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Thursday, 7 January 2016

गजेंद्र भाई और कितनी महाभारत : छोड़ क्यों नहीं देते FTII का अध्यक्ष पद..?



संदीप कुमार मिश्र: सत्ता के लिए सियासत हमारे देश में कोई नई बात नहीं है।चाहे वो राजनीतिक हलके की हो या फिर किसी और विभाग की।अपनी गोटी हर कोई फिट करना चाहता है।अब साब मोह का क्या करें।इनाम तो हर किसी को चाहिए होता है,और मिल जाए तो भला छोड़ें क्यों..।

दरअसल आप समझ ही गए होंगे कि कुर्सी का ये किस्सा कहां का है।जी हां FTII यानी भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान जिसके अध्यक्ष बनाए गए अभिनेता गजेंद्र चौहान।जिसके बाद से ही छात्रों और गजेंद्र की नियुक्ती को लेकर हंगामा होता रहा है।लेकिन अब जब गजेंद्र FTII का कार्यभार संभालने संस्थान पहुंचे तो फिर से छात्रों ने ज़बरदस्त विरोध हंगामा शुरु कर दिया। प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने संस्थान के मुख्य गेट पर ' चौहान गो बैक' और ' तानाशाही नहीं चलेगी' के नारे लगाए।

वहीं स्थानीय पुलिस ने प्रदर्शन कर रहे 40 छात्रों को हिरासत में भी ले लिया। एफ़टीआईआई का अध्यक्ष बनने के बाद गजेंद्र चौहान पहली बार संस्थान पहुंचे थे। जिसपर एफ़टीआईआई स्टाफ़ ने उनका परंपरागत तरीके से स्वागत किया।आपको बता दें कि छात्रों ने गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के विरोध में पिछले साल जून में ही हड़ताल शुरू की थी, जो 139 दिन तक चली थी।इस पूरे आरोप प्रत्यारोप में छात्रों का कहना था कि चौहान और अन्य नियुक्त किए गए लोग सक्षम नहीं हैं। छात्रों का ये भी कहना था कि ये नियुक्तियां राजनीतिक उद्देश्यों से की गई हैं।

अपनी विवादित नियुक्ति के करीब सात महीने बाद अभिनेता गजेंद्र चौहान भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के अध्यक्ष के तौर पर पदभार संभाले।लेकिन विवाद है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है।

बड़ा सवाल ये भी है कि छात्रों को गजेंद्र के नाम पर आपत्ति क्यों है..? उनका मूल उद्धेश्य तो शिक्षा अध्ययन से है ना कि प्रशासनिक कार्य से।और गजेंद्र चौहान FTII के अध्यक्ष हैं ना कि शिक्षक।जिस प्रकार से लगातार कला के इस मंदिर में विवाद चल रहा है उसे देखकर ये लगना स्वाभाविक है कि छात्रों की भी दिलचस्पी अभिनेता,निर्देशक बनने के साथ-साथ सियासत में भी है।अन्यथा ये मुद्दा इतना बड़ा नहीं था कि इसे इस प्रकार खिंचा जाए।

वहीं दूसरी तरफ ये भी लगता है कि FTIIविवाद अब पूरी तरह अहम की लड़ाई हो गई है।नहीं तो कोई जरुरू नहीं है कि गजेंद्र चौहान ही अध्यक्ष बनें।जिस पद पर इतना विवाद हो,गजेंद्र चौहान जी को खुद ही ये पद छोड़ देना चाहिए,क्योंकि पद हासील कर लेने के बाद भी वो क्या हासील कर लेंगे ये समझ से परे हैं।चौहान साब को तो मान सम्मान के साथ कुछ और भी तलाश करना चाहिए।एक समय के साथ उनके नाम के आगे भी FTIIके पूर्व अध्यक्ष लिख दिया जाएगा,लेकिन विवादों के साथ।इससे क्या हासील उन्हें होगा ये तो वही जाने सात ही उनका समर्थन करने वाले लोग।
लेकिन अच्छा यही होता कि विवादों की नया महाभारत बनाने की बजाय FTII की गिरती साख को बेहतर बनाया जाता,उसकी गुणवत्ता में सुधार किया जाता,उसे आधुनिक और बेहतरीन संस्थान बनाया जाता।

अंतत: कहना गलत नहीं होगा कि समय रहते FTII विवाद पर विराम नहीं लगाया गया तो कलाकार पैदा करने की जगह राजनीति की नयी संस्था के रुप में जो नाम लिया जाएगा वो कोई और नहीं FTII ही होगा।  




