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Saturday, 13 February 2016

JNU में देशविरोधी नारा : ये कैसी शर्मनाक विचारधारा..?

संदीप कुमार मिश्र: देश  सबसे बड़े शिक्षा के मंदिर में देश विरोधी नारे...देश के सबसे बड़े शिक्षा के मंदिर संविधान का मजाक...देश के सबसे बड़े शिक्षा के मंदिर में भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली का सबसे शर्मनाक मजाक...क्या यही करने के लिए देश के सबसे बड़े शिक्षा के मंदिर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी...क्या सी ही सोच को बढ़ाने के लिए जेएनयू की आधारशिला रखी गई थी कि यहां के विद्यार्थी,विद्या की अर्थी उठाएंगे और भारत माता का अपमान करेंगे...? 
दरअसल आप इसे एक बड़ी और क्रूर विडंबना नहीं तो और क्या कहेंगे कि जहां एक तरफ जिस जम्मू-कश्मीर सीमा की सुरक्षा के लिए देश के दस जवान सियाचिन की बर्फ में दबकर अपनी जान गवां देते हैं,तो वहीँ दूसरी तरफ उनकी शहादत के चंद रोज बाद ही देश के एक तथाकथित प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में उसी कश्मीर की आजादी, भारत की बर्बादी और अफजल गुरु जैसे देशद्रोही के पक्ष में देश विरोधी नारे लगाए जाते हैं।
अब जरा मेरी नजर में जेएनयू कैंपस में हो रही देशविरोधी घटना के बारे में भी जान लिजिए... कि आखिर क्यों ना हम कहें कि जेएनयू देशद्रोहियों की शरणगाह बन गया है...!हुआ यूं कि 10 फरवरी को दिल्ली के JNU कैम्पस के कुछ दलित, अल्पसंख्यक और कश्मीरी विद्यार्थियों द्वारा संसद हमले के गुनहगार जिसे फांसी पर लटकाया गया यानि अफजल गुरु की तीसरी बरसी पर विद्या के इस मंदिर में सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया गया, जिसका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने कड़ा विरोध दर्ज करते हुए प्रशासन से शिकायत की।और राष्ट्रविरोधी ताकतों ने हंगामे की पटकथा तैयार की।
मामला तुल ना पकड़े इस नजरिये से JNU प्रशासन ने उन छात्रों के इस देश विरोधी कृत्य पर रोक लगा दी।लेकिन फिर मामला और गरम हो गया।उन उपद्रवी विद्यार्थियों द्वारा प्रशासन के निर्णय के विरोध के नाम पर न केवल शिक्षा के इस मंदिर में जमकर हुड़दंग,उत्पात मचाया गया। बल्कि इससे भी आगे बढ़कर कश्मीर की आजादी और भारत की बर्बादी के नारे भी लगाए गए।जरा उन देश विरोधी नारों को भी जान लिजिए।1- ‘कश्मीर मांगे आजादी’,2- ‘कश्मीर की आजादी तक जंग रहेगी,3- भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी’। इस प्रकार से JNU में देश विरोधी नारे लगा रहे इन छात्रों का जब ABVP के छात्रों ने जेएनयू छात्रसंघ के संयुक्त सचिव के नेतृत्व में विरोध किया गया तो दूसरे देश विरोधी नारे लगाने वालों ने कट्टा आदि हथियार दिखाकर उन्हें धमकाया भी और हर संभव अपनी राष्ट्रविरोधी होने का प्रबल परिचय दिया।
जैसा कि अखबारों की सुर्खियां सामने आई,उस लिहाज से देखें तो नारे लगाने वाले उन छात्रों का ये कहना किसी अचंभे से कम नहीं है कि संविधान द्वारा मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत ही उन्होंने अफजल गुरु और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के एक संस्थापक मकबूल भट की याद में उस सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया था और यदि एबीवीपी ने प्रशासन से कह कर उस पर रोक नहीं लगवाई होती तो वे हंगामा नहीं करते।कहने का मतलब ये है कि अभियक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उन्हें यदि देश विरोधी गतिविधियों को करने दिया जाता तो वे ये हंगामा नहीं होता।मतलब इन्हें कुछ भी करने की छुट दे दी जाए।
