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Friday, 5 February 2016

बीजेपी का बंगाल में सीएम कैंडिडेट कौन...?

संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों एक बार फिर तैयार हो जाईए लोकतंत्र के चुनावी समर का आनंद लेने के लिए।केंद्र की सत्ता पर मोदी सरकार है तो जाहिर है सभी पार्टियों का मुकाबला भी बीजेपी से ही होना है...सवाल बीजेपी की साख का है क्योंकि दिल्ली और बिहार में पार्टी का जो हश्र हुआ उससे बीजेपी भविष्य में कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहती।क्योंकि चुनाव तो राज्यों का है लेकिन इससे दिशा तय होगी 2019 के आम चुनाव की।
दरअसल चुनाव के लिहाज सबसे पहले असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा के चुनाव होने हैं जो तकरीबन आस-पास ही होंगे।इस लिहाज से दोनों जगहों पर बीजेपी न तो बिहार जैसे एक्सपेरिमेंट करना चाहेगी और न ही दिल्ली जैसी कोई गलती दोहराना।यही वजह है कि असम में भारतीय जनता पार्टी ने सर्वानंद सोनवाल को असम का सीएम कैंडिडेट बना दिया है,अब सवाल बंगाल का है।
असम और बंगाल के हालात में फर्क
दोस्तों बीजेपी के लिए बड़ा सवाल ये कि असम और बंगाल के हालात में खासा अंतर है।एक तरफ असम में जहां तरुण गोगोई में दम नहीं रहने की बात कही जाती है वहीं बंगाल में ममता बनर्जी की हालत अभी खासा ठीक बताई जा रही है।असम में बीजेपी के लिए संभावनाएं नजर आती है लेकिन फिर भी असम में बदरुद्दीन अजमल फिलहाल मेन फैक्टर बने हुए हैं।ये भी तकरीबन साफ है कि जिसे बदरुद्दीन का सपोर्ट मिलेगा उसका पलड़ा भारी पड़ सकता है। असम गण परिषद से लेकर बदरुद्दीन तक, बीजेपी सभी के संपर्क में है। हालांकि, बदरुद्दीन के कांग्रेस के साथ महागठबंधन में शामिल होने की संभावनाएं इसलिए बढ़ती नजर आ रही हैं क्योंकि नीतीश कुमार के सलाहकार प्रशांत किशोर भी खासा दिलचस्पी लेते नजर आ रहे हैं।
बीजेपी के लिए अच्छी बात असम में ये है कि उसके चुनाव प्रभारी हेमंत बिस्वा शर्मा जो हाल तक कांग्रेस के नेता थे वो अब अपनी नई पार्टी बीजेपी के पक्ष में कह रहे हैं कि असम में मूल समस्या दाल-रोटी नहीं बल्कि अस्मिता का है, जो सिर्फ बीजेपी ही दिला सकती है।खैर बीजेपी पर वोटों के ध्रुवीकरण की तोहमत हमेशा लगती रही है, लेकिन असम में बीजेपी के सीएम कैंडिडेट सर्बानंद सोनवाल-मोदी के सबका साथ सबका विकास के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं।
वहीं बात करें पश्चिम बंगाल की तो बीजेपी अपने मुकाबले ममता और कांग्रेस-लेफ्ट को पहले से कमजोर देखती नजर आ रही है। चुनावी गणित की बात करें तो बीजेपी, कांग्रेस और लेफ्ट के बीच गठबंधन में खुद का फायदा देख रही है।बीजेपी के रणनीतिकार मान कर चल रहे हैं कि दोनों के कार्यकर्ता जमीनी स्तर पर मन से कतई नहीं जुड़े हैं।जबकि कहीं ना कहीं बीजेपी को ये भी समझना होगा कि बिहार में भी पहले उसे ऐसा ही लगा था।
इस लिहाज से बीजेपी की कोशिश जरुर होगी कि ममता को किसी भी तरह से कठघरे में खड़ा कर एक त्रिकोण जैसी स्थिति बना दी जाए।जिसमें बीजेपी को फिट होने का अवसर निकल आए। यही वजह है कि बीजेपी के विजय रथ को बढ़ाने के लिए कैलाश विजयवर्गीय हों या अमित शाह ममता सरकार को सीधेतौर पर निशाने पर ले रहे हैं साथ ही अन्य बड़े नेता भी।
बंगाल में बीजेपी का मुख्यमंत्री का चेहरा कौन..?
ऐसे में आप सोच रहे होंगे कि बंगाल में सीएम कैंडिडेट कौन...?लेकिन इससे पहले कुछ आंकड़ों पर गौर करते हैं।दरअसल बीजेपी को आम चुनाव 2014 के लोक सभा चुनाव में 17 फीसदी वोट जरूर मिले थे, लेकिन सीटें महज दो ही मिलीं।बाद में उसने एक विधानसभा चुनाव भी जीता लेकिन लोक सभा उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा।
रूपा गांगुली को बीजेपी ने बंगाल महिला शाखा का प्रमुख बनाया है।दुसरी तरफ बीजेपी की पश्चिम बंगाल इकाई के प्रमुख दिलीप घोष भी खासे सक्रियता दिखा रहे हैं।कहा जा रहा है कि घोष ने संगठन में अपने हिसाब से कई बड़े बदलाव किए हैं और आरएसएस के करीबी भी हैं। बीजेपी महासचिव कैलाश विजयबर्गीय का कहना हैं कि, "संगठन का ही कोई व्यक्ति सीएम होगा, लेकिन वह जाति पर आधारित नहीं होगा।"
वहीं चुनावी समर में अब बीजेपी का दामन नेताजी सुभाष चंद्र बोस के प्रपौत्र चंद्र कुमार बोस ने भी थाम लिया है। नेताजी से जुड़े दस्तावेजों के सार्वजनिक किये जाने में उनकी भी अहम भूमिका रही है,और खास मौकों पर उन्हें मौजूद भी देखा गया। उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी भी बताया जाता है।मतलब लड़ाई बंगाल में भी दिलचस्प देखने को मिलेगी।
क्योंकि चंद्र कुमार बोस का साथ मिलने से बीजेपी को लगता है कि ममता बनर्जी और अब तक लेफ्ट से जुड़े नेताजी के समर्थकों का एक बड़ा तबका बीजेपी के साथ आ जाएगा। बहरहाल नेताजी की फाइलों से अब तक कोई खास बातें भले निकलकर सामने ना आई हो लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव में ये एक बड़ा फैक्टर जरूर होगा।
अंतत: देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी सीएम चेहरा लाती है या फिर मोदी के विकास के एजेंडे पर चुनाव लड़ती है।चुनाव में समय है,बीजेपी बंगाल की जनता की नब्ज भी टटोलने की कोशिश में होगी कि जीत कैसे सुनिश्चित होगी....चेहरे से या विकास के एजेंडे से।

