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Tuesday, 3 November 2015

बिहार चुनाव अंतिम पड़ाव की ओर


संदीप कुमार मिश्र: अपनी-अपनी जीत के दावे,और अपना-अपना राग।बिहार चुनाव अपने अंतिम दौर की ओर बढ़ चला है।चार चरणों के मतदान हो चुके हैं,अंतिम और पांचवां दौर बाकी है।नरपिशाच,नरभक्षी,बीफ,तांत्रिकों और भी ना जाने क्या-क्या का दौर खत्म हो चुका है।5 नबम्बर को पांचवां दौर और 8 नवम्बर को गिनती।यानि धनतेरस पर सत्ता का ऐलान और दीवाली पर शपथ ग्रहण...कुछ कुछ ऐसा ही।साब पाकिस्तान का तो पता नहीं लेकिन बिहार दो दीवाली जरुर मनाएगा।अरे भाईयों महागठबंधन ने तो सपथ ग्रहण की तैयारीयां भी पहले ,दुसरे चरण के बाद ही शुरु कर दी थी।अतिउत्साह से लवरेज महागठबंधन के सभी नायक, महानायक नया नया कुर्ता पाजामा भी कसाने के लिए आर्डर दे दिये हैं।क्योंकि राजनीतिक पंडित भी वोटरों का क्रियाबांट नहीं होने की बात कह रहे है,अब ये राजनीतिक पंडित कौन हैं,ये जानने के लिए गुगलिया लिजिएगा,हम तो आगे बढ़ते हैं.।क्या सच में बिहार में बीजेपी का विकास रथ रुक रहा है...?बड़ा सवाल तो है ही...क्यों ?

दरअसल मित्रों सियासत में जाति फैक्टर सबसे बड़ा मायने रखता है,खासकर यूपी,बिहार में।मतलब इससे नहीं है कि सही कौन है,गलत कौन है...मतलब तो सिर्फ इससे है कि मेरी जाती का कौन है...अब जहां ये परम्परा चलेगी वहां सत्ता पर कैसे लोग काबीज होंगे इसकी कल्पना आप कर सकते हैं.।लेकिन एक बड़ा बदलाव जो देखने में आ रहा है वो ये कि यूवा मतदाताओं की ना ही कोई जाती है ना ही कोई धर्म।उसका तो इमान और धर्म सब कुछ विकास ही है,उन्नती है,खुशहाल विकास का सपना ही है।और इसके लिए अगर हम कहें कि ये अलख 2014 के आम चुनाव के बाद आयी है तो गलत नहीं होगा।साथ ही इसका श्रेय देश के प्रधानमंत्री को दिया जाए तो गलत नहीं होगा।क्योंकि विकास का एक रोल माडल जो उन्होने जनता को दिखाया उससे कहीं ना कहीं यूवा भारत खुब प्रभावित हुआ।खैर अभी ये भविष्य की बात है कि अच्छे दिन कब आएंगे और कैसे आएंगे या आएंगे भी या नहीं...लेकिन 60 साल बनाम 60 महिने की तुलना तो फिलहाल सरासर गलत है ना...और वो भी तब जब केंद्र की सरकार बने अभी दो साल भी नहीं हुए...।

खैर बात हो रही थी बिहार की...तो दोस्तों मेरे एक मित्र है विनीत कुमार जो बिहार से हैं..और गलती से पत्रकार रहे हैं...अब पत्रकार नही है,अपना ही काम करते है,लेकिन सियासी समीकरण और विश्लेषण में पूरी दिलचस्पी है।उनका स्पस्ट कहना है कि हिन्दू,मुस्लिम,कुशवाहा,कुर्मी,भूमिहार,यादव,दलित,पिछड़े अगड़े।इनका समीकरण सभी पार्टीयां बनाकर ही टिकट दी हैं।सभी पार्टीयों की धुरी हैं जातियां।यानि की दोस्तों साफ है कि सुशासन और विकास की बात बेमानी है,सिर्फ इसका ढ़ोल पिटा जा रहा है बिहार चुनाव में,असली उठापटक तो जातियों के गुणा भाग में ही निकल रहा है।

