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Thursday, 16 August 2018

सफर-ए-जिंदगी : कविह्रदय अटल बिहारी वाजपेयी, अटल विचारों का महासमंदर



संदीप कुमार मिश्र: कवि ह्रदय,शब्दों के कुबेर,विशालतम व्यक्तित्व के धनी और जननायक, देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी जिनके बारे में कुछ भी कहना और लिखना मेरे लिए गर्व और फक्र की बात है।क्योंकि ऐसे विरले व्यक्तित्व सियासत के अखाड़े में कम ही देखने को मिलेंगे जिन्हें अजातशत्रु कहा जाता है। अटल जी ने अपने राजनीतिक जीवन में कई ऐसे फैसले लिए जिनका कायल विपक्ष भी हुआ....चलिए जानने का कोशिश करते हैं अटल जी सफर-ए- जिंदगी के बारे में दिलचस्प बातें...

जननायक श्रीमान अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म 25 दिसम्बर, 1924 को ब्रह्ममुहूर्त में शिन्दे की छावनी ग्‍वालियर में हुआ था।मूल रुप से आगरा के बटेश्वर के रहने वाले कृष्ण बिहारी वाजपेयी जी मध्य प्रदेश की रियासत ग्वालियर में अध्यापन कार्य करते थे।आपको बता दें कि अटल जी के पिता अध्‍यापक के अलावा हिन्दी और ब्रज भाषा के सिद्धहस्त कवि भी थे।धन्य हो गई उस दिन मां कृष्णा वाजपेयी की गोद जब सुर्य की लालिमा के साथ ललाट पर तेज लिए जननायक श्रीमान अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म हुआ।

अटल जी की प्रारंभिक शिक्षा के साथ ही बीए तक की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कालेज वर्तमान के लक्ष्मीबाई कालेज में हुई वहीं प्रथम श्रेणी में राजनीति शास्त्र से परीक्षा कानपुर के डीएवी कॉलेज से पास की।अटल जी ने कानपुर में ही एल०एल०बी० की पढ़ाई भी शुरू की लेकिन संघ से जुड़ जाने के कारण पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी।

एक स्वयंसेवक के रुप में छात्र जीवन से ही राष्ट्रीय स्तर की वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में अटल जी भाग लेते रहे।अटल जी को काव्य के गुण विरासत में प्राप्त हुए थी। कहते हैं कि महात्मा रामचंद्र वीर द्वारा रचित अमर कृति 'विजय पताका' पढ़कर अटल जी के जीवन में ऐसा बदलाव आया।जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी।

अटल जी नें डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और पण्डित दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशन में राजनीति का पाठ पढ़ा और साल 1955 में उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा,लेकिन असफलता हाथ लगी। वाजपेयी जी भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वालों में से एक रहे हैं, जो बाद में भारतीय जनता पार्टी नाम से राजनैतिक पार्टी बनी।आपको बता दें कि 1968 से 1973 तक अटल जी जनसंघ के अध्यक्ष रहे।

पहला चुनाव हार कर अटल जी ने हिम्मत नहीं हारी और 1959 में बलरामपुर (जिला गोण्डा, उत्तर प्रदेश) से जनसंघ के ही प्रत्याशी के रूप में विजयी होकर लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन पहुंचे। अटल जी बीस वर्ष तक लगातार जनसंघ के संसदीय दल के नेता रहे यानी 1957 से 1977 जनता पार्टी की स्थापना तक। मोरारजी देसाई की सरकार में 1977 से 1979 तक अटल जी विदेश मंत्री रहे और विश्वभर में भारत की शानदार छवि बनाई।

दरअसल सन 1980 में अटल जी जनता पार्टी से किसी मामले में असंतुष्ट हुए और जनता पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की और 6 अप्रैल, 1980 में बनी भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद का दायित्व भी संभाला।दो बार राज्यसभा के लिए भी अटल जी निर्वाचित हुए। अटल बिहारी वाजपेयी जी ने पहली बार 16 से 31 मई, 1996 तक वे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे। 19 मार्च, 1998 को फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और उनके नेतृत्व में 13 दलों की गठबंधन सरकार ने पांच वर्षों में देश के अंदर प्रगति के नए-नए आयाम छुए।

