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Wednesday, 9 August 2017

9 अगस्त : अगस्त क्रांति की 75वीं सालगिरह

sandeep kumar mishra
संदीप कुमांर मिश्र: देश आज अगस्त क्रांति की 75वीं सालगिरह मना रहा हैं...क्रांति की ये अलख देश को गुलामी से आजादी दिलाने के लिए थी।लेकिन क्या स्वतंत्रता आंदोलन के प्रेरणा-प्रतीकों,प्रसंगों और विभूतियों का उत्सव मना कर हम आजादी के सही अर्थों को समझ पाए हैं?

अगस्त क्रांति की शुरुआत और मायने
9 अगस्त का दिन भारत की आजादी के लिए इतिहास का पहला गौरवपूर्ण दिन था,जब एक साधारण से दिखने वाले असाधारण से व्यक्ति ने ब्रिटिश साम्राज्य की नीव हिला कर रख दी..और अंग्रेजों से कहा कि अब आपके जाने का वक्त आ गया है....अंग्रेजों भारत छोड़ो....अंग्रोंजों को गहरी चोट देने वाले ये शब्द से मोहन से महात्मा बने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के....।इतिहास में वो दिन अगस्त क्रांति को नाम से जाना जाना लगा...जब जन-जन का मन स्वतंत्रता की अंगड़ाई लेने लगा...और गुलामी की बेड़ियों से भारत माता को आजाद कराने आवाज हर तरफ से उठने लगी।
खुली हवा में सांस लेते आज यकिनन बहुत अच्छा लगता है,लेकिन इस आजादी के लिए देश के अनगिनत वीर सपूतों ने अपना जीवन न्यौछावर कर दिया था। एक समय था जब भारत में रहने वाले हर हिन्दुस्तानी की सांसो पर सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्य का कब्जा हुआ करता था आतंक और गुलामी में फंसे छोटे-बड़े तबके को जब यह अहसास हुआ कि चुप बैठने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है। तब देश में आजादी के लिए हर तरफ से आवाजें उठने लगी।जिसकी अगुवाई राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने की।बापू ने न केवल देश के हर तबके को समायोजित किया बल्कि सभी को एक साथ संगठित होकर आगे बढ़ने को प्रेरित किया।
sandeep kumar mishra
4 जुलाई 1942 को राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने एक प्रस्ताव पारित किया।जिसका उद्धेश्य था कि अंग्रेजों भारत छोड़ो।इस प्रस्ताव में ये भी कहा गया कि ब्रिटिश हुकूमत अगर अपने देश वापस नहीं जाती है तो उनके खिलाफ पार्टी देश भर में आन्दोलन शुरू करेगी।

लेकिन कांग्रेस के इस प्रस्ताव को ब्रिटिश सरकार ने नज़र अंदाज कर दिया। जिसके बाद बाद कांग्रेस ने अन्य सभी दलों से इस आन्दोलन में साथ देने का आह्वान किया। लेकिन सफलता नहीं मिली और फिर 9 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आन्दोलन शुरू किया।जिसका भरपूर असर ब्रिटिश शासन पर हुआ।और ब्रिटिश डरने लगे।

मुंबई के एक पार्क में शुरू हुए इस आन्दोलन के खौफ से ब्रिटिश साम्राज्य की चूलें हिल गई।तभी से 9 अगस्त 1942 का वो दिन अगस्त क्रांती कै नाम से जाना जाने लगा।

Saturday, 5 August 2017

राखी एक पवित्र बंधन

sambodhan
sambodhan/sandeep kumar mishra

बेटे की चाह में बढ़ रहे कोख के कातिल..!


संदीप कुमार मिश्र:  काश! हमारी सोच बदल जाती।भेदभाव के उस संकिर्ण मानसिकता से हम बाहर निकलते...उस बेबस मासूम को ये ना कहना पड़ता...कि अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो... काश!.....बड़ा अच्छा लगता है जब देश के पीएम नारा देते हैं...बेटी बचाओ, बेटी पढाओ का...इस अभियान की सराहना भी होती है...वहीं तब और भी अच्छा लगता है जब सेल्फ़ी विथ डॉटर की बात कही जाती है..अच्छा लगता है ना सुनने में ये सब...बेटियों की रक्षा और सुरक्षा के लिए सरकारे खुब पैसे भी खर्च कर रही है...लेकिन क्या इसका असर हमारे समाज पर पड़ रहा है...हमारी सोच बदल रही है..हम बदल रहे हैं...?