लेकिन एक बात है वोटरों का मिजाज ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार भगवान की कृपा को समझना।बिहार का वोटरों का झुकाव किस ओर है,ये कह पाना किसी के लिए भी बड़ा ही मुश्किल भरा काम है।वोटर इतना समझदार चुके हैं कि खा किसी की रहे हैं और गा किसी की रहे हैं,भई ऐसा करें भी क्यों ना,क्योंकि फिर तो पांच साल बाद ही ये अवसर जो मिलेगा।जो हाथ लग जाए वही तो साथ है।वादों की पोटली का क्या...?वो तो हर पांच साल बाद ही खुलेगी ना।

एक तरफ एनडीए गठबंधन तो दुसरी तरफ महागठबंधन।दोनो के पास अपने अपने सुपर हीरो।एक तरफ लालू तो दूसरी तरफ नमो राग और उनकी आक्रामक चुनावी शैली,जिनकी जुबान का कायल क्या आम जनता जनार्दन,विपक्षी भी हैं,या यूं कहें कि महागठबंधन भी।क्योंकि महागठबंधन को तो इंतजार रहता है कि नमो राग सुनने को मिले फिर कुछ टीका टिप्पड़ी करने को मिले।और नमो हैं कि बोलने का कोई मौका ही नहीं छोड़ते।महागठबंधन के पास सीएम है तो एनडीए के पास पीएम है।एक तरफ सुशासन बाबू हैं तो दूसरी तरफ विकास है।यकिन मानिए भाईयों बड़ा ही दिलचस्प चुनाव है बिहार का।जनता जागरुक भी है तो कुछ विचलित भी।पता नहीं कि क्या होगा।


एक बात जो एनडीए का मूड बिगाड़ सकती है वो ये कि यादव वोटों में टूट कम ही नजर आई। सुशासन बाबू और और लालू के वोट एनडीए मे जाने की बजाए एक-दूसरे को ही ट्रांसफ़र हुए।वहीं कुशवाहा वोट एकमुश्त एनडीए को नहीं मिल रहा है।गाहे बगाहे चुनावी समर में आरक्षण की बात पर आरएसएस प्रमुख के बयान से दलित वोटों और ईबीसी को बुरी तरह से बांट दिया लगता है।साथ ही बिहार भाजपा का अंदरूनी असंतोष और कलह भी बढ़ा है,बिहारी बाबू यानि शत्रु दादा के बोल भी भाजपा के लिए आग में धी का काम कर रहे है।इतना ही नही, बिहारी बनाम बाहरी के मुद्दे ने बीजेपी को अपने होर्डिंग बदलने पर मजबूर किया और उसे स्थानीय नेताओं के फोटो लगाने पड़े।

क्या बीजेपी के प्रबंधन कौशल को महागठबंधन मात दे रहा है..? ये तो आने वाला समय बताएगा,लेकिन एक बात तो तय है कि बिहार में राजनीतिक दीवाली अगर एनडीए मनाता है तो जीत के हीरो सिर्फ और सिर्फ मोदी होंगे...और उनका विकास का पहिया होगा,और अगर दीवाली महागठबंधन खेमें में मनती है तो हार का ठीकरा............।आप खुद ही समझदार हैं।मित्रों तकरिबन ढाई करोड़ युवा मतदाता बिहार चुनाव में अपना ख़ासा उत्साह दिखा रहे हैं। और कहीं ना कहीं ये जाति की दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर चुनाव की हवा को मोड़ने में सक्षम है।

