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Saturday, 16 November 2019

विद्या की अर्थी उठाते JNU के विद्यार्थी:स्वामी विवेकानंद जी राष्ट्र नायक हैं उनके विचारों को कैसे खत्म कर सकते हो !



स्वामी विवेकानंद तो बन नही पाओगे,उनके विचारों से सीख लेकर एक सभ्य भारतीय तो बन जाओ।
संदीप कुमार मिश्र: JNU कैम्पस के कुछ उपद्रवी और टुकड़े-टुकड़े गैंग के सदस्यों ने स्वामी विवेकानंद जी की प्रतिमा की निरादर सिर्फ इसीलिए की कि उनकी मूर्ति पर उनके वस्त्र भगवा। ये सुनकर उन मूर्खों पर हंसना स्वाभाविक ही था। अब कौन बताए उन मूर्खों को कि ये भगवा धारण करने के लिए स्वामी जी ने कितनी तपस्या और साधना की थी...
चलिए एक छोटा सा दृष्टांत सुनाता हूं आपको नरेंद्र से विवेक और फिर भगवाधारी स्वामीविवेकानंद बनने की...उम्मीद है ये कथानक वो चंद गद्दार,देश के टूकड़े करने वाले चंद विद्या के मंदिर में चुम्मा पार्टी करने वाले कपूतों तक जरुर पहुंचेगा...!

मेरे प्यारे भाईयों और बहनों (स्वामी जी की लाइन से उपयुक्त शुरुआत औऱ क्या हो सकती है,शिकागो) 23 वर्ष की उम्र में संन्यास लेने वाले विवेकानंद जी को लोग यह कहकर ख़ूब उलाहना दिया करते थे कि "स्वामीजी अभाव-संन्यासी हैं या स्वभाव-संन्यासी?" यानी स्वामीजी के मन में सच ही में वैराग्य जगा था या अभाव-विपदा से पीछा छुड़ाने की गरज से उन्होंने कौपीन धारण कर लिया ?

इस उलाहना के पीछे अनेक कारण थे !
गौतम और वर्धमान दोनों ही राजपुत्र थे। जब संसार से मन उचटा तो राजपाट का परित्याग कर वन में चले गए। जाते समय उन्हें यह नहीं सोचना पड़ा था कि हमारे बाद परिजन भूखों तो नहीं मरेंगे। किंतु नरेन्द्रनाथ के साथ स्थिति थोड़ी भिन्न थी।
ऐसे तो दरीयाटाला गांव के कश्यप गोत्र के दत्त लोगों का परिवार समृद्ध था। कलकत्ते में गौरमोहन मुखर्जी स्ट्रीट पर उनकी विशाल "दत्त-कोठी" थी। जिस काल में बंगाली मध्यवर्ग की तनख़्वाह ही 15 रुपया महीना हुआ करती थी, तब "दत्त-कोठी" का महीने का ख़र्चा हज़ार रुपया था। किंतु सुख के दिन सदैव कहां रहते हैं ?

