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Saturday, 5 November 2016

सदियों पुरानी छठ पूजा की परंपरा: रामायण, महाभारत काल में भी होती थी छठ पूजा

संदीप कुमार मिश्र: आस्था और विश्वास का महापर्व है छठ पूजा।सात्विक विचार और भाव के साथ 36 घंटे का निर्जला व्रत करते हुए व्रती छठी मईया की पूजा अर्चना करते हैं,साथ ही सूर्य देव की आराधना करते हैं।उगते और डूबते सूर्य को अर्ध्य देते हैं और इस प्रकार से आस्था के पूनीत और पावन पर्व का समापन होता है।
मित्रों ये परंपरा ये अनादिकाल से चली आ रही है।सूर्य देव की पूजा आराधना का महत्व हमारे वेद ग्रंथों में बड़े ही सरल भाव से बताया गया है।सूर्य देव ही एकमात्र प्रत्यक्ष देव हैं जो हममें उर्जा का संचार करते हैं।हमें शक्ति प्रदान करते हैं। सूर्योदय की पहली किरण यानी ऊषा और संध्या यानी सूर्य की अंतिम किरण प्रत्यूषा को धठ पूजा पर व्रती अर्घ्य देकर दोनों को नमन करते हैं और अपनी पूजा संपन्न करते हैं। दरअसल सूर्य देव की शक्तियों का मुख्य आधार उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं और छठ पूजा के पावन अवसर पर सूर्य देव के साथ ऊषा और प्रत्यूषा की संयुक्त रुप से पूजा आराधना की जाती है।
सूर्योपासना का उल्लेख ऋगवेद में मिलता है।वहीं वेदों और उपनिषदों में भी सूर्यदेव की पूजा का वर्ण देखने को मिलता है। पौराणिक काल से ही सूर्यदेव को आरोग्य का देवता कहा जाता हा है। सूर्य की किरणों में रोगों को नष्ट करने की क्षमता होती है।हमारे धर्म शास्त्रों में ऐसा कहा गया है कि गायत्री मंत्र के रचयिता ऋषिवर विश्वामित्र के मुख से गायत्री मंत्र कार्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को ही निकला था।
महाभारत काल की बात करें तो कहा जाता है कि जब पांडवों ने अपना संपूर्ण राजपाट जुए में हार गए थे तब द्रौपदी ने छठ का पवित्र व्रत किया था।जिससे छठी मईया प्रसन्न हुई और पांण्डवों को राजपाट वापस मिल सका। वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पूजा का की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा कर की थी।
रामायण की बात करें तो तो प्रभु श्री राम लंका विजय के पश्चात रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने व्रत,उपवास किया और सूर्यदेव की अर्चना की थी।मान्यताओं के अनुसार छठी मईया, सूर्यदेव की बहन हैं, यही कारण है कि छठ पर्व पर छठ देवी को प्रसन्न करने के लिए भगवान भास्कर यानी सूर्य देव को पूजा आराधना की जाती है।जिससे कि सूर्य देव प्रसन्न होकर मनवांछित फल प्रदान करे।ऊं सूर्याये नम:।जय छठी मईया।

Thursday, 3 November 2016

देवोत्थान(देवउठवनी) एकादशी सरल पूजा विधान/10/11/2016

संदीप कुमार मिश्र: हिन्दू धर्म शास्त्रों में एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है।जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु की पूजा का विशेष महत्व बताया गया है।एकादशी व्रत साधक को मनसा वाचा कर्मणा बड़े ही भक्ति भाव से करनी चाहिए।

कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थापनी एकादशी या देवप्रबोधनी या देवउठवनी एकादशी कहा जाता है।जो कि इस बार 10/11/2016 को है।और फिर अगले दिन यानि पारण के दिन (11/11/2016)  तुलसी जयंती मनाई जाएगी।कहते हैं कि देवोत्थापनी एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु चार महिने की नींद से जागते हैं।
इस पावन और पूनीत अवसर पर सरल और सुलभ तरीके से भगवान श्री हरि की साधना और पूजा विधान जाने-
एकादशी के इस खास अवसर पर साधक बड़े भक्ति भाव से व्रत,उपवास रखें। भगवान विष्णु को विशेष रुप से  धूप,दीप,नैवेद्य,फूल,गंध,चंदन,फल का अर्ध्य दें और सच्चे मन से श्रीहरि की साधना करें।साथ ही मृदंग,शंख,घंटों को बजाएं और निम्न मंत्रों का जाप करें-