अंतत: भाईयों कहना गलत नही होगा कि जातिवाद हमारे देश के रग-रग में भरा पड़ा है।देश तो आजाद हुआ लेकिन आजादी से लेकर आज तक राजनीति के केंद्र बिन्दु में जातिया ही रही हैं।जिनका उपयोग और दुरुपयोग अपने मतलब के लिए सियासदान करते रहे हैं। हमारे देश में आरक्षण का मतलब था कि समाज के निम्न वर्ग को मुख्य धारा से जोड़ा जाए और विकास की बात की जाए।लेकिन अब हालात क्या है आरक्षण का आप जानते है।जातियां आरक्षण के नाम पर वोट बैंक बन गई हैं।किसी को आरक्षण का झुनझुना थमाया गया तो कहीं भय दिखाकर उसे वोट में तब्दील किया गया।इतना ही नहीं कहीं कहीं तो सुरक्षित रहने की भावना के डर से लोग एक हो गए।जातिगत राजनीति और आरक्षण की बानगी आप खाप पंचायतों में भी देख सकते हैं,वहां तो वर्चस्व की लड़ाई के रुप में जातिवाद उभरकर सामने आया।जातिगत राजनीति को तब और बल मिला जब मंडल कमीशन लागू हुआ,उसके बाद तो यूपी,बिहार में नेता पार्टीयां योग्यता के आधार पर नही,जातीगत आधार पर चुनने लगी।एक सिंबल के रुप में दलितों के नेता के तौर पर काशींराम को जाना जाने लगा तो यादवों के नेता मुलायम सिंह यादव हो गए।आप देखेंगे तो देशभर में तमाम ऐसे बड़े सियासी चेहरे आपको नजर आ जाएगे जो अगड़ी,पिछड़ी,दलित और भी ना जाने किस किस जाति का प्रतिनिधित्व करते हैं और आरक्षण की मांग करते हैं।मतलब साफ है कि कहीं ना कही पूरा देश जातिगत राजनीति के दलदल में धंसता जा रहा है।ऐसे में मंडल,कमंडल की धरती पर जातिगत राजनीति ना हो ऐसा कैसे संभव हो सकता है।

बड़ा सवाल उठता है कि क्या बदलाव की ओर बढ़ रहा है बिहार ? क्योंकि पिछले चार चरणों में क्रमश: मतदाताओं का रुझान भी बैलेट की तरफ बढ़ा है,लोग घरों से बाहर निकलकर बूथ तक अपने मताधिकार का प्रयोग करने पहुंच रहे हैं।और अगर मैं ठीक हुं तो शायद ये पहली बार होगा कि बिहार में चुनाव शांतिपूर्ण संपन्न होगा,खैर अभी पांचवां दौर बाकी है,कहना जल्दबाजी होगी,लेकिन फिर भी अब जो नजर आया उसके आधार पर कहा जा सकता है।खैर अब भारत डिजिटल हो रहा है,दुनिया की बड़ी नजरे हमारें देश के यूवाओं की ओर उत्सुकता से देख रही हैं,शायद इस बदलते परिवेश में जाति,धर्म के भंवरजाल से हम आगे निकलें या यूं कहें कि निकलना ही होगा।तभी अच्छे दिन का भारत हम देख पाएंगे और तभी एक भारत,श्रेष्ठ भारत का सपना पूरा हो पाएगा।अब इस दिशा में हम कितना आगे बढ़ पाए हैं ?..................आप सोचिए,हम भी सोचते हैं।।।


Monday, 2 November 2015

गंगा तेरा दर्द ना जाने कोय...!'नमामि गंगे'


संदीप कुमार मिश्र: मानो तो मैं गंगा मां हुं,ना मानो तो बहता पानी। दोस्तो बात तो फिल्मी है,लेकिन सच है।तभी तो मां गंगा के अब प्रदुषित हो चुके जल में भी करोड़ो लोग डुबकी लगाने को लालायित रहते हैं।और लगा भी रहे हैंहालांकि ऐसा नहीं की शासन और सरकार इस बात से वाकिब नहीं लेकिन सरकार का तो जब तक बात बिगड़ न जाये कुछ करने में यकीन नहीं होतागंगा में आज भी तमाम नाले गिर रहे हैं और सरकार के लाख दावों के बाद भी केवल इलाहाबाद में गंगा में 57 छोटे बड़े नाले गिर रहे हैं

