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Friday, 23 March 2018

23 मार्च शहीद दिवस : आजादी से मोहब्बत करके जिन्होंने मौत को अपनी दुल्हन बना लिया


संदीप कुमार मिश्र: जब भी हमारे ज़हन में देश की आजादी का ख्याल आता है तो पहला नाम जो आज के युवाओं को याद आता है वो है शहीदे आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का।जो देश की आजादी की खातिर हंसते हंसते फांसी के फंदे पर हम सब से विदा ले गए।सच है दोस्तों आजादी के इन हरफनमौला दिवानो का जब भी जिक्र होता है तो सवा सै करोड़ भारतीय का सीना फक्र से चौड़ा और ,माथे पर चमक जोश और उत्साह बरबस ही  देखने को मिल जाता है। आज शहीदी दिवस है।हम सब जानते हैं कि 1931 में आज ही के दिन शहीदे आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गई थी।

भगत सिंह प्रायः यह शेर गुनगुनाते रहते थे-
जबसे सुना है मरने का नाम जिन्दगी है
सर से कफन लपेटे कातिल को ढूँढ़ते हैं...
दरअसल दोस्तों उम्र के जिस पड़ाव पर लोग अपने सुनहरे भविष्य के सपने संजोते हैं वहां मां भारती के इन वीर सपूतों ने गुलामी की जंजीरों में जकड़ी भारत माता की आजादी से मोहब्बत करके मौत को अपनी दुल्हन बना लिया।तभी तो स्वतंत्रता से इश्क करने वाले शहीद भगत सिंह का नाम कभी अकेले नहीं लिया जाता, उनके साथ राजगुरु और सुखदेव का भी जिक्र हमेशा होता है।
मित्रों जब अंग्रेजों के अन्याय और अत्याचारों से देश में हर तरफ हाहाकार मचा हुआ था तो अनेकों वीर सपूतों ने अंग्रेजों की दासता से भारत माता को मुक्ति दिलाने की खातिर अ हंसते-हंसते अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

लिख रहा हूं मैं अंजाम,जिसका कल आगाज आएगा।मेरे लहू का हर इक कतरा इंकलाब लाएगा ।।
मैं रहूं ना रहूं पर ये वादा है मेरा तुमसे।मेरे बाद वतन पर मरने वालों का सैलाब आएगा।।

कहते हैं कि शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने अपने प्रगतिशील और क्रांतिकारी विचारों से भारत के नौजवानों में स्वतंत्रता के प्रति ऐसी अलख जगा दी कि अंग्रेज सरकार को डर लगने लगा कि कहीं उन्हें भारत छोड़ कर भागना न पड़ जाए। आज़ादी के तीनों मतवालों ने ब्रिटिश सरकार की रातों की नींद हराम कर दी थी। दरअसल अपने निर्धारित योजना के अनुसार भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त ने ८ अप्रैल, १९२९ को केन्द्रीय असेम्बली में एक खाली स्थान पर बम फेंक दिया।बम फेंकने के बाद वे चाहते तो भाग सकते थे लेकिन भगत सिंह की सोच थी की गिरफ्तार होकर वे अपना सन्देश बेहतर ढंग से दुनिया के सामने रख पाएंगे ।जिसका परिणाम हुआ कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और 24 मार्च 1931 को तीनों को एक साथ फांसी देने की सजा सुना दी गई।फांसी की चर्चा आग की तरह चारो तरफ फैल गई,जिसे सुनकर लोग इतने भड़क चुके थे कि भारी भीड़ के रूप में उस जेल को घेर लिया लोने ने जहां फांसी दी जानी थी ।
इस बात से अंग्रेज इतने डर गए कि कहीं विद्रोह न हो जाए इसलिए एक दिन पहले यानी 23 मार्च 1931 की रात को ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दे दी। इतना ही नहीं चोरी छिपे उनके शवों को जंगल में ले जाकर जला दिया।