चिरंजीवी हैं अंजनी के लाल महावीर हनुमान...!


यत्र-यत्र रघुनाथ कीर्तनं तत्र तत्र कृत मस्तकान्जलिम।
वाष्प वारि परिपूर्ण लोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम॥
अर्थात कलियुग में जहां-जहां भगवान श्रीराम की कथा-कीर्तन इत्यादि होते हैं, वहां हनुमानजी गुप्त रूप से विराजमान रहते हैं।

जगत जननी माता जानकी ने भी कहा कि –
अजर-अमर गुन निधि सुत होऊ।करहु बहुत रघुनायक छोऊ॥


हमारे सनातन धर्म में कहा गया है कि यदि मनुष्य पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से हनुमंत लाला जी महाराज का आश्रय ग्रहण कर लें तो फिर गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज की तरह ही उसे भी पवन सुत हनुमान जी महाराज और प्रभु भीराम के दर्शन होते देर नहीं लगेगी। इस प्रकार से हम देखें तो हनुमान जी के हर काल में अजर-अमर होने का संकेत प्राप्त होता है।

जैसा कि धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि त्रेतायुग में पवनपुत्र हनुमानजी महाराज केसरी नंदन के रूप में अवतार लिए और प्रभु श्रीराम के भक्त बनकर उनके साथ छाया की तरह रहे। वाल्मीकि ‘रामायण’ में भी हनुमानजी के संपूर्ण चरित्र का विस्तार से उल्लेख मिलता है। हनुमानजी के त्रेतायुग में होने के हजारों प्रमाण मिलते हैं। कहा जाता है कि श्रीराम, भरत, सीता, सुग्रीव, विभीषण और संपूर्ण कपि मंडल, कोई भी महाबली हनुमान जी महाराज के ऋण से मुक्त नहीं हो सकता।

हनुमान जी के संबंद में कहा जाता है कि वो चिरंजीवी हैं। वे हर युग में पृथ्वी पर निवास करते हैं।हनुमान जी सतयुग में भी थे,रामायण काल में भी थे और महाभारत काल में भी।कहा ये भी जाता है कि प्रभु श्री राम जी के अनन्य भक्त महावीर हनुमान कलियुग में भी विराजमान है और उनके जीवित होने के संकेत मिलते हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने हनुमान चालीसा में अंजनी के लाला को-शंकर सुवन केसरी नंदन कहकर संबोधित किया है।मानस में कहा गया है कि  त्रेतायुग में जब-जब श्रीराम ने हनुमानजी को गले से लगाया, तब-तब आदि देव महादेव के प्रसन्नता का कोई ठिकाना कनही रहा है। सतयुग में भगवान आशुतोष-माता पार्वती से प्रभु श्रीराम के मर्यादित स्वरूप का वर्णन करते हैं और वे उसी युग में पार्वती से दूर रहकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रीहनुमंत लालजी महाराज सतयुग में शिवरूप में थे और शिव तो अजर-अमर हैं।
हनुमानजी महाराज के कलियूग में होने के प्रमाण समय-समय पर मिलते रहे हैं, जो इस बात को प्रमाणित करते है कि हनुमानजी आज भी विद्यमान हैं।पौराणिक मान्यता भी है कि जहां कहीं भी भगवान राम की कथा होती है वहां हनुमान जी अवश्य होते हैं। इसलिए हनुमानजी महाराज की कृपा पाने के लिए प्रभु श्रीरामजी की भक्ति जरूरी है। जो राम के भक्त हैं हनुमानजी उनकी सदैव रक्षा करते हैंउनके घर से रोग शोक का नाश होता है।क्योंकि हनुमामन जी महाराज के संबंध में कहा जाता है कि-नासै रोग हरै सब पीरा,जो सुमिरै हनुमत बलवीरा।
श्री हनुमान बल, पराक्रम, ऊर्जा, बुद्धि, सेवा, भक्ति की आदर्श प्रतिमा माने जाते हैं। यही कारण है कि शास्त्रों में श्री हनुमान को सकलगुणनिधान भी कहा गया है। श्री हनुमान को चिरंजीव सरल शब्दों में कहें तो अमर माना जाता है। श्री हनुमानजी ऐसे देवता है, जो हर युग में किसी न किसी रूप, शक्ति और गुणों के साथ जगत के लिए संकटमोचक बनकर मौजूद रहे। श्री हनुमान से जुड़ी यही विलक्षण और अद्भुत बात उनके प्रति आस्था और श्रद्धा गहरी करती है।श्री हनुमानजी महाराज किस युग में किस तरह जगत के लिए शोकनाशक बनें-