अब इन तथाकथित छात्रों को कौन समझाए कि जिस संविधान ने उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकार दिए हैं, उसी ने बतौर देश के नागरिक उनके लिए कुछ मौलिक कर्तव्य भी निर्धारित किए हैं और उन्हीं कर्तव्यों में से एक ‘राष्ट्र की एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण’ रखना भी है। जिसका वे पालन नहीं कर रहे। अफसोस इस बात का कि इन छात्रों में एक विरोधाभास यह है कि जिस संविधान द्वारा दिए गए एक अधिकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दम पर ये छात्र ‘भारत की बर्बादी’ के नारे जैसी देश विरोधी गतिविधियां तक संचालित करने की हिम्मत दिखा रहे हैं, उसी संविधान की एक कार्यस्थली यानी संसद पर हमला करने वाले अफजल गुरु का समर्थन भी कर रहे हैं।क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यही है,कि छात्र के नाम पर आप देशविरोधी हो जाएं...या फिर आप अफजल गुरु जैसे लोगों के पक्ष में नारे लगाएं।
आपको बता दें कि ये पहली बार नहीं है जब JNU के छात्रों पर देशविरोधी हरकतें करने का आरोप लगा है।कुछ वक्त पहले की ही बात है कि JNU के वामपंथी छात्रों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाना बनाकर बेहद अपमानजनक और भद्दे नारे लगाए थे। 30 जनवरी को वामपंथी छात्र संगठन आईसा और केवाईएस के छात्र हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमुला की मौत को लेकर दिल्ली में RSS दफ्तर के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे।जिसपर पुलिस ने कार्रवाई की थी तो इन संगठनों ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है,और भी ना जाने क्या-क्या।ये कहने में हमें कोई गुरेज नहीं कि इन छात्रों का विरोध पूरी तरह से तर्क और विवेक से परे है, और खत्म हो चुकी अपनी वाम विचारधारा को चर्चा में लाने के एजेंडे पर पूरी तरह से आधारित है।
ये बात हम सब जानते हैं कि किसी जमाने में JNU कैंपस वामपंथियों का गढ़ रहा है और फिलहाल हमारे देश में JNU ही एक ऐसी जगह है जहां वामी समुदाय का कुछ अस्तित्व भी है,वरना तो देश भर में वाम विचारधारा मृत्यूशैया पर पड़ी हुई है,चाहे छात्र स्तर पर हो या फिर मतदाता और शासन के स्तर पर। अब तो ऐसा लगने लगा है कि JNU में भी वाम की सत्ता में सेंध लगने लगी हैं।जैसा कि विगत वर्ष के छात्रसंघ चुनावों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् का संयुक्त सचिव की सीट पर कब्जा करना इसको पूरी तरह से स्पष्ट करता है कि वाम विचारधारा का खात्मा ही इस प्रकार की देश विरोधी गतिविधियों को बढ़ावा दे रही है।
जिस प्रकार से अब वाम विचारधारा पूरी तरह से जनता से दूर किस ऑफ लव और महिषासुर को महापुरुष बनाने जैसे ना जाने किन आसमानी मुद्दों में गुम है और इसी नाते वो हर दिन लगातार खारिज हो रही है।अफसोस तो इस बात है कि वाम विचारधारा के लोग संवयं में सुधार करने की बजाय चर्चा में बने रहने के लिए अफजल गुरु के समर्थन, कश्मीर की आजादी और भारत की बर्बादी जैसे देश विरोधी कृत्य करने तक से पीछे नहीं हट रहे हैं।अब साब कौन कहे कि इस प्रकार के कृत्यों से आपकी छवी और...और खराब होगी,क्योंकि इस देश में देशभक्तों और भारत माता की जय कहने वालों की तादाद ज्यादा है,लांस नायक हनुमनथप्पा,सीमा पर डटे हमारे सजग प्रहरी और सभ्य भारत माता के सपूत भी इस देश में रहते हैं।जिनका एक ही धर्म है राष्ट्र धर्म।जिनके लिए इंडिया फर्स्ट है। शर्म आनी चाहिए ऐसे देशद्रोहियों को आप देश का नहीं बल्कि पाकिस्तान में बैठे उन आतंकियों का समर्थन करते हैं जो भारत के खिलाफ आतंकि भेज धुसपैठ हमारे देश में कराते हैं।
अंतत: एक बात तो तय है कि JNU के ये देश विरोधी छात्र सब कुछ जानते-समझते हुए भी देशविरोधी गतिविधियां करते हैं।जो घातक है भविष्य के लिहाज से,देशहित के लिहाज से,भारत की एकता और अखंडता के लिहाज से।जिसपर कड़ाई और निर्दयता से कार्यवाही करनी चाहिए।देशद्रोह का मुकद्दमा करना चाहिए,ताकि इस तरह की हरकत करने की दुबारा कोई जुर्रत ना कर सके।।  