नरेन्द्र के पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ते के प्रख्यात क़ानूनदां थे। वर्ष 1884 में जब उनकी अकाल मृत्यु हुई तो परिवार पर विपदाओं का कहर टूट पड़ा। हालात ऐसे हो गए की जहां हजारों खर्च हो जाया करते थे वहां पति की मृत्यु के बाद नरेन्द्र की माता भुवनेश्वरी देवी जी तीस रुपया मासिक ख़र्च पर आ गई, लेकिन ख़र्चों में कटौती करने से कुटुम्ब का भरण-पोषण कहां होता है ?
जब पिता की मृत्यु हुई तब विवेकानंद 21 वर्ष के थे और घर में सबसे बड़े(पुरुष में) वही थे। जीवन-यापन के साधन के लिए कोई उपाय-जुगाड़ करने का उत्तरदायित्व भी उन्हीं के कंधों पर आया। लेकिन नरेन्द्रनाथ का मन तो मठों और योगियों की दुनिया में उलझा हुआ था !
नरेन्द्रनाथ अपने माता-पिता की चौदह संतानों में से छठे थे। विश्वनाथ दत्त और भुवनेश्वरी देवी की पहली दो संतानें पुत्र‍ियां थीं और दोनों शैशव में काल-कवलित हो गई थीं। दो अन्य पुत्र‍ियां किरणबाला 18 की होकर और हरिमणि 22 की होकर चल बसीं। पिता की मृत्यु के समय परिवार में एक स्वर्णमयी दीदी ही नरेन्द्र से ज्येष्ठ थीं, हम जानते हैं कि उस काल में स्त्री कहां भात-भोजन के उपाय करने जाती? विवेकानंद के दोनों प्रसिद्ध छोटे भाई तब अल्पायु के थे। महेंद्रनाथ 15 के किशोर थे और भूपेंद्रनाथ तो अभी 3 वर्ष के बालक ही थे। आगे चलकर महेंद्रनाथ को बड़ा यायावर लेखक और भूपेंद्रनाथ को स्वतंत्रता सेनानी बनना था, किंतु अभाव तो उस समय सिर पर था!
मानो यह विपदा ही पर्याप्त ना हो, विश्वनाथ की मृत्यु के बाद अवसर देख अन्य परिजनों ने दत्त-संपत्त‍ि पर दावा ठोंक दिया। कलकत्ता हाईकोर्ट के एटॉर्नी-मुहाल के काग़ज़ात टटोलें तो पाएंगे कि विश्वनाथ दत्त के परिवार पर एक-एक कर बिंदुवासिनी, शचिमणि और ज्ञानदासुंदरी नामक परिवार की ही स्त्र‍ियों ने मुक़दमे दायर किए थे। "दुबले और दो आषाढ़" वाली दुर्दशा थी!
वर्ष 1881 में दक्षिणेश्वर में परमहंसदेव से भेंट के बाद से ही नरेन्द्र का मन संसार से उचट गया था किंतु अब पिता की अकाल मृत्यु के बाद क्या परिवार को भूखों मरने को छोड़ दें? इस दुविधा का सामना कभी गौतम और वर्धमान ने नहीं किया था। इसी आत्मसंघर्ष में 1884 से 1886 तक नरेंन्द्रनाथ के दो वर्ष बीते।

