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Friday, 23 September 2016

शारदीय नवरात्र इस बार दस दिन:क्या है महत्व...?

संदीप कुमार मिश्र: हमारी भारतीय सनातन संस्कृति में शारदीय नवरात्र विशेष महत्व रखती है।जिसके कई पौराणीक प्रमाण हमारे धर्म ग्रंथों में बताए गये हैं।नौ दिनो तक चलने वाले नवरात्र के महोत्सव में मां भगवती के नौ रुपों की पूजा-आराधना बड़े ही विधि विधान से की जाती है।माता के नौ रुप शैलपुत्रीब्रह्मचारिणीचंद्रघण्टा,कुष्माण्डा,स्कन्दमा‍ता,कात्यायनी,कालरात्री,महागौ‍री,सिद्धिदात्री के रुप में नवदुर्गा की हर्ष और उल्लास के साथ धूमधाम से पूजा अर्चनी की जाती है।
दस दिन की शारदीय नवरात्र
अक्सर नवरात्र का पर्व नौ दिवसीय होती है,और तिथि के घटने पर ये आठ दिन की भी हो जाती है। लेकिन इस बार नवरात्र का पावन महोत्सव यानी शारदीय नवरात्रि 10 दिन तक चलेगा। 1 से 10 अक्टूबर 2016 तक नवरात्र का त्योहार देश भर में मनाया जाएगा।क्योंकि शनिवार यानी 1 तारीख से को प्रथम दिवस पर घट स्थापना होगी और माता शेरावाली के पहले रुप शैलपुत्री की आराधना होगी।वहीं 2 अक्टूबर प्रात: 5:53बजे से द्वितिया तिति लग रही हैजो 3 तारीख की प्रात: 7: 44 बजे तक रहेगी।जैसा कि हम सब जानते हैं कि हमारे हिन्दू धर्म और ज्योतिष शास्त्र में कहा जाता है कि जिसका दिन उसकी रात... यानी तीसरे दिन भी द्वितिया तिथि ही रहेगी और माता ब्रम्हचारीणी की पूजा 2 और 3 तारीख को होगी। यही कारण है कि इस बार नवरात्र 10 दिन की होगी और जिसका समापन 10 अक्टूबर को संपन्न होगी।और दशहरा,विजय दशमी का त्योहार 11 अक्टूबर को मनाया जाएगा।  
नवरात्र का बढ़ना है शुभ फलदायी
ज्योतिष शास्त्र और हिन्दू पंचाग के अनुसार इस बार की नवरात्रि अति शुभ है।क्योंकि ये दस दिन की है।समस्त देशवासीयों के लिए शारदीय नवरात्र इस बार सुख,स्वास्थ,सम्पन्नता,शांति और समृद्धि लेकर आएगा। ऐसे में भक्ति और भाव के साथ जगत जननी मां जगदम्बा की करें आराधना और साधना।माता बड़ी दयालू है,वो अपने भक्तों को कभी निराश नहीं करती है।माता भगवती आपकी समस्त मनोकामनाओं को पूरा करें।।जय माता दी।।
शारदीय नवरात्र की तिथियों के बारे में जाने क्रमश:
            तारीख             दिन                नवरात्र
 1 अक्टूबर        शनिवार     प्रतिपदा,घट स्थापना,शैलपुत्री की पूजा
     2 अक्टूबर            रविवार       द्वितीया, माता ब्रम्हचारिणी की पूजा
3 अक्टूबर          सोमवार     द्वितीया, माता ब्रम्हचारिणी की पूजा
           4 अक्टूबर        मंगलवार           तृतीया,माता चंद्रघंटा की पूजा
           5 अक्टूबर        बुद्धवार            चतुर्थी,कुष्माण्डा देवी की पूजा
           6 अक्टूबर        गुरुवार            पंचमी,स्कंदमाता की पूजा
           7 अक्टूबर        शुक्रवार            षष्ठी,कात्यायनी माता की पूजा
           8 अक्टूबर        शनिवार           सप्तमी,माता कालरात्री की पूजा
           9 अक्टूबर        रविवार            अष्टमी,माता महागौरी की पूजा
           10 अक्टूबर       सोमवार           नवमी,सिद्धीदात्री देवी की पूजा
           11 अक्टूबर       मंगलवार           दशमी,दशहरा,रावण दहन

ऐसे तो नवरात्र के पावन अवसर पर माता भगवती की पूजा आराधना जनसामान्य दुर्गा सप्तशती के पाठ से करते हैं, लेकिन आज की आपाधापी भरी जींदगी और समयाभाव में आप सप्तशती का पाठ नहीं कर पाते हैं तो भगवान् शिव रचित सप्तश्लोकी दुर्गा का पाठ अत्यंत ही प्रभावशाली है।जिसका पाठ सरलता और सुलभता से आप कर सकते हैं और इसका फल भी दुर्गा सप्तसती के पाठ के समान ही मिलता है।