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविंद निद्रा जगत्पते।त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वाराह दंष्ट्रोद्धृतवसुंधरे।हिरण्याक्षप्राणघातिन् त्रैलोक्ये मंगलं कुरु।।

इसके बाद फूल अर्पित करें और भगवान की आरती गाएं।और समस्त देवी देवताओं का ध्यान करें और प्रसाद वितरण करें।
हमे धर्म शास्त्रों में समस्त मांगलिक कार्यों की शुरुआत भी देवप्रबोधिनी एकादशी से यानी भगवान विष्णु की पूजा अर्चना से शुरु हो जाती है।एक कथा के अनुसार कहा जाता है कि भाद्रपद मास यानी भादो की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु ने शंखासुर दैत्य का वध किया था।कहते हैं कि शंखासुर बड़ा ही बलशाली और पराक्रमी दैत्य था।जिससे लंबे समय तक भगवान विष्णु का घमासान युद्ध चला और अंतत: शंखासुर का वध हुआ।इस भिषण युद्ध में भगवान अत्यधिक थक गए थे।जिसके बाद क्षीरसागर में आकर विश्राम करने लगे और चार माह के पश्चात कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को जागे।यही कारण है कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवप्रबोधिनी एकादशी या देवउठवनी एकादशी कहा जाता है।
देवप्रबोधिनी एकादशी का मूल भाव है स्वयं में देवत्व को जगाना ।वहीं प्रबोधिनी एकादशी की बात करें तो तातपर्य है कि मनुष्य नींद से जाग जाए,सतकर्म की ओर बढ़े और भगवान श्रीहरि का अभिनंदन,स्वागत करे।

भगवान विष्णु की भक्ति तभी सार्थक है जब हम अपने मन में किसी भी जीव के द्वेश और ईष्या का भाव ना रखें,किसी को भी मनसा,वाचा,कर्मणा कष्ट ना पहुंचाएं।सत्य के सारथी बने,स्वाध्यायी बने।अंधकार से प्रकाश की ओर कदम बढ़ाएं।ज्ञान और विवेक का दीपक जलाएं।दयालु प्रभु दीनानाथ,जगत के पालनहार श्री हरि भगवान विष्णु आप सभी का कल्याण करें।।ऊं ऊं ऊं ऊं ऊं।।  


Wednesday, 2 November 2016

छठ पूजा विशेष : सूर्य उपासना का महापर्व छठ

संदीप कुमार मिश्र: सूर्य उपासना का महापर्व है छठ पूजा। भगवान सूर्य देव ही ऐसे देव हैं जो प्रत्यक्ष देवता माने गये है।संपूर्ण संसार में शक्ति और उर्जा का संचार करते हैं सूर्य देव।सूर्य के बिना तो इस धरा पर जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। भगवान सूर्य के प्रति अटूट आस्था,श्रद्धा और विश्वास का ही महापर्व है छठ पूजा।जिसे सूर्य षष्ठी व्रत भी कहा जाता है।
सूर्यदेव की उपासना का इकलौता ऐसा पर्व है छठ पूजा जिसमें उगते और डूबते सूर्य को अर्ध्य दिया जाता है। कार्तिक शुक्ल षष्ठी को संपन्न होने वाला सूर्य-षष्ठी व्रत, छठ पहले तो उत्तर-भारत में ही मनाया जाता था लेकिन धीरे-धीरे इसकी महत्ता बढ़ती गई और अब संपूर्ण देश के साथ ही विश्व के कुछ अन्य राष्ट्रों में भी मनाया जाने लगा।
वास्तविक रुप से हम देखें तो सूर्य उपासना का ये महापर्व प्रकृति को समर्पित है।स्वच्छता और सादगी को समर्पित है।पूराणों और वैदिक महत्व की बात करें तो अनंत काल से ही सूर्य की उपासना का प्रमाण मिलता है। ऐसे में हम कह सकते हैं कि वैदिक युग में जिन देवी देवताओं को सर्वपूज्य माना जाता है, उनमें सूर्य, अग्नि और इंद्र प्रमुख हैं।
छठ पूजा का इतिहास
चार दिनों की छठ पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी से सप्तमी तक मनाई जाती है| चार दिनों के इस पवित्र त्योहार में आस्था और भक्ति का हर रंग मिला होता है। कहते हैं कि छठी माता की पूजा माताएं संतान की रक्षा और उन्नति और खुशहाली के ले करती है।एक पौराणिक कथा के अनुसार-