मुफ्ती मोहम्मद सईद : सादगी पसंद राजनेता


संदीप कुमार मिश्र: कश्मीर की सरजमीं का एक सादगी पसंद भारतीय राजनेता मुफ्ती मोहम्मद सईद।जिसके दिल में हिन्दूस्तान बसता था।तभी तो देश के एकमात्र मुस्लिम गृह मंत्री बने मुफ्ती मोहम्मद सईद।एक मंझे हुए वकील और एक सौम्य और मंझे हुए राजनीतिक खिलाडी की तरह राष्ट्रीय राजनीति और जम्मू-कश्मीर की राजनीति में अपने सईद ने एक अलग मुकाम बनाया।लेकिन चंद दिनो बाद(12 जनवरी) जीवन के 80 दशक में प्रवेश करने से पहले ही शांत हो गए खामोश हो गए। मुफ्ती मोहम्मद सईद  ने दिल्ली के एम्स में अंतिम सांस ली तो देश की सियासत पल भर के लिए खामोश हो गयी।सभी सियासी पार्टियां शोक की इस घड़ी में जनाब सईद साब के परिवार के साथ थीं।होना भी यही चाहिए और लोकतंत्र की खूबसूरती भी यही है।

दरअसल दोस्तों लगभग छह दशक तक के अपने राजनीतिक करियर में सईद ताकतवर अब्दुल्ला परिवार के खिलाफ मुख्य प्रतिद्वंदी बनकर घाटी ही नहीं देश की सियासत में भी उभरे। कहते हैं कि राजनीति के खेल में हमेशा अपने पत्ते छिपाकर रखने वाले सईद अपने राजनीतिक एजेंडे के अनुरुप चलने के लिए विरोधाभासी विचारधाराओं वाले दलों के साथ भी दोस्ती में गुरेज नहीं करते थे। मुफ्ती मोहम्मद सईद के सियासी सफर में जो दो अहम पड़ाव थे वो थे सन 1984 और 2015।क्योंकि सन 1989 में सईद स्वतंत्र भारत के पहले मुस्लिम गृहमंत्री बने और और अभी चंद दिनो पहले गुजरे साल 2015 में वो बीजेपी गठबंधन से दूसरी बार जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बने।

दोस्तों मुफ्ती मोहम्मद सईद  ने देश के गृहमंत्री के रुप में उस समय पदभार संभाला था, जब उनके खुद के गृहराज्य में आतंकवाद अपने चरम पर था और आतंकियों ने अपना विभत्स रुप दिखाना शुरु किया था। गृहमंत्रालय में उनके इस कार्यकाल को JKLF द्वारा उनकी तीसरी बेटी रुबइया के अपहरण किए जाने के साथ जोड़कर याद किया जाता है।आपको बता दें कि आतंकियों ने रुबइया की रिहाई के बदले में अपने पांच साथियों को छोडने की मांग की थी और अपनी मांग पूरी होने पर ही रुबइया को छोडा था।कहते हैं सईद की बेटी का अपहरण और आतंकियों की रिहाई ने पहली बार भारत को एक ‘‘कमजोर देश'' के रुप में पेश किया।

शिक्षा का सफर
मुफ्ती मोहम्मद सईद का जन्म अनंतनाग जिले में बिजबेहड़ा के बाबा मोहल्ला में 12 जनवरी 1936 को हुआ था।वहीं के एक स्थानीय स्कूल से  प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद श्रीनगर के एस पी कॉलेज से सईद ने स्नातक किया।बाद में अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से कानून की एक डिग्री और अरब इतिहास में स्नातोकत्तर की डिग्री ली।

सियासत का कारवां
मुफ्ती मोहम्मद सईद ने 1950 के दशक के आखिर में जीएम सादिक की डेमोक्रेटिक नेशनल कांफ्रेंस में शामिल होकर सियासत की दुनिया में कदम रखा। सादिक ने युवा वकील मुफ्ती मोहम्मद सईद की क्षमताओं को पहचानकर उन्हें पार्टी का जिला संयोजक बनाया।जिसके बाद सईद 1962 में बिजबेहड़ा से राज्य विधानसभा में चुने गए। उन्होंने पांच साल बाद भी इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखा। उन्हें सादिक ने उप मंत्री नियुक्त किया। सादिक उस समय मुख्यमंत्री थे। हालांकि मुफ्ती मोहम्मद सईद  कुछ साल बाद ही पार्टी से अलग हो गए और इंडियन नेशनल कांग्रेस ने शामिल हो गए। जो ऐसे समय में एक साहसिक लेकिन जोखिम भरा कदम था।जबकि जेल में बंद शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को अधिकतर कश्मीरियों का भारी समर्थन प्राप्त था।