दोस्तों भगत सिंह और सुखदेव कालेज के युवा स्टूडैंट्स के रूप में भारत को आजाद कराने का सपना संजोये बैठे थे तो वहीं दूसरी ओर राजगुरु विद्याध्ययन के साथ कसरत के काफी शौकीन थे और उनके बारे में कहा जाता है कि उनका निशाना अचूक था।
ये सभी आजादी के दिवाने चंद्रशेखर आजाद के विचारों से इस कदर प्रभावित थे कि उन्होंने क्रांतिकारी दल में शामिल होकर बहुत कम समय में ही अपना विशेष स्थान बना लिया था। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को आज आजादी के जोशीले दीवानों के रूप में तो हम सब जानते हैं लेकिन बहुत कम लोग इस बात से अवगत हैं कि जेल में लम्बे समय तक रहते हुए उन्होंने कई विषयों पर अध्ययन किया और अनेकों लेख लिखे।जिसे उनकी मृत्यु के बाद अनेकों लेख प्रकाशित किए गया।

मेरे जज्बातों से इस कदर वाकिफ है मेरी कलम।मैं इश्क भी लिखना चाहूं तो इंकलाब लिखा जाता है                                                                   (भगत सिंह) 

अंग्रेजों ने भगतसिंह को तो खत्म कर दिया पर वह भगत सिंह के विचारों को खत्म नहीं कर पाए। जिसने देश की आजादी की नींव रख दी।आज भी देश में भगतसिंह क्रांति की पहचान हैं।अपनी छोटी सी आयु में ही देश पर जान कुर्बान करने वाले इन क्रांतिकारी शहीदों को शत्-शत् नमन,प्रणाम।इंकलाब-जिंदाबाद।जय हिन्द।

Thursday, 22 March 2018

संसद में सिर्फ हंगामा..क्यूं ना बंद हो माननीयों की सेलरी और खत्म हो सदस्यता !



संदीप कुमार मिश्र : हमारे देश के माननीय नेतागण...चाहे संसद में हों या फिर सड़क पर सिवाया हंगामा के इन्हें कुछ नहीं सूझता।देश की आजादी से लेकर अब तक हमारे देश में यदि कुछ नहीं बदला है तो वो हंगामा करने की प्रवृति।क्योंकि हंगामे के सोर में काम करने की जिम्मेदारी थोड़ी कम हो जाती है और आरोप लगाने में आसानी होती है।

दरअसल हमारे देश में अब आलम ये हो गया है कि एक मेहनतकश मजदूर या नौकरी पेशा करने वालों पर ना जाने कितने नियम कायदे और कानून हैं लेकिन सांसदों और विधायको के लिए कोई कानून और नियम नहीं है। काम करो न करो सैलरी मिलती रहेगी, सारी सुविधा मिलेगी, डिनर लंच, घूमना फिरना सब कुछ। खूब हंगामा करो, खूब शोर मचाओ, काम मत होने दो, फिर भी सारी सुविधा लेते रहो।ये संसद की संस्कृति जैसे बन गयी हो। इस प्रकार की माननियों की हरकतों से कई बार जनता त्रस्त होती भी नजर आती है,लेकिन कर कुछ नहीं पाती है।इसी का परिणाम है कि तमाम ऐसे महत्वपूर्ण फैसले शोर शराबे में या तो गुम हो जाते हैं या फिर उनपर बहस ही नहीं हो पाती है।

चुनाव दर चुनाव लगातार यही सब देखने को विवश है आवाम।हाल की घटनाओं की बात करें तो लगता है कि शायद कुछ बदलता हुआ नजर आए।क्योंकि जिस प्रकार से राज्यसभा में सांसदों ने हंगामा मचाया, काम को बाधित किया,उसपर उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने सांसदों का डिनर कैंसिल कर दिया, जब काम नहीं, तो डिनर कैसा, जनता का टैक्स का पैसा क्यों बर्बाद करना, नायडू ने सांसदों का डिनर कैंसिल करने के साथ सेलरी कट करने पर भी विचार की बात कही।ये अलग बात है कि सेलरी कटने से इन माननियों को कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है लेकिन सांकेतिक तौर पर जनता में एक बेहतर संदेस जाएगा की जब ऐसे ही सांसद सदन में हंगामा करते हैं तो इन्हें क्यों जिताया जाए।इनका बहिष्कार किया जाना चाहिऐ।इससे कहीं ना कहीं सांसद महोदय भी गंभीर नजर आएंगे क्योंकि उनपर भी दंडात्मक कार्यवाही के तौर पर सेलरी कटने से बात इज्जत पर आएगी और जनप्रतिनिधी होने के कारण व्यवहार में परिवर्तन आए।