दरअसल जब प्रधानमंत्री मोदी जी सपेरों के देश को माउस चलाने वाले इक्कीसवीं सदी के भारत की बात करते हैं तो क्या हमारे समाज में बैठे बेटों की चाह में आधी आबादी पर अत्याचार करने वाले लालचियों को ये बात समझ में नहीं आती कि देश के विकास और उत्थान में जितनी बेटों की भागीदारी है उतनी ही बेटियों की भी।

या फिर हम रुढीवादी मानसिकता के ऐसे शिकार हैं कि हमारी सोचने समझने की क्षमता ही खत्म हो गयी है...या फिर हमें ये भी नजर नहीं आता कि किस प्रकार महज अपने सुख के लिए जिस बेटे की चाह में हम बेटियों की कोख में ही हत्या कर दे रहे हैं, वही बेटा जब जवान हो जाता है तो अपने एशोआराम के लिए अपने मां-बाप को वृद्ध आश्रम में छोड़ देता या फिर दर बदर की ठोकरें खाने को...।

ख्वाहिश बेटों की,सेवा बेटियों से...फिर क्यों हो रहा है महापाप !
कुछ दिनों पहले की ही बात है,पंजाब का एक युवक अपने दोस्तों साथ मिलकर एक महिला को बेरहमी से पीट रहा था...वो चीख रही थी, चिल्ला रही थी,लेकिन हैवान बन चुके युवक लगातार उसे पीट रहे थे...।

दरअसल आपको जानकर हैरानी होगी कि उश बेबस महिला की जान का दुश्मन कोई गुंड़ा बदमाश नहीं बल्कि उसका खुद का अपना देवर था...जो सजा अपनी भाभी को इस बात की दे रहा था...जिसके लिए वो महिला खुद जिम्मेदार नहीं थी...जानते हैं उस महिला का गुनाह का क्या था...बस यही कि...की उस महिला ने बेटी को जन्म दिया था।

खैर ये कोई पहला मामला नहीं है...इस तरह के अनगिनत मामले हमारे समाज में आसपास देखने को मिल ही जाते हैं...जो रौंगटे खड़े कर दे...लेकिन आवाज कम ही निकल पाती है..क्योंकि कहीं ना कहीं, या यूं कहें कि ज्यादातर लोग ऐसी ही मानसिकता से पीड़ित हैं।

दिल दहला देने वाली एक और खबर जो मानवियता को शर्मसार कर दे, वो भी पंजाब से ही थी... दरअसल इस घटना में उस गर्भवती महिला को उसके पति और देवर ने इसलिए जान से मार दिया कि कहीं वो बेटी को फिर से ना जन्म दे दे...क्योंकि उसकी पहले से ही एक बेटी थी...। दूसरी बार जब वो महिला गर्भवती हुई तो लिंगपरीक्षण करवा कर उसे गर्भपात करवाने को कहा गया था।ये घटना इतनी दर्दनाक थी कि कलेजा मूंह को आ जाए...।पति और देवर ने महिला को बांधकर उसके पेट पर जोर से प्रहार किया,जिस वजह से सात महिने का भ्रूण बाहर आ गया और महिला की मौत हो गई।

अफसोस कि बेटे की चाह में इंसान इस क़दर अंधा हो जाता है कि ईश्वर के दिए हुए बेटी रुपी  अनमोल उपहार को भी तिरस्कार कर दे रहा हैं।वंश चलाने की ये कमीनी जल्दबाजी और बेटों की ख्वाहिश बेटियों की ज़िंदगी पर आज के जमाने में भी भारी पड़ती जा रही है।
टीवी पर हमें ये देखना तो बहुत अच्छा लगता है कि बेटों के मुकाबले बेटियों विश्व में अपने देश का परचम फैला रही हैं..चाहे वो सानिया मिर्ज़ा, सायना नेहवाल, गीता, बबीता फोगट हो या फिर महिला क्रिकेट को पहचान दिलाने वाली मिताली राज हों...बेटियों कामयाबी के नए मुकाम हासिल कर रही हैं...राजनीति,खेल, उद्योग से लेकर इंटरटेनमेंट की दुनिया में भी भारत की बेटियां देश का नाम लगातार रौशन कर रही हैं।