इन दो वर्षों में नौकरी की तलाश में नरेन्द्र ने नौकरी का आवेदन लेकर कार्यालय कार्यालय ख़ूब चक्कर लगाए। ईश्वरचंद्र विद्यासागर के सुविख्यात "मेट्रोपोलिटन इंस्ट‍िट्यूशन" की एक शाखा जब सिद्धेश्वर लेन, चांपातला में खुली तो नरेन्द्रनाथ ने वहां नौकरी के लिए आवेदन किया। नौकरी मिल गई। स्कूल के सेक्रेटरी विद्यासागरजी के जमाई थे। नरेन्द्रनाथ से किसी बात पर उनका विवाद हो गया तो उन्होंने नौवीं और दसवीं के छात्रों से कहलवा दिया कि माटसाब को तो पढ़ाना ही नहीं आता ! स्वयं विद्यासागर जी तक शिक़ायत पहुंची तो उन्होंने कह दिया कि नरेन्द्रनाथ को कल से नौकरी पर आने की आवश्यकता नहीं है।
यह प्रसंग इन अर्थों में चमत्कृत करने वाला है कि जिस विवेकानंद की कीर्ति पूरी दुनिया में एक शिक्षक और उपदेशक के रूप में प्रसारित होना थी, उन्हें स्कूली छात्रों ने यह कहकर निरस्त कर दिया कि वे पढ़ाना नहीं जानते थे ! और दूसरे यह कि ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे महामानव से भी अभावग्रस्त नरेन्द्र नाथ के पेट पर लात मारने का पाप जाने-अनजाने हो गया था !
इसके बाद नरेन्द्र ने किसी ज़मींदारी कार्यालय में नौकरी की। मार्च 1885 में वह नौकरी भी छोड़ दी। परमहंसदेव को जाकर बताया कि "ठाकुर दादा, यह नौकरी भी छोड़ आया हूं।" ठाकुर दादा ने प्रकृतिस्थ भाव से कहा : "ठीक किया, ठीक ही तो किया!"
दत्त परिवार पर चल रहे दीवानी मुक़दमे के दौरान 8 मार्च 1887 को अदालत में नरेन्द्रनाथ की पेशी हुई। बैरिस्टर साहब ने नरेन्द्र से उनकी उम्र पूछी, नरेन्दर ने कहा, "होगी कोई तेइस चौबीस वर्ष!" पेशा पूछा तो उत्तर दिया, "बेकार हूं!" अब बैरिस्टर साहब ने उलाहना देते हुए कहा, "तुम किसी के चेले बन गए हो ना ?" नरेन ने उत्तर दिया, "मुझे नहीं मालूम कि "चेला" क्या होता है !" फिर बैरिस्टर ने पूछा, "तुम रामकृष्ण आश्रम के लिए चंदा वसूली तो नहीं करते ?" नरेन्दर ने कहा कि "मैंने वैसा कोई कार्य कभी नहीं किया!"
पिता की मृत्यु के बाद नरेन्द्र के जीवन के वे दो वर्ष ऐसे ही अपमान और उलाहना और कटाक्ष से भरे हुए थे।
तभी शंकर का "विवेकचूड़ामणि" उन्होंने पढ़ा तो भीतर तक कांप गए। शंकर ने कहा था : "मनुष्यत्व मुमुक्ष्यत्व: महापुरुष संश्रय।" यानी मनुष्य जाति, आत्मशोध की वृत्त‍ि और महापुरुष का साहचर्य, ये तीनों बातें कभी एक साथ नहीं होतीं, अतएव जब वैसा हो तो सत्य की खोज में जुट जाना चाहिए। नरेन्द्र ने मन ही मन सोचा कि जाने कितने कल्पों के बाद मिला यह अवसर क्या क्लर्क और टीचर की नौकरी करके ही गंवा दूं? नहीं, यह संभव नहीं है।
तब जाकर वर्ष 1886 में उन्होंने संन्यास ले लिया और "स्वामी विवेकानंद" कहलाए।
वैसी ही किसी मनोदशा में तब विवेकानंद ने हरिदास देसाई को पत्र लिखकर कहा था : "आप मेरी दुखिनी मां से मिलने गए, बहुत प्रसन्नता हुई। एक तरफ़ भारतवर्ष के लाखों नर-नारियों का दु:ख है, दूसरी तरफ़ आत्मीय स्वजनों की दुर्दशा। मैंने संन्यास का पथ चुना है। आगे मां काली ही मेरी रक्षा करेंगी!"
विवेकानंद की एक बहन योगींद्रबाला ने गृहकलह में आत्महत्या कर ली थी। उसकी मृत्यु का समाचार मिलने पर वे विलाप करने लगे तो किसी ने टोका : "संन्यासी को ऐसा शोक प्रकाश शोभा नहीं देता!" इस पर विवेकानंद ने उत्तर दिया : "संन्यासी हूं तो क्या अपने हृदय का विसर्जन कर दूं?"
परिवार के प्रति दायित्व की चेतना और आत्मसत्य के शोधन का गुरुभार, इस द्वैत-प्रपंच के बीच विवेकानंद आजीवन पिसते रहे थे। बाद में जब वे जगविख्यात हो गए, तब भी परिजनों की चिंता में घुलते रहे। विशेषकर मां के प्रति चिंतित थे। इसके लिए याचना में हाथ फैलाने से भी उन्होंने संकोच नहीं किया। 1 दिसंबर 1898 को खेतड़ी महाराज को पत्र लिखकर विवेकानंद ने कहा : "मेरे रोग का ख़र्च आपको अधिक दिन वहन नहीं करना होगा क्योंकि अब मैं अधिक दिनों का मेहमान नहीं हूं, किंतु आपसे भीख मांगता हूं कि मां को हर माह सौ रुपयों की जो आर्थिक सहायता आप भेजते हैं, उसे मेरी मृत्यु के बाद भी जारी रखें!"
किंतु दुर्दैव ही था कि स्वयं खेतड़ी महाराज विवेकानंद से पूर्व ही वर्ष 1901 में चल बसे थे!
संसार संन्यासी को देखता है। संसार महायोगी का नाम जपता है। "विवेकानंद" कहकर जयघोष करता है। किंतु इस महायोगी के जीवन में कितने कष्ट-क्लेश थे, देह में कितने रोग थे, अभावों का कितना संताप था, संन्यस्त हो जाने का कितना अपराधबोध था, इस बारे में कौन विचार करता है!
एक मनुज से महायोगी बनने तक की इस यात्रा को देख सकने वाली भावदृष्टि जिसके पास होगी, वह कभी युगनायक के भगवा वस्त्रों की अवमानना करने के पाप का विचार भी नहीं कर सकेगा! इति! (संकलन)

Wednesday, 6 November 2019

जीवन की व्यथा को दूर करना है तो श्रीराम जी के शरणागति हो जाईए...!