सवाल ये है कि सांसदों को जनता  संसद में काम करने के लिए भेजती है,ना कि  काम को बाधित करने के लिए।ऐसे में कितना वाजिब है इस तरह का बखेड़ा लोकतंत्र के मंदिर में खड़ा करना।एक तो ऐसे ही संसद में काम नहीं होता और काम हो रहा है तो होने मत दो।संसद की कार्यवाही को हंगामे की भेंट चढ़ा दो।

अंतत: सभी माननीयों को इस बात का इल्म जरुर होना चाहिए कि शोर हंगामा चाहे जितना भी कर लो। ये पब्लिक है सब जानती है।2019 करीब है,जनता एक एक दिन का हिसाब मांगेगी। संभल जाओ और जनता के पैसे,वक्त को यूं ही जाया मत करो।नहीं तो तोताराम बनकर जब आपका सामना जनता जनार्दन से होगा तब उड़ने के सिवाय कोई चारा नहीं बचेगा।


Monday, 19 March 2018

जाने क्या है हिन्दू सनातन धर्म में ‘ संवत्सर ’ का महत्व,कैसे हुई शुरुआत



संदीप कुमार  मिश्र:(संकलन) हिन्दू सनातन धर्म विश्व का सबसे अनूठा और प्राचीन धर्म है ।  अक्सर एक यक्ष  प्रश्न आपके ज़हन में उठता होगा कि आखिर संवत्सर है क्या, और हमारे देश में इसे मनाने के पीछे क्या कारण है और इसकी आवश्यकता क्यो पड़ी।साथ ही संवत्सर मनाने की परंपरा, और उसका विधि विधान क्या है ?
इस संबंध में जैसा कि ब्रह्म पुराण में वर्णित है कि जगत पिता ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के दिन ही की थी। ब्रह्माजी ने जब सृष्टि की रचना का कार्य आरंभ किया तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रवरा' तिथि घोषित किया। इसमें धार्मिक, सामाजिक, व्यवसायिक और राजनीतिक अधिक महत्व के जो भी कार्य आरंभ किए जाते हैं, सभी सिद्धफलीभूत होते हैं।  
चैत्र मासि जगत ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेऽहनि,
शुक्ल पक्षे समग्रेतु तदा सूर्योदय सति।।
वहीं कालांतर में भगवान विष्णु के मत्स्यावतार का आविर्भाव और सतयुग की शुरुआत प्रारंभ भी इसी समय हुआ था।तभी से इश प्रवरा तिथि के महत्व को स्वीकार कर, भारत के सम्राट विक्रमादित्य ने भी अपने संवत्सर का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही किया।जिसे आगे चलकर महर्षि दयानंद जी ने भी आर्य समाज की स्थापना इसी दिन की ।
इस दिन मुख्यतया ब्रह्माजी का व उनकी निर्माण की हुई सृष्टि के प्रधान देवी-देवताओं, यक्ष-राक्षसों, गंधर्वों, ऋषि, मुनियों, मनुष्यों, नदियों, पर्वतों, पशुपक्षियों और कीटाणुओं का ही नहीं, रोगों और उनके उपचारों तक का पूजन किया जाता है। साथ ही संवत्सर पूजन, नवरात्र घट स्थापना, ध्वजारोहण, तैलाभ्याड्ं स्नान, वर्षेशादि पंचाग फल श्रवण, परिभद्रफल प्राशनन और प्रपास्थापन प्रमुख रुप से की जाती हैं।कहते हैं कि  इसका विधिपूर्वक पूजन करने से वर्ष पर्यन्त सुख-शान्ति, समृद्धि आरोग्यता बनी रहती है।
हिन्दू धर्म के सभी शुभ कार्यों में शामिल संवत्सर