सिंहस्थ कुंभ महापर्व महात्म्य

संदीप कुमार मिश्र:  महाकालेश्वर की नगरी उज्जैन में,मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी के पावन तट पर,सिंहस्थ कुंभ महापर्व का महाउत्सव,आध्यात्म और भक्ति का अद्भूत संगम। सनातन धर्म प्रेमीयों का इस महाउत्सव में देखने को मिलेगा भावभरा समागम।

 दरअसल दोस्तों हमारी वैदिक जीवन पद्धति कुंभ जैसे महाआयोजनों का आदर्श रही है। ये बात सर्वविदित है कि हमारे देश भारत को सांस्कृतिक एकसूत्रता में बांधने के लिए ही देश के चारों कोनों में पीठों की स्थापना करने वाले आदिशंकराचार्य भी वैदिक जीवन के ही प्रचारक थे। इसलिए हम सब के लिए कुंभ जैसे आयोजनों के बारें में जानना काफी दिलचस्प है कि हमारे वेदों में कुंभ के संबंध में क्या कहा गया है। वैदिक स्थापनाओं से यह तो स्पष्ट है कि ऐसे आयोजन तब भी होते थे और बाद में आदिशंकराचार्य ने फिर से इस परम्परा को आगे बढ़ाया।
साथियों हमारी वैदिक संस्कृति में जहां व्यक्ति की जप,तप,साधना, आराधना और जीवन पद्धति को परिष्कृत करने पर जोर दिया गया है,तो वहीं पवित्र तीर्थस्थलों और उनमें घटित होने वाले पर्वों और महापर्वों के प्रति भावभरा आदर, श्रद्धा और भक्ति का पावन भाव प्रतिष्ठित करना भी मुख्यतौर पर रहा है।इस नजरिये और महात्म्य की दृष्टी सें कहें तो विश्व प्रसिद्ध सिंहस्थ महाकुंभ एक धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महापर्व है। जहां आकर समस्त मानवता को आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की अनुभूति प्राप्त होती है।
महाकाल की नगरी उज्जैन में सिंहस्थ महाकुंभ महापर्व पर देश और विदेश के भी साधु-महात्माओं, सिद्ध-साधकों और संतों का समागम देखने को मिलता है।जिनके सानिध्य में आकर श्रद्दालू अपने लौकिक जीवन की सभी समस्याओं का समाधान तलाशते हैं। इसके साथ ही अपने जीवन को ऊध्र्वगामी बनाकर मुक्ति की कामना भी करते है। मुक्ति का मूल अर्थ ही बंधनमुक्त होना है,व मोह का समाप्त होना ही बंधनमुक्त अर्थात् मोक्ष प्राप्त करना है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पुरुषार्थों में मोक्ष ही अंतिम मंजिल बताई गई है।

कुम्भी वेद्या मा व्यधिष्ठा यज्ञायुधैराज्येनातिषित्का। (ऋग्वेद)

अर्थात्, हे कुम्भ-पर्व तुम यज्ञीय वेदी में यज्ञीय आयुधों से घृत द्वारा तृप्त होने के कारण कष्टानुभव मत करो।
युवं नदा स्तुवते पज्रियाय कक्षीवते अरदतं पुरंधिम्।
करोतराच्छफादश्वस्य वृष्णः शतं कुम्भां असिंचतसुरायाः।। (ऋग्वेद)

कुम्भो वनिष्ठुर्जनिता शचीभिर्यस्मिन्नग्रे योग्यांगमर्भो अन्तः।
प्लाशिव्र्यक्तः शतधारउत्सो दुहे न कुम्भी स्वधं पितृभ्यः।। (शुक्ल यजुर्वेद)

कुम्भ-पर्व सत्कर्म के द्वारा मनुष्य को इस लोक में शारीरिक सुख देने वाला और जन्मान्तरों में उत्कृष्ट सुखों को देने वाला है।


आविशन्कलशूं सुतो विश्वा अर्षन्नाभिश्रिचः इन्दूरिन्द्रायधीयतो। (सामवेद)
पूर्ण कुम्भोडधि काल आहितस्तं वै पश्चामो बहुधानु सन्तः।
स इमा विश्वा भुवनानिप्रत्यकालं तमाहूः परमे व्योमन। (अथर्ववेद)

हे सन्तगण ! पूर्णकुम्भ बारह वर्ष के बाद आया करता है, जिसे हम अनेक बार प्रयागादि तीर्थों में देखा करते हैं। कुम्भ उस समय को कहते हैं जो महान् आकाश में ग्रह-राशि आदि के योग से होता है।