गंगा के किनारे पर बसे दो बड़े शहर हैं बनारस और कानपुर। कानपुर से 43.5 करोड लीटर सीवेज हर रोज निकलता है।वहां मौजूद प्लांट हर रोज केवल 16.2 करोड़ लीटर पानी ही साफ कर पाता है। शहर का केवल 39% हिस्सा ही प्लांट से जुड़ा है। बाकी के घरों से निकलने वाला प्रदूषित पानी नालियों द्वारा गंगा में छोड़ दिया जाता है।बनारस में मात्र 30 प्रतिशत घर ही सीवेज लाइनों से जुड़े हुए हैं।बनारस से भी हर रोज तकरीबन 30 करोड़ लीटर सीवेज निकलता है।बाकी यहां के प्लांट में भी केवल 10.2 करोड़ लीटर प्रदूषित पानी ही साफ करने की क्षमता है।और बाकी पानी गंगा में छोड़ दिया जाता है और ये क्रम बस ऐसे ही चलता रहता है।इस परियोजना के अंतर्गत जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय ने अब तक केवल वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट को ही लगाया जो पिछले गंगा एक्शन प्लान में प्रस्तावित थे।इस दौरान इस कार्यक्रम पर कई बैठकें की गईं लेकिन काम नहीं के बराबर किया गया।

ये आंकड़े जितना हैरान करते हैं,उससे कहीं ज्यादा तकलीफ देते हैं की मां गंगा अपने उन करोड़ों भक्तों की गन्दगी ढोने को मजबूर है,जो उसकी पूजा करते हैं और अब हालात ये है की उसकी सांसे उखड़ने लगी हैंउसकी अविरलता और निर्मलता तो पहले ही दम तोड़ चुकी हैंआखिर कब होगी गंगा स्वच्छ और कब करेंगे श्रद्धालू स्वच्छ जल में स्नान कह पाना मुश्किल है।

पुण्य सलिला सुरसरी, पतितपावनी, जगउद्धारिणी मां गंगाजिसका हर भारतवासी से जन्म से लेकर मरण तक का अटूट नाता हैजिसे श्रद्धा से गंगा मैया कह कर हम बुलाते हैं और जो ना जाने कितनी संस्कृतियों की साक्षी और इतिहास की गवाह हैजिसके तट पर संस्कृतियां जन्मी,जिसने सदियों से जमाने का हर दर्द सहा, फिर भी लोगों में बांटती रही अमृतवह गंगा जिसके बारे में कहा जाता है-गंगा ही हिंदुस्तान है,और हिंदुस्तान ही है गंगासच कहें तो इस देश की पहचान है गंगाआज उसी गंगा की पहचान खो रही हैसदियों से भारतवर्ष की जीवनरेखा रही सुरसरी की अपनी सांसें फूल रही हैंघुट रहा है उसका दम।

गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा में घोला जा रहा है जहरऔर वह अब प्रदूषण के पंक में डूब कर अपनी पहचान ही खोती जा रही हैसाल दर साल सिकुड़ता जा रहा है उसका आंचल। कानपुर में चमड़े का शोधन करने वाली टेनरियां हों,या गंगा किनारे बसे कुल 2073 कस्बे और शहरसभी के गंदे नालों का पानी बिना शुद्ध किये सीधा गंगा में जाता हैशहरों-कस्बों की इस गंदगी ने गंगा के 75 प्रतिशत पानी को प्रदूषित कर दिया हैइसके अलावा उसमें पड़ने वाले औद्योगिक कचड़े,इससे अमृत जैसे पानी को विष में बदल गहे हैं। 