एक सफल आयोजक और प्रशासक समझे जाने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद  ने यह सुनिश्चित किया कि कांग्रेस घाटी में न केवल अपने पैर जमाए बल्कि उन्होंने पार्टी के लिए भारी समर्थन भी पैदा किया। सईद 1972 में एक कैबिनेट मंत्री और विधान परिषद में कांग्रेस दल के नेता बने। उन्हें दो वर्ष बाद कांग्रेस की राज्य इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। राज्य की सियासत में सईद का कद लगातार बढ़ रहा था जिसकी वजह से वो खुद को राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में भी देखने लगे थे। हालांकि राज्य के इस सर्वोच्च पद को पाने की उनकी सभी उम्मीदें उस समय धराशायी हो गईं, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अब्दुल्ला के साथ एक समझौता कर लिया और 11 साल के अंतराल के बाद मुख्यमंत्री के रूप में उनकी वापसी का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इंदिरा का यह फैसला कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं और विशेष तौर पर सईद की मर्जी के खिलाफ था।


लेकिन आसानी से हार न मानने वाले सईद ने वर्ष 1977 के चुनाव से पहले एक तरह के सत्ता परिवर्तन की स्थित पैदा कर दी। क्योंकि कांग्रेस ने अब्दुल्ला सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। यहां सईद का लक्ष्य चुनावों के दौरान आधिकारिक मशीनरी पर नियंत्रण रखने के लिए मुख्यमंत्री पद पर कांग्रेस के व्यक्ति को आसीन करवाना था, जो कि खुद सईद ही होते। लेकिन तत्कालीन राज्यपाल एल के झा ने राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया।यह पहली बार हुआ था कि जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगा था। हालांकि बाद में सभी पांच अवसरों पर राज्यपाल शासन लागू करवाने में सईद ने एक अहम भूमिका निभाई।

अंतत: इस प्रकार से सियासत में चढ़ते उतरते दौर को मुफ्ती मोहम्मद सईद ने बड़े ही करीब से देखा था।साथ ही देश की सियासत में अपनी एक अलग पहचान बनाई थी।





Wednesday, 6 January 2016

हाइड्रोजन बम से हड़कंप: मानवता पर सबसे बड़ा खतरा...!



संदीप कुमार मिश्र : एक तरफ जहां विश्वभर में आतंकवाद मानवता का सबसे बड़ा दूश्मन बना बैठा है तो वहीं दूसरी तरफ उत्तर कोरिया ने एक शक्तिशाली और खतरनाक हाईड्रोजन बम का सफल परिक्षण किया है,जो मानवता के सबसे बड़ा खतरा है।जिसकी पुष्टी उत्तर कोरिया के सरकारी टीवी चैनल ने की है कि परिक्षण सुबह 10 बजे किया।इस परिक्षण पर कुछ देश संशय भी कर रहे हैं कि इस प्रकार का कोई परिक्षण नहीं हुआ है।लेकिन वहीं इस परिक्षण की दुनियाभर में आलोचना हो रही है।

दरअसल उत्तरी कोरिया के नेता किम जोंग-उन ने पिछले महीने ही संकेत दिए थे कि उनके परमाणु-संपन्न देश ने हाइड्रोजन बम भी विकसित कर लिया है। आपको बता दें कि उत्तर कोरिया इससे पहले एटम बम के भी तीन परीक्षण कर चुका है।

ये जानना आपके लिए भी बेहद जरुरी है कि क्या  एटम बम की तुलना में हाइड्रोजन बम क्यों है ज़्यादा खतरनाक-

दोस्तों हाइड्रोजन बम कहीं ज़्यादा शक्तिशाली आणविक हथियार है एटम बम की तुलना में...एटम बम की तुलना में हाइड्रोजन बम से निकलने वाली ऊर्जा बेहद ज़्यादा होती है...एक भरे पूरे शहर को नेस्तनाबूत कर देने की शक्ति होती है हाइड्रोजन बम में...हाइड्रोजन बम अपनी ऊर्जा अणुओं के विलय यानि एटॉमिक फ्यूज़न से हासिल करता है, जबकि एटम बम अपनी ऊर्जा अणुओं के विखंडन यानि एटॉमिक फिशन से हासिल करता है...।