किसी समय एक राजा को संतान नहीं थी जिससे राजा बहुत दुखी थे। महर्षि कश्यप जब राजा के राज्य में आए तो राजा ने उनकी बहुत सेवा की,जिसके बाद महर्षि ने खुश होकर आशीर्वाद दिया। जिसके प्रभाव से रानी गर्भवती हो हुई,लेकिन संतान मृत पैदा हुई।जिससे दुखी होकर राजा रानी ने आत्महत्या करने का निर्णय लिया।लेकिन  जैसे ही वे दोनों नदी में कूदने को हुए उन्हें छठी माता ने दर्शन दिये और कहा कि आप मेरी पूजा करें।आपकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी। राजा रानी ने विधि-विधान के साथ छठी माता की पूजा की जिससे उन्हें स्वस्थ संतान की प्राप्ति हुई।तभी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को छठ पूजा की शुरुआता हुई।इसके अलावा भी हमारे धर्म शास्त्रों में छठ पूजा का वर्णन है।कहते हैं कि माता सीता ने और द्रोपदी ने भी छठ पूजा की थी। आप सभी इष्ट मित्रों को छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएं।छठी मईया आप सभी की मनोकामनाओं को पूरा करें और आपको मनोवांछित फल प्रदान करें।जय छठी मईया।।

Sunday, 16 October 2016

करवा चौथ: जाने व्रत,पूजन विधि और मुहूर्त का शुभ समय

संदीप कुमार मिश्र: (करवा चौथ-19 अक्टूबर,दिन बुद्धवार)। अपने पति की लंबी आयू की कामना के लिए हमारी भारतिय संस्कृति में सुहागिन महिलाएं कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को व्रत रखती हैं जिसे हम करवा चौथ कहते हैं।
छांदोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैंमहान और कठोर व्रत करवा चौथ को विवाहित स्त्रियां अपने पति परमेश्वर की रक्षा के लिए निराहार रहकर निर्जला व्रत रखती हैं...जिससे उनकी सहनशक्ति,समर्पण और त्याग का पता चलता है।
करवा चौथ पर विशेष रुप से भगवान शिव,माता पार्वती,कार्तिकेय और भगवान गणेश की पूजा आराधना का विधान है।इस विशेष त्योहार पर महिलाएं चंद्रमा के उदय पर अर्घ्य देती हैं और पूजा करती हैं। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री, चावल, रखकर अपनी सास या सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर सुहाग सामग्री भेंट करती हैं।
जानिए करवा चौथ की पूजन सामग्री
मिट्टी, चॉदी, सोने या पीतल आदि किसी भी धातु का टोंटीदार करवा व ढक्कन, दीपक, रुई, कपूर, गेहूँ, शक्कर का बूरा, हल्दी, पानी का लोटा, कुंकुम, शहद, मेंहदी, महावर, कंघा, बिंदी, चुनरी, चूड़ी, बिछुआ, अगरबत्ती, पुष्प, कच्चा दूध, शक्कर, शुद्ध घी, दही, मेंहदी, मिठाई, गंगाजल, चंदन, चावल, सिन्दूर, गौरी बनाने के लिए पीली मिट्टी, लकड़ी का आसन, हलुआ, छलनी, आठ पूरियों की अठावरी, श्रद्धा स्वरुप दान के लिए दक्षिणा।  
करवा चौथ का व्रत धारण करने के लिए प्रात: स्नान ध्यान करके साफ और स्वच्छ वस्त्र धारण करें,श्रृंगार करें।करवा की पूजा करने के साथ ही भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करें क्योंकि माता पार्वती ने कठिन तपस्या करके शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था।यही वजह है कि इस विशेष दिन में शिव-पार्वती की पूजा का विधान है।वहीं करवा चौथ के दिन चंद्रमा की पूजा का हमारे धर्म शास्त्रों में महत्व तो बतलाया ही गया है साथ ही इसका ज्योतिष महत्व भी बताया गया है।
करवा चौथ पूजा समय
पूजा का शुभ मुहूर्त- शाम 05 बजकर 46 मिनट से 06 बजकर 50 मिनट तक।
करवा चौथ के दिन चन्द्र को अर्घ्य देने का समय रात्रि 08.50 बजे ।
करवा चौथ पूजन विधि-
नारद पुराण में कहा गया है कि करवा चौथ के दिन दिन भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। करवा चौथ की पूजा करने के लिए बालू या सफेद मिट्टी की एक वेदी बनाकर भगवान शिव- देवी पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, चंद्रमा एवं गणेशजी को स्थापित कर उनकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए।
पूजन के समय का मंत्र-
''मम सुखसौभाग्य पुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्री प्राप्तये चतुर्थी व्रतमहं करिष्ये
सांयकाल के समय, माँ पार्वती की प्रतिमा की गोद में श्रीगणेश को विराजमान कर उन्हें लकड़ी के आसार पर बिठाएं। माता पार्वती का सुहाग की सामग्री से श्रृंगार करना चाहिए। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती की भक्ति भाव से आराधना करनी चाहिए और साथ ही करवे में पानी भरकर पूजा करनी चाहिए।इस दिन सुहागन महिलाएं र्निजला व्रत रखते हुए कथा सुने और फिर चंद्रमा के दर्शन करके पति के द्वारा जल और अन्न ग्रहण करें।