लेकिन अफसोस की बेटों की चाह में कन्या भ्रूण हत्याएं लगातार जारी हैं...यकिनन जब तक ये दूषित मानसिकता खत्म नहीं होगी कि बेटों से ही वंश चल सकता है...तब तक सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद देश में बेटियां ऐसे ही संसार देखने से पहले ही मरती रहेंगी।


याद रखना चाहिए कि बेटियां हमें गौरवान्वित कराती है,घर संवारती हैं, बेटियां तो खुशियां हैं,वो हैं तो ज़िंदगियां हैं...इन्हें संसार में आने से ना रोकें..आने दें..बस...खुशियों के संग आने दें...। यकिन मानिए जींदगी संवर जाएगी...। 

Friday, 4 August 2017

जाने रक्षा-बन्धन क्यों है खास,क्यों है इसकी ज़रूरत, भारत में इसका महत्व क्या है....?

संदीप कुमार मिश्र : रक्षाबंधन पर्व पर जहाँ बहनों को भाइयों की कलाई में रक्षा का धागा बाँधने का बेसब्री से इंतजार है, वहीं दूर-दराज बसे भाइयों को भी इस बात का इंतजार है कि उनकी बहना उन्हें राखी भेजें।रक्षा बंधन के महत्व को समझने के लिये सबसे पहले इसके अर्थ को समझना होगा। "रक्षाबंधन " रक्षा+बंधन दो शब्दों से मिलकर बना है।अर्थात एक ऎसा बंधन जो रक्षा का वचन लें। इस दिन भाई अपनी बहन को उसकी दायित्वों का वचन अपने ऊपर लेते है।
हमारे वर्तमान समाज में हम सब के सामने जो सामाजिक कुरीतियां सामने आ रही है। उन्हें दूर करने में रक्षा बंधन का पर्व बेहद मददगार साबित हो सकता है। एक तरफ जहां पाश्चात्य संस्कृति हमारे देश,हमारे समाज में घर करती जा रही है।ऐसे में हम अपने संबंधों के प्रति कितने समर्पित हैं,और कितना निभा रहे हैं हम रिश्तों की इस अनमोल डोर को।ये बन्धन सिर्फ भाई बहन के रिश्तों को ही मजबूत नहीं करता बल्कि एक सशक्त समाज का निर्माण करने में भी सहयोग प्रदान करता है।

यकिनन अगर हम वर्तमान परिप्रेक्ष में रक्षा-बंधन की आवश्यकता और महत्व को देखें तो इसके दो रूप हमें देखने को मिलते हैं...
एक तरफ तो आज भी लोगों का एक समूह अपनी इस परंपरा में गहरी आस्था रखता है। उनके लिए ये पर्व भाई -बहन के रिश्तों की अटूट डोर का प्रतीक है।भारतीय परम्पराओं का एक ऐसा पर्व है, जो भाई- बहन के स्नेह के साथ- साथ हर सामाजिक संबंध को मजबूत करता है। इस लिए ये पर्व भाई-बहन को आपस में जोड़ने के साथ-साथ सांस्कृ्तिक, सामाजिक महत्व भी रखता है।
वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं जो हमारे सामने मॉडर्न होने का दावा करते हैं और उनकी नज़र में रक्षा-बंधन का ये पवित्र धागा एक ब्रेसलेट से ज़्यादा महत्व नहीं रखता है।ऐसे लोगों से प्रभावित होकर आज के युवा भी राखी जैसे पवित्र बंधन से थोड़े-बहुत विमुख ज़रूर हुए हैं पर राखी का ये बंधन अटूट होता है।इतनी आसानी से लोग इसे तोड़ नहीं सकते।तभी तो युगों-युगों से इसकी महत्ता और चमक आज भी फिकी नहीं हुई है।आज भी समय के साथ पर्व की शुभता में कोई कमी नहीं आई है, बल्कि इसका महत्व और बढ गया है।