सतयुग: श्री हनुमान रुद्र अवतार माने जाते हैं। शिव का दु:खों को दूर करने वाला रुप ही रुद्र है। इस तरह कहा जा सकता है कि सतयुग में हनुमान का शिव रुप ही जगत के लिए कल्याणकारी और संकटनाशक रहा।
त्रेतायुग: इस युग में श्री हनुमानजी को भक्ति, सेवा और समर्पण का आदर्श माना जाता है। शास्त्रों के मुताबिक विष्णु अवतार श्री राम और रुद्र अवतार श्री हनुमान यानि पालन और संहार शक्तियों के मिलन से जगत में बुरी और दुष्ट शक्तियों का अंत हुआ।

द्वापर युग: श्री हनुमान नर और नारायण रूप भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के साथ धर्मयुद्ध में रथ की ध्वजा में उपस्थित रहे।यह प्रतीकात्मक रूप में संकेत है कि श्री हनुमानजी इस युग में भी धर्म की रक्षा के लिए मौजूद रहे।

कलियुग: श्रीमद्भागवत के मुताबिक कलयुग में श्री हनुमान का निवास गन्धमानदन पर्वत पर है। यही नहीं जहां भी प्रभु श्रीराम का गुणगान होता है वहीं हनुमान जी विद्यमान रहते हैं और जगत का कल्याण करते हैं।

हिन्दु धर्म शास्त्रों में इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि कुछ ऐसी आत्माएं हैं जिन्हें चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त है।क्योंकि प्रभु श्रीरामजी से वरदान पाने के कारण हनुमान जी अमर हो गए,ऐसा कहा गया है। शायद तभी गोस्वामी जी ने कलियुग में हनुमंत लालजी की मौजूदगी का मानस में वर्णन किया है,और बताया है कि हनुमान जी की कृपा से ही उन्हें प्रभु श्रीराम जी और लखन लालाजी के दर्शन प्राप्त हुए।

अंतत: हरि अनंत हरि कथा अनंता।एक बात तो तय है कि मानिए तो देव नहीं तो पत्थर। आस्थाओं का देश है भारत,परंपराओं का देश है भारत। संतो-मुनियों,महात्माओं का देश है भारत। तभी तो विश्व गुरु है भारत।और भारत को ऐसा बनने के लिए कोई ऐसी शक्तु तो अवश्य है जो हमें एक सुत्र में बांधकर रखती है।और हर स्वरुप में प्रभु का एहसास कराती है।

।। चारों जुग परताप तुम्हारा, है परसिद्ध जगत उजियारा॥
अर्थ- चारो युगों सतयुग, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में आपका यश फैला हुआ है, जगत में आपकी कीर्ति सर्वत्र प्रकाशमान है।।।


                        मानस मर्मज्ञ कपूर चंद शास्त्री जी महाराज

Thursday, 4 February 2016

महबूबा के जख्म पर मोदी सरकार का मरहम...!


संदीप कुमार मिश्र: सत्ता तो चाहिए लेकिन अपनी शर्तों पर ...कुछ ऐसा ही हाल हो गया है कश्मीर का...कुर्सी खाली है...लेकिन महबूबा बैठने को तैयार नहीं...उनके जख्मों पर मोदी सरकार मरहम भी लगा रही है, लेकिन शायद मरहम उनके मुताबिक नहीं...जिस वजह से सरकार नहीं बन पा रही है।

दरअसल जम्मू कश्मीर में सरकार बनने को लेकर दुविधा लगातार बरकरार है।समस्या हल होनी की बजाय बढ़ती जा रही है।पीडीपी और बीजेपी किसी भी शर्त की बात नहीं कर रहे,लेकिन फिर भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ रही है।सवाल ये है कि पीडीपी के मन में आखिर क्या है....? क्या कश्मीर एक बार पिर चुनाव की ओर आगे बढ़ रहा है।क्योंकि दोनो पार्टीयों में बात नहीं बनी तो विकल्प क्या रह जाएगा...?