वहीं आणविक विलयन तथा आणविक विखंडन दो अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं हैं, जिनसे ऊर्जा निकलती है...विखंडन की प्रक्रिया में प्रत्येक अणु दो या उससे ज़्यादा छोटे और हल्के अणुओं में बंट जाता है...इसके ठीक उलट, विलयन के दौरान दो या उससे ज़्यादा छोटे और हल्के अणु मिलकर बड़ा और अधिक भारी अणु बन जाते हैं...हाइड्रोजन बम में हाइड्रोजन के अणुओं का विलयन इस्तेमाल होता है, इसीलिए इसे हाइड्रोजन बम कहा जाता है...।

आपको जानकर हैरानी होगी कि किसी फ्यूज़न बम को बनाना कहीं अधिक जटिल होता है, क्योंकि इसके लिए कहीं ज़्यादा तापमान- करोड़ों डिग्री सेंटीग्रेड- की आवश्यकता पड़ती है...इस तापमान को पाने के लिए पहले आणविक विखंडन की प्रक्रिया करवाई जाती है, ताकि ज़्यादा ऊर्जा उत्पन्न हो, और फिर उस ऊर्जा के जरिये विलयन शुरू करवाया जाता है...किसी भी फ्यूज़न बम के लिए पहले एक विखंडन उपकरण को चलाया जाना अनिवार्य होता है...हाइड्रोजन बम को छोटे आकार में बनाया जाना सरल होता है, ताकि उसे मिसाइल में आसानी से फिट किया जा सके...।

साथियों आपको याद होगा कि जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान एटम बम गिराए गए थे, जिसका परिणाम ये निकला कि आज तक एटम बम का असर वहां देखने को मिलता है,लेकिन कभी भी आज तक किसी भी युद्ध में हाइड्रोजन बम का इस्तेमाल नहीं किया गया है...यह उत्तरी कोरिया द्वारा किया गया कुल मिलाकर चौथा आणविक परीक्षण है, हालांकि यह पहला फ्यूज़न बम है...।

आपको बता दें कि अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र की ओर से परमाणु और मिसाइल परीक्षण पर प्रतिबंध लगाने के बावजूद उत्तर कोरिया ने चौथी बार भूमिगत परमाणु परीक्षण किया है।वहीं उत्तर कोरिया का कहना है कि अमेरिका की उससे शत्रुतापूर्ण नीतियों के कारण और खुद को सुरक्षित रखने के लिए वह अपने परमाणु कार्यक्रम जारी रखेगा। वह एक जिम्मेदार परमाणु राष्ट्र के रूप में काम करेगा और जब तक उसकी संप्रभुता को किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं होगा, तब तक वह इसका इस्तेमाल नहीं करेगा।


अंतत: हाइड्रोजन बम का सफल परिक्षण सबसे पहले अमेरिका, फिर रूस, चीन और फ्रांस भी कर चुके हैं।और इस श्रेणी में अब उत्तर कोरिया भी शामिल हो गया है।इस प्रकार का परिक्षण मानवता और विश्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है।जिसपर रोक लगाना बेहद जरुरी है...।

करणी माता मंदिर : करणी माता हैं बीकानेर की कुल देवी


संदीप कुमार मिश्र :  आस्थाओं और मान्यताओं का देश भारत।जहां के कण कण में देवी देवताओं का वास है।जहां आस्थाऐं हमारे विश्वास को मजबुत करती हैं,तो वहीं मान्यताऐं हमें एक दुसरे से जोड़नें का काम करती है।तो आईए आपको दर्शन करवाते हैं ऐसे ही एक खास मंदिर के। जी हां दोस्तों राजस्थान का खूबसूरत शहर बीकानेर। जो सिर्फ अपने धार्मिक महत्व के कारण ही नहीं बल्कि अपनें प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी जाना जाता है, और यहीं के देशनोक में स्थित है,माता करणी का मंदिर। जिसे चूहे वाले मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।कहते हैं कि माता करणी बीकानेर की कुल देवी भी हैं।

राजस्थान जिसका कण कण हमें अपनी ओर आकर्षित करता है। करणी माता का मंदिर राजस्थान राज्य के ऐतिहासिक नगर बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर जोधपुर रोड पर गांव देशनोक की सीमा में स्थित है।जिसे चूहे वाले मंदिर के नाम से भी जाना जानता हैं।करणी देवी साक्षात मां जगदम्बा की अवतार मानी जाती हैं।कहते हैं साढ़े छह सौ वर्ष पूर्व जिस स्थान पर यह भव्य मंदिर है,वहां एक गुफा में रहकर मां अपने इष्ट देव की पूजा अर्चना किया करती थीं।यह गुफा आज भी मंदिर परिसर में स्थित है।