हमारे देश भारतवर्ष का गौरवमयी इतिहास और हमारी सनातनी सभ्यता और संस्कृति में संवत्सर का विशेष महत्व सदियों से रहा है।हमारे यहां शुभ संस्कार, विवाह, मुंडन, नामकरण कथा-किर्तन संकल्प जैसे शुभ कार्यों में जप-तप, मंत्र जाप, यज्ञादि अनुष्ठानों के समय संवत,संवत्सर का प्रयोग प्रमुखता से किया जाता है।हमारे पवित्र और प्राचीन ऋग्वेद में लिखा गया है कि दीर्घतमा ऋषि ने युग-युगों तक तपस्या करके ग्रहों, उपग्रहों, तारों, नक्षत्रों आदि की स्थितियों का आकाश मंडल में ज्ञान प्राप्त किया। आपको ये भी बता दें कि वेदांग ज्योतिष काल गणना के लिए विश्व भर में भारत की सबसे प्राचीन और सटीक पद्धति है।
पौराणिक काल गणना वैवश्वत मनु के कल्प आधार पर सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग- इन चार भागों में विभाजित है। इसके पश्चात ऐतिहासिक दृष्टि से काल गणना का विभाजन इस प्रकार से हुआ। युधिष्ठिर संवत्, कलिसंवत्, कृष्ण संवत्, विक्रम संवत, शक संवत, महावीर संवत, बौद्ध संवत। तदुपरान्त हर्ष संवत, बंगला, हिजरी, फसली और ईसा सन भारत में चलते रहे। इसलिए वेद, उपनिषद, आयुर्वेद, ज्योतिष और ब्रह्मांड संहिताओं में मास, ऋतु, वर्ष, युग, ग्रह, ग्रहण, ग्रहकक्षा, नक्षत्र, विषुव और दिन रात का मान व उनकी ह्रास, वृद्धि संबंधी विवरण पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं।
जानिए कैसे शुरू हुआ विक्रम संवत
ईसवी सन से ५७ वर्ष पहले उज्जैन के राजा चन्द्रगुप्त द्वितीय ने आक्रांताशकों को पराजित कर विक्रमादित्य की उपाधि धारण की थी। यह चैत्र शुक्ला प्रतिपदा को घटित हुआ। विक्रमादित्य ने इसी दिन से विक्रम संवत की शुरुआत की। काल को देवता माना जाता है। संवत्सर की प्रतिमा स्थापित करके उसका विधिवत पूजन व प्रार्थना की जाती है।
एक दूसरे के पूरक हैं विक्रमी और शक संवत्सर
विक्रम और शक संवत्सर दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यद्यपि हमारे राष्ट्रीय पंचांग का आधार शक संवत है, तथापि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शक हमारे देश में हमलावर के रूप में आए थे। कालान्तर में भारत में बसने के उपरांत शक भारतीय संस्कृति में ऐसे रच बस गए कि उनकी मूल पहचान लुप्त हो गई। जो भी हो, पर शक संवत् के अनुसार हम न तो कोई राष्ट्रीय पर्व व जयंतियां मनाते हैं और ना ही लोक परंपरा के पर्व।
कहने का तात्पर्य यह है कि शक संवत् का हमारे दैनिक जीवन में कोई विशेष महत्व नहीं रह गया है। विक्रम संवत् के आधार पर तैयार किया गया पंचांग पूर्ण प्रचलन में है। भारत के सभी प्रमुख त्योहार व तिथियां इसी पंचाग के अनुसार मनाई जाती हैं। ज्ञात हो कि विक्रमी पंचांग ग्रेगेरिन कैलेंडर से ५७ वर्ष पहले वर्चस्व में आ गया था, जबकि शक संवत् की शुरुआत ईस्वी सन् के ७८ वर्ष बाद हुई।
विश्व में लगभग २५ संवतों का प्रचलन है जिसमें १५ तो २५०० वर्षों से प्रचलित हैं। दो-चार को छोड़कर प्रायः सभी संवत् वसंत ऋतु में आरंभ होते हैं। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को विक्रम संवत् का आरंभ भी भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप है क्योंकि इसका संबंध हमारे ऋतुचक्र से जुड़ा है। वृक्ष पुराने पत्ते झाड़कर नए धारण कर रहे हैं, प्रकृति भी पुष्पित वसंत में झूम झूम कर सुगंधित वायु से इसका स्वागत करने को आतुर है।