एक रिपोर्ट के अनुसार ऋषिकेश से लेकर गंगासागर तक का गंगा का पानी मनुष्य के पीने लायक नहीं रहायहां तक कि मनुष्य इसमें स्नान तक नहीं कर सकतावैज्ञानिक मानते हैं कि इसमें नहाने से कैंसर व अन्य बीमारियों के होने का खतरा हैवही गंगाजल जिसके बारे में यह प्रसिद्ध था कि इसे वर्षों रखे रहें तो भी इसमें कीड़े नहीं पड़ते।वो आज विषैला हो गया हैऔद्योगिक विकास की अंधी दौड़ का खामियाजा बाकायदे मां गंगा भोगने को विवश है

नमामि गंगे परियोजना के लिए प्रधानमंत्री की मंशा सराहनीयता साधुवाद की परिचायक है,लेकिन गंगा को अकाल मौत से बचाने के लिए कोई सार्थक प्रयास नितांत आवश्यक है।क्योंकि इसके बिना गंगा नहीं बचेगी और अगर गंगा के अस्तित्व पर संकट आया तो यह संकट देश पर भी होगा। दरअसल मोदी सरकार आने के बाद गंगा की साफ सफाई पर अब तक 1900 करोड रुपए खर्च किए जा चुके हैं।लेकिन अफसोस इस बात पर है कि इतना पैसा बहाने के बावजूद भी ये परियोजनाएं असफल हो जाती हैं।

मां गंगा की साफ सफाई और देखभाल के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट 'नमामी गंगे परियोजना' को चलते हुए अब एक साल से भी ज्यादा का समय बीत चुका है,वहीं इस परियोजना के लिए केन्द्र सरकार ने 2037 करोड़ रुपये का बजट भी आवंटित किया था।जिसमे गंगा के आसपास के घाटों का निर्माण शामील था, और सौंदर्यीकरण के लिए अलग से 100 करोड़ का बजट निर्धारित किया गया था।इस काम को अंजाम देने के लिए वाराणसी, पटना, केदारनाथ, इलाहाबाद,हरिद्वार, कानपुर और दिल्ली में किया जाना तय किया गया था। अगर पिछले तीन दशकों की बात करें तो गंगा की देखभाल और संरक्षण के लिए जितनी धन राशी खर्च की गई उससे चार गुना ज्यादा नमामि गंगे के लिए राशी आवंटीत की गई।काश ये परियोजना कागजों में जितनी आकर्षक दिखाई दे रही है अगर उसका सही तरीके से पालन किया जाए तो मां गंगा की स्वच्छता बनायी जा सकती है,लेकिन अफसोस अब तक नमामि गंगे कागज पर ही नजर आ रही है।

दरअसल ये परियोजनाएं लगता है कि इसलिए असफल हुईं क्योंकि अमल करने की ठोस नीति नहीं थी।आम जनमानस को भी आगे आना होगा।जब तक गंगा को प्रदुषित करने वाले लोगों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई नहीं होगीतब तक स्थिति सुधरने वाली नहीं हैसंत समाज ने भी एक अरसे से गंगा विमुक्ति का अभियान छेड़ा हुआ हैगंगा को प्रदुषित करने वालों के खिलाफ कड़े कानून की मांग कर रहा है

आज ना जाने कितने सवाल हैं जो आज देश की जनता के जेहन में हैं,वह गंगा को तिल-तिल कर मरता देख रही है,और सोच रही है कि आखिर वे कौन से खलनायक हैंजिन्होंने गंगा को इस हाल तक पहुंचने दिया हैहम आज गंगा के शुद्धीकरण की बात करते हैंवही गंगा जो औरों को तारती हैआज खुद अशुद्ध हैगंगा नदी नहीं एक पावन सरिता है,वह जीवनधारा है,जीवन शैली है।