वहीं साल 1998 में पोखरण में परमाणु विस्‍फोट करके अटल जी ने देश को दुनिया के कुछ गिने-चुने परमाणु संपन्‍न देशों में शुमार करवा दिया।इतना ही नहीं पोखरण में भारत का द्वितीय परमाणु परीक्षण कराया और अमेरिका की सीआईए को भनक तक नहीं लगने दी।

अटल जी लंबे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया था।साथ ही वे एक ओजस्वी वक्ता और प्रसिद्ध हिन्दी कवि भी थे।अटल जी के संघर्षमय जीवन, परिवर्तनशील परिस्थितियां, राष्ट्रव्यापी आन्दोलन जेल-जीवन आदि अनेकों आयाम के प्रभाव एवं अनुभूति ने काव्य में सदैव ही अभिव्यक्ति पाई।मृत्यु या हत्या, कैदी कविराय की कुण्डलियां, संसद में तीन दशक, कुछ लेख: कुछ भाषण, सेक्युलर वाद, राजनीति की रपटीली राहें, बिन्दु बिन्दु विचार, अमर आग है, उनकी कुछ प्रकाशित प्रमुख रचनाएं हैं।


गठबंधन की सरकार चलाना आसान नहीं होता लेकिन अटल जी ने दर्जनो से ज्यादा पार्टीयों को साथ लेकर सफलतापूर्वक सरकार चलाई। अटल बिहारी वाजपेयी जी सबसे लंबे समय तक गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री रहे हैं।अटल जी ही पहले विदेश मंत्री थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देकर भारत को गौरवान्वित किया था।अटल जी ही थे जिन्‍होंने सौ साल से भी ज्यादा पुराने कावेरी जल विवाद को सुलझाया था।

अपने कार्यकाल में अटल जी ने देश को शिखर पर ले जाने वाले कई बेहतरीन कार्य किए।कई संरचनात्मक ढांचे के लिए कार्यदल; सॉफ्टवेयर विकास के लिए सूचना एवं प्रौद्योगिकी कार्यदल; केन्द्रीय बिजली नियंत्रण आयोग आदि का गठन किया. अटल जी ने राष्ट्रीय राजमार्गों एवं हवाई अड्डों का विकास; नई टेलीकॉम नीति तथा कोकण रेलवे की शुरुआत आदि के माध्यम से बुनियादी संरचनात्मक ढांचे को मजबूत करने वाले कदम उठाये. उन्‍होंने राष्ट्रीय सुरक्षा समिति, आर्थिक सलाह समिति, व्यापार एवं उद्योग समिति भी गठित की।

उन्‍होंने आवश्यक उपभोक्ता सामग्रियों की कीमतों को नियंत्रित करने के लिये मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया, उड़ीसा के सर्वाधिक गरीब क्षेत्र के लिए सात सूत्री गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया। आवास निर्माण को प्रोत्साहन देने के लिए अर्बन सीलिंग एक्ट समाप्त किया तथा ग्रामीण रोजगार सृजन एवं विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों के लिए बीमा योजना शुरू की।
अटल जी ने ही पाकिस्‍तान के साथ नए संबंधों को शुरुआत देने के लिए दिल्‍ली से लाहौर के बीच बस सेवा शुरू की। दिल्‍ली से लाहौर जाने वाली पहली बस में वे स्‍वयं पाकिस्‍तान गए। इतना ही नहीं वाजपेयी जी ने स्वतंत्रता संघर्ष में हिस्सा भी लिया और वे 1942 में जेल गए। 1975-77 में आपातकाल के दौरान अटल जी को बन्दी बनाया गया था।

श्रीमान अटल बिहारी वाजपेयी जी को उनकी राष्ट्र की उत्कृष्ट सेवाओं के लिए देश के सर्वौच्च सम्मान भारत रत्न और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।
अंत में अटल जी की ही देशभक्ति कविता आपके सामने प्रस्तुत है-

