Friday, 1 September 2017

महालय श्राद्ध यानि पितृ पक्ष: जानें कैसे करें पितरों की शांति के लिए श्राद्ध,क्या है महत्व

संदीप कुमार मिश्र: पितरों की आत्मा के लिए शांति और परिवार पर पर पितरों की कृपा बनी रहे,इसलिए किया जाता है श्राद्ध।जिसके लिए हमारे हिन्दू धर्म में एक विशेष पक्ष होता है जिसे पितृ पक्ष कहते हैं।जिसकी शुरुआत 6 सितंबर 2017 से हो रही है।पितृ पक्ष में पितरों को याद करने के साथ ही दान पुण्य और ब्राह्मणों को भोजन करवाने का विधान बताया गया है।श्राद्ध अपने पितरों की तिथि के अनुसार ही किया जाता है जिससे पितृ खुश होते हैं।हमारे धर्म पूराणों में कहा गया है कि कि पितृपक्ष में पितृगण का श्राद्ध तर्पण करने से हमारे जीवन में सुख शांति सदैव बनी रहती है।
कैसे करें श्राद्ध
हमें सबसे पहले श्राद्ध करने के लिए तर्पण में दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल से पितरों को तृप्त करना चाहिए और श्राद्ध कर्म में गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल को भी शामिल करना चाहिए।साथ ही ब्राम्हणों को भोजन और पिण्ड दान के माध्यम से पितरों को भोजन करवाना चाहिए और भोजन के बाद दान दक्षिणा देनी चाहिए।

कहा जाता है कि इस दिन यदि आपके घर पर कोई दीन हीन गरीब या भिखारी आ जाए तो उसे भी श्रद्धा और आदरपूर्वक भोजन कराना चाहिए।धर्म शास्त्रों में यहां तक कहा गया है कि श्राद्ध के दिन गाए और कौए को भी भोजन करवाना चाहिए या निकालना चाहिए।वहीं जल का तर्पण भी करवाना चाहिए जिससे पितृों की प्यास बुझती है।
श्राद्ध पक्ष में पालन व ध्यान रखने योग्य बातें
श्राद्ध के लिए आश्विन शुक्ल पक्ष के 15 दिन विशेष माने गए हैं।जबकि हर अमावस्या और पूर्णिमा को, पितरों के लिये श्राद्ध और तर्पण करने का विधान बताया गया है।लेकिन पितृ पक्ष विशेष है, इन 15 दिनों में अगर पितृ खुश हो जाते हैं तो परिवार में खुशियां आती हैं और जीवन के संघर्ष पथ में कभी किसी चीज की कमी नहीं रहती। इसलिए श्राद्ध करते समय कुछ बातों का विशेष ध्यान रखने के लिए हमारे धर्म शास्त्र बताते हैं।

जाने श्राद्ध करने की विशेष प्रक्रिया
श्राद्ध करते समय तर्पण में दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल से पितरों को तृप्त करें। ब्राम्हाणों को भोजन और पिण्ड दान से पितरों को भोजन दें और वस्त्रदान कर पितरों को वस्त्र दें।एक बात का विशेष ध्यान रखें कि श्राद्ध का फल, दक्षिणा देने पर ही प्राप्त होता है।

कब और किस पहर में करें श्राद्ध
प्रसिद्ध ज्योतिर्विद पं. शिव कुमार शुक्ल जी के अनुसार श्राद्ध करने के लिए दोपहर का कुतुप और रौहिण मुहूर्त सबसे श्रेष्ठ है। कुतुप मुहूर्त दोपहर 11:36 बजे से 12:24 बजे तक होता है। वहीं रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:24 बजे से दिन में 1:15बजे तक होता। कुतप काल में किए गए दान का अक्षय फल प्राप्त होता है।साथ ही पूर्वजों का तर्पण, हर पूर्णिमा और अमावस्या अवश्य करें।
पितृ पक्ष के 15 दिनों में करें जल से तर्पण
पितृ पक्ष यानि श्राद्ध के 15 दिनों में अपने पूर्वजों की आत्मा की शांती के लिए  कम से कम जल से तर्पण अवश्य करना चाहिए।पंडित जी कहते हैं कि चंद्रलोक के ऊपर और सूर्यलोक के पास पितृलोक होने से, वहां पानी की कमी होती है और जल के तर्पण से, पितरों की प्यास निरंतर बुझती रहती है अन्यथा हमारे पितृ प्यासे रह जाते हैं।
कौन कर सकता है श्राद्ध?
श्राद्ध कौन कर सकता है,इस संबंध में ही हमारे धर्म शास्त्रें में बताया गया है।नियम के अनुसार पिता का श्राद्ध बेटे को करना चाहिए। बेटे के न होने पर, पत्नी को श्राद्ध करना चाहिए। पत्नी न होने पर, सगा भाई श्राद्ध कर सकता है। एक से ज्य़ादा पुत्र होने पर, बड़े पुत्र को श्राद्ध करना चाहिये।धर्म संवत इस प्रकार का विधान बताया गया है।
श्राद्ध में कुछ अन्य ध्यान रखने योग्य बातें
श्राद्ध के विषय में कहा गया है कि कभी भी रात के समय श्राद्ध न करें। संध्या के समय में भी श्राद्धकर्म को निषेध बताया गया है।
पितृ पक्ष में हमें वही भोजन बनाना चाहिए जो हमारे पितरों को पसंद रहा हो।ऐसे श्राद्ध के भोजन में जौ, मटर और सरसों का उपयोग श्रेष्ठ बताया गया है।वहीं तर्पण के लिए गंगाजल, दूध, शहद, कुश और तिल सबसे ज्यादा ज़रूरी है।कहते हैं कि तिल ज़्यादा होने से उसका फल अक्षय होता है।श्राद्ध कहां करें....इस संबंध में कहा गया है कि दूसरे के घर रहकर श्राद्ध नहीं करना चाहिए।