ऋषियों मुनियों ने इसमें जप तप कर मोक्ष पायासदियों से यह पतित पावनी और सुरसरि यानी देव सरिता कहलाती रही हैइसे वही सम्मान मिलना चाहिएयह मां है,और इसे बचाना हर देशवासी का कर्तव्य हैअब तक जो भूल हुई है उसका दुष्परिणाम हमारे सामने हैहम पण्य सलिला गंगा को कीचड़ और गलीज से सनी नदी के रूप में बदलते देख रहे हैं,और दुखी हो रहे हैं यह सोच कर कि एक संस्कृति, एक जीवनधारा एक समृद्ध, पुनीत इतिहास हमारे सामने धीरे-धीरे विलुप्त होने की दिशा में बढ़ रहा हैभगीरथ कठिन तप कर गंगा को धरा पर लाये थे... ताकि उनके पूर्वज सगर पुत्र तर सकेंउनकी लायी सुरसरी उसके बाद से सदियों से जगत को तार रही हैलेकिन हमने इसकी रक्षा नहीं की और यह सूखी तो फिर कोई भगीरथ नहीं आयेगाधरती पर गंगा को दोबारा लाने के लिए

माफ किजिएगा दोस्तों लेकिन जीवनदायिनी गंगा के प्रति हम भी कम उदासीन नहीं है।गंगा जो इस देश का आधार और इसकी संस्कृतियों की संवाहक है।खैर इस अंधेरे में भी प्रकाश की किरणें नजर आ रही हैं, जो सुखद संकेत हैदेश के विभिन्न हिस्सों में गंगा के प्रदूषण के प्रति जनमानस में चिंता जगाने, उन्हें गंगा की रक्षा में प्रवृत्त करने की दृष्टि से कई प्रयास किये जा रहे हैं।जैसे गंगा आरती,जो हरिद्वार के परमार्थ आश्रम में वर्षों से होती आ रही है,बनारस में भी होती है, हावड़ा के रामकृष्णपुर घाट में भी हो रही है जिसका उद्देश्य गंगा के प्रदूषण के बारे में जन जागरण फैलाना हैकम से कम ऐसे प्रयास से गंगा की दुर्दशा के बारे में देश में चिंता जगाने का काम तो किया ही जा सकता है,जो संभव है

देश के हर नागरिक को गंगासेवक बनना होगा।और गंगा को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए चौकस रहना होगा।ऐसा न हुआ तो गंगा का अस्तित्व मिट जायेगा, फिर न पूजा के लिए इसका शुद्ध जल उपलब्ध होगा और न इसके तट पर किसी पावन पर्व में स्नान किया जा सकेगाशायद वह दिन कोई सच्चा हिंदुस्तानी नहीं देखना चाहेगामां गंगा भारत भूमि पर अपने स्वच्छ अमृतमय जल के साथ अनवरत काल तक अबाध प्रवाहमान रहेंहमें यही कामना और प्रार्थना करनी चाहिए और सरकार को सकारात्मक और ठोस प्रयासनमामि गंगे।