एक बात तो साफ है कि चुनाव में जाना इस वक्त न तो बीजेपी चाहती है न पीडीपी। हां, पूर्व मुख्यमंत्री जनाब उमर अब्दुल्ला जरूर चुनाव की मांग कर चुके हैं।लेकिन फिलहाल पीडीपी ने राज्यपाल से अपना रुख साफ करते हुए कुछ और मोहलत जरुर मांग रखी है। खैर पीडीपी का रुख देखते हुए बीजेपी भी अपने दूसरे प्लान-बी पर काम करती नजर आ रही है।

कहा जा रहा है कि सरकार ना बनाने के पीछे असल महबूबा मुफ्ती की पीएम मोदी से नाराजगी है। जिसकी कई वजहें बताई जा रही है...मसलन-

पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री मोदी जब श्रीनगर पहुंचे थे तो जम्मू कश्मीर के लिए 80 हजार करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की थी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की मशहूर टिप्पणी ‘कश्मीरियत, जम्हूरियत और इंसानियत’ को दोहराया था। मोदी इसे कश्मीर के विकास का स्तंभ बताते हुए इन तीन मंत्रों के अनुसरण की बात कही थी। लगे हाथ तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद पर भी कटाक्ष किया था। आपको बता दें कि प्रधानमंत्री की यात्रा से पहले मुफ्ती सईद ने कहा था कि वाजपेयी ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया था जिससे हमारे 10 साल शांति से गुजरे।अगर भारत को बढ़ना है तो बड़े भाई के रूप में उसे छोटे भाई (पाकिस्तान) की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाना होगा।


वहीं इस पूरे मामले पर पीएम मोदी ने सख्ती दिखाते हुए स्पस्ट शब्दों में कहा था कि कश्मीर मुद्दे पर उन्हें विश्व में किसी की सलाह मसवरे की जरूरत नहीं है।यही बात जनाब मुफ्ती को नागवार गुजरी थी लेकिन वो खामोश रहे।लेकिन महबूबा मुफ्ती और पीडीपी नेताओं को इस बात की टीस जरुर थी।

इतना ही नहीं इस पूरे मामले पर पीडीपी के सीनियर लीडर तारिक हमीद कर्रा ने तल्ख लहजे में कहा भी कि, "मोदी सिकंदर की तरह काम कर रहे हैं और ताकत के जोर से दिल जीतना चाहते हैं।"दरअसल एक अखबार से बातचीत में कर्रा इस बात को ऐसे पेश करते हैं कि , "वाजपेयी की नीति हाथ मिलाने की थी, लेकिन मोदी का रवैया हाथ मरोड़ने वाला है।" महबूबा भी मोदी से खासी खफा हैं। उन्हें इस बात की तकलीफ है कि उनके पिता दिल्ली में ही एम्स में भर्ती थे और प्रधानमंत्री उन्हें देखने तक नहीं पहुंचे।
वहीं बात ये भी सामने आई कि राहत पैकेज हासिल करने के लिए सईद को दर दर की ठोकरें खानी पड़ीं। पीडीपी नेताओं से बातचीत में भी महबूबा ने एक वाकया सुनाया था। महबूबा ने कहा, "मेरे पिता जब आखिरी सांसे ले रहे थे और जब उन्होंने पूछा कि क्या रिलीफ पैकेज जारी किया गया, तो मैंने उनसे झूठ बोला और कहा कि हां, जारी हो गया है।"

दोस्तों फिलहाल तो बीजेपी वेट एंड वॉच की पॉलिसी अपना रही हैं।और बीजेपी कह भी रही है कि उनकी तरफ से कोई शर्त नहीं है।देखना बड़ा दिलचस्प होगा कि 87 सदस्यों वाली जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीडीपी के खाते में 28 सीटें हैं,जबकि बीजेपी के पास 25।और बीजेपी को पीपल्स कांफ्रेंस के दो और एक निर्दलीय विधायक का समर्थन भी हासिल है।ऐसे में बीजेपी अपने का अगला कदम क्या होता है।


अंतत: महबूबा का नाराजगी खत्म हो...और जम्मू कश्मीर में शांती बहाली के लिए सरकार बने।हम तो यही चाहेंगे।क्योंकि नाराजगी के लिए बक्त तो बहुत है,लेकिन काम करने के लिए,विकास करने के लिए समय बहुत कम।तो कश्मीर की जनता का सम्मान करते हुए दोनो बड़े दलों को शांती से सरकार चलानी चाहिए।हम तो यही कहेंगे....महबूबा जी मान जाईए ना....।