अगर इस दिन बहन -बहन, भाई-भाई को राखी बांधता है तो इस प्रकार की समस्याओं से निपटा जा सकता है।यह पर्व सांप्रदायिकता और वर्ग-जाति की दिवार को गिराने में भी मुख्य भूमिका निभा सकता है।जरुरत है तो केवल एक कोशिश की।
रक्षा-बंधन की कैसे हुई शुरुआत...? 
1.    भविष्य पुराण में इसके बारे में लिखा गया है कि सबसे पहले इन्द्र की पत्नी ने देवराज इन्द्र को देवासुर संग्राम में असुरों पर विजय पाने के लिए मंत्र से सिद्ध करके रक्षा सूत्र बंधा था। इससे सूत्र की शक्ति से देवराज युद्ध में विजयी हुए।
2.    शिशुपाल के वध के समय भगवान श्री कृष्ण की उंगली कट गई थी... तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। इस दिन सावन पूर्णिमा की तिथि थी। भगवान श्री कृष्ण ने द्रौपदी को वचन दिया कि समय आने पर वो आंचल के एक-एक सूत का कर्ज उतारेंगे। द्रौपदी के चिरहरण के समय श्री कृष्ण ने इसी वचन को निभाया।
3.    आधुनिक समय में राजपूत रानी कर्मावती की कहानी काफी प्रचलित है। राजपूत रानी ने अपने राज्य की रक्षा के लिए मुगल शासक हुमायूं को राखी भेजी। हुमायूं ने राजपूत रानी को बहन मानकर राखी की लाज रखी और उनके राज्य को शत्रु से बचाया।

पवित्र रिश्तों की डोर इसी प्रकार से निरंतर हमारे जीवन और समाज को मजबूती प्रदान करे,हमें सदैव यही कामना करनी चाहिए। 

रक्षा बंधन विशेष : जाने शुभ मुहुर्त


संदीप कुमार मिश्र: नाजुक बंधन में बंधी होती है मजबूत रिश्ते की डोर।हमारा देश भारत अपने आंचल में ढेरों सभ्यता संस्कृति समेटे हुए है।यहां हर रिश्ता ईश्वर का दिया हुआ एक अनमोल उपहार है। जिसे बनाए रखना हमारा फर्ज भी है और हम नैतिक जिम्मेदारी भी मानते हैं।इन्हीं रिश्तों में से एक है भाई बहन का रिश्ता। जिसे हमारे देश में रक्षा बंधन के नाम से जनाना जाता है और बड़ी ही पवित्रता के साथ मनाया जा है।
येन बद्धो बलिः राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
इसी मंत्र का उच्चारण करते हुए बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी यानी रक्षा-सूत्र बांधती हैं, और उनके लिए ये प्रार्थना करती हैं कि वो राजा बलि की तरह प्रतापी, ताकतवर और दानवीर बनें।अपने भाइयों से बहनें ये वचन भी लेती हैं कि वो सदा अपने बहनों की रक्षा करेंगे।
रक्षाबंधन का पावन त्योहार पूरे देश में बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है। हिन्दी कैलेंडर के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को ये पर्व मनाते हैं।

पुजा मुहूर्त व राखी बांधने का समय
इस बार राखी बांधने का समय भद्रा होने की वजह से बहुत कम है,इसलिए बहने राखी बांधने के समय का विशेष ध्यान रखें...
विशेष योग में भाई को राखी बांधना है शुभ
सूतक समय
चंद्र ग्रहण का सूतक समय-1.42 से 11.7 बजे तक
राखी बांधने का समय
राखी बांधने का समय-11.7 बजे से 1.30 (दोपहर)मिनट तक

जाने राखी बांधने का दिव्य उपाय
अब आपको बताते है एक ऐसा खास उपाय जिससे प्रेम और स्नेह का बंधन रक्षा बंधन का त्योहार आपके रिश्तों को और मजबूती प्रदान करेगा-
“ 1 कच्चा सूत लें और केसर में गंगाजल मिलाकर उसे रंगे।सूखने पर दायें हाथ से श्री विष्णु भगवान को “ ऊं नमो नारायणाय “ मंत्र का जाप करते हुए बांध दें।पीले बेसन के लड़डू का भोग अर्पण करें।यदि आप अपने भाई से दूर हैं तो ये उपाय अवश्य करें।श्री हरि का परम आशीर्वाद प्राप्त होगा,जिससे भाई-बहन में स्नेह और भी प्रगाढ़ हो जाएगा। “