कश्मीरी पंडित:विस्थापना भरे दर्द के वो 25 साल



संदीप कुमार मिश्र: कोई लौटा दे मेरा बचपन,मेरी जवानी,मेरी वो गलियां जहां की पगड़ंडीयो पर चलकर जवानी की दहलिज पर रखा मैने कदम।काश..हमें भी एक बार नसीब हो जाता मेरा गांव,मेरा घर।काश..वो दर्द की विरासत चैन से सोने देती,वो मासूमो का कत्लेआम,वो दर दर की ठोकरें,खाने के लाले,जान के लाले।काश मिल जाता उन डरावनी यादों से छुटकार और लौट जाते हम भी अपने घर को। कोई सुनेगा हमारी भी!या यूं ही हुक्मरान बदलते रहेंगे,हर पांच साल बाद वादे और इरादों की बातें होती रहेंगी,हम हमारे अपने यूं ही,अपने ही देश में मुफलिसी के शिकार होते रहेंगे।काश भाव,राग और ताल के इस देश भारत में हमारी भी पहचान कोई कर सकता,हमारे भी दर्द को कोई अपना समझता,हमारे अरमान और ख्वाबों को भी कोई पंख लगाता...काश! काश!काश!
दरअसल दोस्तों ये दर्द है उन विस्थापित कश्मीरी पंडितों का जिन्हे 25 साल पहले घर से बेघर होना पड़ा था।तमाम सरकारी योजनाएं भी 25 सालों के लंबे अंतराल के बाद भी आजाद भारत के माथे पर से विस्थापन का दाग नहीं मिटा सके।सवाल उठता है कि आखिर कौन सी वो मजबूरी थी,कहां गलती हो गई की सरकारें बदलती रही,एक के बाद एक नए चेहरे उम्मीद जगाते रहे।सब कुछ होने के वाद भी आंखों में उम्मीद के सपने लिए उन कश्मीरी पंडितों की घर वापसी नहीं हो सकी ? आखिर क्यूं ?
मित्रों विस्थापन कोई बड़ी बात नहीं है,हम अपनी जरुरतों के लिहाज से,एक बेहतर भविष्य के लिए एक जगह से हुसरे जगह आते जाते हैं।पहले गांव,फिर शहर,महानगर और फिर राजधानी होते जहां हमें आर्थिक उन्नती का रास्ता नजर आता है।लेकिन देश की राजधानी दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में फैले कश्मीरी पंडितों के विस्थापन को आप क्या कहेंगे जो अपने ही मुल्क में प्रवासी या शरणार्थी बन कर जी रहे हैं।हम उन्हें क्या पहचान दे रहे हैं।घाटी पिछले 68 सालों से आम चुनाव का मुख्य मुद्दा रही है,बहस ङी होती है,आरोप-प्रत्यारोप भी खुब लगाए जाते रहे हैं,विकास के बड़े बड़े बादे भी किए जाते रहे हैं लेकिन बेहद अफसोस और शर्मनाक की कश्मीरी पंडितों सुध लेने वाला कोई नहीं,वो जैसे तब थे आज भी वैसे ही दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

आपको जानकर बड़ी हैरानी होगी कि नब्बे के दशक में जब कश्मीर आतंकवाद की दंश झेल रहा था,तब सबसे बड़ी कुर्बानी कश्मीरी पंडितों को देनी पड़ी थी।तकरीबन 4 लाख लोग अपने कलेजे पर पत्थर रखकर घरबार छोड़कर भाग गए।जिसके बाद चुनाव दर चुनाव घोषणाएं,वादे,योजनाएं बनती गई,राहत पैकेज भी दिए गए बावजूद इसके कोई छोस परिणाम सामने नहीं आए और 25 सालों का लगा काला दाग सरकार के माथे पर से नहीं मिट पाया।2014 के आम चुनाव में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की।नरेंद्र मोदी के हाथ में सत्ता आयी,जिनके मन में कहीं ना कहीं कश्मीरी पंडितों को लेकर दर्द भी झलका,लेकिन हालात जस के तस हैं।अब तक एक ही परिवार अपने घर वापस लौटा।आज भी उनके मन में वही डर और खौफ भरा हुआ है।
आंकड़ों की बात करें तो सुप्रीम कोर्ट को खुद जम्मू-कश्मीर की सरकान ने कहा है कि यूपीए के शासन काल में 1600 करोड़ का पैकेज कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास के लिए मंजूर किया गया था,सरकारी महकमों में 3000 पद भी दिए गए थे।इसके लिए तकरीबन 6000 से ज्यादा आवेदन भी प्राप्त हुए।एक अलग नई सोसाईटी बनाने की भी बात हुई।लेकिन हुआ वही ढाक के तीन पात।निष्कर्ष के नाम पर मात्र एक परिवार ही घाटी लौटा। कश्मीरी पंडितों ने अपने हक के लिए एक संघर्ष समिति भी बनाई।जिसके अनुसार सन 1989 में कश्मीरी पंडितों की संख्या घाटी में लगभग तीन लाख पचहत्तर हज़ार थी।लेकिन अलगाववादी हमलों के चलते 1992 में यह संख्या घटकर मात्र बत्तीस हज़ार ही रह गई।2008-09 में हुए सर्वे के अनुसार 2764 पंडित ही घाटी में फिलहाल रह गए थे। कश्मीरी पंडितों का कहना है कि आम चुनाव में हमारे शामिल होने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता है।ख़ासकर संसदीय चुनावों में।इससे ऐसा भी नहीं होगा कि लोकसभा में कश्मीरी पंडितों की कोई आवाज़ आएगी। बड़ा अफसोस होता है साब कि कश्मीरी पंडितों को उनकी ही ज़मीन, उनके ही घर से डरा-धमका कर भगा दिया जाता है, उन्हें एक लोकतांत्रिक देश में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किया जाता है, उनकी संपत्ति को हड़प ली जाती है, हत्याएं कर दी जाती है ,और उन्हें घर छोड़ने को मजबूर कर दिया जाता है।