कुंभ जैसे महापर्वों में ऋषिमुनि,तपस्वी,योगी अपनी साधना छोड़कर जगत और जनकल्याण के लिए एकत्रित होते हैं। वे अपने अनुभव और अनुसंधान से प्राप्त परिणामों से जिज्ञासुओं को सहज ही लाभान्वित करते हैं।कहने का भाव ये है कि कुंभ-सिंहस्थ महाकुंभ जैसे आयोजन चाहे स्वर स्फूर्त ही हों, लेकिन वह उच्च आध्यात्मिक चिन्तन का परिणाम है और उसका सुविचारित ध्येय भी है। ऋग्वेद में कहा गया है -


जधानवृतं स्वधितिर्वनेव स्वरोज पुरो अरदन्न सिन्धून्।
विभेद गिरी नव वभिन्न कुम्भभा गा इन्द्रो अकृणुत स्वयुग्भिः।।

कुंभ पर्व में जाने वाला मनुष्य स्वयं दान-होमादि सत्कर्मों के फलस्वरूप अपने पापों को वैसे ही नष्ट करता है जैसे कुठार वन को काट देता है। जैसे गंगा अपने तटों को काटती हुई प्रवाहित होती है, उसी प्रकार कुंभ पर्व मनुष्य के पूर्व संचित कर्मों से प्राप्त शारीरिक पापों को नष्ट करता है और नूतन (कच्चे) घड़े की तरह बादल को नष्ट-भ्रष्ट कर संसार में सुवृष्टि प्रदान करता है।

चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि। (अथर्ववेद)

ब्रह्माजी कहते हैं-हे मनुष्यों ! मैं तुम्हें ऐहिक तथा आयुष्मिक सुखों को देने वाले चार कुम्भ पर्वों का निर्माण कर चार स्थानों हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में प्रदान करता हूं।

माधवे धवले पक्षे सिंह जीवत्वेजे खौ।
तुलाराशि निशानाथे स्वातिभे पूर्णिमा तिथौ।
व्यतीपाते तु सम्प्राप्ते चन्द्रवासर-संचुते।
कुशस्थली-महाक्षेत्रे स्नाने मोक्षमवाच्युयात्।

कहने का भाव ये है कि जब वैशाख मास हो, शुक्ल पक्ष हो और बृहस्पति सिंह राशि पर, सूर्य मेष राशि पर तथा चन्द्रमा तुला राशि पर हो, साथ ही स्वाति नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि व्यतीपात योग और सोमवार का दिन हो तो उज्जैन में शिप्रा स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
विष्णु पुराण में कुंभ के महात्म्य के संबंध में लिखा गया है कि कार्तिक मास के एक सहस्र स्नानों का, माघ के सौ स्नानों का अथवा वैशाख मास के एक करोड़ नर्मदा स्नानों का जो फल प्राप्त होता है, वही फल कुम्भ पर्व के एक स्नान से प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार एक सहस्र अश्वमेघ यज्ञों का फल या सौ वाजपेय यज्ञों का फल अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी की एक लाख परिक्रमाएं करने का जो फल मिलता है, वही फल कुंभ के केवल एक स्नान का होता है।
अंतत: इस प्रकार हमारे वेदों,पुराणों,शास्त्रों में कुंभ का महात्म्य बताया गया है।निश्चित तौर पर 21वीं सदी के यूवा भारत में आज भी सत्संग और सतकर्म की महत्ता ही हमें विश्वगुरु बनाती है।जिसका श्रेय हमारे धर्म ग्रंथ और हमारी सनातन परंपराएं ही हैं।वसुधैव कुंटुम्बकम वाले देश भारत में भाव राग और ताल का समिश्रण ही है जहां कि सभ्यता संस्कृति की मिसालें दी हैं।धन्य है भारत भूमि और हमारी सनातन परंपराएं...।

Friday, 12 February 2016

बसंत पंचमी महात्म्य और देवी सरस्वती की पूजा

शुक्लाम् ब्रह्मविचार सार परमाम् आद्यां जगद्व्यापिनीम्।
वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌॥
हस्ते स्फटिकमालिकाम् विदधतीम् पद्मासने संस्थिताम्‌।
वन्दे ताम् परमेश्वरीम् भगवतीम् बुद्धिप्रदाम् शारदाम्‌॥2॥

संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों हमारी भारतीय संस्कृति में बसंत पंचमी को स्वयंसिद्ध मुहूर्त कहा गया है।कहते हैं बसंत पंचमी के दिन किसी भी शुभ मुहूर्त के लिए तिथि, समय, वार और नक्षत्र आदि देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। हमारे सनातन धर्म में बसंत को ऋतुओं का राजा कहा जाता है।बसंत पंचमी के पावन पर्व को बसंत ऋतु के आगमन का प्रतिक माना जाता है। प्रकृति के सौंदर्य में हमें बसंत पंचमी के दिन अनुपम छटा के दर्शन होते हैं।एक तरफ जहां वृक्षों से पुराने पत्ते झड़ जाते हैं तो वहीं बसंत के आगमन पर पेंड़ों में नयी कोपलों का आना शुरु हो जाता है।
बसंत पंचमी के अलावा भारतीय संस्कृति में दशहरा, चैत्र के नवरात्र, देवउठनी एकादशी, जानकी नवमी, फुलेरा दूज, रामनवमी, भड़ला नवमी और अक्षय तृतीय के मुहूर्त अपने आप में स्वयंसिद्ध माने जाते हैं।
दरअसल मित्रों माघ के पावन मास की शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। देशभर में बसंत पंचमी का त्यौहार बडे ही धूमधाम से मनाया जाता है। हिन्दू सनातन धर्म में वसंत पंचमी के त्योहार का विशेष महत्व कहा गया है। इसी दिन विद्या की देवी माता सरस्वती की पूजा अर्चना का विधान बताया गया है।बसंत पंचमी की पूजा पूर्वी भारत में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ की जाती है। इस दिन स्त्रियां पीले वस्त्र धारण कर पूजा-अर्चना करती हैं। आपको बता दें कि हमारे हिन्दू धर्म में पूरे साल को जिन छः मौसमों में बांटा गया है, उनमें वसंत हर किसी के लिए अतिप्रिय है।
पावन बसंत का त्योहार हमारे प्रकृति प्रेम को दर्शाता है। यौवन हमारे जीवन का बसंत है तो बसंत इस सृष्टि का यौवन है।लीलाधारी भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में ‘ऋतूनां कुसुमाकरः’ कहकर ऋतुराज बसंत को अपनी विभूति माना है। शास्त्रों एवं पुराणों कथाओं के अनुसार बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा को लेकर एक बहुत ही रोचक कथा हमारे धर्म शास्त्रों में बतायी गई है-
बसंत पंचमी कथा

कहते है जब भगवान विष्णु की आदेशानुसार प्रजापति ब्रह्माजी ने सृष्टि की रचना करने के बाद संसार को देखा तो उन्हें चारों ओर सुनसान निर्जन ही सब कुछ नजर आया।जिसके बाद उदासी से समस्त वातावरण मूक सा हो गया था। जैसे किसी के पास कहने के लिए कोई शब्द ही ना हो। यह देखकर ब्रह्माजी ने उदासी तथा मलिनता को दूर करने के लिए अपने कमंडल से जल लेकर छिड़का।जिसके बाद उन जलकणों के पेड़ों पर पड़ते ही एक अद्भूत शक्ति प्रकट हुई जो दोनों हाथों से वीणा बजा रही थी तथा दो हाथों में पुस्तक और माला धारण की हुई जीवों को वाणी दान की। इसलिये उस देवी को सरस्वती कहा गया। यह देवी विद्या, बुद्धि को देने वाली है।तभी बसंत पंचमी के दिन हर घर में सरस्वती की पूजा भी की जाती है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो बसंत पंचमी का दूसरा नाम सरस्वती पूजा भी है।

बसंत पंचमी के दिन विशेष रूप से मां सरस्वती की पूजा होती है। मंदिरों में भगवान की प्रतिमा का बसंती वस्त्रों और पुष्पों से श्रंगार किया जाता है तथा गाने-बजाने के साथ महोत्सव मनाया जाता है। यह ऋतुराज बसंत के आगमन का प्रथम दिन माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण इस उत्सव के अधिदेवता हैं। इसीलिए ब्रज प्रदेश में राधा तथा कृष्ण का आनंद-विनोद बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। ब्रज-वृंदावन-बरसानामें वसंत पंचमी के त्योहार के साथ ही होली के रंग गुलाल उड़ने भी शुरू हो जाते है।
वसंत पंचमी के अवसर पर ब्रज के सभी मंदिरों में ठाकुरजी के विशेष श्रृंगार, उत्सव एवं अनूठे दर्शनों का आयोजन किया जाता है। वृन्दावन के विश्व प्रसिद्ध बांकेबिहारी मंदिर में ठाकुरजी के चरण दर्शन करने का श्रद्धालूओ को अवसर प्राप्त होता है जो वर्ष में सिर्फ एक ही दिन संभव हो पाते हैं।
वसंत पंचमी के दिन खास तौर पर लोगों को अपने घर में सरस्वती यंत्र स्थापित करना चाहिये, तथा मां सरस्वती के इस विशेष मंत्र का 108 बार जप करना चाहिये।
मंत्र - ‘ऊँ ऐं महासरस्वत्यै नमः’
अंतत: होली का आरंभ भी बसंत पंचमी से ही होता है। इस दिन पहली बार गुलाल उड़ाते हैं और बसंती वस्त्र धारण कर नवीन उत्साह और प्रसन्नता के साथ उत्साह और भाव प्रकट किए जाते हैं।