Wednesday, 3 February 2016

देश का पहला अंडरवॉटर रेस्टोरेंट 'रियल' पोसाइडन


संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों आपने रेस्टोरेंट तो बहुत देखे होंगे। इस प्रकार के रेस्टोरेंट को हम पहले सिर्फ विदेशो में ही देखा करते थे।लेकिन अब अंडर वाटर रेस्टोरेंट का लुफ्त उठाने के लिए किसी भी देश में आपको जाने की जरुरत नहीं है। बल्कि इसका मज़ा आपको अपने ही देश में मिल जाएगा।क्योंकि देश में पहला अंडरवॉटर रेस्टोरेंट अहमदाबाद में खुला गया है।आपको बता दें कि इस रेस्टोरेंट का डाइनिंग एरिया ग्राउंड लेवल से 20 फीट नीचे बनाया गया है।

इस रेस्टोरेंट को ग्रीक देवता सी-पोसाइडन के नाम पर रखा गया है।जिसे आप 'रियल' पोसाइडन कह सकते हैं। 32 सीटों की क्षमता वाले डाइनिंग एरिया के आसपास विशाल एक्वेरियम है। इस एक्वेरियम में 1.60 लाख लीटर पानी और विभिन्न प्रजातियों की 4000 मछलियां हैं।जिसे देखना किस रोमांच से कम नही हैं।

दरअसल इस रेस्टोरेंट के मालिक अहमदाबाद शहर के ही मशहूर कारोबारी भारत भट्ट हैं। जिनका कहना है कि उनके इस रेस्टोरेंट में सिर्फ शाकाहारी खाना ही परोसा जाता है। आपको बता दें कि इस रेस्टोरेंट में जाने के लिए आपको सीढ़ियों से उतरकर गुफानुमा डाइनिंग हॉल में प्रवेश करना पड़ता है। आसपास समुद्र के अंदर जैसे नज़ारे के बीच लोग यहां खाना खा सकते हैं और खाने के साथ समंदर के अंदर का नजारा भी देख सकते हैं।

आपको बता दें की भले ही आप पानी के भीतर अनेक मछलियो के बीच खाना खाएंगे। मगर आपका खाना पूरी तरह से शाकाहारी होगा। यहां खाना खाने वाले को यही एहसास होता है की वह समुन्द्र में बैठकर अपना खाना खा रहे है। एक बार यहां आने वाला, दूसरी बार खुद तो आएगा ही मगर साथ में ही अपने परिजनों को भी लेकर आएगा।

इस रेस्टोरेंट के मालिक का कहना है कि "हम अहमदाबाद के लोगों के लिए कुछ हट कर और अनोखा करना चाहते थे। 3-4 साल पहले मेरे बेटे ने मुझे यह आइडिया दिया। हमने इस पर काम शुरू किया। शुरू में हमारे डिजाइन रिजेक्ट हुए। आखिकार दो साल में ये डिज़ाइन फाइनल हुआ। और अब ये रेस्टोरेंट लोगों को सर्व करने के लिए तैयार है।"इतना ही नहीं भट्ट का कहना है कि निकट भविष्य में वे ग्राहको के मनोरंजन के लिए ऑर्केस्ट्रा/बैंड की व्यवस्था पर भी काम कर रहे हैं। अहमदाबाद के साउथ बोपाल क्षेत्र में ये रेस्टोरैंट इस  फरवरी से आम लोगो के लिए खोल दिया गया है।


अंतत: यकिनन इस तरह का ये हमारे देश में अनुठा प्रयास है।जो कहीं ना कहीं खाने के शौकिनो के लिए किसी रोमांच से कम नहीं है।ऐसे में आपको भी जब अवसर मिले तो आप भी हो आईए अहमदाबाद के 'रियल' पोसाइडन’ में,।

षटतिला एकादशी महात्म्य: तिल दान करना है शुभ

तिलस्नायी तिलोद्वर्ती तिलहोमी तिलोदकी।
तिलदाता च भोक्ता च षट्तिला पापनाशिनी॥
अर्थात इस दिन तिल का इस्तेमाल स्नान करने, उबटन लगाने और होम करने में करना चाहिए, साथ ही तिल मिश्रित जल पीना चाहिए, तिल दान करना चाहिए और तिल का भोजन करना चाहिए। इससे पापों का नाश होता है।

संदीप कुमार मिश्र: माघ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को षटतिला एकादशी कहते हैं। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को अतिप्रिय है। षटतिला एकादशी का महात्मय पुराणों में वर्णित है। इस दिन श्री हरी भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है। इस दिन काले तिलों के दान का विशेष महत्व हमारे धर्म शास्त्रों में बताया गया है।वहीं शरीर पर तिल के तेल की मालिश, तिल जल से स्नान, तिल से बने तिलवा का जलपान और तिल पकवान की इस दिन विशेष महत्ता है। इस दिन पंचामृत में तिल मिलाकर भगवान को स्नान कराना चाहिए साथ ही तिल मिश्रित पदार्थ स्वयं खाना चाहिए और ब्राह्मण को भी खिलाना चाहिए।

दरअसल दोस्तों माघ के महिने को हमारे सनातन धर्म में नरक से मुक्ति और मोक्ष दिलाने वाला माना जाता है।षटतिला एकादशी हमें इस बात को बताती है कि धनदान से कहीं ज्यादा महात्म्य अन्नदान का होता है। पुलस्त्य मुनी ने नरक से मुक्ति पाने के उपाय के संबंध में कहा है कि - मनुष्य को माघ माह में अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए क्रोध, अहंकार, काम, लोभ और मोह का त्याग करना चाहिए।और सात्विकता का पालन करना चाहिए।