जीवन की व्यथा को दूर करना है तो श्रीराम जी के शरणागति हो जाईए और अभिनंदन करिये श्रीरामलला का....
।।जय श्री सीताराम।।
"भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला: नत्वान्नत्वा याच्तेरारामचंद्र
सामान्योग्य्म धर्म सेतुर्नराणा काले-काले पालनियों भवदभि:"
संदीप कुमार मिश्र - #रा माने #राष्ट्र...#म माने #मंगल....यानी राम नाम में ही राष्ट्र का मंगल है...किंचित ही कोई होगा जो मर्यादापुरुषोत्तम जननायक प्रभु श्रीराम के चरित्र से अवगत ना हो क्योंकि प्रभु श्री राम रूप में भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता की ऐसी आदर्शमयी और जीवंत प्रतिमा प्रतिष्ठित की हैजो विश्वभर में अलौकिकअसाधारणअनुपम एवं अद्भुत हैजो धर्म एवं नैतिकता की दृष्टि से सर्वोपरि ही नहीं सदैव प्रासंगिक है।
विनय पत्रिका में गोस्वामी जी ने बड़ा सहज ही वर्णित किया है कि जिस जीव को श्रीसीताराम जी प्रिय ना हो उसे करोड़ो शत्रुओं के समान छोड़ देना चाहिए...कहने का मतलब है कि जिसे श्रीराम में प्रीति ना हो उसे छोड़ देना ही बेहतर होता है....जैसे भक्त प्रहलाद ने अपने पिता को छोड़ दिया...विभीषण ने अपने भाई लंकापति को छोड़ दिया....भरतलाल जी ने अपनी मां कैकेयी को छोड़ दिया...बली ने अपने गुरु शुक्राचार्य को छोड़ दिया....और ब्रज बालाओं ने अपने पतियों को छोड़ दिया....
यहां तक तो ठीक था लेकिन श्रीराम जी के प्रति अनन्य और अटूट प्रेम का उदाहरण शिव जी का है...ऐसा धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि भगवान शिव जी ने तो सीता जी का रुप धारण करने के कारण अपनी अर्धांगिनी माता सती जी को ही छोड़ दिया...वैष्णवानाम यथा शंभू...इतना बड़ा वैष्णव कोई होगा क्या...स्वामीनी का रुप बनाने के कारण शिव जी ने सती जी को छोड़ दिया...महादेव का एक नाम रुद्र भी है जिसका अर्थ है कि रोदिती रामार्थंम य: स रुद्र:... जो भगवान राम जी के लिए रोता है उसे रुद्र कहते हैं...श्रीराम जी प्रति अनन्य भक्ति का ऐसा आदर्श शायद ही कहीं और प्रस्तुत हो...
आदिदेव महादेव को भगवान राम के रुप पर बहुत आशक्ति है...वो भी भगवान के किस रुप पर सबसे ज्यादा आशक्ति है...बाल रुप पर....राम जी का बाल रुप भोलेनाथ को अतिप्रिय है....
जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आई।
जे हर हिय नयननि कबहुं निरखे नहीं अघाई।।
जिनके प्रेम और संकोच के वश में होकर स्वयं भगवान श्रीराम आकर प्रकट हुए,जिन्हें श्री महादेव जी अपने ह्रदय के नेत्रों से कभी अघाकर नहीं देख पाए...अर्थात जिनका स्वरुप ह्रदय में देखते-देखते शिवजी कभी तृप्त नहीं हुए....ऐसे हैं घट-घट में बसे श्रीराम
भगवान शिव की श्रीराम जी की भक्ति का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि शक्ति स्वरुपा माता पार्वती जी ने कहा कि -सारे पति अपनी पत्नियों में आसक्त रहते हैं और मेरा पति रघुपति में आसक्त हैं...ऐसा परम भागवत पति कहां मिलेगा....
अब ये भी जान लें कि पति किसे कहते हैं ?-पति माने पायति रामचंद्र शिव भक्ति सुधारसं...जो अपनी पत्नी को राम भक्ति का सुधारस पिलाता है उसे पती कहते हैं।
अब ऐसे प्रभु श्रीराम जी को उनके घर से कब तक बेघर रखा जा सकता है...आईए मिलकर उत्सव मनाएं,शांति और सौहार्द के स्वागत करें रामलला का....और स्थापित करें पुन: रामराज्य... ।।जय श्री सीताराम।।