मां के ज्योर्तिलीन होने पर उनकी इच्छानुसार उनकी मूर्ति की इस गुफा में स्थापना की गई। संगमरमर से बने मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है।मंदिर परिसर में चूहों की धमाचौकड़ी देखती ही बनती है।चूहे पूरे मंदिर प्रांगण में मौजूद रहते हैं और वे श्रद्धालुओं के शरीर पर कूद-फांद करते हैं।लेकिन किसी को कोई नुक़सान नहीं पहुंचाते।चील, गिद्ध और दूसरे जानवरों से इन चूहों की रक्षा के लिए मंदिर में खुले स्थानों पर बारीक जाली लगी हुई है।

इन चूहों की उपस्थिति की वजह से ही श्री करणी देवी का यह मंदिर चूहों वाले मंदिर के नाम से भी विख्यात है।ऐसी मान्यता है कि किसी श्रद्धालु को यदि यहां सफ़ेद चूहे के दर्शन होते हैं,तो इसे बहुत ही शुभ माना जाता है।सुबह के पांच बजे होने वाली मंगला आरती और शाम सात बजे आरती के समय चूहों का जुलूस यहां देखने लायक़ होती है।मंदिर के मुख्य द्वार पर संगमरमर पर नक़्क़ाशी को भी विशेष रूप से देखने के लिए लोग यहां आते हैं।चांदी के किवाड़, सोने के छत्र और चूहों के प्रसाद के लिए यहां रखी चांदी की बड़ी परात भी देखने लायक़ है।

राजस्थान का करनी माता मंदिर जिसे मूषक मंदिर के नाम से भी जाना जाता है वो बीकानेर के देशनोक का एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण का केंद्र है।कहा जाता है कि राव बीकाजी जो बीकानेर के निर्माता है उनको देवी करनी  माता से आशीर्वाद प्राप्त था।तब से देवी को बीकानेर राजवंश के संरक्षक देवता के रूप में पूजा जाता है।बताया जाता है की राजा गंगा सिंह द्वारा 20 वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण किया गया था। ये मंदिर अपने चूहों के लिए  भी जाना जाता है।जिन्हें काबस कहा जाता है।ऐसा माना जाता है की इन चूहों में देवी के बच्चों की आत्मा होती हैं। जिन्हें चरण कहा जाता है।इन चूहों के प्रति यहां के लोगों में गहरी आस्था है।यहां के लोगों की ऐसी धारणा है की यदि कोई चूहा अगर किसी श्रद्धालु के पैर में चढ़ जाए तो उस व्यक्ति की मनोकामना बहुत जल्द पूरी होती है।इन चूहों को चढ़ावे के रूप में प्रसाद चढ़ाया जाता है।

मुख्यरूप से चूहों के इस मंदिर में हर एक तीर्थयात्री बड़े ही स्वतंत्र रूप से घुमता है।मंदिर की सबसे अच्छी बात ये है कि यहां हजारों की तादात में चुहे हैं लेकिन कभी भी प्लेग जैसी बिमारी की घटना यहां नहीं हुई जो किसी चमत्कार से कम नहीं है।पूरी दुनियाभर में ये एक अद्वितीय मंदिर माना जाता है। देश का अनुठा और बेहद खुबसुरत ये मंदिर,अद्भुत है।खास अवसरों पर इस मंदिर में भक्तों का जनसैलाब उमड़ पड़ता है।ये मंदिर राजस्थान ही नहीं देश के अन्य प्रांत के साथ ही विश्वभर में अपनी ख्याती फैला चुका है।

एक खूबसूरत शहर बीकानेर।एक अलमस्त शहर बीकानेर।जहां के लोग अलमस्त और बेफिक्र होकर अपना जीवन यापन करते है।इसका कारण भी है।कहते हैं कि बीकानेर के संस्थापक राव बीकाजी अलमस्त स्वभाव के थे और यहां की कुलदेवी माता करणी है । जिनके दरबार में हर आमो-खास-अर्जी लगानें आता है।

करणी माता के दरबार में आनें के लिए हम ट्रेन और खुद के वाहन के साथ ही बस का भी सहारा ले सकते हैं।अपनें साधन से आनें वाले श्रद्धालु रास्तेभर राजस्थान की खूबसूरती का नजारा पा सकते हैं।वहीं ट्रेन का सफर भी खास होता है।