                                              !!स्वतंत्र भारत का मस्तक नहीं झुकेगा!!
भारत जमीन का टुकड़ा नहीं, जीता-जागता राष्ट्रपुरुष है । हिमालय इसका मस्तक है, गौरीशंकर शिखा है । कश्मीर किरीट है, पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं । दिल्ली इसका दिल है । विन्ध्याचल कटि है, नर्मदा करधनी है । पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघाएं हैं । कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है । पावस के काले-काले मेघ इसके कुंतल केश हैं । चांद और सूरज इसकी आरती उतारते हैं, मलयानिल चंवर घुलता है । यह वन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है । यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है । इसका कंकर-कंकर शंकर है, इसका बिंदु-बिंदु गंगाजल है । हम जिएंगे तो इसके लिए, मरेंगे तो इसके लिए ।अटल बिहारी वाजपेयी

Tuesday, 14 August 2018

15 अगस्त2018 विशेष: स्वतंत्रता दिवस के सही मायने



संदीप कुमार मिश्र: वतन हमारा रहे सादगाम और आजाद,हमारा क्या हम रहे ना रहें।हमारे देश को आजाद हुए 71 दशक बीत चुके हैं और जब हम वर्ष 2018 में 72 वां स्वतंत्रता दिवस मनाएंगे तो ये भी सोचेंगे कि हमने इन विगत वर्षों में एक लम्बा सफर तय किया।आज़ादी की इस प्रात:बेला को हम कैसे भूल सकते हैं जिसे पाने के लिए हमारे देश के महान स्वतंत्रता सेनानियों ने वर्षों तक संघर्ष किया और अंग्रेजों के गुलामी की बेड़ियों से भारत मां को आज़ादी दिलवायी ।

हमारी आज़ादी के कई मायने थे।मायने इस नजरीये से कि विश्व की सबसे संबृद्ध सभ्यता संस्कृति हमारी थी,विविधता में एकता हमारी मूल पहचान थी, यानी विविध संस्कृति, धर्म और भाषा हमारे यहां ही थी।जो संसार के किसी भी हिस्से में नहीं बोली जाती है।जरा सोचिए ऐसी संबृद्ध संस्कृति कहां मिलेगी,जहां लगभग 300 से ज्यादा भाषाएं बोली जाती है। जिनमे से 18 आधिकारिक भाषाएं हों।ऐसी विविधता और कहां देखने को मिलेगी।भारत विश्व का इकलौता ऐसा देश है, जहां अनेकता में एकता की अद्भूत मिसाल देखने को मिलती है।जिसे 200 वर्षों तक अंग्रेज तहस नहस करते रहे।जिसे गुलामी से मुक्त करवाने के लिए हमारे नायकों ने,भारत मां के वीर सपूतों ने बलिदान दिया और हमें आजादी मिल गयी।

दरअसल हमारे देश में सभी धर्म,मज़हब, जाति,पंथ और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के सम्माननियों का बड़े ही गर्मजोशी से अभिनंदन किया जाता है तभी तो अतिथि को देवताओ के समान सम्मानित किया जाता है, और अतिथि देवो भवः कहकर सम्बोधित किया जाता है।विगत 71 वर्षों में, हमारा देश दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में उभरा और अब तक हमारा देश भारत एक संबृद्ध राष्ट्र के रूप में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, दूरसंचार, उद्योग के साथ हरित क्रांति के क्षेत्र में नए नए किर्तिमान स्थापित कर चुका है। जिसके आधार पर हम हम कह सकते हैं कि देश की युवा पीढ़ी का वर्तमान और भविष्य शानदार और सही दिशा में आगे बढ़ रहा है ।

आईए हम सब मिलकर देश को और भी संबृद्ध,स्वच्छ और निर्मल बनाने का संकल्प लें।क्योंकि राष्ट्र सर्वप्रथम है।हमारा देश जितना ही संबृद्ध होगा उतनी ही हमारी प्रगति होगी,उतना ही विकास होगा।72 वें स्वतंत्र दिवस की आप सभी हार्दिक बधाई,शुभकामनाएं।।
।।जय हिन्द जय भारत।।

