई तो केंद्र सरकार पर आपने आरोप लगा दिया की ये सब बदले की भावना से किया जा रहा है।अब भईया थोड़ी सी जो हमारी जानकारी है वो तो यही कहती है कि कोर्ट के काम में किसी सरकार का दखल नहीं होता है जी। इस देश में सबसे ज्यादा सत्ता का सुख कांग्रेस ने ही उठाया इसलिए समस्त कांग्रेसीयों को ये बात तो मालूम ही होनी चाहिए...ना जाने क्यूं कांग्रेसी नेताओं को अब लगने लगा कि ये बदले की भावना से की गई कार्यवाही है...।मोदी सरकार पर बदले की कार्रवाई का आरोप मढ़ कर साब आपने तो संसद में खुब हंगामा काटा और काट रे हैं क्योंकि संसद की कार्यवाही में लगने वाला धन आपकी जेब से तो जाता नहीं है।मजे की बात तो ये है कि जब राहुल बाबा तमिलनाडु में बाढ़ पीड़ितों के हाल जानने गए तो वहां भी बात बाढ़ पीड़ितो की बात करने की बडाय सरकार पर आरोप मढ़ने लगे कि बदले की भावना से की जा रही कार्यवाही है।अजी साब समय काल और परिस्थिति तो देख लेते।आप कहां है किस लिए गए है क्या वहां बदले की भावना की बात करना जरुरू था क्या...या फिर आपने सोच लिया था कि 44 से 4 अच्छे हैं के लिए आप तैयारी कर रहे हैं।

अंतत: समस्त कांग्रेसियों से करबद्ध प्रार्थना करता है ये देश कि संसद की कार्यवाही में बाधक ना बनें और संसद,संविधान का सम्मान आप भी करें,क्योंकि आप भी उसी दायरे में हैं जिसमें हम सब भारतीय।

कांग्रेस के लिए दोस्तों क्या कहना गलत होगा कि 
असहिष्णुता के पैरोकार वालों आप तो बड़े असहिष्णु हैं जी...!



पाकिस्तान से वार्ता,रिश्तों की नई शुरुआत...!


संदीप कुमार मिश्र : दोस्तों कहते हैं दिल मिले ना मिले ना मिले हाथ मिलाते रहिए।कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है भारत-पाक रिश्ते में भी।क्योंकि आतंक की जननी पाकिस्तान से भी भारत ने सकारात्मका की उम्मीद करते हुए बातचीत की नई शुरुआत की है।दरअसल बातचीत का सिलसिला पेरिस में ही उस वक्त शुरु हो गया था जब दोनो देशों के समकक्ष मिले,जिसकी पहल खुद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही की।इस पहल को विश्व के हर देश ने सराहा और उम्मीद जताई की बातचीत से ही किसी भी मसले का ह निकाला जा सकता है।खैर जलवायु परिवर्तन के सिलसिले में जहां विश्व के सभी राष्ट्राध्यक्ष इकट्ठे हों वहां मुलाकात सम्भव थी।

लेकिन भारत और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच बैंकॉक में हुई छह दिसंबर की मुलाकात की अप्रत्यासित खबर ने सबको चौंका दिया।इस मुलाकात में सूसे मजे की बात ये रही कि मीडिया के कोजी कैमरे को इसकी भनक तक नहीं लगी।पता तो तब चला जब भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई,जिसमें दोनो देशों के NSA की मुलाकात की तस्वीरें साझा की गई।जिसके बाद ये पता चला कि भारत के एनएसए अजीत डोवाल और उनके पाकिस्तान के एनएसए नसीर खान जनजुआ के बीच बैठक हुई है। जिसमें सबसे ज्वलंत मुद्दा आतंकवाद के साथ ही  कश्मीर और कई अन्य मुद्दों पर चर्चा हुई। इस मुलाकात में एक और अहम बात ये रही कि जब ये वार्ता हो रही थी तब दोनों देशों के विदेश सचिव भी मौजूद थे।

जब बात गुपचुप तरीके से हो तो जनाब सियासत कैसे ना होती तो इस अहम बैठक को लेकर विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर सवाल उठा दिए कि अगस्त 2015 के बाद से ऐसा क्या बदल गया कि दोनों देश बातचीत के लिए एक मंच पर आ गए।वहीं विपक्ष का ये भी कहना था कि सीमा पार से आतंकवाद और घुसपैठ की घटनाएं जब लगातार जारी हों तो ऐसे में पाकिस्तान के साथ बातचीत करने का औचित्य क्या है। अब साब विपक्ष को तो एक बहाना चाहिए था सो कांग्रेस ने इस बातचीत को देश के साथ धोखा तक बता दिया।अब बोलने में क्या हर्ज है जनाब,कुछ भी बोल दिजिए।