अंतत: करणी माता मंदिर में पहुंचकर श्रद्धालू दरबार की भव्यता को देखकर आनंदित हो उठते हैं। यहां आने वाले भक्तों के आश्चर्य का ठिकाना तब और नहीं होता जब वो मंदिर में चूहों को अठखेलियां करते हुए देखते हैं।ऐसी आस्था,श्रद्धा और भक्ति निश्चिततौर पर कहीं और नहीं देखनें को मिल सकती।ऐसे में साथियों जब भी समय मिले तो आप भी हो जाईए बीकानेर...।


पठानकोट आतंकी हमले के चश्मदीद राकेश कुमार की जुबानी



संदीप कुमार मिश्र : आखिरकार आतंकियों के मनसूबों को हमारे जाबांज जवानो ने नाकाम कर दिया।जिसमें हमारे सात जवान शहीद हो गए।उन्हें देश नमन करता है,उनकी शहादत को सलाम करता है।लेकिन इस हमले में एक शख्स ऐसा भी था,जो चश्मदीद है आतंक के इस गुनाह का। वो दर्द में है,पीड़ा से कराह रहा है,लेकिन उसकी आपबीती रोंगटे खड़े कर देने वाली है।आखिर कैसे आए आतंकी पठानकोट..?सब कुछ राकेश कुमार जानता है..।

दरअसल पठानकोट में आतंकियों ने हमले से पहले एयरबेस पर सबसे पहले पंजाब के एसपी सलविंदर सिंह की कार छीन लिया था।आपको बता दें कि एसपी सलविंदर सिंह के साथ उनकी कार में ही बैठा था एसपी का दोस्त राकेश कुमार ।जिसके साथ आतंकियों ने सबसे पहले उसके गले पर चाकू से वार कर मरा समझकर खेत में फेंक दिया था।

राजेश कुमार का कहना है कि गाड़ी वही ड्राइव चला रहा था। जब गाड़ी कोलियां गांव के पास पहुंची तो आर्मी की वर्दी पहने चार आतंकियों ने उन्हें रुकने के लिए हाथ दिया। आर्मी की वर्दी देखकर उसने यह सोचते हुए ब्रेक लगा दिया कि शायद चैकिंग के लिए रोका जा रहा है।लेकिन जैसे ही उसने खिड़की का शीशा नीचे किया, आंतकियों ने उसकी कनपटी पर गन लगा दी, और जबरन अंदर दाखिल हो गए।और आतंकियों ने एसपी सलविंदर सिंह का हाथ बांधकर उन्हें पिछली सीट पर बैठे उनके रसोइए मदनलाल के साथ पिछली सीट पर बैठा दिया।जिसके बाद राकेश और दहशत में आ गया।

वहीं राजेश कुमार का कहना था कि गाड़ी में बैठने के बाद आतंकी आपस में पंजाबी में बात करने लगे कि पहले जिसकी कार छीनी थी, उसे तो मार दिया। अब इनलोगों का क्या करें। आतंकियों का ये भी कहना था कि वह अपने टारगेट तक पहुंचने में पहले ही एक दिन लेट हो गए हैं,लेकिन अब वो ज्यादा समय नहीं गंवा सकते।खैर,राजेश का कहना था कि आतंकियो ने  जब सलविंदर सिंह और उनके रसोईए मदन लाल को गाड़ी से नीचे फेंक दिया फिर आतंकियों ने राजेश से पूछा कि यह बंदा कौन था तो उसने कहा कि यह गुरदासपुर के पूर्व एसपी व पीएपी के असिस्टेंट कमांडेंट सलविंदर सिंह थे।

ये जानने के बाद आतंकियों ने राजेश से पूछा कि, "एसपी कौन होता है? जिसके जवाब में राजेश ने कहा कि एसपी पुलिस का बड़ा अफसर होता है तो चारों आतंकी हैरान रह गए। इसके बाद उन आतंकियों में से एक ने पाकिस्तान में किसी को फोन किया और बताया कि जो गाड़ी उन्होने छीनी थी, वह बड़े पुलिस अफसर की थी। इस पर दूसरी तरफ से उन्हें सलविंदर सिंह को मारने के निर्देश दिए गए।"ये बातें राजेश बड़े ध्यान से सुन रहा था।