ऐसे करें नव संवत्सर की शुरुआत
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नूतन संवत्सर प्रारंभ होता है। इस दिन प्रत्येक घर पर मंगल स्नान कर देवता, ब्राह्मण, गुरु की पूजा कर, स्त्रियां-शिशु वस्त्र आभूषण आदि धारण कर उत्सव मनाएं। ज्योतिषी का सत्कार कर उनसे नूतन संवत्सर का फल सुनें। प्रातःकाल में नीम के कोमल पत्ते और पुष्प लाएं। उनमें काली मिर्च, हींग, सेंधा नमक, अजवाइन, जीरा और खांड मिलाकर चूर्ण बनाएं, कुछ इमली भी मिलाएं और इसे खाएं। इस प्रयोग से साल भर रक्त विकार नहीं होता और अनेक रोगों की शांति होती है।
पंचागस्य गणेश, ब्राह्मण और ज्योतिषी की पूजा कर याचकों को यथाशक्ति दान आदि से प्रसन्न करें। मिष्ठान आदि भोजन कराएं। गीत, गायन, वाद्य, कथा श्रवण आदि कर यह संपूर्ण दिन आनंद से व्यतीत करें। गृहस्थियों को विलासयुक्त आनंदपूर्वक वर्षारंभ दिन व्यतीत करने से संपूर्ण वर्ष आनंदमय जाता है। (संकलन)



Saturday, 17 March 2018

चैत्र नवरात्रि 2018: मां दुर्गा की राशि के अनुसार करें देवी की उपासना पूजा,बरसेगी कृपा



संदीप कुमार मिश्र : जगत जननी मां जगदम्बा की आराधना का पावन पर्व है नवरात्र । 18 मार्च से शुरु हो रहे चैत्र नवरात्रि में मां के नौ स्वरूपों की उपासना अपनी राशि के अनुसार कैसे करें जिससे मां की कृपा आप पर सदैव बनी रहे।आईए जानते हैं-

मेष राशि- चैत्र नवरात्रि में मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है । माता शैलपुत्री की उपासना करने से मेष राशि वालों के मान सम्मान और धन दौलत में वृद्धि होगी।

वृष राशि- चैत्र नवरात्रि का दूसरा स्वरुप मां ब्रह्राचारिणी का है। वृष राशि वालों को मां ब्रह्राचारिणी की उपासना करनी चाहिए जिससे जीवन में चली आ रही समस्त परेशानियां खत्म हो जाएंगी।

मिथुन राशि- मां चंद्रघण्टा की उपासना मिथुन राशि के जातको को करना शुभ फल देगा।मिथुन राशि वाले प्रात: दुर्गा चालीसा का पाठ करें।इससे शत्रु परास्त होंगे और बुरी नजर नहीं लगेगी।

कर्क राशि- सिद्धिदात्री माता की पूजा कर्क राशि वालों के लिए करना श्रेष्ठ बताया गया है। कर्क राशि वालों को मां भगवती और लक्ष्मी सहस्त्रनाम का पाठ करना शुभ फलदायी है।धन प्राप्ती का मार्ग सुगम होगा।

सिंह राशि- बगलामुखी की पूजा सिंह राशि के जातकों को करनी चाहिए। दुर्गा पाठ करना इस राशि के जातकों के लिए शुभ रहेगा। इस राशि के जातको कों कहीं से शुभ समाचार मिलने के संकेत है।

कन्या राशि- ब्रम्ह्राचारिणी मां की पूजा कन्या राशि वालों को करनी चाहिए। मां ब्रम्हचारिणी की पूजा करने से कानूनी विवाद में फैसला आपके पक्ष में रहेगा और नौकरी बदलना भी आपके लिए शुभ होगा।
तुला राशि- मां महागौरी की पूजा-अर्चना तुला राशि वालों के लिए शुभ होगा। माता महागौरी की आराधना से मान-प्रतिष्ठा बढ़ेगी और यश प्राप्त होगा।