Thursday, 22 September 2016

नवरात्रि पर्व पर नव दुर्गा की 9 दिन बीज मंत्र से करें आराधना


संदीप कुमार मिश्र: सर्वविदित है कि नवरात्रि के पावन पर्व पर शक्ति के 9 रुपों की पूजा आराधना होती है।हमारे धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि आदिशक्ति जगत जननी मां जगदम्बा के सभी स्वरुप भक्ति और शक्ति प्रदान करने वाली हैं।एक तरफ जहां माता संपूर्ण संसार से बुराईयों को खत्म करने के लिए कालरात्रि और चंद्रघंटा के रुप में अवतार लेती हैं तो वहीं  जगत के कल्याण और उत्थान के लिए सिद्धिदात्री और महागौरी के रुप में प्रकट होकर अपने साधको को मनवांछित फल प्रदान करती हैं।
प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्माचारिणी।तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम्।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम्।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा: प्रकीर्तिता:।उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्म्रणव महात्मना।।
इस प्रकार नवरात्रि के 9 दिनों में माता के नव रुप की पूजा अर्चना बड़े ही विधि-विधान से होती है।चाहे घर हो मंदिर या फिर बड़े-बड़े पंडाल।हर जगह माता की पूजा बड़े ही धूमधाम से होती है।एक गृहस्थ के लिए जरुरी है जानना कि नवरात्र के 9 दिनों में माता शेरावाली को प्रसन्न करने के लिए कौन से मंत्रों का जाप करना चाहिए।
9 दिन माता के बीज मंत्रों से करें नव देवियों को प्रसन्न। होगी मनोकामना पूरी,बनेंगे बिगड़े काम।जाने कौन से हैं 9 बीज मंत्र क्रमश:-
1. शैलपुत्री : ह्रीं शिवायै नम:
2. ब्रह्मचारिणी : ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:
3. चन्द्रघंटा : ऐं श्रीं शक्तयै नम:
4. कूष्मांडा ऐं ह्री देव्यै नम:
5. स्कंदमाता : ह्रीं क्लीं स्वमिन्यै नम:
6. कात्यायनी : क्लीं श्री त्रिनेत्रायै नम:
7. कालरात्रि : क्लीं ऐं श्री कालिकायै नम:
8. महागौरी : श्री क्लीं ह्रीं वरदायै नम:
9. सिद्धिदात्री : ह्रीं क्लीं ऐं सिद्धये नम:

।।जय माता दी।।

क्या है नवरात्री का महत्व ?


संदीप कुमार मिश्र: शक्ति की उपासना और साधना का महापर्व है नवरात्र। संपूर्ण चराचर जगत में जगत जननी मां जगदम्बा की महिमा अपरंपार है,शक्ति की उपासना,साधना और स्मरण से बन जाते हैं सभी बिगड़े काम।सनातन संस्कृति और वेद पुराणों में सदियों से माता शेरावाली की पूजा अर्चना का विधान। हमारे हिन्दू धर्म में शक्ति की पूजा अपने साधको को अनंत सुख देने वाली है,और जीवन में उन्नती और तरक्की का रास्ता प्रशस्त करने वाली है।
जगत जननी मां जगदम्बा की महिमा का गुणगान करने का महापर्व है नवरात्र :
एक अद्भुत शक्ति,जिसे संसार आदिशक्ति मां दुर्गा के नाम से जानता है।माता की विशेष आराधना, त्याग और समर्पण का पर्व है नवरात्र।जिसमें माता के भक्त,साधक,प्रेमीजन माता शेरावाली के नव रुपों का गुणगान नव दिवस तक करते हैं और योगी मनीषि सिद्धियां प्राप्त करते हैं।

हमारे धर्म पुराणों में ऐसा वर्णित है कि सर्वप्रथम मर्यादापुरुषोत्तम प्रभू भगवान श्रीराम चंद्र जी महाराज  ने लंका विजय प्राप्त करने से ठीक 10 दिन पूर्व इसी शारदीय नवरात्र में शक्ति की आराधना कर माता भगवती की कठोर साधना और पूजा-अर्चना की थी।तभी से नवरात्र का चलन प्रारंभ हुआ और सनातन धर्म में नवरात्री का पावन पर्व विशेष रुप से देश भर में मनाया जाने लगा।
ऐसा हमारे धर्म शास्त्रों में वर्णित है कि नवरात्र के विशेष अवसर पर मां भगवती आदि शक्ति जगदम्बा को पूर्णरुपेण समर्पित होकर,सच्चे मन और समर्पण भाव से जो भी साधक साधना करते हैं,उन्हें दसों महाविद्याओं की प्राप्ति हो जाती है।साथ ही इस विशेष पर्व पर दुर्गा सप्तशती का संपूर्ण पाठ करने से विशेष फल की प्राप्ती होती है। माता जगदम्बा अपने साधकों का सदैव कल्याण करती हैं।मां भगवती ज्ञान और विवेक देने वाली है,मनोकामना पूर्ण करने वाली है,मनवांछित फल देने वाली है।।जय माता दी।।

Wednesday, 21 September 2016

मृत्यु एक अटल सत्य: गरुड पुराण का पाठ श्राद्ध पक्ष में क्यों है आवश्यक ?