एक नजर इन आंकड़ों पर भी गौर कर ले-
1-कश्मीरी पंडित कश्मीर के इलाके के एकमात्र मूल हिंदू निवासी हैं। 2-वर्ष 1947 तक कश्मीर के अंदर कश्मीरी पंडितों की आबादी करीब 15% थी।3-ये आबादी दंगों और अत्याचार की वजह से वर्ष 1981 तक घटकर 5% रह गई।4-वर्ष 1985 के बाद से कश्मीरी पंडितों पर ज़ुल्म और अत्याचार बड़े पैमाने पर हुआ।5-कश्मीर पंडितों को कट्टरपंथियों और आतंकवादियों से।6-19 जनवरी 1990 को कट्टरपंथियों ने ऐलान कर दिया कि कश्मीरी पंडित काफिर हैं।7-कहा गया कि वे कश्मीर छोड़ दें या फिर इस्लाम कबूलें, वरना जान से मार देंगे।8-फरवरी और मार्च 1990 के दो महीने में करीब 1.60 लाख कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ना पड़ा।9-करीब 4 लाख कश्मीरी पंडितों को उनके घरों से भागने के लिए मजबूर किया गया।10-कश्मीरी पंडितों की 95 फीसदी आबादी को अत्याचारों के ज़रिए उस कश्मीर से भगा दिया गया, जहां के वो मूल निवासी हैं।11-1947 में देश के बंटवारे के बाद हुआ सबसे बड़ा पलायन था जिस पर किसी बुद्धिजीवी ने एक आंसू नहीं बहाया।12-कश्मीर में 808 परिवारों के सिर्फ़ 3 हज़ार 445 कश्मीरी पंडित ही बचे हैं।

काश हम सोच पाते,महसुस कर पाते,दर्द की उस काली मनहुस रात को जब अपना घर,मोहल्ला,खेत- खलिहान,पुरखों की यादें सबकुछ छोड़कर भागना पड़ा कश्मीरी पंडितों को।सन 1990 से लेकर 2015 तक,देश के ना जाने किसना सवेरा देखा,विस्थापितों की एक पूरी पीढ़ी भी अपने जीवन के 25 बसंत देख चुकी है,बावजूद इसके घर वापसी की हिम्मत नही जूटा पा रहे हैं लोग। सरकारें कोशिश कर रही हैं लेकिन क्या योजनाएं भर बना देने से ये संभव हो पाएगा।जरुरत है दो समाजों में फैली उस नफरत की आग को बुझाने की,प्रेम और शांती के संदेश को जन जन तक पहुंचाने की।और उन लोगों पर निर्ममता से कार्यवाही करने की जो कश्मीरी पंडितों के गुनहगार है,साथ ही सुरक्षा की भरपूर जिम्मेदारी लेने की।जिससे कश्मीरी पंडित एक बार फिर अपने घर लौट सकें,जिससे की देश की एकता और अखंडता बरकरार रह सके।





वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...