Monday, 13 August 2018

अपने आनंद में जीना ही जीवन का सच्चा सुख



संदीप कुमार मिश्र: कहते हैं कि जो अपने आनंद और मस्ती में जिए जीना उसे ही कहते हैं,लेकिन ज की आपाधापी भरी जींदगी में एक दूसरे से आगे निकल जाने की होड़ में हम ना तो दूसरे के सुख से सुखी होते हैं ना दुख में दुखी।क्योंकि आजकल हमारे जीनें का मूल अर्थ सिर्फ तुलनात्मकता, प्रतिस्पर्धा मात्र ही रह गया है।  जबकि हमारा प्रयास होना चाहिए कि हम अपने अल्हड़पने मस्ती भरे आनंद में ही जीए।विचार इस बात पर करना चाहिए कि हमारे सामने वाला यदी सुखी है तो कैसे है,ऐसी कौन सी सकाराच्मकता उसमें है जो हममें नहीं है और फिर हमें अपने जीवन में सकारात्मकता लानी चाहिए और सामने वाला से प्रेरणा लेकर उचित दिशा में कार्य करने चाहिए।जबकि हमारी चिंता कारण अब ये बनता जा रहा है कि सामने वाला सुखी क्यों है साथ ही सामने वाले को परेशान और दुखी देखकर हम उसके दुख करने के वारे में विचार नहीं करते हैं,हम तो यो सोचने लगते हैं कि सामने वाला और परोशान कैसे हो।दरअसल अब हमारे समाज में ऐसा स्वभाव बढ़ने लगा है कि सामने वाला सुखी क्यों और कैसे है ?
रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनी इठलैहैं लोग सब, बांटी न लेंहैं कोय।।
अर्थ : रहीम दास जी कहते हैं कि अपने मन की व्यथा को मन के भीतर ही छिपा कर ही रखना ठीक होता है,क्योंकि दूसरे का दुःख सुनकर लोग इठला भले ही लें, उसे बाँट कर कम करने वाला कोई नहीं होता।
अत: हमें अपने विचारों में सकारात्मकता लानी चाहिए,अपनी मस्ती में जीना चाहिए और आनंद उठाना चाहिए,क्योंकि जीवन का सच्चा सुख स्वयं के आनंद से रहने में हैं।।।

Thursday, 9 August 2018

जीवन में सुख-शांति की तलाश कैसे पूरी हो ?



संदीप कुमार मिश्र: शायद ही कोई इस नश्वर संसार में होगा जो तेरा-मेरा के चक्कर में ना फंसा हुआ हो। आशाएं,आकांक्षाएं,उम्मीदों से भरा पूरा हमारा जीवन नित्य नए सपने बुनता रहता है और हम वास्तविकता से दूर होते जाते हैं और अपने आज को खोकर भविष्य को पाने के लिए भगते रहते हैं।
यही मैं और मेरा का चक्कर हमसे हमारी सुख-शांति छीन लेता है।समस्या ये है कि हम स्वयं को पहचानने के अलावा सब कुछ करते रहते हैं जबकि स्वयं को जानना सबसे पहले आवश्यक है।हमारे धर्म पुराण कहते हैं कि आत्मानम् विद्धि यानी संसार में सबसे बड़ा काम है स्वयं को पहचानना।
जिसकी तलाश में हम भटकते रहे दरबदर,लुट जाने के बाद पता चला कि वो बैठा है मेरे अंदर। यही सच भी है कि जिस ईश्वर को हम इधर-उधर तलाशते रहते हैं वो तो हमारे भीतर ही बैठे हुए हैं,लेकिन हमारी मानसिकता ही ऐसी हो गई है कि हम अपने अपवित्र विचारों और बुरे कर्मों की वजह से अपने पवित्र मन को दूषित कर बैठे हैं और ऐसे में हमारा ईश्वर,हमारा भगवान, हमारी खुशी हमें नजर नहीं आती।दिक्कत तब और बढ़ जाती है जब हमें अपनी अज्ञानता पर लाज भी नहीं आती।
वास्तव में हमें ये समझना होगा कि अज्ञानता है क्या ?जिसका सबसे सरल उत्तर यही है कि  अपने आपको न जानना ही अज्ञानता है।और स्वयं को जान लेना ही सच्चा ज्ञान है।क्योंकि ये ज्ञान ही एकमात्र ऐसे रस या सद्गुण है जो हमें हमारे जीवन में सर्वोत्कृष्ठता का अनुभव तो कराता ही है साथ ही हमें श्रेष्ठतम लाभ प्राप्त करवाता है।जीवन में सुख का सुलभ स्रोत भी यही है।यकिन मानिए इस भवसार से पार पाने के लिए ज्ञान की पवित्रता का वरण करना ही होगा क्योंकि ज्ञान होने से ही सत्य का साक्षात्कार हो सकेगा।
ध्यान रखें संसार में सबसे बड़ी बुराई है- परमात्मा की बात न मानना।एक संकल्प अवश्य लें कि जब तक मुझमें सांस है, मैं ईश्वर द्वारा निर्धारित अपने प्रत्येक कर्तव्यों को इमानदारी से करता रहूंगा।याद रखें हमें धैर्य कभी नहीं खोना चाहिए, क्योंकि परम पिता परमात्मा के रहते हुए कोई भी व्यक्ति यहां अनाथ नहीं है। इसी सत्य को जानने से हममें ज्ञान की आभा प्रकट होगी और हममें समस्त बुराइयों का नाश होता है और तब  जीवन में सुख-शांति की प्राप्ति होगी।