लेकिन एक बात तो है वो ये कि कहीं ना कहीं विपक्षी दलों की बात में दम भी नजर आता है क्योंकि पीएम मोदी हमेशा कहते रहे हैं कि गोलीबारी और बातचीत एक साथ नहीं चल सकती। बातचीत के लिए उपयुक्त माहौल का बनना जरूरी है,लेकिन दोनो देशों में हुई NSA लेबल की बातचीत ने हर किसी को  चौंका दिया।कुछ ने स्वागत किया तो कुछ ने शंकाएं व्यक्त की।लेकिन एक बात तो तय थी कि NSA लेबल की इस बातचीत ने वार्ता के रास्ते जरुर खोल दिए थे।

दरअसल 2016 में सार्क सम्मेलन होने हैं जो पाकिस्तान में होना प्रस्तावित है। इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पीएम मोदी को पाकिस्तान की यात्रा करनी होगी,जिसके लिए एक बेहतर माहौल की जरुरत होगी और मुलाकात का शुरु हुआ ये सिलसिला उसी जमीन को तैयार करने की क सार्थक कोशिश है। ये बात हर कोई जानता है कि पाकिस्तान की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों पर पाकिस्तान की  सेना का हर प्रकार से दखल होता है।और सेना की मर्जी के खिलाफ सरकार कुछ नहीं कर पाती है।आपको बता दें कि पाकिस्तान के जनरल राहील शरीफ ने अक्टूबर में रिटायर हुए लेफ्टिनेंट जनरल नसीर खान जनजुआ को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया।कहा ये भी जाता है कि जनजुआ पाकिस्तानी जनरल के काफी करीब हैं। जिस वजह से डोवाल के साथ जनजुआ की बातचीत का अगर मतलब निकाला जाए तो मोदी सरकार एक कोशिश सीधे रावलपिंडी के साथ बातचीत करना भी हो सकती है। पाकिस्तान की नवाज सरकार के साथ ही वहां के सैन्य हुक्मरानों को भी बातचीत में शामिल रखना मोदी सरकार की एक कूटनीतिक पहल हो सकती है।फिलहाल हम आप कयास ही लगा सकते हैं। इसी कड़ी में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी पाकिस्तान की दो दिवसीय यात्रा पर हैं।


अंतत: दोनो मुल्कों में वार्ता से यदि सकारात्मका झलकती है तो वार्ता जरुर होनी चाहिए लेकिन सतर्कता नितांत आवश्यक है क्योंकि हमारे पड़ोसी पाक के इमान पर भरोसा करना तोड़ा कठीन हैं,दरअसल ये हम नहीं इतिहास कहता है,बहरहाल दोस्ती की नयी शुरुआत की मोदी सरकार को शुभकामनाएं।       

Saturday, 5 December 2015

केजरी सरकार का नया फरमान 'ईवन' और 'ऑड' : दिल्ली में प्रदूषण से दिला पाएंगे निजात ?


संदीप कुमार मिश्र : दिल्ली में लगातार प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। बेतहाशा सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियां...गाड़ियों से निकलता धूआं और शोर।दिल्ली की फिजाओं में जहर घोल रही है।जिससे आहत एनजीटी और हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगाई और दिल्ली सरकार ने प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए बेहद सख्त कदम उठाए।जिसके तहत 1 जनवरी 2016 से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में 'ईवन' और 'ऑड' नंबर प्लेट के आधार पर गाड़ियां चलेंगी।आईए आपको बताते हैं कि क्या है 'ईवन' और 'ऑड' नंबर का फंड़ा।दरअसल 2,4,6,8,0 के नंबर वाली गाड़ियां पहले दिन और 1,3,5,7,9 की नंबर वाली दूसरे दिन चलेंगी। यानी की पहले दिन सम संख्या वाली और दूसरे दिन विषम संख्या वाली गाड़ियां दिल्ली में चलेंगी। लेकिन ये नियम पब्लिक ट्रांस्पोर्ट पर लागू नहीं होगा। यानी कि महीने में अब आप सिर्फ 15 दिन ही कार चला सकेंगे।
इतना ही नहीं दिल्ली सरकार ने शहर में फैले कोहरे, धुंध और प्रदूषण को कम करने के लिए इस फॉर्मूले को तैयार किया है।दरअसल सिंगापुर की तर्ज पर इस व्यवस्था को दिल्ली में लागू किया जा रहा है।वहीं दिल्ली के कोयला से चलने वाले बिजली के प्लांट को भी बंद किया जाएगा।यानी कि बदरपुर प्लांट और दादरी प्लांट को भी बंद करने की सरकार की मंशा है।