रेशम के पवित्र डोर में बंधा संसार। वैसे सम्बन्धों को बताने और जताने की ज़रूरत नहीं होती।लेकिन आधुनिकता की ओर बढ़ते समय में कहीं रिश्तों की डोर कमज़ोर ना हो जाए।इसलिए ज़रूरी है कि रक्षा- बन्धन के इस बेमिसाल बन्धन को हम जाने- पहचाने और मानें।

Wednesday, 2 August 2017

व्यक्ति विशेष- योगी आदित्यनाथ जी महाराज


संदीप कुमार मिश्र : एक योगी...एक तपस्वी...एक समाज सेवी...हिन्दू जीवन पद्धति का प्रबल समर्थक... एक योगी...पवित्र पावन पीठ गोरक्षनाथ मंदिर के महंत...देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री...योगी आदित्यनाथ...।

योगी आदित्यनाथ जी का उदय उस सूर्योदय की तरह था जिसकी लालिमा से संपूर्ण प्रदेश ही नहीं भारतवर्ष के साथ ही सनातन धर्म और संस्कृति का विकास और उत्थान निरंतर हो रहा है...दरअसल एक समय था जब जेहाद, धर्मान्तरण, नक्सली व माओवादी हिंसा, भ्रष्टाचार तथा अपराध की अराजकता और धर्म की रक्षा के लिए नाथपंथ के विश्व प्रसिद्ध मठ श्री गोरक्षनाथ मंदिर गोरखपुर के पावन परिसर में शिव गोरक्ष महायोगी गोरखनाथ जी के अनुग्रह स्वरूप माघ शुक्ल 5 संवत् 2050 तदनुसार 15 फरवरी सन् 1994 की शुभ तिथि पर गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ जी महाराज के उत्तराधिकारी के रुप में योगी आदित्यनाथ जी महाराज का दीक्षाभिषेक सम्पन्न हुआ।

महादेव की पावन देव-भूमि उत्तराखण्ड में 5 जून सन् 1972 को जन्म लिए योगी जी सनातन हिन्दू धर्म की विकृतियों को दूर करने के लिए विज्ञान वर्ग से स्नातक करने के बाद 22 वर्ष की अवस्था में सांसारिक जीवन त्यागकर संन्यास ग्रहण किया।

सन्यासियों के प्रचलित मिथक को तोड़कर योगी जी ने शिव की प्रेरणा से जन सामान्य को जोड़ने का कार्य प्रारंभ किया और चल पड़े समाज के हर तबके को न्याय और अधिकार दिलाने के लिए...गांव-गांव...गली-गली...क्योंकि बुनियादी जरुरतों की आवश्यकता हर किसी को है।

एक बृहद रुप में जनजागरण का अभियान चलाकर सहभोज के माध्यम से योगी जी ने छुआछूत और अस्पृश्यता की भेदभावकारी रूढ़ियों पर जमकर प्रहार किया।साथ ही गोरक्षा के लिए आम जन को जागरूक करके गोवंश के संरक्षण एवं सम्वर्धन का कार्य निरंतर कर रहे हैं बहुआयामी प्रतिभा के धनी योगी जी, धर्म के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्र की निरंतर सेवा कर रहे हैं।

नियती ही है कि योगी जी आगे बढ़ते गए और कारवां बनता गया...और पूज्य गुरुदेव के आदेश और गोरखपुर की सम्मानित जनता की मांग पर साल 1998 में गोरखपुर से लोकसभा चुनाव लड़ा और मात्र 26 वर्ष की आयु में भारतीय संसद के सबसे युवा सांसद बने और 1998 से लेकर 2017 तक निरंतर ये क्रम जारी रहा और अब उत्तर प्रदेश को कुशासन और भ्रस्टाचार से निजात दिलाने के लिए यूपी की कमान संभाली और सीएम के तौर पर दमदारी से कार्य कर रहे हैं।

व्यवहार कुशलता, दृढ़ता, कर्मठता और हिन्दुत्व के प्रति अगाध प्रेम मनसा, वाचा कर्मणा सभी रुप में योगी जी  समाज के अंतिम व्यक्ति की सुविधा का ख्याल रखते हैं।
सत्य तो यही है कि योगी जी का जीवन एक खुली किताब हैं,जिसे पढ़ना बहुत आसान है।योगी जी का जीवन और समय पीड़ित, गरीब, असहाय के लिए समर्पित है।क्योंकि योगी जी का कहना है कि है सत्ता सेवा की वस्तु है ना की उपभोग की..।