Thursday, 11 February 2016

हिमवीर लांस नायक हनमनथप्पा को नमन

संदीप कुमार मिश्र: देश उस वीर जवान को नमन करता है,जिसके फौलादी हौंसलों के आगे बर्फ की कठोर चट्टाने भी उसके बुलंद हौंसले को हिला ना सकी।और ऐसे भी जवान मरते नहीं, शहीद होते हैं। सियाचिन का हमारा शेर लांस नायक हनमनथप्पा तो मरा नही, अमर हो गए।अब तो  जो भी जवान सियचिन जायेगा उसे अपने लांस नायक की बहादुरी, जज्बे की गौरव और वीरगाथा सुनाई जायेगा। तुम सच्चे शेर थे, पहले बर्फ से और फिर आखिरी दम तक मौत से लड़ते रहे, यही तो होती है एक वीर सैनिक की कहानी।हमारे देश के असली हीरो तो तुम ही हो लांस नायक हनमनथप्पा कोप्पाड।तुम्हारा देश तुम्हे नमन करता है,सलाम करता है,श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
दरअसल सियाचिन ग्लेशियर से चमत्कारिक रूप से जीवित निकाले गये बहादुर सैनिक लांस नायक हनमनथप्पा कोप्पाड का लंबे संधर्ष के बाद निधन हो गया।आज यानी 11 फरवरी को सुबह 11 बजकर 45 मिनट पर इस हिमवीर ने अंतिम सांस ली।’ मद्रास रेजिमेंट के 33 वर्षीय सैनिक लांस नायक हनमनथप्पा के परिवार में उनकी पत्नी महादेवी अशोक बिलेबल और दो वर्ष की एक बेटी नेत्रा कोप्पाड है। कर्नाटक के धारवाड़ के बेटादूर गांव के रहने वाले कोप्पाड 13 वर्ष पहले सेना में अपनी सेवाएं देना शुरु किए थे।

हनमनथप्पा को नौ फरवरी को आर्मी रिसर्च ऐंड रेफरल हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। आपको याद होगा कि तीन फरवरी को 19,600 फुट की उंचाई पर सियाचिन में हिमस्खलन के बाद बर्फ में दबने के बावजूद हनमनथप्पा छह दिन तक मौत को मात देते रहे थे। उन्हें ‘चमत्कारी मानव’ कहा जाने लगा था।अंतिम समय में हनमनथप्पा के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। उनके निधन की वजह मल्टी ऑर्गन फेलियर बताई जा रही है।
लांस नायक हनमनथप्पा के संबंध में सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि अपनी 13 साल की कुल सेवा में से 10 साल कठिन और चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों में उन्होने सेवा दी थी।हमेशा हनमनथप्पा ने अपने लिए चुनौतीपूर्ण क्षेत्रों को ही चुना। हनुमनथप्पा ने महोर (जम्मू कश्मीर) में 2003 से 2006 के बीच काम किया, जहां वह आतंकवाद निरोधी अभियान में सक्रिय रूप से शामिल थे। इसी तरह एक बार फिर 2008 से 2010 के बीच स्वेच्छा से 54 वीं राष्ट्रीय राइफल्स में सेवा देने की बात कही, जहां उन्होंने आतंकवाद से लड़ने में अदम्य साहस और वीरता दिखाई। हनमनथप्पा 2010 से 2012 के बीच पूर्वोत्तर में स्वेच्छा से सेवा देते रहे, जहां वह नेशनल डेमोक्रेटिक फंट्र ऑफ बोडोलैंड और यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम के खिलाफ सफल अभियानों में सक्रियता से हिस्सा लिया।
आपको बता दें कि हनुमनथप्पा अगस्त 2015 से सियाचिन ग्लेशियर के बेहद उंचाई वाले क्षेत्रों में सेवा दे रहे थे और दिसंबर 2015 से 19600 फुट की उंचाई पर सर्वाधिक उंची चौकियों में से एक पर अपनी तैनाती को चुना।जहां का तापमान शून्य से 40 डिग्री सेल्सियस नीचे और जहां पर 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक हवा चलती है।जहां रहना खासा मुश्किल भरा होता है।
देश के इस वीर सपूत के निधन से देशभर में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि हनुमनथप्पा हमें ‘उदास और व्यथित’ छोड़ गए हैं। सियाचिन हिमनद में आए हिमस्खलन में बर्फ की मोटी परत के नीचे दबे हनुमनथप्पा को छह दिन बाद जीवित बाहर निकाला गया था।लांस नायक हनुमनथप्पा की आत्मा को शांति मिले। आपके अंदर जो सैनिक था वह अमर है। हमें गर्व है कि आप जैसे शहीदों ने भारत की सेवा की।’’
अंतत: लांस नायक हनमनथप्पा ने अदम्य साहस, बहादुरी और निष्ठा दिखाई जो हमारी सेना की विशिष्ट पहचान है।देश आपको सदैव याद रखेगा।कहते हैं कुछ ऐसा करके दिखा कि लोग तुम्हे याद रखें कल खेल में हम हों ना हो गर्दिश में तारे रहेंगे सदा।