माघ मास के कृष्णपक्ष की षट्तिला एकादशी व्रत में तिल का विशेष महत्व कहा गया है।तिल से भरा हुआ बर्तन दान करना बेहद शुभ माना जाता है। कहते हैं तिलों के बोने पर उनसे जितनी शाखाएं पैदा होंगी, उतने हजार बरसों तक दान करने वाला स्वर्ग में निवास करता है।

षटतिला एकादशी कथा
षटतिला एकादशी के संबंध में एक कथा कही जाती है कि- “एक ब्राह्मणी श्री हरि भगवान विष्णु में बड़ी श्रद्दा भक्ति रखती थी,व एकादशी का व्रत भी करती थी।लेकिन उसने कभी ब्राह्मण एवं देवताओं के निमित्त किसी भी प्रकार का अन्न दान नहीं किया था। एक दिन भिक्षा लेने कपाली का रूप धारण कर स्वयं भगवान पहुंचे और भिक्षा की याचना की।लेकिन गुस्से में ब्राह्मणी ने मिट्टी का एक बड़ा ढेला दिया। कुछ समय बाद ब्राह्मणी देह त्याग कर वैकुंठ पहुंची।लेकिन उसे वहां मिट्टी के बने मनोरम मकान ही मिले, अन्न नहीं। दुखी होकर उसने श्री हरि से इसका कारण पूछा तो पता लगा कि ऐसा अन्नदान नहीं करने की वजह से है और निवारण हेतु उसे षट्तिला एकादशी का व्रत करना चाहिए। ब्राह्मणी ने व्रत किया, तब उसका मकान अन्न से भर गया।

इसलिए कहा जाता है कि इस दिन तिल और अन्नदान अवश्य करना चाहिए।साथ ही नारियल अथवा बिजौरे के फल से विधि-विधान से पूजा कर श्री हरि भगवान विष्णु को अर्घ्य देना चाहिए।हां अगर आपके पास धन न हो तो सुपारी का दान करें।

विशेष ध्यान रखने योग्य बातें
सभी सनातनधर्मी व आस्थावान प्रेमी जो लोग एकादशी व्रत नहीं कर पाते हैं, उन्हें एकादशी के दिन कम से कम खान-पान एवं व्यवहार में सात्विक अवश्य रखनी चाहिए। एकादशी के दिन लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा जैसे तामसी आहार्य को वर्जीत करना चाहिए। एकादशी के दिन चावल खाना भी वर्जित है।

अंतत: आस्थाओं के देश भारत में सब कुछ खास है,कास कर हमारे तीज,त्योहार।ऐसे में बात जब श्रीहरि भगवान विष्णु के पूजा अर्चना की हो तो कोई भी पीछे नहीं रहना चाहता।आप भी रहें षटतिला एकादशी और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करें।

सशंखचक्रं सकिरिटकुंडलम् सपितवस्त्रं सरसिरुहेक्षणम्।
सहारवक्षस्थलं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्।।

Monday, 1 February 2016

एशिया के मेनचेस्टर कानपुर का क्यों हुआ हाल बेहाल ?


संदीप कुमार मिश्र:  ये बात करीब चालीस साल पहले की है जब देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश के औद्योगिक केंद्र कानपुर को एशिया का मेनचेस्टर कहा जाता था।दोस्तों कानपुर भारत का एकमात्र ऐसा शहर था, जहां सबसे ज़्यादा कपड़े का उत्पादन हुआ करता था।हमारे देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में कानपुर का योगदान बेहद महत्त्वपूर्ण हुआ करता था।

दरअसल आज़ादी के पहले की बात करें तब भी कानपुर शहर अंग्रेज़ों के लिए बहुत खास था और शहर में एल्गिन मिल, स्वदेशी मिल के साथ ही लाल इमली मिल चलायी जाती थी, जो समुचे विश्व में कपड़ा उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थीं।उस समय इन मिलों में लाखों लोगों को रोज़गार मिला करा था। आज़ादी के बाद 1947 से 1971 तक कम्युनिस्ट पार्टी के एसएम बनर्जी कानपुर के सांसद थे, जिन्होंने केंद्र सरकार के साथ मिलकर इन मिलों को और बढ़ाया। 1974 तक शहर की इन मिलों ने पूरी दुनिया में अपना कद बढ़ाया, लेकिन देश में इमरजेंसी लगने के बाद से ही कानपुर को ग्रहण लगना शुरू हो गया।