संदीप कुमार मिश्र: जन्म और मृत्यु इस मोहमाया रुपी संसार में हमारे जीवन का एक अटल सत्य है।जो भी इस संसार में आया है उसे जाना ही पड़ेगा।मानव देह धारण करने के बाद देव हों या नर नारी,योगी-ऋषि हों या फिर पशु-पक्षी हर किसी को जाना ही है।
गरुण पुराण सार
दरअसल पवित्र गरुड पुराण हमारे सनातन धर्म और हिन्दू धर्म के सुप्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथों में से एक माना गया है। हिन्दू धर्म में कहा गया है कि गरुड पुराण मनुष्य के मृत्यु के बाद सद्गति प्रदान करने वाला ग्रंथ है।हम अक्सर देखते हैं कि मृत्यु के बाद गरुण पुराण का पाठ किया जाता है,जिसके पीछे का भाव यही है कि मृत्यु के पश्चात मनुष्य को सद्गति प्राप्त हो।गरुण पुराण के अधिष्ठातृ देव भगवान श्रीहरि यानी भगवान विष्णु हैं। सनातन धर्म के अठारह पुराणों में इसलिए भी गरुड पुराण का विशेष महत्व है कि स्वयं भगवान विष्णु ही इसके देव हैं।इसीलिए इसे वैष्णव पुराण भी कहते हैं।
गरुड पुराण में ऐसा कहा गया है कि हमारे अच्छे-बुरे कर्मों का फल हमारे इस जीवन में तो मिलता ही हैसाथ ही मृत्योपरांत भी कर्मो के अनुसार फल मिलता है।यही वजह है कि गरुड पुराण महात्म्य का विशेष पाठ मृत्योपरांत परिवार के किसी सदस्य को सुनाया जाता है,जिससे मोहमाया रुपी संसार से जाने वाले के मोह से हमें मुक्ति मिल सके और हमारा दुख शोक कम हो जाए।
गरुड पुराण के प्ररंभ में सृष्टि की उत्पत्ति की चर्चा है। इसके बाद सूर्य की पूजा की विधि, दीक्षा विधि, श्राद्ध पूजा, नवव्यूह पूजा विधान के बारे में बताया गया है। साथ ही भक्ति, ज्ञान, वैराग्य, सदाचार और निष्काम कर्म की महिमा भी बताई गयी है।सनातन हिन्दू धर्म में कहा गया है कि श्राद्ध पक्ष में गरुड पुराण का पाठ करने से आत्मा को मुक्ति,भक्ति और मोक्ष की प्राप्ती होती है। अपने पितरों और पूर्वजों को मुक्ति दिलाने के लिये, कहा जाता है कि गरुड पुराण का पाठ अवश्य करना या करवाना चाहिए।
मृत्यु के पश्चात आत्मा कब पहुंचती है यमलोक ?
एक यक्ष प्रश्न आपके मन में अवश्य उत्पन्न हो रहा कि आखिर मृत्यु के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है,लेकिन आत्मा यमलोक कब पहुंचती है? आखिर मृत्यु के बाद का सच क्या है? मृत्यु के पश्चात आत्मा कितने दिनों बाद यमलोक पहुंचती है?इन शंकाओं का समाधान  गरुड पुराण में वर्णित है।हम सब जानते हैं कि भगवान श्री हरि का वाहन गरुड है,और गरुड देव ने ही  भगवान श्रीहरि विष्णु से मृत्योपरांत आत्मा की स्थिति के संबंध में पूछा है।गरुड देव भगवान श्रीहरि से विनम्र भाव से अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए पूछते हैं कि मृत्यु के पश्चात भगवन, आत्मा कहां जाती है?ऐसे अनगिनत प्रश्नो का उत्तर भगवान श्रीहरिविष्णु ने, गरुड पुराण में दिया है कि मृत्यु से पहले और और बाद में मनुष्य की क्या गति होती है और आत्मा कहां,कैसे और कब,कितने दिन में पहुंचती है।
गरुड पुराण में उन्नीस हज़ार श्लोक
ऐसा कहा जाता है कि 'गरुड पुराण' में उन्नीस हज़ार श्लोक हैं,लेकिन वर्तमान समय में सिर्फ सात हज़ार श्लोक ही उपलब्ध हैं।गरुड पुराण को दो भागों में रखकर देखा जाता है। प्रथम भाग में भगवान श्रीहरि विष्णु की भक्ति,उपासना की विधियों का वर्णन है वहीं द्वितीय भाग में प्रेत कल्प का विस्तार से वर्णन करते हुए विभिन्न नर्क में जीव के पड़ने का उल्लेख है। इस अध्याय में मरने के बाद मनुष्य की गति क्या होती है,किस प्रकार से मनुष्य का योनियों में पुन: जन्म होता है,किस प्रकार  प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है और कलिकाल में हमें किस प्रकार से  श्राद्ध और पितृ कर्म करना चाहिए जिससे कि मोक्ष की प्राप्ती हो सके। मोक्ष कैसे मिल सकता है ? श्राद्ध और पिंडदान कैसे किया जाता है? श्राद्ध के कौन-कौन से तीर्थ हैं ? इसका वर्णन मिलता है।