Thursday, 31 October 2019

सूर्य उपासना का ऐसा लोक आस्था का पर्व सिर्फ भारत में ही देखने को मिल सकता है



।।जय छठी मईया।।
कांच ही बांस के बहंगिया बहंगी लचकत जाए
#सूर्यउपासना का महापर्व #छठ जो #लोकआस्था का महापर्व है।जिसके गीत की धुन सुनते ही यकिन मानिए मन मस्तिष्क में एक अजीब सा आनंद प्रदान करने वाली सिहरन उत्पन्न हो जाती है...और मन बरबस ही गंगा घाट,सिर पर बड़ी-बड़ी फलों और खाद्य व्यंजनो से लदी हुई टोकरी लेकर जाते #आस्थावान लोग नजर आने लगते हैं....#छठपूजा के पर्व पर लोगों में गजब का उत्साह तो देखते ही बनता है... यकिनन #आधुनिकता की #चकाचौंध में अपनी #लोक #आस्था और #परंपरा को बचा कर रखना ही #छठ है...

#बिहार,#उत्तरप्रदेश और #झारखंड से बाहर निकलते हुए अब तो सिर्फ #देश भर में ही नहीं #विदेशों में भी छठ पर्व की छटा सहज ही देखने को मिल जाती है....जिसे देखकर कहना गलत नहीं होगा कि छठ हर किसी के घर में हो ना हो लेकिन हर जगह हो रहा है....सूर्य देव की उपासना के महापर्व की छटा आपको उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम हर जगह देखने को मिल जाएगी....हां इसका स्वरुप थोडा छोटा या बड़ा हो सकता है...लेकिन वही गन्ना,नारियल,ठेकुआ,केला,शरीफा आपको सूप में सजा हुआ मिल जाएगा...साथ में अन्य पारंपरिक व्यंजन और फल भी....

#सदियों से मनाया जाने वाला पवित्र त्योहार हमारे स्मरण में हो ना हो लेकिन कहानियां हमने जरुरी सूनी होगी कि किस प्रकार से सूर्य के उदय होते ही हमारी #माताएं #बहनें #परिवार और #समाज के लोग घाट की तरफ बढ़ जाते हैं...खैर अब #नदियां तो स्वच्छ रही नहीं तो पार्क में बने तालाब में जाकर भी अपनी लोक आस्था को हमने जीवित रखा है...
अपनी #संस्कृति और #लोक #आस्था से लगाव को आप इस लिहाज से भी समझ सकते हैं कि ट्रेनो,बसों में जगह कम पड़ जाती है...छठ पर्व के समय ऐसा लगते लगता है मानो शहर के शहर खाली हो रहे हैं... वास्तव में श्रद्धा और विश्वास का इस प्रकार अपार जन सैलाब आपको कहीं और देखने को नहीं मिलेगा...

चार दिनों के इस #महापर्व से #स्वच्छता का जो संदेश मिलता है वो कहीं भी किसी भी रुप में कहीं और देखने को नहीं मिलती...और सूर्य की महत्ता तो हम सब जानते ही हैं....मनुष्य की समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला त्योहार छठ वास्तव में #आस्था,#प्रेम,#लोकसंस्कृति का अद्भूत #संगम हैं...

मेरे सभी इष्ट मित्रों को #सूर्य #उपासना के #महापर्व #छठ की हार्दिक #शुभकामनाएं और #बधाई।।
#जयछठीमईया  #लोकआस्थाकामहापर्व #गंगाघाट #सूर्यउपासना #महापर्व #देशविदेश #बिहार #यूपी #अर्घ्य #स्वच्छतासंदेश

Friday, 4 October 2019

मेरी मां का सम्मान करो अपने लिए... क्योंकि कल तुम भी मां बनोगी तब समय की मार तुम झेल नहीं पाओगी !