(कभी कभी मजबूत हाथों से पकड़ी हुई ऊंगलियां भी छूट जाती हैं,क्योंकि रिश्ते ताकत से नहीं दिल से निभाये जाते हैं…!)

Wednesday, 8 August 2018

लुटियन की दिल्ली बनाम लूटीपीटी दिल्ली !



संदीप कुमार मिश्र: हमारे देश भारत की दो राजधानी है दोस्तों !  जो ना जानते हों वो जान लें,खैर दिल्ली वाले तो जानते ही हैं,क्यों ? नहीं जानते ! बिल्कुल सही समझा आपने...एक तो है हंसीन दिल्ली जिसे लुटियन की दिल्ली कहते हैं,जहां रंगीनिया है,चमचमाती सड़के हैं,रोड़ों पर सलीके से चलती गाडियां हैं,जहां की सुबह लालबत्ती के सायरन से होते हुए होती है और शाम बड़े-बड़े आलिशान होटलों में जाम छलकाते हुए और रात का क्या है साब,उसकी तो बात ही कुछ और है...!
अरे भाई ये वही लुटियन ज़ोन है जहां संसद भवन,राष्ट्रपति भवन और भी ना जाने कितने भवन और अतिसंवेदनशील प्रतिष्ठान है,जी हां यही तो वो वीवीआईपी एरिया हैं जहां हमारे प्रधानमंत्री जी भी रहते हैं और विश्व भर की एंबेसीयां भी हैं,और भी ना जाने क्या-क्या जनाब। हम तो सब कुछ देख भी नहीं पाए हैं! डर लगता है जी,...ना जाने कब किस मोड़ पर कौन पुलिस वाला शक की बिनाह पर धरपकड़ ले।कहते हैं कि सादी वर्दी में भी यहां पर खुफिया विभाग के लोग घुमते रहते हैं। अब साब होना भी चाहिए,अरे भाई देश भर के हमारे चुने हुए प्रतिनिधि से लेकर बड़े से बड़ा अफसर भी तो यहीं रहते हैं जो हमारे लिए संसद में लड़-झगड़ के नियम कायदे बनाते हैं और हमें ये बताते हैं कि हमें कितने किलोग्राम चावल,गेहूं मिलेगा, और कितने ग्राम चीनी और दाल...हां ये भी कि कितने रुपये कमाने वाला गरीब है और कितने रुपये कमाने वाला अमीर। भई...साहब लोग हैं तो समझ भी ज्यादा ही होगी ना। अकबर,बाबर और औरंगजेब से लेकर ना जाने कितने बड़े-बड़े नामों पर वीआईपी रोड़ों के भी नाम हैं साहब।जहां हमारे खद्दरधारी खड़े होकर गर्व महसूस करते हैं।अब लुटियन की दिल्ली के बारे में क्या-क्या लिखें साब...अपनी कहां इतनी समझ....!
लेकिन हां जिस राजधानी दिल्ली में हम रहते हैं उसके बारे में यथास्थिति जरुर बयां कर सकता हूं...जिसका नाम है लूटीपीटी दिल्ली !..जहां की सुबह भी शोर-शराबे के साथ भागमभाग से शुरु होती है और शाम भी थकान और पीड़ा के साथ। हमारी लूटीपीटी दिल्ली में तो गड्ढेदार सड़कें भी हैं तो किसी दानव की तरह मुंह बाए सीवर होल और नालियां भी हैं और कचड़ों का क्या साब,...सुबह मक्खियों की भिनभिनाहट और बदबू...अरे जनाब इतना ही नहीं पानी की मिठास और निर्मलता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि जैसे ही एक टैंकर आकर खड़ा होता है वैसे ही गालियों की जो मिठास कानो में पड़ती है...ओहो वातावरण पवित्र हो जाता है,कभी कभी तो दो-दो हाथ भी देखने को मिलता है । लेकिन मस्त हैं साब क्योंकि देश की राजधानी में जो रहते हैं...कभी सुबह न्यू अशोक नगर के हनुमान मंदिर रोड़ पर 8-9 बजे के बीच आईए या फिर संगम विहार,लाल बाग,शिव विहार या फिर दिल्ली की जितनी भी पूरीयां हैं चाणक्यापूरी और विकासपूरी को छोड़कर...या फिर रेलवे ट्रैक के किनारे बसी जुग्गीयों वाले इलाके में...सच कहते हैं मजा आ जाएगा....दूर से देखने पर सिर्फ मुंडी ही मुंडी नजर आएगी आपको...एक भरपूर हिन्दुस्तान का नजारा आपको एक ही मोहल्ले में देखने को मिल जाएगा ।