वृश्चिक राशि- स्कंदमाता की पूजा वृश्चिक राशि वालों को करनी चहिए।सभी मनोकामनाएं पूर्ण होगी ।
धनु राशि-  धनु राशि के जातकों की सभी परेशानीयों को दूर करेंगी देवी चंद्रघंटा माता चंद्रघंटा धनु राशि के जातकों पर निरंतर अपनी कृपा बरसाएंगी।

मकर राशि - मकर राशि के जातकों के लिए मां कालरात्रि की पूजा करना लाभदायक रहेगा। सुख-समृद्धि की प्राप्ति होगी और घर में आ रही परेशानियां दूर होंगी ।

कुंभ राशि- चैत्र नवरात्रि पर माता कालरात्रि की पूजा करने से कुंभ राशि के जातको पर लगातार धन की वर्षा होती रहेगी।समस्त कार्य निरंतर पूरे होते रहेंगे और कार्य में सफलता मिलती रहेगी।

मीन राशि- चैत्र नवरात्रि पर मां चंद्रघंटा की पूजा करना मीन राशि के जातकों के लिए बेहतर होगा। नौकरी और व्यवसाय के लिए मीन राशि वालों के लिए चैत्र नवरात्र काफी फायदेमंद होगा।



चैत्र नवरात्र 2018:जानिए नौ देवियों की पूजा में क्या चढ़ाएं भोग और चोला


 संदीप कुमार मिश्र : ।।जय माता दी।। माता दुर्गा कि नवरात्र के पावन अवसर नौ स्वरुपों की पूजा अर्चना की जाती है।आईए जानते हैं नौ दिनो तक माँ भगवती की किस प्रकार से पूजा ,चोला और भोग लगाएं जिससे हो सभी मनोकामनाएं पूर्ण-

पहला नवरात्रा
18-3-2018, रविवार, माँ शैलपुत्री
चोला (मैरुन), भोग (सफेद चीजें, या गांय के घी से बनी)
ऐसा करने से  सभी प्रकार के रोगो से हमें मुक्ति मिल जाती है।

दूसरा नवरात्र
19-03-2018 सोमवार,माँ ब्रम्हचारिणी
 चोला (सफ़ेद).भोग (मिश्री, चिनी, पँचामरित भोग (लोंग, ईलाईची, सुपारी, सात पान के पत्ते, मिश्री.),
 दान करने से आयु लम्बी होती है।

तीसरा नवरात्रा
 20-03-2018, मंगलवार,माँ चंद्रघण्टा
चोला (केसरी), भोग (दूध और उससे बनी चीजें)
 दान करने से माँ भगवती खुश होती है और दुःखो का नाश करती है।

चौथा नवरात्रा
21-03-2018, बुधवार,माँ कुष्मांडा
चोला (रानी) ,भोग खीर और मालपुएँ का भोग, ब्राम्हण को दान करने से और खुद भी खाने से ,बुद्धि का विकास होता है।

पाचँवा नवरात्रा
22-03-2018, वीरवार,माँ स्कंदमाता
चोला (पीला),भोग केले का भोग ,पाँच भिखारीयों को  केले दान करने से ,शरीर सवचछ होता है।

छठा नवरात्रा
 23-03-2018, शुक्रवार,माँ कात्यायनी देवी
चोला (नेवी ब्लू), भोग मघु (शहद) का भोग लगाने से,  साधक को सुंदर रूप प्राप्त होता है।

सातवां नवरात्रा
24-03-2018, शनिवार,माँ कालरात्रि
चोला (हरा) , भोग (गुड़ और चना) का भोग लगाने से मनुष्य शोक मुक्त होता है।


आठवां व नौवां नवरात्र
माँ भगवती की अष्टमी और नवमी
25-03-2018,शनिवार, माँ महागौरी,माँ सिद्धीदात्री
चोला (लाल) ,भोग (नारियल और चना पुडी़ )का भोग लगाने से माँ भगवती सबकी मनोकामना पूर्ण करती है और जीवन में सुख शांति मिलती है !!

हम कामना करते हैं कि माँ भगवती,जगत जननी मां जगदम्बा की कृपा आप सभी पर बनी रहे। आपकी जीवन यात्रा को मां शेरावाली सार्थक करे, आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें,और आपके जीवन में सब मंगल ही मंगल हो।
!! जय माता दी !!

वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...