उस समय की केंद्र सरकार की अनदेखी और इमरजेंसी के दौरान आए राजनीतिक भूचाल का असर सीधे तौर पर इन मिलों पर पड़ा और 1990 तक इन मिलों में कपडा उत्पादन लगातार घटने लगा और कुछ सालों बाद ये मिलें बंदी की कगार पर आ गईं और यहां काम करने वाले लाखों लोग बेरोज़गार हो गए।जब कानपुर की हालत खस्ता हो रही थी तो इस शहर को संभाला चमड़ा व पान मसाले के उद्योग ने। शहर के जाजमऊ इलाक़े में सैकड़ों टेनरियां खुली। यही नहीं यहां पान मसाला और गुटखा का उत्पादन करने वाली कई फैक्टरियां खुली। शहर में बनने वाले चमड़े व मसालों की सप्लाई न केवल पूरे देश में हुई बल्कि भारी मात्र में निर्यात भी शुरू किया गया। शहरवासियों ने इन उद्योगों को आगे बढ़ाकर कानपुर का नाम फिर पूरी दुनिया में ऊंचा किया। लेकिन आगे बढ़ने का ये सफर कुछ समय बाद एक बार फिर थमने लगा।

आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश में 1990 से लेकर अभी तक बीएसपी, बीजेपी और सपा की सरकारें रहीं। लेकिन राज्य सरकारों की अनदेखी के चलते शहर का बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद खराब होता चला गया। शहर की सड़कें ख़स्ताहाल होती गईं और बिजली कटौती तेज़ी से बढ़ती गई। रोज़गार के लिए कानपुर में आसपास के कई राज्यों से लाखों लोग आए, जिससे शहर की आबादी बढ़ती गई, लेकिन बिजली सप्लाई का हाल ठीक होने की बजाय और बुरा होता गया। 


जिसका परिणाम ये हुआ कि शहर के हज़ारों मसाला व्यापारियों ने कानपुर से अपनी फैक्टरियां का रुख अन्य शहरों की ओर कर लिया।आपको बता दें कि कानपुर गंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। जाजमऊ इलाके में स्थित चमड़ा व्यापारियों ने फैक्टरियों से निकलने वाले कूड़े को भारी मात्रा में गंगा में फेंकना शुरू कर दिया, क्योंकि यहां कूड़े के डिस्पोजल के लिए प्रशासन द्वारा कोई कदम नहीं उठाए गए, जिससे गंगा बुरी तरह दूषित हुई। उद्योग के कारण शहर में प्रदूषण भी बढ़ता गया। जब प्रदूषण शहरवासियों के लिए जानलेवा साबित होने लगा तो राज्य सरकारों और शहर प्रशासन ने फैक्टरियों पर चालान करना शुरू कर दिया। कई फैक्टरियों को बंद भी करा दिया गया।लेकिन इसका स्थायी समाधान नहीं खोजा गया,जिससे कि फैक्टरीयों का पलायन जारी रहा।

अगर लेदर कॉउंसिल ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट की माने तो कानपुर शहर में 12000 करोड़ का चमड़ा व्यापार था, जो घटकर अब महज़ 3200 करोड़ रह गया है। शहरवासियों को काफी उम्मीदें थी कि लाल इमली व एल्गिन जैसी बड़ी मिलें फिर से शुरू कराई जाएंगी, लेकिन सरकार की कारगुज़ारी के चलते कोई कदम नहीं उठ पाया और 2005 में इन दोनों मिलों में ताला लग गया।बंद कंपनीयां तो सिर्फ चुनाव जितने के लिए सियासी मुद्दा बन कर रह गयी ।


सियासत का शिकार कानपुर…!

पिछले पच्चीस सालों में एक बार बीजेपी, दो बार बीएसपी और दो बार सपा प्रदेश की सत्ता पर काबिज रही।कानपुर में दस विधानसभा सीटें हैं, लेकिन यहां पर हर बार इन चार राजनीतिक दलों को लगभग बराबर सीटें मिलती रही हैं। लोकसभा सीट पर सात साल बीजेपी रही तो पंद्रह साल कांग्रेस, लेकिन राज्य में बीते 15 सालों से सपा और बीएसपी की सरकार बनती आ रही है। कई बार मुलायम और मायावती ने कानपुर आकर नाराज़गी व्यक्त की, कि कानपुर ने उन्हें कुछ नहीं दिया तो वह शहर के बारे में क्यों सोचें। इसका मतलब यह था कि किसी बार भी लोकसभा में सपा और बसपा का उम्मीदवार नहीं जीता।


कानपुर के सबसे बड़े नेता श्री प्रकाश जायसवाल जो पंद्रह साल सांसद रहे और केंद्रीय कोयला मंत्री के साथ ही गृह राज्य मंत्री भी रहे, लेकिन उन्होंने शहर के लिए कुछ ख़ास नहीं किया। कई बार लोगों ने सड़क पर उतरकर उनके खिलाफ आक्रोश भी व्यक्त किया।इतना ही नहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने करीब चार  साल पहले शहर में रैली के दौरान लाल इमली और एल्गिन मिल को चलाने और शहर में उद्योग फिर से स्थापित कराने का वादा भी किया था, लेकिन तब की केंद्र सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं की गई।जिसका खामियाजा कानपुर को भुगतना पड़ रहा है।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कानपुर की जनता को सिर्फ सब्जबाग ही दिखाए और शहर में किसी तरह का कोई विकास कार्य नहीं कराया गया।फिलहाल कानपुर से बीजेपी के सांसद मुरली मनोहर जोशी हैं, जिनकी गिनती बीजेपी के सबसे वरिष्ठ नेताओं में होती है। उनको सांसद बने लगभग दो साल बीत गए हैं, लेकिन शायद ही वह दस बार भी कानपुर आए हों। जबकि कानपुर के बीजेपी कार्यकर्ता अपने सांसद से लगातार अपनी नाराजगी जाहीर कर चुके हैं।कई बार तो जोशी जी के लापता होने का पोस्टर भी लगा चुके हैं।