शायद ही कोई दिन होगा साब जब इन इलाकों से कोई भूख से,रोग से,गंदगी से मरता हुआ ना नजर आए ।...कभी शनि बाजार,मंगल बाजार की रौनक देखिए यहां की...बड़े-बड़े मौल की रंगीनियां आपको फीकी लगने लगेंगी।लेकिन खुश हैं साब यहां भी रहने वाले लोग...सबसे मजे की बात तो ये है कि इन इलाकों में कभी-कभी हमारे जनप्रतिनिधि भी जाते हैं और जिस दिन जाते हैं वो दिन किसी त्योहार से कम नहीं होता...।

खैर!...कभी कभी सोचता हूं कि क्या ऐसी ही देश की राजधानी की कल्पना हम करते हैं।...लिखने को तो इतना कुछ है इस दिल्ली के बारे में कि लिखते-लिखते सुबह से शाम और फिर सुबह हो जाए लेकिन लिखना खत्म ना हों...सच कहता हूं दोस्तों कि दिल्ली लोग आते ही क्यों हैं?...इस गंदगी और उधार की जिंदगी जीने से तो अच्छा अपने गांव में ही रह लेते...कम से कम स्वच्छ हवा और जल की दिक्कत तो नहीं होती और मेहनत मजदूरी करके दो वक्त की रोटी भी मिल ही जाती।लेकिन फिर सोचता हूं की आजादी के कई दशक बाद भी ऐसी कौन सी बेबसी और मजबूरी रही होगी होगी कि लोग अपना पुस्तैनी घरबार छोड़कर नरक की जिंदगी गुजर बसर करने के लिए दिल्ली या फिर दिल्ली जैसे अन्य महानगरों में चले जाते हैं...क्या सिर्फ महज वोटबैंक बनने के लिए...शायद ही देश का कोई ऐसा प्रांत हो जहां के लोग दिल्ली में आकर नहीं बसे हों....!