"फोन पर मिले निर्देशों के बाद आतंकियों ने गाड़ी वापस मुड़वाई और उस जगह पर फिर पहुंचे जहां सलविंदर सिंह को फेंका गया था। वहां जब ढूंढऩे पर सलविंदर सिंह नहीं मिले तो आतंकी गुस्से से झल्ला गए और वापस गाड़ी में बैठकर राजेश को गाड़ी अकालगढ़ की ओर मोड़ने को कहा।और फिर अकालगढ़ पहुंचकर आतंकियों ने गाड़ी खेतों में रुकवा दी,जिसके बाद राजेश के  गले पर चाकू से जानलेवा वार किया।

राजेश कुमार का कहना था कि आतंकियों ने उसे मरा हुआ समझकर एयरफोर्स की बाउंड्री वाल की ओर भाग निकले।आतंकियों के भाग जाने के थोड़ी देर बाद राजेश ने आंखें खोली और हिम्मत जुटाकर हाथ खोले। और किसी तरह गुरुद्वारे जा रहे एक आदमी को रोककर उसके फोन से अपने जीजा राजकुमार को कॉल की। उसके बाद राजकुमार ने इस वारदात की सूचना पुलिस को दी।


अंतत: राजेश कुमार की जान तो बच गयी,लेकिन तमाम ऐसे सवाल हैं जिनकी तह तक जाना अब भी बाकी है,कि आखिर आतंकियों ने एसपी को क्यों छोड़ा।इसके साथ ही अनगिनत सवाल सवाल लोगों के जहन में है,जिनका जवाब हर हाल में चाहिए..कि क्या कोई देश का गद्दार भी इस हमले में शामिल था...या फिर हुई कोई भारी चूक...?इन्तजार हैं इन सभी सवालों का,क्योंकि तभी पठानकोट में हुए शहीदों को मिल पाएगी सच्ची श्रद्धांजलि...। 

Tuesday, 5 January 2016

क्यों ना हो मीडिया से मोहभंग..?



संदीप कुमार मिश्र: ये कहने मे अच्छा तो नहीं लगता कि मीडिया अपने रास्ते से भटक गई है,पत्रकारिता अब पूर्ण रुप से व्यवसाय हो गया है।जो सिर्फ टीआरपी से ही मतलब रखता है।देश भक्ति,सामाजिक सरोकार,जनभावना,मानवीय पहलू जैसी तमाम बातों को दिखाना न्यूज चैनलों के लिए विशुद्ध रुप से टीआरपी की मारामारी है,एक ऐसी ओछी जल्दबाजी,कि सबसे पहले खबर किस चैनल पर ब्रेक होती है,बड़ी बड़ी ब्रेकिंग न्यूज,प्लेट्स बनाकर परोस दी जाती है कि सबसे पहले हमारे चैनल ने दिखाई आपको ये खबर। ओह!अफसोस होता है....।

अफसोस इसलिए भी कि मैं भी खुद को पत्रकार कहता हूं।तकलीफ तभी थोड़ी ज्यादा बढ़ जाती है।वरना 125 के भारत में कितने लोग जानते हैं मीडिया की हकिकत।शर्म से सिर तब और झुक जाता है जब,कोई महिला पत्रकार शहीद जवान के घर जाकर शहीद की बीबी और बच्चों से पूछती है कि अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन आपके पापा कैसे शहीद हुए,क्या शहीद होने से पहले आपके पास कोई फोन आया था,और भी ना जाने क्या-क्या...कलेजा फट जाता है,कि देश ने अपना एक लाला खो दिया,एक औरत ने अपना पति,और एक बच्चे के सिर से उठ गया पिता का साया और हमारे रिपोर्टर कहते हैं अच्छा तो नहीं लग रहा,लेकिन देश जानना चाहता है... वगैरह,वगैरह....।क्यों झुठ बोलते हैं तथाकथित पत्रकार और चैनल वाले महोदय जी।ये क्यों नहीं कहते कि आपको ये दिखाना इसलिए जरुरी है कि आपकी टीआरपी इस हफ्ते औरों से बढ़ जाएगी।खैर आप यहीं नहीं रुकते......आपके साहस की दाद देनी पड़ेगी कि आपका बस चले तो आप देश की हिफाजत से भी अपनी वाहवाही के लिए समझौता कर दें।