               लांस नायक हनमनथप्पा को कोटिश: नमन।जय हिन्द जय भारत।।


बाबा हरभजन शहीद सैनिक होते हुए भी कर रहे हैं देश सेवा !

संदीप कुमार मिश्र: क्या आज के समय में ऐसा संभव है कि कोई आत्म हर पल आपके साथ रहती हो...और समय समय पर आपके जीवन में आने वाले खतरे से आपको आगाह करती हो। आप कहेंगे शायद नहीं...क्योंकि विज्ञान इसे नहीं मानता।वहीं सियाचिन में लांस नायक हनुमंथप्‍पा के जीवित बच जाने को आप क्या कहेंगे..? क्या हनुमान जी ने इस जवान को बचाया..?
दरअसल ये बात हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमारे देश के एक शहीद की कहानी यही बयां करती है,सीमा पर हमारे देश के सजग प्रहरी उस शहीद जवान को भगवान की तरह पूजते हैं। क्योंकि ये वीर शहीद जवान हमारे सैनिकों को सीमा पर होने वाले किसी भी खतरे से निपटने के लिए तैयार करता है।
दोस्तों हमारे प्रशासनिक अमले हों या फिर तीनो सेनाओं(जल,थल,वायु) में इस तरह के अंधविश्वास की कोई जगह नहीं होती...लेकिन आपको बता दें कि ये कहानी है भारतीय सेना के विश्वास की, जो वास्तविक होकर भी अविश्वसनीय है।जिसपर आपको भी यकीन करना ही होगा।
हमारी भारतीय सेना के जवानो की माने तो एक सैनिक, जो मरणोपरांत भी अपना काम पूरी इमानदारी और चौकन्ना होकर कर रहा है।शहीद होने के बाद भी वो सेना में कार्यरत है,इतना ही नहीं समय-समय पर उसका प्रमोशन भी होता है।दरअसल ये करिश्माई दास्तान है बाबा हरभजन सिंह की।जिनका जन्म 30 अगस्त 1946 को हुआ था और जो 9 फरवरी 1966 को भारतीय सेना के पंजाब रेजिमेंट में सिपाही के पद पर भर्ती हुए थे।और 1968 में जो 23वें पंजाब रेजिमेंट के साथ पूर्वी सिक्किम में कार्यरत थे।लेकिन 4 अक्टूबर 1968 को खच्चरों का काफिला ले जाते वक्त बाबा हरभजन सिंह का पूर्वी सिक्किम के नाथू ला पास के नजदीक पैर फिसल जाने और लंबी खतरनाकर घाटी में गिरने से असमय काल के गाल में समा गए।
दोस्तों कहते हैं कि तेज पानी के बहाव ने बाबा के शरीर को बहाकर 2 किलोमीटर दूर तक ले गया।इस घटना के बाद बाबा अपने संगी साथी सैनिक के सपने में आए और अपने मृत शरीर के बारे में जानकारी दी।मजे की बात देखिए की जब सेना के जवानो ने खोजबीन शुरु की तो बाबा हरभजन सिंह का पार्थिव शरीर उसी स्थान पर मिला जहां बाबा ने बताया था।बाबा ने अपने दोस्तों से सपने में ही इच्छा जाहिर की थी कि इनकी एक समाधी बनाई जाए।बाबा का  सम्मान करते हुए एक समाधी भी बनाई गई।
समय बदला...लेकिन विश्वास अडिग रहा।आज इस जगह को लेकर लोगों की आस्था और श्रद्धा ही है कि उनकी सुविधाओं को ध्यान में रखकर हमारी भारतीय सेना ने 1982 में उनकी समाधि को 9 किलोमीटर नीचे बनवाया दिया, जिसे अब बाबा हरभजन मंदिर के नाम से लोग जानते है। साथियों इस जगह पर प्रत्येक वर्ष हजारों श्रद्दालू दर्शन करने आते हैं।बाबा की इस समाधी के बारे में मान्यता है कि इस जगह पर पानी की बोतल को आप कुछ दिन रख दें तो उसमें अद्भूत चमत्कारिक गुण आ जाते हैं,और इस पानी को 21 दिन पीने से लोग रोगों मुक्त हो जाते हैं।
मरणोपरांत भी कहा जाता है कि बाबा नाथु ला पर चीन सेना द्वारा हो रही सभी गतिविधियों की सुचना अपने मित्रों को सपनों में देते थे, जो कि सदैव सच साबित होती रही थीं।बाबा हरभजन सिंह को नाथू ला का हीरो भी कहा जाता है।इसी प्रकार के अनगिनत तथ्यों के आधार पर बाबा को मरणोपरांत भी भारतीय सेना की सेवा करने में रखा गया। 48 साल बाद भी बाबा हरभजन सिंह की आत्मा भारतीय सेना में अपना पूरी निष्ठा से कर्तव्य निभा रही है।