इस लूटीपीटी दिल्ली की विडंबना देखिए कि जो सड़क गलती से एक बार खुद गई तो वो कई महिनो तक खुदी ही रहती है,चाहे भले ही कितनी भी घटना और दुर्घटना उससे हो जाए,बरसात के मौसम में इन इलाकों में चारों तरफ पानी ही पानी होता है,नालियां कचड़ों से ठसाठस भरी रहती हैं...लोग इन्हीं किचड़ और गंदगी भरे रास्तों पर आने जाने को मजबूर हैं....अब ये दुर्व्यवस्था किसी को नजर नहीं आती...हर कोई सिर्फ टोपी ट्रांसफर करने में लगा रहता है...।

सवाल उठता है कि आखिर कब दिल्ली वास्तव में देश का दिल बन पाएगी...या फिर कभी नहीं...स्मार्ट सीटी बने इसमें किसी को कोई गुरेज नहीं,शहर बसेगें तो रोजगार भी बढ़ेंगे लेकिन जो शहर के नाम पर कलंक बने हुए हैं उन्हें तो पहले दुरुस्त बना दिये जाएं...आखिर कब तक हमारे जनप्रतिनिधि हों या फिर अफसर इस बात को समझेंगे....विकास के नाम पर आखिर कब तक हकीकत से महरुम रहेगी देश की अस्सी प्रतिशत आबादी..और कब बनेगी एक दिल्ली एक राजधानी...और देश का एक दिल...दिल्ली.....आप भी उम्मीद रखें और हम भी....बस और क्या।।    

  

Monday, 6 August 2018

सावन में शिव का व्रत क्यों रखती हैं लड़कियां ?



संदीप कुमार मिश्र: ऐसे तो महादेव की पूजा अर्चना हमेशा ही फलदायी होती है।लेकिन भगवान शिव के पवित्र माह सावन में भोले की अपने भक्तों पर कुछ खास ही कृपा बरसती है।शिवलिंग का विविध प्रकार से अभिषेक करना,पूजा-अर्चना करना,ध्यान लगाना और व्रत रहना इस पवित्र सावन मास में बढ़ जाता है।खासतक लड़कियां सावन सोमवार का व्रत अवश्य रखती है।लेकिन क्या आप जानते हैं सावन में सोमवार का व्रत क्यों रखा जाता है,खासकर लड़कियां व्रत क्यों रहती हैं।चलिए हम आपको कुछ खास कारण बताते हैं-

1-      महादेव की विशेष कृपा पाने का पवित्र माह सावन
हमारे धर्म पुराणों में ऐसी मान्यता है कि सावन का महीना आदिदेव महादेव को समर्पित है।कहते हैं कि इस पवित्र माह में विधि-विधान से जो भी साधक शिव जी की पूजा करता है उसपर महादेव शिघ्र ही प्रसन्न होकर उसकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर देते हैं ।

2-      भोलेनाथ अतिशिघ्र प्रसन्न होने वाले देव
कहते हैं कि आशु तुष्यति इति आशुतोष: कहने का मतलब है कि जो शीघ्र ही प्रसन्न हो जाएं उन्हें आशुतोष कहा जाता है।इसीलिए भगवान् शिव को आशुतोष कहा गया है। भगवान शिव अपने उपासकों से शिघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं।

3-      श्रावण मास में भगवान शिव की होती है विशेष पूजा
श्रावण यानी सावन के माह में भगवान भोलेभंडारी की विशेष रूप से पूजा की जाती है। पूजन में देवों के देव महादेव का अभिषेक जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगा जल, गन्ने के रस आदि से किया जाता है और फिर अभिषेक के बाद बेलपत्र, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, राई फूल आदि अर्पित कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है और अंत में महादेव को धतूरा, भांग और श्रीफल आदि का भोग लगाया जाता है।


4-      श्रावण माह में अति फलदायी सोमवार
धर्म शास्त्रों के अनुसार श्रावण माह में पड़ने वाले सभी सोमवार को यदि साधक व्रत रखते हैं तो उन्हें नाथों के नाथ भोलेनाथ की विशेष कृपा और फल की प्राप्ति होती है।

5-      लड़कियां महादेव जैसे पति पाने के लिए रखती हैं श्रावण सोमवार का व्रत
कहते हैं कि श्रावण माह के सोमवार को ही माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए व्रत रखा था। इसलिए ऐसा कहा जाता है कि जो कन्या चारों सोमवार का व्रत रखती है उन्हें महादेव जैसे पति की प्राप्ति सहज ही हो जाती है।