नए नियमों के आधार पर –
1-आप दिल्ली में रहते हैं और आपकी गाड़ी का आखिरी नंबर 2,4,6,8,0 है तो आप महिने में पंद्रह दिन ही गाड़ी चला सकते है
2- आपकी गाड़ी का आखिरी नंबर 1,3,5,7,9 है तो आप भी महिने में 15 दिन गाड़ी चला सकते हैं।
यानी एक दिन छोड़कर एक दिन ही गाड़ी आप चला सकते है।
3- दिल्ली की सड़कों की 3हफ्तों में वैक्यूम क्लीनिंग करने का प्रावधान भी नए नियम में है।
4- बाहर से आने वाले भारी वाहनो का दिल्ली में प्रवेश 11 बजे के बाद ही हो पाएगा।


इस नियम को लागू करने में अड़चने

 दरअसल दिल्ली सरकार ने नया फरमान तो सुना दिया है लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या इस अजीबो गरीब फार्मूले को दिल्ली में लागू किया जा सकता है।क्योंकि अंतत: इस नियम को ट्रैफिक पुलिस को ही फालो करना है और सोचने वाली बात ये है कि क्या ट्रैफिक पुलिस के पास पर्याप्त स्टाफ है..?क्या ट्रैफिक पुलिस के पास तकनीकी संसाधन है।सरकारी, कॉमर्शियल और दूसरे हल्के-भारी वाहनों के बीच से सम-विषम नंबर प्लेट वाली गाड़ियों को छांटना क्या बेहद मुश्किल नहीं होगा..?क्योंकि दिल्ली में ही 84 लाख से ज्यादा निजी वाहन दर्ज हैं,वहीं एनसीआर से भी रोजाना करीब पांच लाख वाहनों की आवाजाही दिल्ली में होती है।


अब जरा वर्तमान में ट्रैफिक पुलिस की स्थिति जान लें-

वास्तविकता ये है कि दिल्ली में वाहनों की संख्या के अनुपात में ट्रैफिक पुलिस का आंकड़ा आधा है। वहीं ट्रैफिक पुलिस के 54 सर्कल में से केवल आठ में ही डबल शिफ्ट में ड्यूटी होती है। इसके अलावा एकल शिफ्ट के चलते ट्रैफिक पुलिसकर्मियों पर अतिरिक्त भार होता है। और तो और ट्रैफिक पुलिस की संख्या दिल्ली में छह हजार है जिसमें करीब तीन-चार हजार पुलिसकर्मी ही ड्यूटी पर रहते हैं।और प्रतिदिन 60 लाख से अधिक वाहनों की आवाजाही को सुनिश्चित करते हैं मात्र तीन से चार हजार पुलिसकर्मी।इसके अलावा संसद सत्र, धरना-प्रदर्शन, पुलिस लाइन, दफ्तर एवं बतौर नायब कोर्ट में तैनाती, वीवीआईपी ड्यूटी और बीमारी अरामी।कुल मिलाकर 20 फीसदी। ऐसे में क्या संभव है कि सिर्फ नियम बनाने से काम चल जाएगा,क्योंकि इस नियम से लगता है कि भविष्य में राज्य और केंद्र सरकार के बीच टकराहट और कड़वाहट पैदा हो सकती है।

लेकिन सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली से प्रदूषण कम कैसे किया जाए।या फिर सम और विषम नंबर वाली योजना के लिए क्या और कैसे करना होगा क्योंकि विश्व के किसी भी देश में इस प्रकार का नियम ज्यादा प्रभावी नहीं साबीत हुआ है।फिर भी कुछ तो करना ही पड़ेगा,जैसे- हर छोटी-बड़ी सड़क पर सीसीटीवी और रेड स्पीड कैमरे लगाए जाए जो कैमरे वाहनों की नंबर प्लेट का फोटो ले सकें जिससे नियमों का उलंधन करने वालों के घर नोटिस भेजा जा सके।साथ ही हर एक रास्ते पर ट्रैफिक पुलिस की तैनाती के साथ ही उच्च क्वालिटी वाले डिजिटल एवं वीडियो कैमरे लगाने होंगे। गाड़ीयों के चालान नोटिस के लिए अलग से सेंट्रल सर्वर और कंट्रोल रूम तैयार करना होगा। इसके अलावा सड़क पर अलग-अलग लेन बनानी होंगी और इसका उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जरूरत होगी।क्योंकि जब सभी वाहन अपनी लेन में चलेंगे तभी नियमों का उल्लंघन करने वालों को पहचाना जा सकेगा। और नियमों का उल्लंघन करने वालों का चालान कम से कम पांच हजार और अधिकतम दस हजार करना होगा।जिसके बाद इस नियम को दिल्ली में लागू किया जा सकता है।