मृत्यु से पूर्व मनुष्य की क्या गति होती है ?
एक जिज्ञासा जो सदैव हमारे मन में रहती है कि अंत समय में मनुष्य जब मृतु शैया पर पड़ा रहता है, उसके प्राण पखेरु उड़ने वाले होते हैं इस समय उसकी दशा क्या होती है।इस संबंध में गरुड पुराण में कहा गया है कि सर्वप्रथम  मनुष्य की आवाज चली जाती है वहीं जब अंतिम समय आ जाता है,तब मरने वाले व्यक्ति को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। जैसे ही दिव्य दृष्टि मिलती है वैसे मृत्युशैया पर पड़े व्यक्ति की समस्त इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं और संपूर्ण संसार एक रुप में दिखाई देने लगता है।
मृत्यु के समय,जब निकलने वाले हों प्राण पखेरु तब क्या होता है ?
ऐसा गरुड पुराण में वर्णित है कि, मृत्यु के समय 2 यम के दूत आते हैं। जिनके भय से अंगूठे के बराबर जीव, हा हा हा की आवाज़ करते हुये, शरीर का त्याग करता है।और फिर यमराज के दूत, जीवात्मा के गले में पाश बांधकर, उसे यमलोक ले जाते हैं। जिसके बाद, जीव का लघु शरीर, यमदूतों से डरता हुआ निरंतर आगे बढ़ता जाता है।
बेहद कठीन है मृत्यु का मार्ग
मृत्यु जिसके नाम से ही शरीर में एक सीहरन सी हो जाती है,ठीक उसी प्रकार मृत्यु का पथ बेहद डरावना, अंधकारमय, और गर्म रेत से भरा होता है।कहा गया है कि यमलोक पहुंचने पर, पापी जीव को यातना देने के बाद, यमराज के कहने पर,जीव को आकाश मार्ग से घर छोड़ दिया जाता है।जिसके बाद घर आकर जीवात्मा, पुन: अपने शरीर को धारण करना चाहती है, लेकिन यमराज के दूतों के पाश से मुक्ति नहीं मिल पाती है।सबसे अद्भुत ये है कि मृताआत्मा के पिंडदान के बाद भी,जीवात्मा तृप्त नहीं हो पाती है। इस प्रकार भूख, प्यास,तड़प और बेचैनी से आत्मा,पुन: यमलोक आ जाती है।इसलिए कहा जाता है कि जब मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति के वंशज, उसका पिंडदान नहीं करते,तब तक आत्मा दु:खी होकर विचरण करती रहती है। अनेकों प्रकार की लंबे समय तक यातना भोगने के पश्चात, उसे विभिन्न योनियों में नया शरीर मिलता है।इस प्रकार से पितरों की आत्मा की शांति के लिए मनुष्य की मृत्यु के दस दिन के अंदर ही पिंडदान अवश्य कर लेना चाहिए।
ऐसा करने से दसवें दिन पिंडदान से,लघु शरीर को चलने की शक्ति मिलती है।इसी क्रम में मृत्यु के तेरहवें दिन एक बार फिर यमदूत उसे पकड़ लेते हैं।जिसके बाद शुरु होती है वैतरणी नदी को पार करने की यात्रा। इस वैतरणी नदी को पार करने में पूरे 47 दिन का समय लगता है।इस प्रकार से जीवात्मा को यमलोक की प्राप्ती होती है।

Tuesday, 20 September 2016

आखिर कब तक शहीद होते रहेंगे जवान


आखिर कब तक शहीद होते रहेंगे जवान
कब तक निंदा और भर्त्सना की परम्परा रहेगी कायम,
एक बार मिल जाए गम,रख लेंगे हम संयम,
हो जाए अब आर-पार,आतंकि हमलो को अब नहीं सहेंगे हरदम,

पीठ पर बार करने वालों की,निंदा से नहीं चलेगा अब काम
बंद करो शहीदों की चिताओं पर सियासत, पाक का कर दो काम तमाम।

ऐ मेरे सियासतदां,करो कुछ ऐसा इंतजाम
अब ना हो कोई शहीद,ना टूटे कोई घर मकां...
जो कह गए अलविदा,वो लाल मेरे थे,
वो मातृभूमि मेरी थी,वो प्राण मेरे थे..