संदीप कुमार मिश्र- वो औरत जब ब्याह कर आयी थी, तो कुछ दिनों तक तो सब ठीक भी था! लेकिन ना जाने क्यों अपनी सासू मां पर बार बार नए नए आरोप लगानो लगी...अपने दफ्तर से थका हारा आया उसका पति एक ही बात कहता अपनी पत्नी से कि भगवान के लिए ये रोज रोज की किच किच बंद करो और मेरी मां पर बेबुनियादी आरोप लगाना बंद करो...लेकिन पत्नी जी थी कि एक ही बात की रट लगाए थी कि नहीं आपकी मां ने ही मेरी सोने की चैन उठाई है जब मैं नहाने गई थी...बेचारा पति अपनी झल्लाहट को कम करता हुआ प्यार से समझाता है कि सुनो मेघा जब हमारे कमरे कमरे में मेरे और तुम्हारे अलावा कोई आता जाता ही नहीं तो कैसे तुम्हारी चैन गायब हो सकती है,ध्यान से सोचो तुम ही कहीं रख कर भूल गई होगी...पति की बात पर ध्यान ना देते हुए मेधा ने और जोर से चिख कर कहा कि नहीं मुझे पूरा विश्वास है कि आपकी मां ने ही मेरा चैन चुराया है...
मां की अवहेलना एक बेटा कैसे बर्दास्त कर सकता था...जाने अनजाने में गुस्से में उसने मेघा को एक थप्पड़ रसीद कर दिया...जिसकी कल्पना मेघा ने कभी नहीं की थी...चंद महीनो पहले हुई शादी का सारा नशा उतरे देर ना लगी और संबंधों में एक दरार आ गयी...परिणाम इतना भयानक था कि मेघा अपना बैग पैक करके घर छोड़कर जाने लगी लेकिन जाते जाते उसने अपने पति से आंखों में आंसू भरते हुए एक सवाल पूछा कि तुमको अपनी मां पर इतना यकीन और विश्वास क्यूं है..??”
खामोश खड़ा एकटक दरवाजे की तरफ निहारते हुए पति ने मेघा की बातें सुनकर जो उत्तर दिया तो उसे अपने कमरे में दरवाजे की ओट में खड़ी उम्मीदों के उजालों से भरी मां ने सुना तो उसका मन बरबस ही भर आया क्योंकि उस बेटे ने अपनी पत्नी मेघा से कहा कि "जब वो बहुत छोटा था तभी असमय उसके पिताजी गुजर गए,सभी जिम्मेदारी मां के उपर आ गयी..मां ने मोहल्लेवालों के घरों मे झाडू-पोछा लगाकर एक वक्त की रोटी इकट्ठा करती थी... मुझे याद है जब मां मुझे थाली में भोजन परोसती थी तो एक खाली डब्बे को ढक कर रख देती थी और मुस्कुराते हुए कहती थी मेरी रोटियां बेटा इस डिब्बे में है,अभी मेरी इच्छा नहीं है तू खा ले...मां की बात सुनकर मैं भी हमेशा की तरह ही आधी रोटी खाकर ही मूंह बनाकर कह देता था कि मां मेरा पेट भर गया है मुझे और नही खाना है...बस हां...इससे ज्यादा मैं नहीं खा सकता...।
मेरी मां ने मुझे मेरी छोड़ी हुई आधी रोटी खाकर बड़ी मुश्किल से मुझे पाला पोसा और बड़ा किया है...आज अगर मैं दो रोटी कमाने लायक हो पाया हूं तो ये मेरी नहीं मेरी मां की तपस्या है...अरे कैसे भूल सकता हूं कि मेरी मां ने उम्र के उस पड़ाव पर अपनी इच्छाओं को मेरी खातिर मार दिया जबकि वो अपनी सभी कामनाओं को पूरा कर सकती थी...आज वही मेरी मां अपने उम्र के अंतिम पड़ाव पर तुम्हारी सोने की चैन की भूखी हो जाएगी...ऐसे कलुषित विचार की कल्पना तो मैं सपने में भी नहीं कर सकता...
तुम चाहती हो कि तीन दशक की कठोर,घनघोर तपस्या को मैं तुम्हारे तीन महिने से मिले क्षणिक सुख के लिए भूला दूं....?ऐसा नहीं हो सकता...तुमसे बस यही कहना चाहूंगा कि मेरी मां का सम्मान करो...अपने लिए क्योंकि कल तुम भी मां बनोगी...कहीं ऐसा ना हो कि तब समय की मार को तुम झेल ना पाओ ! पति की बात सुनकर मेघा की आंखो से आंसू छलक पड़े...और दूसरी तरफ मां की आंखों से भी आँसूओं का समंदर बहने लगा...
समय ठहर सा गया...आंसूओं के सैलाब में आनंद के उदित होने का संकेत दिखने लगा...मेघा मां के पैरों मों लिपट जाती है...मां वात्सल्य से बेटा और बहू को गले लगा लेती है...
अंतत: मां अनमोल है,जितना सेवा और सम्मान कर सकते हैं करें...कहीं संदेह हो तो मेरे जैसे लोगों से पूछें कि जब मां के आंचल से लिपटने का मन करता है तो चंद आंसू बहा कर संतोष कर लेते हैं...और कर भी क्या सकते हैं....!