इस मायावी संसार में आसान नहीं होता वैभवपूर्ण ऐश्वर्य का त्यागकर कंटकाकीर्ण पगडंडियों पर चलना।लेकिन योगी जी के जीवन का उद्देश्य है - ‘न त्वं कामये राज्यं, न स्वर्ग ना पुनर्भवम्। कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामर्तिनाशनम्।। अर्थात् ‘‘हे प्रभो! मैं लोक जीवन में राजपाट पाने की कामना नहीं करता हूँ। मैं लोकोत्तर जीवन में स्वर्ग और मोक्ष पाने की भी कामना नहीं करता। मैं अपने लिये इन तमाम सुखों के बदले केवल प्राणिमात्र के कष्टों का निवारण ही चाहता हूँ।’’


‘जाति-पाँति पूछे नहिं कोई-हरि को भजै सो हरि का होई’ गोरक्षपीठ का मंत्र रहा है।परम योगी शिवअवतारी गुरु गोरक्षनाथ ने भारत की जातिवादी-रूढ़िवादिता के विरुद्ध जो उद्घोष किया था वह अनवरत जारी है। जिसे गोरक्षपीठाधीश्वर परमपूज्य महन्त अवेद्यनाथ जी महाराज के पद-चिह्नों पर चलते हुए पूज्य योगी आदित्यनाथ जी महाराज आगे बढ़ा रहे हैं।

गोरक्षपीठ, नाथ परंपरा और गोरखपुर मंदिर इतिहास


जब जब पृथ्वी पर अन्याय और अत्याचार बढ़ता है...तब तब ईश्वर मानव जाति और रक्षा के लिए इस धरा पर अवतार लेते हैं...जिससे कि संपूर्ण सृष्टी सुरक्षित रह सके...भगवान शिव सृजन करता भी हैं और संहारक भी..शिव के ही स्वरुप हैं गुरु गोरक्षनाथ...
अहमेवास्मि गोरक्षो,मद्रूपं तन्निबोधत।
योग मार्ग प्रचाराय,मयारुपमिदं धृतम्।।
मैं ही गोरक्ष हूं...और इन सब को मेरा ही स्वरुप जानो...योग मार्ग के प्रचार के लिए ही मैने धारण किया है ये स्वरुप...ऐसा स्वयं आदि देव महादेव भगवान शिव ने नाथ साधुओं के संबंध में कहा है। और नात संप्रदाय का विश्व का सबसे बड़ा पीठ है गोरक्षनाथ पीठ,गोरखनाथ मंदिर जो कि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर में स्थित है...।।


बाबा गोरखनाथ के नाम पर इस जिले का नाम गोरखपुर पड़ा...गुरु शिष्य परंपरा की आधार ये पीठ...जिसकी स्थापना स्वयं शिव स्वरुप गुरु गोरक्षनाथ ने की है।जिसके पीछे की कहानी जानने के लिए आपको चलना होगा देवभूमि हिमाचल प्रदेश जहां विराजती है आदिशक्ति स्वरुपा मां ज्वाला जी।

कहते हैं धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जब बाबा गोरक्षनाथ जी महाराज ज्वाला देवी पहुंचे तो स्वयं मां ज्वाला देवी ने उन्हें आतिथ्य स्विकार करने को कहा...जिसके जवाब  गोरखनाथ जी ने कहा कि कि वह स्वयं की मांगी हुई भिक्षा का ही भोजन करेंगे...ये कहते हुए बाबा ने मां से कहा कि आप अग्नि जलाकर पात्र में जल गरम करें और वो भिक्षा मांगकर अन्न ले आते हैं।एक तरफ तो देवी जी जल अग्नि पर चढ़ाकर गर्म करने लगी तो वहीं दूसरी तरफ गोरक्षनाथ जी भिक्षा मांगते-मांगते गोरखपुर में आकर तपस्या में लीन हो गए...प्रमाणस्वरुप आप स्वयं जाकर ज्वाला जी में गोरख डिब्बी देख सकते हैं जहां आज भी जल उबल रहा है।इस प्रकार से गोरक्षपीठ की स्थापना स्वयं आदियोगी शिव के अंश गुरु गोरक्षनाथ जी महाराज ने की जो कि नाथ संप्रदाय का सबसे बड़ा पीठ है...गोरखनाथ मंदिर से ही विश्व भर में नाथ संप्रदाय के पीठों का संचालन किया जाता है...।