मेरे अपनों-
चल सको तो चंद कदम वहां तक चल कर देखो..
जहां मेरी सीमा के प्रहरी सोये हैं शमशान में
करुण विलाप करती है माता अपने हिन्दूस्तान में
बेटा गया,सुहाग गया,बहन से दूर हो गया भाई,
बच्चों के सिर से उठ गया साया,आतंकियों को जरा भी दया ना आई

भीख मांग कर जीता है जो,नाम मुल्क का पाकिस्तान है।
आतंक का पोषक करता है जो,भूला अपनी औकात है..
बार बार है मूंह की खाता,फिर भी हमें है आंख दिखाता,
गीदड़ भभकी का करो इंतजाम,
आखिर कब तक शहीद होंगे जवान।

सवा सौ करोड़ देशवासी,चाह रहे एक ही परिणाम
पाक नहीं सुधरने वाला,आतंकियों का करो इंतजाम
अब तो हो जाय आर-पार,चाहे जो भी हो अंजाम ।
आखिर कब तक शहीद होंगे जवान।

कौन कहे नापाक को,मिनटों में मिट जाएगा,
संतति संग विश्व के नक्शे से,नेस्तनाबूत हो जाएगा..
ओ पाक...मत ले परीक्षा अब हमारी...
वरना नाम तेरा पाकिस्तान से कब्रिस्तान हो जाएगा।

चल गया ब्रम्होस,अग्नि,आकाश के आगे टिक ना तू पाएगा...
जब तक नींद से जागेगा, कब्र में सो तू जाएगा...
तेरे नाजायज कपूत आतंकियों की,
धनुष,शौर्य, की गर्जना से,पतलून गीली हो जाएगी,
चल गया निर्भय और मोक्षित,सोच हालत तेरी क्या हो जाएगी...
सूर्या, प्रहार की मार से कभी ना बच पाएगा तू...
सुधर जा अब पाक,नहीं तो मिट्टी में मिल जाएगा तू।


शांति और सद्भाव का संदेश देते हम हैं सदा,
लेकिन,
नहीं अब समझौता होगा,वीर जवानो की लाशों पर,
ईंट का जवाब हम पत्थर से देंगे,मत कर शक हमारे इरादों पर
हिम्मत है तो छद्दम छोड़,सिने पर वार करके अब दिखला,
बाप हैं,बाप ही रहेंगे हम तेरे,
अब समझौता शहीदों की चिताओं पर नहीं होगा।

खून खौलता है अब हरदम,पढ़ खबर अखबारों में,
शेरों और सिंहो की पेशी,क्यूं हो रही गीदड़ के दरबारों में,
लश्कर,हिजबुल देश नहीं,पाक की नाजायज औलादें है,
इमान नहीं इनका कोई,ये हराम के ज़ादे हैं
अब करना है काम तमाम इनका,
क्योंकि,शांति और सद्भाव...
गोली,गोलों का जवाब नहीं होता,
आतंकी, हत्यारों के सम्मुख, अहिंसा का प्रस्ताव नहीं होता।

पाक की नापाक हरकत,संपूर्ण विश्व है जानता,
कौन कहता है कि पाक आतंकी नहीं है पालता।
पाक परस्त आतंकियों को अब तो,खुदा भी माफ़ नहीं कर सकते हैं....
निर्मम नृसंश हत्यारों को मारो,गोली के बदले गोला दागो,तभी न्याय हो सकते हैं।
शांतिवार्ता छोड़ अब,आक्रमण करने होंगे,
निर्दयी आतंकियों से लड़ने के संकल्प करने होगें..
वीर सपूतों की हत्याओं के बदले,अब समझौते नहीं होंगे..।

बार-बार कश्मीर मांगता,देखो मूर्ख पाकिस्तान,
लाहौर, कराची, रावलपिंडी,अब लेकर रहेगा हिन्दूस्तान।
अंत में सवाल वही है कि-
आखिर कब तक शहीद होते रहेंगे जवान.....?
आखिर कब तक शहीद होते रहेंगे जवान.....?