Tuesday, 27 August 2019

G 7 में मोदी-ट्रंप मुलाकात से पाकिस्तान में महसूस हुए झटके!इमरान खान की दिमागी हालत खराब..!




संदीप कुमार मिश्र: अनुच्छेद 370 रुपी कोढ़ को जो भारत पिछले 72 सालों से ढो रहा था...उसे युवा भारत के सशक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल शुरु होते ही एक झटके में खत्म कर दिया...जिससे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जो ISI और ARMY के रिमोट से संचालित होते हैं उनका गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया...वो अचानक कोमा में आ गए...ऐसे ही बेचारे इमरान गधे-घोड़े बेचकर काम चला रहे थे...लेकिन 370 हटने से उनके आकाओं ने उन्हें और डंडा दे दिया जिससे उनके झटके बढ़ गए...

पाक के आका जिस-जिस मुल्क में कश्मीर मुद्दे को लेकर गए वहीं उल्टे पांव वापस आना पड़ा...लेकिन आदत वही बनी रही कुत्ते की पूंछ की तरह...जनाब इमरान की हालात तब और खराब हो गयी जब G7 समिट में डोनाल्ड ट्रंप गके सामने ये कह दिया कि कश्मीर हमारा आंतरिक मामला है हम सुलझा लेंगे...जिसका भरपूर समर्थन ट्रंप ने भी कर दिया...

यकिन मानिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की इस मुलाकात के झटके पाकिस्तान के रोम रोम में महसूस किए गए और इमरान खान तो ऐसे पागल हुए कि धमकी भरा बयान देने लगे कि कश्मीर पर हम किसी भी हद तक जाएंगे और अगर जंग हुई तो दोनो दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं , तबाही का असर पूरी दुनिया पर होगा”…

दरअसल हम सब जानते हैं कि जब से कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा है तब से कई बार इमरान खान से लेकर उनके सरकार के कई मंत्री भारत को धमकी और चेतावनी दे चुके हैं... और पाकिस्तान से बयानों का सिलसिला जारी है क्योंकि ट्रंप के सामने मोदी के साफ रुख के बाद उनकी हालत खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली हो गई है....

काश पाकिस्तान ये समझ जाता कि कश्मीर पर चर्चा करना पत्थर पर सिर फोड़ने जैसा है...कश्मीर भारत का मस्तक है और भारत अपना मस्तक कभी झुकने नहीं देगा...


Monday, 5 August 2019

कश्मीर से 370 हटने के बाद होगा क्या ?



संदीप कुमार मिश्र- देश का मुकुट मणी है कश्मीर।अब जब संसद में 370 हटाने का प्रस्ताव देश को गृह मंत्री ने पेश कर दिया और जम्मू-कश्मीर से लद्दाख को अलग कर दिया और दोनो को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया।अब आगे क्या ? इससे क्या फायदा होगा ?

