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Monday, 7 March 2016

हैप्पी बर्डे: अनुपम खेर के अभिनय में सादगी और संजीदगी का बेजोड़ मेल

संदीप कुमार मिश्र: हर एक चरित्र को अपने तरिके से जीता..सादगी और संजीदगी से परोसने वाले सख्स का ही नाम अनुपम खेर है....जिन्होने संघर्ष का भी उतना ही आनंद उठाया जितना सफलता का।दरअसल ये बातें हम इसलिए कह रहे हैं कि आज अनुपम खेर (7 मार्च 2016) अपना 61वां जन्मदिन मना रहे हैं।तो ऐसे में इस शानदार शख्सियत को बधाई तो बनती ही है।दोस्तों अनुपम खेर जी ऐसे चंद अभिनेताओं में शुमार हैं जिन्होंने माया नगरी में लगभग तीन दशक से अपने दमदार अभिनय से दर्शकों को बांधे रखा।चलिए जानते हैं उनके जन्मदिन के खास अवसर पर पर उनके जीवन की कुछ खास बातें...
7 मार्च 1955 को शिमला में जन्में खैर साब की शुरु से ही ख्वाहिश अभिनेता बनने की थी।स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद अनुपम खेर ने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय(NSD)में दाखिला लिया और साल1978 में अभिनय की पढ़ाई समाप्त करने के बाद शनै: शनैं: रंगमंच और अभिनय की दुनिया में आगे बढ़ने लगे।

मित्रों कहना गलत नहीं होगा कि अनुपम जी किसी भी तरह की भूमिका में फिट बैठे हैं,चाहे हम बात कर्मा'फिल्म में एक शानदार खलनायक की हो या फिर 'डैडी', 'सारांश' जैसी फिल्म में भावपूर्ण अभिनय की साथ ही 'रामलखन', 'लम्हे' जैसी फिल्मों में गुदगुदाते हास्य अभिनय की।इन सभी भूमिकाओं  को अनुपम खेर जी ने बखुबी जीवंत किया।
वो दौर 80 के दशक का था जब मन में अभिनेता बनने का सपना लेकर अनुपम खेर ने माया नगरी मुंबई में कदम रखा।माया नगरी में बतौर अभिनेता खेर साब को 1982 में आगमन'फिल्म में काम करने का अवसर मिला,अफसोस कि फिल्म असफल हो गई और पहचान की तलाश अनुपम खेर की और बढ़ गई।

लेकिन 1984 में अनुपम जी को महेश भट्ट की फिल्म 'सारांश' में काम करने का अवसर मिला । जो मिल का पत्थर साबित हुई।दरअसल इस फिल्म में उन्होंने एक वृद्ध पिता के चरित्र को निभाया था जिसके बेटे की असमय मृत्यु हो जाती है। अपने इस किरदार को अनुपम खेर ने संजीदगी के साथ निभाकर दर्शकों का दिल जीत लिया साथ ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किये गए।कहना गलत नहीं होगा कि इसी के बाद से अनुपम जी किसी परिचय के मोहताज नहीं रहे।
1986 में सुभाष घई की फिल्म 'कर्मा' में बतौर 'खलनायक' काम कर अनुपम खेर ने अपने दमदार अभिनय का लोहा मनवाया।

अनुपम जी की सबसे खासियत थी की वो कभी भी एक तरह को चरित्र में बंधकर काम नहीं किए। जिसका उदाहरण था कि 1989 की सुपरहिट फिल्म 'राम लखन' में उन्होनें फिल्म अभिनेत्री माधुरी दीक्षित के पिता की भूमिका निभाई। फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता के फिल्म फेयर पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

इसी साल यानि 1989  में ही फिल्म 'डैडी' प्रदर्शित हुई,जो अनुपम खेर के शानदार अभिनय का लोहा मनवाने में कामयाब रही। फिल्म में अपने भावुक किरदार को अनुपम खेर ने सधे हुए अंदाज में निभाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस फिल्म में अपने दमदार अभिनय के लिए वह फिल्म फेयर समीक्षक पुरस्कार और राष्ट्रीय पुरस्कार के स्पेशल ज्यूरी पुरस्कार से सम्मानित किए गए।अभिनय के साथ ही अनुपम खेर ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा।
साल 2003 में अनुपम खेर ने फिल्म 'ओम जय जगदीश' का निर्देशन किया,जो असफल रही।लेकिन 2005 में अनुपम खेर ने फिल्म 'मैने गांधी को नहीं मारा' का निर्माण किया।और   इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय के लिये उन्हें कराची इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार से सम्मानित किया गया।वहीं बालीवुड में अपना जौहर दिखाने के बाद  अनुपम ने कई हॉलीवुड फिल्मों में भी अपने अभिनय का जौहर दिखाया । साथ ही छोटे पर्दे पर भी 'से ना सम्थिंग टु अनुपम अंकल'और 'सवाल दस करोड़ का' बतौर होस्ट काम कर दर्शकों का भरपूर उत्साहवर्धन किया।
अपने फिल्मी सफर में अब तक अनुपम खेर आठ बार फिल्म फेयर पुरस्कार पा चुके हैं। फिल्मों में कई भूमिकाएं निभाने के बाद अनुपम नेशनल सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष भी बने। वहीं 'नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा' में बतौर निदेशक रहते हुए 2001 से 2004 तक काम किया।


अंतत: फिल्म जगत में अनुपम खेर के सराहनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री और पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। अनुपम खेर ने अपने तीन दशक लंबे फिल्मी करियर में लगभग 350 फिल्मों में काम किया।वहीं अब फिल्मों के साथ-साथ उनका झुकाव सामाजिक मुद्दों की तरफ भी देखने को मिल रहा है।फिल्म के साथ समाज और सियासत में उनकी दिलचस्पी के शुभकामना और जन्म दिन की हार्दिक शुभकामनाएं।।।  

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