मेरी कलम से,
(संदीप कुमार मिश्र)
मेरे शहीद वीर सपूतों सादर नमन
श्रद्दांजलि

Wednesday, 14 September 2016

अनंत चतुर्दशी विशेष: बप्पा की विदाई का संबंध महाभारत से है

संदीप कुमार मिश्र: धार्मिक ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि गणेश चतुर्थी से लेकर लगातार दस दिन तक महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की कथा भगवान गणेश को सुनाई थी जिसे भगवान गणेश ने लिखा।
ऐसा कि कहा जाता है कि जब वेदव्यास जी महाभारत की कथा गणेश जी को सुना रहे थे तो उनकी आंखें बंद थी।जिस वजह से उन्हे पता ही नहीं चल पाया कि इसका गणेश जी पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।जब दस दिन के बाद कथा संपन्न हुई और महर्षि ने आंखें खोली तो देखा कि दस दिन लगातार कथा सुनते-सुनते गणेश जी के शरीर का तापमान बहुत बढ़ गया है और गणेश जी को ज्वर हो गया ।फिर जाकर महर्षि वेदव्यास ने कुंड में ले जाकर गणेश जी को डुबकी लगवाई और खुब स्नान करवाया, जिससे उनके शरीर का ताप कम हुआ। इसीलिए कहा जाता है कि भगवान गणपति अनंत चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक सगुण साकार रुप में मुर्ति में स्थापित रहते हैं।जिसे गणपति उत्सव के दौरान हम अपने घर,आफिस,पंडाल में स्थापित करते हैं।
मान्यता ऐसी भी है कि भक्त अपनी मुराद पूरी होने के लिए गणेश जी के कान में अपनी इच्छा प्रकट करते हैं और दस दिन तक अपने भक्तों की इच्छाओं को सुनते-सुनते बप्पा के शरीर का ताप बढ़ जाता है,जिससे उन्हें शितलता प्रदान करने के लिए चतुर्दशी को बहते जल में विसर्जित कर गणपति को शितल किया जाता है।

एक बहुत ही रोचक जानकारी भगवान: गणेश जी के बारे में ये है कि भगवान गणेश के मयूरेश्वर स्वरुप के कारण उनके नाम के साथ मोरया लगाया जाता या कहा जाता है।एक कथा के अनुसार गणेश पुराण में ऐसा वर्णित है कि जब सिंधू नामक दानव का अत्याचार बढ़ गया था तब देवताओं ने भगवान गणेश का आह्वान किया।और सिंधू दानव का संहार करने करने के मयूर को भगवान गणश ने अपना वाहन बनाया और छह भुजाओं का अवतार धारण किया।तभी से इस अवतार की पूजा भगवान गणेश के साधक गणपति बप्पा मोरया के जयकारे के साथ करते हैं।जिससे संपूर्ण वातावरण बप्पामय हो जाता है।
भगवान श्रीगणेश जी के संबंध में विशेष:-
गणों के स्वामी होने के नाते भगवान श्रीगणेश को गणपति कहते हैं
केतु के देव हैं श्रीगणेश
गणपतये संप्रदाय केवल गणेश जी की ही पूजा करता है जो मुख्यत: महाराष्ट्र में रहते हैं।
हाथी जैसा मुख होने की वजह से गणेश जी का नाम गजानन  है।
ऐसा वरदान मिला है भगवान गणेश जी को कि बगैर श्रीगणेश जी की पूजा के कोई भी कार्य संपन्न नहीं होगा। इसीलिए भगवान गणेश जी को आदिपूज्य देव कहा जाता है।
अनंत चतुर्थी महोत्सव को मनाने की शुरुआत 1893 में स्वतंत्रता सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक जी ने देश की आजादी के लिए देस के युवाओं को एक करने के लिए की थी।
भगवान श्रीगणेश जी की लंबी सूंड महाबुद्दित्व का प्रतिक है।
शिवमानस शास्त्र में ऊं को पारिभाषित करते हुए लिखा गया है कि उपर का भाग गणेश जी का मस्तक,नीचे का भाग उदर,चंद्र बिंदू लड्डू,और मात्रा सुंड है।
कुछ शास्त्रों में ऐसा भी वर्णित है कि भगवान गणेश जी की एक बहन भी थी जिनका नाम अशोक सुंदरी था।
भगवान गणेश जी की पत्नी का नाम रिद्दि और सिद्दि है।लेकिन भगवान गणेश जी की पूजा ऋद्धि-सिद्दि के साथ नहीं माता लक्ष्मी के साथ की जाती है।
अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान गणेश की पूजा अर्चना कर उनका विसर्जन किया जाता है।

Monday, 12 September 2016

श्राद्ध पक्ष/पितृ पक्ष/महालय : महात्म्य और विधान(16-30 सितंबर 2016)