अंतत: बड़ा सवाल ये है कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है जहां प्रशासन की कमान महामहिम राष्ट्रपति महोदय के हाथ में है,और नियमों को क्रियान्वित करवाना,पास करना केंद्र सरकार के हाथ में है,तो क्या दिल्ली सरकार ने इस नियम को सर्वसम्मति से तैयार किया है,और क्या इस नियम को लागू करने के लिए बजट दिल्ली सरकार के पास है,क्योंकि इस नियम में साल्यूशन कम और कन्फ्यूजन ज्यादा है और झमेले भी।तो क्या ये माना जाए कि केजरीवाल सरकार केंद्र की मोदी सरकार से दो-दो हाथ करने के लिए ही इस नियम को तैयार किया है..?बहरहाल देखिए दिल्ली में आगे आगे और क्या होता है...।  
  

एक भालू की इच्छामृत्यु

संदीप कुमार मिश्र : इच्छा म़त्यु की बातें आपने सुनी होगी,शायद देखी भी हो..क्योंकि इन्सानों में एसा संभव है।लेकिन जानवरों में ऐसा पहली बार देखने को मिला।दरअसल इंदौर के कमला नेहरू चिड़ियाघर में बीते दो वर्षो से लकवाग्रस्त सोनू नाम के भालू को ​विश्व में पहली बार दया मृत्यु दी गई। भालू सोनू के दया मृत्यु की प्रक्रिया सुबह 11.22 बजे शरू हुई। जिसके लिए बाकायदा चिड़ियाघर में भालू को दया मृत्यु’, मरने से पहले 11 पंडितों द्वारा गीता के श्लोक सुनाया गया,और फिर इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया प्रारंभ करते हुए स्पेशल इंजेक्शन दिया गया। इंदौर के चिड़ियाघर में जन्मे 33 साल का सोनू (भालू) पिछले दो साल से लकवाग्रत हो गया था।

इंदौर जू अथारिटी के अधिकारी उत्तम यादव मुताबिक भालू बेहद तकलीफ में था। खा-पी नहीं रहा था। दो साल से उसका इलाज चल रहा था। 33 साल का हिमालयन भालू सोनू ढाई साल से पैरालिसिस से जूझ रहा था और उसके शरीर के 80% हिस्से को लकवाग्रस्त हो गए थे ।

जिसके बाद महामंडलेश्वर लक्ष्मणदास जी महाराज की मौजूदगी में 11 पंड़ितों ने सोनू को गीता के श्लोक सुनाए।और फिर गंगाजल के साथ तुलसी दल दिया गया।भालू को पिंजरे में मेकसेल्फ नामक केमिकल के तीन इंजेक्शन लगाए गए और फिर कुछ देर के लिए पिंजरा ढंक दिया गया। पूरी तरह से बेहोश होने के बाद सोनू को पिंजरे से निकालकर बाहर लाया गया।सलाइन के ज़रिए मैग्निशियम सल्फेट (मौत की दवाई) चढ़ाया गया।करीब एक घंटे बाद सोनू की धड़कने थम गईं।इसके बाद भालू सोनू का पोस्टमार्टम किया गया और उसे जू में ही दफना दिया गया।

पिछले दो सालों से असहनीय दर्द से कराह रहा सोनू आकिरकार इस दुनिया से विदा हो गया।ऐसा कम ही सुनने और देखने को मिलता है कि किसी भालू के लिए हवन यज्ञ किया जाए।जहां बड़े से लेकर बच्चे हर कोई गमगीन हो।आंखों में नमी भी हो और एक सूकून भी।क्योंकि जिस दर्द से सोनू कराह रहा था उससे हर कोई चाहता था कि चाहे जैसे भी हो उसकी मौत हो जाए।


अंतत: ईश्वर सोनू (भालू)की आत्मा को शांति दें,और फिर किसी बेजूबान की ऐसी हालत ना हो,जिसकी आंखों में आंसू तो हो,शरीर में असहाय वेदना भी हो लेकिन बताने के लिए जुबान ना हो। 










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