अंतत: ज़ाहिर है कि कानपुर में पार्टिया वोट की राजनीति से उपर उठकर सोची होंती तो अब तक लाखों लोगों को रोजगार भी मिला होता और प्रदेश के राजस्व में भी बढ़ोतरी हुई होती।इतना ही नहीं एशिया का मेनचेस्टर कानपुर इस तरह आंसु नहीं बहा रहा होता।


अमर का मुलायम प्रेम:घर वापसी का संकेत...?

संदीप कुमार मिश्र: कहते हैं राजनीति में ना तो कोई स्थाई दोस्त होता है और ना ही दुश्मन। खासकर चुनाव के समय तो विरोधी को भी अपना बनाने की कोशिश की जाती है... गठबंधन किया जाता है...जोड़तोड़ किया जाता है..पूराने समय में किए गए वादों की दुहाई दी जाती है...।इमोशनल अत्याचार करने से भी गुरेज नहीं किया जाता है।भई ऐसा करने में हर्ज ही क्या है..सत्ता के लिए कुछ भी करने में गुरेज ही क्या है...सिंहासन मिल जाने पर तो ऐसे भी सब ठीक हो ही जाता है,नहीं भी हो तो पांच साल तो फिक्स हो ही जाता है।

खैर,यहां बात अमर सिंह के मुलायम प्रेम की हो रही है,मुलायम मतलब मुलायम सिंह यादव। कयास लगाये जा रहे हैं कि यूपी विधान सभा चुनाव से पहले अमर सिंह की समाजवादी पार्टी में वापसी हो सकती है।क्योंकि जिस प्रकार के संकेत दोनो की तरप से देखने को मिल रहे हैं,उससे खबरें तो ऐसी ही सुनने को मिल रही है।दरअसल अमर सिंह ने कहा कि सपा प्रमुख मुलायम सिंह उनके बड़े भाई थे...हैं और रहेंगे..और मनुष्य का भाग्य कब किस करवट बैठे, कुछ नहीं कहा जा सकता।'अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अमर वाणी का क्या मतलब है।

वहीं अपने धुर विरोधी आजम खान पर भी चुटकी लेते हुए अमर सिंह ने कहा कि चुनावी वर्ष में आजम सपा की जरूरत हैं, इसलिए वे उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहना चाहेंगे।आपको बता दें कि अमर सिंह रवि‍वार को उत्तर प्रदेश के नए लोकायुक्त संजय मिश्रा के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए, जो उनके गृह जनपद आजमगढ़ से जुड़े कन्हैया लाल मिश्र के परिवार से हैं।अमर सिंह ने कहाकि , 'इससे पहले भी वो गैर राजनीतिक कार्यक्रमों में मुलायम सिंह के साथ थे, चाहे अस्पताल का उद्घाटन हो, उनका जन्मदिन हो या दिवंगत जनेश्वर मिश्र से जुड़ा कार्यक्रम हो।’

आपको याद होगा कि एक जमाना था जब सपा में मुलायम के बाद अमर सिंह की ही चलती थी।और सपा मुखिया से अमर का पारिवारिक संबंध है ।दरअसल अभी हाल ही में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि ‘अमर सिंह भले ही पार्टी के सदस्य न हो, अमर सिंह मेरे दिल में हैं, मेरे दिल में थे हैं और हमेशा रहेंगे।हमारे बहुत घनिष्ठ संबंध हैं और वह हमेशा रहेंगे।’ इसीलिहाज से अमर का कहना है कि वो सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के दिल में हैं, दल में हैं या नहीं इससे क्या मतलब।’ उन्होंने कहा, ‘दिल ज्यादा महत्वपूर्ण है, दल से। दल में स्वार्थ है, दिल नि:स्वार्थ, पवित्र।’

लेकिन जब अमर सिंह समाजवादी पार्टी में वापसी पर आजम खान का कहना था कि नेताजी सर्वे सर्वा हैं, जिसे चाहें पार्टी में ले लें और जिसे चाहें निकाल दें।


अंतत: राजनीति में कुछ भी अकारण नहीं होता और ना ही कहा जाता है।इस लिहाज से देखा जाए तो जिस प्रकार से उत्तर प्रदेश में आगामी चुनाव(2017) के लिहाज से वोटो का ध्रुवीकरण अभी से शुरु हो गया है।जीत के लिए सभी पार्टियां दम खम लगानी शुरु कर दी हैं।ऐसे में देखना होगा कि यूपी की सियासत में अमर मुलायम प्रेम क्या रंग दिखाता है क्योंकि आजम खान किस रुप में स्विकार कर पाते हैं अमर सिंह को...ये देखना बड़ा दिलचस्प होगा।



वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...