संदीप कुमार मिश्र: सनातन संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति है।जिसमें तीज-त्योहार,पूजा-विधान,रस्मों का विशेष महत्व है।हिन्दू धर्म की व्यापकता का विश्व में कोई सानी नहीं हैं।हिन्दू संस्कृति अद्भूत है,अतुल्यनिय है।मित्रों हमारे धर्म में पितरों को भी आदर सम्मान देने का विधान है,क्योंकि उनकी कृपा से हमारे आने वाली पीढ़ी का उन्नती और विकास होता है,इसलिए श्राद्ध पक्ष में बड़े ही विधि विधान से पितरों का श्राद्ध हमारे हिन्दू ध्म में किया जाता है।
दरअसल भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का विशेष समयकाल श्राद्ध पक्ष कहलाता है और इस वार जिसका प्रारंभ हमारे हिंदू धर्म और पंचांग के अनुसार, 16 सितंबर, 2016  पूर्णिमा यानि चंद्र ग्रहण से हो रहा है, जिसका समापन 30 सितंबर अमावस्या के दिन शुक्रवार को होगा। इस विशेष तिथि के समय हम पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान करते हैं और सात्विक जीवन बिताते हैं। इस लिहाज से आश्विन माह के कृष्ण पक्ष (15 दिन)को श्राद्ध पक्ष के रूप में देश भर में मनाया जाता है।श्राद्ध एक संस्कार है।जिसका वर्णन हमारे अनेकों हिन्दू धर्म ग्रंथों में है।आपको बता दें कि श्राद्ध पक्ष को महालय और पितृ पक्ष भी कहते हैं।मूल रुप से श्राद्ध का अर्थ है कि अपने पितरों के प्रति,वंश के प्रति, देवताओंके प्रति अपनी श्रद्धा और विश्वास को प्रकट करना।
पितृ पक्ष के पन्द्रह दिनों की समयावधि में हिन्दु परिवार के लोग पूर्वजों को भोजन अर्पित करते हैं और उन्हें श्रधांजलि देते हैं। हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष में हमारे पूर्वज इस धराधाम पर आते हैं,और अपने हिस्से का अन्न जल किसी न किसी रुप में ग्रहण करते हैं।कहते हैं कि इस तिथि पर सभी पितृगण अपने वंशजों के द्वार पर आकर अपने हिस्से का भोजन सूक्ष्म रुप में ग्रहण करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। ऐसे भी हमारा दायित्व बनता है कि जो पूर्वज अब हमारे साथ नहीं है,लेकिन उनका आशिष हमें मिलता रहे।इसलिए अपनो की उन्नती और विकास के लिए हमारे पितृदेव श्राद्ध के समय हमें कृतार्थ करने के लिए पृथ्वी पर आते हैं और समस्त हिन्दू समाज के लोग अपनी श्रद्धा और सामर्थय्नुसार अपने पूर्वजों के लिए श्रद्दापूर्वक श्राद्ध करते हैं।
पुराणों के अनुसार-