अब अतीत में क्या जाएं दोस्तों आपको नफरत हो जाएगी इन न्यूज चैनलों से,लेकिन पठानकोट में हुई आतंकी वारदात को ही ले लें आप।देश जहां शहीद हुए सात जवानो के गम में शरीक हो रहा था,शोक मना रहा था तो वहीं तमाम बड़े-बड़े चैनल वाले अपने शो में आतंकी देश पाकिस्तान के कुछ विश्लेषकों के साथ डिवेट पर बैठकर तू तू मैं मैं कर रहे थे।जिससे हासिल कुछ नहीं होना था, लेकिन हां टीआरपी जरुर बढ़नी थी। मीडिया के आकाओं को ये जरुर बताना चाहिए कि क्या चैनल पर डिवेट करके और आक्रामकता दिखाने भर से शहीदों का सम्मान हो जाएगा..? क्योंकि इस प्रकार से पाकिस्तानी मेहमानों के ज़रिये कहीं पाकिस्तान विरोधी कुंठा को हवा तो नहीं दी जा रही है। इस कुंठा को हवा तो कभी भी दी जा सकती है लेकिन ऐसा करके क्या हम वाक़ई शहादत का सम्मान कर रहे हैं? क्या ये पाकिस्तानी मेहमान कुछ नई बात कह रहे हैं? चैनलों पर पाकिस्तान से कौन लोग बुलाये जा रहे हैं? क्या वही लोग हैं जो इधर के हर सवाल को तू तू मैं मैं में बदल देते हैं और इधर के वक़्ता भी उन पर टूट पड़ते हैं। कोई किसी को सुनने वाला नहीं।इस डिवेट में कोई किसी को बोलने नहीं देता। इस घटना पर दोनों देशों के जिम्मेदार लोग बोल रहे होते तो भी बात समझ आती लेकिन वही बोले जा रहे हैं, जिन्हें घटना की पूरी जानकारी तक नहीं। जिनका मक़सद इतना ही है कि टीवी की बहस में पाकिस्तान को अच्छे से सुना देना।

ये तो चैनलों पर बैठकर बेहूदा चर्चा का हाल है।अब जरा इसके दूसरे पहलू पर आते हैं।जहां चैनलों के तथाकथित तेज तर्रार रिपोर्टर मौका-ए-वारदात पर जब रिपोर्टिंग करते हैं तो उन्हें एक बार आप सुन लिजिए,कि किस प्रकार से ना चाहते हुए भी आतंकियों के आकाओं तक किस प्रकार से खबर हमारे चैनल वाले उन तक पहुंचाते हैं और वो अपने मंसूबे में कामयाब होते हैं।दरअसल सवाल उठता है कि मीडिया के पास एकमात्र यही तरीका बचा है..? हमारी अपनी कमियों और भूल से ही हुई चूक पर कोई सवाल क्यों नहीं है हमारे पास ?

बड़ा सवाल इसलिए भी उठता है कि मीडिया किस दिशा में जा रहा है।हम क्या दिखाना चाहते हैं...? हमारी जिम्मेदारी क्या है..?उन्हें निभाने का रास्ता हम कैसे अख्तियार कर रहे हैं..?क्या हम अपनी रिपोर्टींग और सुत्रों के माद्यम से जाने अनजाने में खबरों को आतंकियों तक नहीं पहुंचा रहे है..? क्या हमारे लिए शहादत पर शोक मनाने का यही एक तरीका बचा है..?

नहीं साब...शायद नहीं...। हमें गर्व है अपने जवानों पर,उनकी शहादत पर।उनकी सजग निगांहों की वजह से हमारी सिमाएं सुरक्षित हैं।ऐसे में चैनल पर तू तू मैं मैं करने से बात नहीं बनती है।इससे शहादत आहत होती है,अफसोस होता है। अफसोस की मीडिया कब तक और कहां तक गिरेगी..? हमारे सवालों की हकिकत क्या है? बस यही कि हम पूछते जा रहे हैं..पूछते जा रहे हैं...।चाहे बेशक उनके जवाब देने का माद्दा किसी में ना हो।


अंतत: लगता है कि अब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपनी विश्वसनियता पूरी तरह से खोता जा रहा है,जिसे बचाये रखने के लिए इसके व्यवसायिकरण को रोक कर खबरिकरण पर ध्यान देने की जरुर है,खबरो की तह तक जाना जरुरी है, लेकिन देश की एकता और अखंडता को ताक पर रख कर नहीं,किसी मर्यादा का उलंघन करके नहीं,किसी का मान मर्दन करके नहीं।दिखाने के लिए खबरों को मत दिखाएं,सच्चाई को हीं बयां करें,वर्ना पत्रकारिता पर से पूरी तरह से जनता का विश्वास उठते देर नहीं लगेगी।जो काफी हद तक उठ चूकी है...।

वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...