Thursday, 13 October 2016

जाने करवा चौथ के व्रत का विधान और पूजा-मुहूर्त

संदीप कुमार मिश्र: करवा चौथ हिन्दू धर्म का एक मुख्य त्योहार है जिसे सुहागन औरते अपने पती की लंबी आयू के लिए रखती हैं। करवा चौथ का व्रत कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दौरान किया जाता है। इस दिन हमारी भारतिय महिलाएं नीराजल रहकर अपने पती की दीर्घ आयू के लिए शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश की पूजा अर्चना करती हैं।साथ ही शादीशुदा महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा अर्चना करती हैं और चंद्रमा के दर्शन करके और अर्घ देकर अपने व्रत को तोड़ती हैं। करवा चौथ का अत्यंत ही कठोर व्रत होता है।
करवा चौथ समय व मुहूर्त
करवा चौथ पूजा मुहूर्त- 05:43 से 06:59
अवधि – 1 घंटा 16 मिनट्स
करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय – 08:51
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ – 18/11/2016 को 08:47 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त - 07/11/2016 को 07:32 बजे
करवा चौथ पूजन व्रत विधान
करवा चौथ व्रत के दिन प्रातः नित्यकर्म और स्नानादि से निवृत होकर वाहित महिलाओं को संकल्प लेकर करवा चौथ व्रत शुरु करना चाहिए। गेरू और पिसे चावलों के घोल से करवा बनाना चाहिए। पीली मिट्टी से माँ गौरी और उनकी गोद में गणेशजी को बनाना चाहिए।माता गौरी की मूर्ति के साथ भगवान शिव और गणेशजी को लकड़ी के आसन पर बिठा कर माता गौरी को चुनरी बिंदी आदि सुहाग सामग्री से सजाना चाहिए।साथ ही पूजा स्थल पर जल से भरा हुआ लोटा रखें। रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं, गौरी-गणेश की पूजा करें और कथा का श्रवण करें। कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और उन्हें करवा भेंट करें। रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति से आशीर्वाद लेकर व्रत को खोलें।इस प्रकार व्रत पूर्ण होता है।
करवा चौथ पर सरगी का विशेष महत्व
करवा चौथ पर सरगी सास के द्वारा अपनी बहू को दी जाती है।जिसका सेवन महिलाएं सूर्योदय से पहले तारों की छांव में खाकर व्रत की शुरुआत करती हैं।सरगी के रुप में सास अपनी बहू को हर प्रकार के खाने की सामग्री के साथ ही वस्त्र देती हैं। सरगी को हमारे हिन्दू धर्म में सौभाग्य और समृद्धि का प्रतिक माना जाता है।
पौराणिक दृष्टि में करवा चौथ  

करवा चौथ का पौराणिक महत्व महाभारत में भी बताया गया है।एक कथा के अनुसार वनवास के समय अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं।दूसरी तरफ पांडवों पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ता है,जिसे देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती है और भगवान श्री श्रीकृष्ण से मुक्ति पाने का उपाय जानने की प्रार्थना करती है।जिसपर भगवान कृष्ण द्रौपदी से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत करने को कहते हैं।इस प्रकार से द्रौपदी ने पूर्ण निष्ठा और भाव से व्रत किया और पाण्डवो के सभी कष्ट दूर हो गए।तभी से ये परंपरा निरंतर चली आ रही है और महिलाएं अपनी पती दीर्घ आयू के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं।

शरद पूर्णिमा की रात होगा रोग का नाश


योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, “पुष्णामि चौषधि: सर्वा: सोमो भूत्वा रसात्यमक:।। अर्थात 'मैं रसस्वरूप, अमृतमय चंद्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूं

संदीप कुमार मिश्र:  शरद पूर्णिमा की रात्रि के संबंध में भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है उसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है।एक रिसर्च के अनुसार शरद पूर्णिमा की विशेष रात्रि में औषधियों की स्पंदन क्षमता बढ़ जाती है।
ऐसा कहा जाता है कि महान पंडित, विद्वान लंकाधिपति रावण भी शरद पूर्णिमा की रात्रि किरणों को दर्पण के माध्यम से अपनी नाभि पर ग्रहण करता था।ऐसा करने से उसे पुनर्योवन की शक्ति प्राप्त होती थी।विज्ञान भी कहना है कि शरद पूर्णिमा की रात्रि को चांदनी रात में 10 बजे से लेकर से मध्यरात्रि के 12 बजे तक कम वस्त्रों में भ्रमण करने वाले व्यक्ति को अक्षय ऊर्जा की प्राप्ती होती है।ज्योतिष के अनुसार कहा जाता है कि सोमचक्र, नक्षत्रीय चक्र और आश्विन के त्रिकोण के कारण शरद ऋतु से ऊर्जा का संग्रह होता है, और बसंत में निग्रह होता है।इस प्रकार से शरद पूर्णिमा का महत्व हमारे धर्म शास्त्रों में बताया गया है,जिसकी भारतिय जनमानस बड़े ही भक्ति भाव और नियम पूर्वक पालन करता है।

 वहीं एक शोध में ये भी कहा गया है कि दुग्ध में लैक्टिक अम्ल और अमृत तत्व होता है जो कि चंद्रमा की किरणों से अधिक मात्रा में शक्ति का शोषण करता है।साथ ही चावल में स्टार्च होने के कारण शोषण की प्रक्रिया और भी आसान हो जाती है।यही वजह है कि ऋषि-मुनियों ने शरद पूर्णिमा की रात्रि में खीर खुले आसमान में रखने का नियम विधान बताया है।जिसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है।

 विज्ञान के शोध के अनुसार शरद पूर्णिमा पर खीर को चांदी के पात्र में बनाना चाहिए।क्योंकि चांदी में रोग प्रतिरोधकता अधिक होती है।जिससे कि विषाणु दूर होते हैं।इस दिन हल्दी का प्रयोग नहीं करना चाहिए।शरद पूर्णिमा पर कहा जाता है कि रात्रि 10-12 बजे तक कम से कम आधे घंटे तक स्नान करना चाहिए।

शरद पूर्णिमा- 15 अक्टूबर2016,शनिवार

संदीप कुमार मिश्र : धर्म और आस्था हमारी संस्कृति वो मजबूत नींव है जो हमारी भारतिय सभ्यता को और भी संबृद्ध बनाती है।त्योहारों और परंपराओं का देश है भारत।एक के बाद एक त्योहार हमें निरंतर एक दूसरे से जोड़ने का कार्य करते हैं।नवरात्र और दशहरा के शुरुआत से ही त्योहारों का सिलसिला शुरु हो जाता है।इन दोनो त्योहार के बाद जो मुख्य त्योहार पड़ता है वो है शरद पूर्णिमा। इस बार शरद पूर्णिमा 15 अक्टूबर (शनिवार) को देशभर में बड़े ही धूमधाम से मनाई जाएगी। आपको बता दें कि कई वर्षों के बाद इस बार शरद पूर्णिमा और शनिवार का विशेष संयोग बना है। शरीवार को चंद्रमा का पूर्ण दर्शन होने के कारण इसे महापूर्णिमा भी कहा जा रहा है। कहते हैं कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा 16 कलाओं से युक्त होता है।जिससे कि शरद पूर्णिमा का महत्व बढ़ जाता है ।
हिन्दू धर्म शास्त्रों ऐसा कहा गया है कि शरद पूर्णिमा के दिन ही भगवान कृष्ण ने रासलीला की थी।इसलिए शरद पूर्णिमा को रासपूर्णिमा भी कहा जाता है। इस दिन के विशेष महत्व के तौर पर आम जनमानस खीर(तस्मई) बनाकर रात्रि में चंद्रमा की रोशनी में रख ते हैं। जिससे कि उसमें औषधीय गुण आ जाते हैं और उस खीर का सेवन करने से मनुष्य का मन, मस्तिष्क और शरीर चाजगी और स्फुर्ति से भर जाता है,उत्साह और उमंग की वृद्धि होती है।

शरण पूर्णिमा पर क्या करें
शरद पूर्णिमा के पावन अवसर पर विशेष कृपा प्राप्त करने के लिए गाय के दूध से खीर बनाकर उसमें घी और चीनी मिलाकर रात्रि में चंद्रमा की रोशनी में छत पर रख दें।शरद पूर्णिमा के अगले दिन प्रात: इसी खीर का भगवान को भोग लगाकर अपने पूरे परिवार के साथ खीर का सेवन करें।

वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...