गरुड़ पुराण- पितृ पूजन (श्राद्धकर्म) से संतुष्ट होकर पितर मनुष्यों के लिए आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, वैभव, पशु, सुख, धन और धान्य देते हैं।
मार्कण्डेय पुराण- श्राद्ध कर्म से तृप्त होकर पितृगण श्राद्धकर्ता को दीर्घायु, सन्तति, धन, विद्या सुख, राज्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करते हैं।
कुर्मपुराण- जो प्राणी जिस किसी भी विधि से एकाग्रचित होकर श्राद्ध करता है, वह समस्त पापों से रहित होकर मुक्त हो जाता है और पुनः संसार चक्र में नहीं आता।
ब्रह्मपुराण-  जो व्यक्ति शाक के द्वारा भी श्रद्धा-भक्ति से श्राद्ध करता है, उसके कुल में कोई भी दुःखी नहीं होता।
विष्णु पुराण- श्रद्धायुक्त होकर श्राद्धकर्म करने से पितृगण ही तृप्त नहीं होते, अपितु ब्रह्मा, इंद्र, रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार, सूर्य, अग्नि, अष्टवसु, वायु, विश्वेदेव, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी और सरीसृप आदि समस्त भूत प्राणी भी तृप्त होते हैं।
यमस्मृति में कहा गया है कि जो लोग देवता, ब्राह्मण, अग्नि और पितृगण की पूजा करते हैं, वे सबकी अंतरात्मा में रहने वाले भगवान विष्णु की ही पूजा करते हैं।
श्राद्ध का महत्व के बारे में यहां तक हमारे हिन्दू धर्म में बताया गया है कि श्राद्ध पक्ष में भोजन करने के बाद जो आचमन किया जाता है और पैर धोया जाता है, उसी से हमारे पितृगण संतुष्ट हो जाते हैं।समस्त कुटुंब के साथ विधि विधान से किए गए श्राद्ध की तो बात ही क्या कहनी,उससे तो कई गुना फल की प्राप्ती होती है।
इतना ही नहीं हमारे अनेकानेक वेदों, पुराणों, धर्मग्रंथों में श्राद्ध की महत्ता और उसके लाभ के बारे में बताया गया है।एक बात तो स्पस्ट है कि श्राद्ध फल से ना सिर्फ हमारे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है बल्कि हमें विशेष रुप से हमारे पितर हमारे जीवन सुख शांती के लिए आशीर्वाद भी देते हैं। इसलिए हमें आवश्यक रुप से वर्ष भर में पितरों की मृत्युतिथि को सर्वसुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध संपन्न करना चाहिए और सामर्थ्यानुसार ब्राह्मण देव को भोजन प्रसाद ग्रहण करवाना चाहिए व पुण्य के भागी बनना चाहिए ।
ध्यान रखने योग्य बातें-
श्राद्ध पक्ष के दौरान विशेष रुप से ध्यान रखना चाहिए कि समस्त परिवार प्रसन्नता व विनम्रता के साथ अपने पितरों को भोजन परोसे और ब्राह्मण भोजन करवाने के पश्चात ही स्वयं भोजन ग्रहण करें।श्राद्ध कर्म जब तक हो रहा हो तब तक पुरुष सूक्त तथा पवमान सूक्त का जप निरंतर होते रहना चाहिए। ब्राह्मण देव जब भोजन प्रसाद ग्रहण कर लें तब अपने पितृदेव से प्रार्थना करनी चाहिए-
दातारो नोअभिवर्धन्तां वेदा: संततिरेव च॥
श्रद्घा च नो मा व्यगमद् बहु देयं च नोअस्तिवति।
कहने का भाव है कि पितृगण ! हमारे परिवार में दाताओं, वेदों और संतानों की वृद्घि हो, हमारी आप में कभी भी श्रद्धा न घटे, दान देने के लिए हमारे पास बहुत संपत्ति हो।
इसके बाद ब्राह्मणों की प्रदक्षिणा, दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए और उन्हें विदा करना चाहिए ।
विशेष रुप से ध्यान रखने योग्य बातें
श्राद्ध के लिए जल में काले तिल, जौ, कुशा एवं सफेद फूल मिलाकर उस जल से विधि पूर्वक तर्पण किया जाता। हिन्दू मान्यता है कि इससे हमारे पितर तृप्त होते हैं। श्राद्ध के बाद ब्राह्मण को भोजन कराकर दी जाने वाली तृप्ति पितरों को भी संतुष्ट करती है।   
श्राद्ध कर्म करने वाले व्यक्ति को दक्षिण दिशा की ओर मुख करके, आचमन कर अपने जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय का दूध, घी, शक्कर एवं शहद को मिलाकर बने पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना चाहिए,इसे ही पिंडदान कहा जाता है।
श्राद्ध कर्म प्रारम्भ होने की तिथि ( 16-30 सितंबर2016 )
पूर्णिमा श्राद्ध, 16सितम्बर 2016, शुक्रवार
प्रतिपदा श्राद्ध, 17 सितम्बर 2016, शनिवार
द्वितीय श्राद्ध,18 सितम्बर 2016 रविवार
तृतीय श्राद्ध/चतुर्थी श्राद्ध,19 सितम्बर 2016 सोमवार
पंचमी श्राद्ध,20 सितम्बर 2016, मंगलवार
षष्ठी श्राद्ध, 21 सितम्बर 2016 बुधवार
सप्तमी श्राद्ध,22 सितम्बर 2016 वृहस्पतिवार
अष्टमी श्राद्ध,23 सितम्बर 2016, शुक्रवार
नवमी श्राद्ध,24 सितम्बर 2016, शनिवार
दशमी श्राद्ध, 25 सितम्बर 2016, रविवार
एकादशी श्राद्ध,26 सितम्बर 2016, सोमवार
द्वादशी श्राद्ध,27 सितम्बर 2016 मंगलवार
त्रयोदशी श्राद्ध,28 सितम्बर 2016, बुधवार
चतुर्दशी श्राद्ध, 29 सितम्बर 2016, वृहस्पतिवार
सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध,30 सितम्बर 2016, शुक्रवार
इस प्रकार से पितृ देवों के लिए श्राद्ध पक्ष में नियम-संयम और विधान से,भाव से, श्रद्दा से हमें अपने पितरों की शांति के लिए पूजा पाठ करना चाहिए।जिससे हमारे सिर पर बड़ों आसीर्वाद सदैव बना रहे और हमारे जीवन से रोग शोक का नाश हो जाए और हमारे जीवन में सुख,शांति सम्बृद्धि,उन्नति होती रहे।  

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