आपको बता दें कि बाबा के इस चमत्कारी मंदिर उनके जूते और अन्य सामान रखे गए हैं। सेना के जवान बाबा के मंदिर की पहरेदारी करते हैं,और इसी क्रम में सेना के जवान की तरह नित्य उनके जूते पॉलिश, वर्दी साफ करना,और बिस्तर भी लगाते हैं।मंदिर में तैनात सिपाहियों का कहना है कि साफ किए हुए जूतों पर कीचड़ लगी होती है,बिस्तर पर सिलवटें देखी जाती हैं। इतना ही नहीं दोस्तों बाबा की आत्मा से जुड़ी बातें चीन की सेना भी बताती है।यहां तक कि चीनी सिपाहियों ने भी बाबा को घोड़े पर सवार होकर सेना के जवान की तरह रात में गश्त करने की बात कही है। दोनो देश के लोगों का यकिन ही तो है कि आज भी दोनों देशों की हर फ्लैग मीटिंग पर एक कुर्सी बाबा हरभजन के नाम की भी रखी जाती है।जो उनके होने का सदैव आभास कराती है।

हमारे देश के अन्य सैनिकों की तरह ही बाबा को भी हर महीने वेतन दिया जाता है।कहते हैं सेना के पेरोल में आज भी बाबा का नाम लिखा हुआ है और नियमानुसार बाबा की प्रमोशन भी होता है।अब तो बाबा सिपाही से कैप्टन के पद पर आ चुके हैं।हर साल बाबा को 15 सितंबर से 15 नवंबर तक दो महीने की छुट्टी भी दी जाती थीं और बड़ी श्रद्धा के साथ स्थानीय लोग और सैनिक एक जुलुस के रूप में उनकी वर्दी, टोपी, जूते और साल भर का वेतन दो सैनिकों के साथ, सैनिक गाड़ी में नाथुला से न्यू जलपाईगुड़ी रेलवे स्टेशन लाते थे और वहां से डिब्रूगढ़ अमृतसर एक्सप्रेस से उन्हें जालंधर (पंजाब) लाया जाता।गाड़ी में बाबा के नाम का टिकट भी बुक किया जाता था।यहां से सेना की गाड़ी उन्हें उनके गांव तक छोडऩे जाती थी। गांव पहुंचने पर बाबा का सामान उनके मां को सौंप दिया जाता था।और फिर उसी ट्रेन से उसी आस्था और सम्मान के साथ उनके समाधि स्थल वापस लाया जाता।लेकिन विगत कुछ वर्षों से इस आस्था को अंधविश्वास कहा जाने लगा, और यात्रा बंद कर दी गई।

अंतत: अब आप इसे आस्था कहें या अंधविश्वास।लेकिन जो विश्वास हमारे भारतीय सैनिकों को शक्ति की अनुभूति कराती है वो हमारे लिए किसी आस्था से कम नहीं है।


।।बाबा हरभजन सिंह को नमन।।।जय हिन्द,जय भारत।।

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