दरअसल अब देश के अन्य हिस्सों से बाहरी लोग जम्मू कश्मीर में काम-धंधा कर सकेंगे।अब तक जम्मू-कश्मीर में वोट का अधिकार सिर्फ वहां के स्थाई नागरिकों को ही था लेकिन अब दूसरे राज्यों के लोग भी यहां वोट कर सकेंगे।इतना ही नहीं 370 के हटने से चुनाव में उम्मीदवार भी बन सकते हैं।कहने का मतलब देश का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में सरकारी नौकरी पा सकता है।अन्य राज्यों की तरह देश के किसी भी हिस्से का आम भारतीय नागरिक कश्मीर में जमीन खरीद सकता है मतलब वहां बस सकता है।

इसके इतर 370 हटने से देश का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर में शिक्षा अध्ययन के लिए स्कॉलरशिप हासिल कर सकता है साथ ही सुप्रीम कोर्ट का आदेश भी जो पहले जम्मू-कश्मीर में सीधे नहीं लागू होते थे वो अब लागू होंगे।साथ ही भारत के किसी भी हिस्से,प्रदेश का नागरिक अब कश्मीर में स्थायी तौर पर रह सकता है, अचल संपत्ति खरीद सकता है जो कि 35A की वजह से नहीं हो पा रहा था।

अब जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित राज्य बना दिया गया है।जम्मू कश्मीर की विधानसभा अब दिल्ली जैसी विधानसभा होगी। यानि राज्य का हेड गवर्नर होगा।जिसका प्रभाव होगा कि जम्मू कश्मीर की पुलिस सीएम के बजाए राज्यपाल को रिपोर्ट करेगी यानि लॉ एंड ऑर्डर केंद्र के पास होगा।
आपको जानकर हैरानी होगी कि सूचना का अधिकार कानून अब तक जम्मू-कश्मीर पर लागू नहीं था, लेकिन धारा 370 हटने के बाद RTI कानून लागू हो जाएगा।जम्मू कश्मीर में अब तिरंगे का अपमान करना अपराध होगा,जो कि पहले नहीं था।

370 रहने से पहले होता था कि यदि कोई कश्मीरी महिला पाकिस्तान के किसी व्यक्ति से शादी करती थी, तो उसके पति को भी जम्मू-कश्मीर की नागरिकता मिल जाती थी यानी किसी भी पाकिस्तानी को आसानी से जम्मू में रहने का अधिकार मिल जाता था लेकिन अब ये मुमकिन नहीं होगा।इतना ही नहीं जम्मू-कश्मीर की महिला यदि किसी दूसरे राज्य के स्थायी नागरिक से शादी करती हैं तो उसकी और उसके बच्चों के लिए अब कश्मीरी नागरिकता जैसे अड़चने भी नहीं होंगी और सूबे से दोहरी नागरिकता भी खत्म हो जाएगी।

जो भी कानून संसद से पारित होंगे वो अब सीधे जम्मू कश्मीर में भी लागू होंगे।जो कि  अब तक भारतीय संसद के अधिकार जम्मू कश्मीर को लेकर सीमित थे।आपको बता दें कि अब तक विदेश,डिफेंस और वित्तीय मामले को छोड़कर यदि भारतीय संसद कोई भी कानून बनाती थी तो वो वह जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होता था।इस प्रकार के कानून को लागू कराने का प्रावधान पहले था कि संसद द्वारा पारित कानून को जम्मू-कश्मीर राज्य की विधानसभा में पास होना जरूरी होता था। इस प्रकार के उल जूलूल अधिकार राज्य को 370 के तहत ही मिले हुए थे जो कि अब खत्म हो गये हैं।

370 हटने से अब भारतीय संविधान के अनुसार अल्पसंख्यकों को आरक्षण मिलेगा।पहले कश्मीर में अल्पसंख्यक हिंदुओं और सिखों को 16 फीसदी आरक्षण नहीं मिलता था, लेकिन धारा 370 हटने के बाद से लाभ भी मिलना शुरू हो जाएगा।शिक्षा का अधिकार और CAG का कानून भी लागू नहीं था जो अब तत्काल प्रभाव से लागू हो जाएगा।अंतत: राज्य की विधानसभा का कार्यकाल पांच साल का होगा, जो पहले छह साल का था।यानि कि अब एक देश, एक संविधान, एक कानून और एक विधान.....

मोदी सरकार का अपने वादे पर बढ़ता एक और महत्वपूर्ण कदम.... यानी कि सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास....

वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...