6-      शिव का जलाभिषेक करने के लिए कांवड़ यात्रा शुभ
श्रावण माह में शिव भक्त कावड़ में गंगा जल भरकर सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।कहते हैं कि सावन माह के प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का जलाभिषेक शुभ और फलदायी होता है।भगवान के प्रति भक्तों की अपार श्रद्धा ही कांवड़ यात्रा है जो भक्त और भगवान के रिश्ते को और मजबूती प्रदान करती है।



Thursday, 2 August 2018

सख्ती से लागू हो NRC, किसी घुसपैठिये को भारत में रहने हक नहीं ! मेरा देश कोई धर्मशाला नहीं



संदीप कुमार मिश्र: वाह रे सरकार! कीटनाशक दवा(NRC) का छिड़काव किया असम में और कीड़े बंगाल के बिलबिला रहे हैं। शर्म आती है जो मानवीयता की दुहाई देते हैं।अरे जनाब अपनी आबरु लूटाकर मानवीयता की रक्षा नहीं होती।मेरा देश मेरा है,धर्मशाला नहीं है।कोई समस्या हैं तो समाधान मिल बैठकर ढ़ुंढना होगा। लेकिन ना जाने कई दशकों से जंग खाई व्यवस्था को सिर्फ इस आधार पर नहीं छोड़ा जा सकता कि घुसपैठियों से किसी की सरकार बनती है।
इन घुसपैठियों के कुकृत्यों से कितनी जनधन की हानी हो रही है इसका अंदाजा शायद हर किसी को है लेकिन फैसला लेनो की हिम्मत किसी में नहीं।किंचित ही देश का कोई ऐसा राज्य,जिला या कस्बा हो जहां इन घुसपैठियों के आतंक से लोग परेशान ना हो।चोरी,डकैती,बलात्कार,हत्या जैसी ना जाने कितनी घटनाओं में इनका सीधे सीधे हाथ होता है।देश की राजधानी दिल्ली भी इससे अछूती नहीं है...
अब किस किस इलाके का नाम लूं।कई तो ऐसे हैं जहां दिन में भी जाने से डर लगता है।सरकारें वोट बैंक की राजनीति में एक के बाद एक हजारों की तादाद में जुग्गी बसा कर दिल्ली की पहचान को ही खत्म कर दिया।जुग्गी वाली दिल्लीबनाकर रख दिया।जुग्गी बसाने का ठेका समय-समय पर दिल्ली में शिफ्ट होता रहा।सिर्फ वोटबैंक के लिए।

अब आप सोचिए राजधानी दिल्ली जब इन घुसपैठियों से सुरक्षित नहीं है तो आसाम, बंगाल और सीमावर्ती क्षेत्रों की क्या दशा होगी जहां कई दशक से ये घुसपैठियों तांडव मचा रहे हैं।
अब कोई मुझे सरकार प्रेमी या मोदी भक्त कहता हो तो कहता रहे लेकिन मोदी सरकार के इस कड़े फैसले का मैं पूरजोर समर्थन करता हूं और करता रहूंगा।अब मोमता दीदी नाराज हो,उनका वोट बैंक खत्म हो जाए या फिर कांग्रेस और अन्य पार्टियां चील्ल पों मचाएं या मिमियाएं...।शर्म आती है ऐसे बयानो पर जब बंगाल की मुख्यमंत्री मोमता दीदी ये कहती हैं कि अगर इन घुसपैठियों को निकाला जाएगा तो गृह युद्ध हो जाएगा।ऐसा प्रेम अगर बंगाली आवाम के लिए दिखाया होता तो शायद बंगाल से गरीबी,भूखमरी,बेरोजगारी खत्म हो गई होती।लेकिन नाश कर दिया इन लेफ्टिस्टों ने और मोमता दीदी ने बंगाल का।
सरकार को बड़ी कड़ाई से NRC लागू करवाना चाहिए।हां लेकिन एक बात का विशेष और खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी भारतीय का हक ना मारा जाए।कोई अपना बेसहारा ना हो जाए।यकिनन ये मेरा देश है,हमारा देश है कोई धर्मशाला नहीं है। मानवीयता की बात हम अपने घर में कर लेंगे,अपनों से प्रेम भी करेंगे और लड़ेंगे भी...लेकिन किसी घुसपैठिये को अपने घर के सामानों संसाधनो का दुरुपयोग करने नहीं देगें।


वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...