क्या है मंदिर का इतिहास         
कहते हैं नाथ परंपरा गुरु मच्छेंद्र नाथ द्वारा स्थापित की गई...ये वही स्थान है जहां पर वर्तमान में गोरखनाथ मंदिर स्थित है।इसी स्थान पर गुरु जी तपस्या किया करते थे और उनको श्रद्धांजलि समर्पित करते हुए ही गोरखनाथ मंदिर की स्थापना की गई। मंदिर का नाम गुरु गोरखनाथ के नाम पर रखा गया...जिन्होंने अपनी तपस्या का ज्ञान मत्स्येंद्रनाथ से लिया था, जो नाथ सम्प्रदाय (मठ का समूह) के संस्थापक थे...अपने शिष्य गोरखनाथ के साथ मिलकर, गुरु मच्छेंद्र नाथ ने योग स्कूलों की स्थापना की...जो योग अभ्यास के लिये बहुत अच्छे स्कूल माने जाते थे...।
गोरखनाथ मंदिर के संबंध में कहा जाता है कि मुगल शासकों ने मंदिर को कई बार नष्ट करने की कई बार कोशिश की थी। खिलजी ने 14वीं सदी में गोरखनाथ मंदिर को नष्ट कर दिया था।

क्या है नाथ संप्रदाय
हमारे हिन्दू धर्म, दर्शन, अध्यात्म और साधना में 'नाथ संप्रदाय' का प्रमुख स्थान बताया गया है... संपूर्ण देश में फैले नाथ संप्रदाय के विभिन्न मंदिरों तथा मठों की देखरेख गोरखनाथ मंदिर से ही होती है...नाथ संप्रदाय के अनुसार शिव के साक्षात स्वरूप 'श्री गोरक्षनाथ जी' सतयुग में पेशावर (पंजाब) में, त्रेतायुग में गोरखपुर, उत्तरप्रदेश, द्वापर युग में हरमुज, द्वारिका के पास तथा कलियुग में गोरखमधी, सौराष्ट्र में आविर्भूत हुए थे...

वर्तमान समय में गोरक्षनाथ मंदिर की भव्यता और पवित्र रमणीयता अत्यंत कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है...मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है...मंदिर के भव्य व गौरवपूर्ण निर्माण का श्रेय महिमाशाली व भारतीय संस्कृति के कर्णधार योगिराज महंत दिग्विजयनाथ जी व उनके सुयोग्य शिष्य गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ जी महाराज थे, जिनके श्रद्धास्पद प्रयास से भारतीय वास्तुकला के क्षेत्र में मौलिक इस मंदिर का निर्माण हुआ...।

गोरखनाथ मंदिर की स्थापना के बाद से ही यहां पीठाधीश्वर या महंत की परंपरा रही है...गुरु गोरखनाथ जी के प्रतिनिधि के रूप में सम्मानित संत को महंत की उपाधि से विभूषित किया जाता रहा है...गोरखनाथ मंदिर के प्रथम महंत श्री वरद्नाथ जी महाराज कहे जाते हैं, जो गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य थे...जिसके बाद क्रमश: परमेश्वर नाथ एवं गोरखनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करने वालों में प्रमुख बुद्ध नाथ जी (1708-1723 ई), बाबा रामचंद्र नाथ जी, महंत पियार नाथ जी, बाबा बालक नाथ जी, योगी मनसा नाथ जी, संतोष नाथ जी महाराज, मेहर नाथ जी महाराज, दिलावर नाथ जी, बाबा सुन्दर नाथ जी, सिद्ध पुरुष योगिराज गंभीर नाथ जी, बाबा ब्रह्म नाथ जी महाराज, ब्रह्मलीन महंत श्री दिग्विजय नाथ जी महाराज, महंत श्री अवैद्यनाथ जी महाराज और वर्तमान में मगुरु शिष्य परंपरा का निर्वहन करते हुए अब महंत आदित्यनाथ जी महाराज गोरक्ष पीठाधीश्वर के पद पर अधिष्ठित हैं...। 

वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...