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Monday, 2 November 2015

टपकेश्वर महादेव: जहां टपकती है शिवलिंग पर जल की बूंदे


संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों आज आपको लेकर चलते हैं एक ऐसे रमणीक,मनोहारी जगह,जहां ईश्वर भक्ति का आपको मिलेगा ऐसा प्रमाण जहां भक्त ही नहीं प्रकृति भी नित्य,हरपल करती है आदिदेव महादेव का जलाभिषेक। देवभूमि उत्तराखण्ड।जहां है हिमालय और यहीं देवाधिदेव भगवान महादेव का है निवास स्थान।शायद इसीलिए देवताओं को ही नहीं भक्तों को भी देवभूमि हमेशा ही पसंद ती रही है।गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी नदियों का उद्‌गमस्थल होने के साथ-साथ भगवान नारायण और कैलाशपति भगवान शिव सहित अनेक  देवी-देवताओं का निवास स्थान होने से  इस भूमि को पावन देवभूमि के रूप में पुकारा गया है।

उत्तराखण्ड की राजधानी देहरादून।जहां की खूबसूरत वादियों में स्थित है एक धार्मिक स्थल जो भगवान शिव के प्रमुख धाम टपकेश्वर के नाम से जाना जाता हैयह मंदिर देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र में नदी के किनारे स्थापित हैमंदिर में स्थित गुफा में भगवान शिव के शिवलिंग रूप के दर्शन किए जाते हैंजहां यह शिवलिंग स्थापित है उस स्थान पर एक चट्टान से जल कि बूंदे हमेशा ही शिवलिंग पर टपकती रहती हैंइस अद्भुत चमत्कार के कारण ही इसे टपकेश्वर कहा जाता है

मित्रों टपकेश्वर महादेव मंदिर एक प्राचीन मंदिर हैजो पौराणिक तीर्थस्थल हैयहां पर स्थित स्वयंभू शिवलिंग टपकेश्वर महादेव के नाम से विख्यात हैंसभी शिव भक्तों के लिए यह एक महत्वपूर्ण स्थान हैमंदिर में अनेक उत्सवों का आयोजन किया जाता हैजिसमें दूर-दूर से भक्त लोग शामिल होने के लिए आते हैंमंदिर में प्रत्येक माह की त्रयोदशी के समय टपकेश्वर महादेव का विशेष रूद्राक्षमय श्रृंगार दर्शन किया जाता है।।
देहरादून की खूबसूरत वादियों में स्थित प्रसिद्ध टपकेश्वर महादेव मंदिर का श्रद्धालुओं में विशेष महत्व है

देहरादून के गढ़ी कैंट क्षेत्र में नदी के किनारे बने इस मंदिर में भगवान शिव के शिवलिंग और उस पर चमत्कारिक रूप से टपकती पानी की बूंदों के दर्शन होते हैंइस मंदिर में जिस स्थान पर शिवलिंग की स्थापना है। दरअसल उसके ठीक ऊपर की चट्टान से हमेशा ही पानी की बूंदें शिवलिंग पर टपकती रहती हैंइस अद्भुत चमत्कार के कारण ही शिव जी के इस मंदिर को टपकेश्वर महादेव मंदिर कहा जाता है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार यह स्थान गुरु द्रोणाचार्य की साधना स्थली भी रहा हैउन्हीं के द्वारा यहां शिवलिंग की स्थापना किये जाने की लोक कथाएं प्रचलित हैंमंदिर के निर्माण के बारे में कहा जाता है कि भारत भ्रमण के दौरान गुरु द्रोणाचार्य इस स्थान पर आयेयहां उनकी भेंट एक महर्षि से हुईद्रोणाचार्य जी ने महर्षि से भगवान शिव के दर्शन करने की इच्छा जाहीर कीइस अभिलाषा को पूरी करने के लिए महर्षि ने उन्हें ऋषिकेश की ओर प्रस्थान करने का परामर्श दिया और कहा कि ऋषिकेश यात्र के दौरान ही नदी के किनारे एक दिव्य स्थान पर वो शिवलिंग के दर्शन कर पायेंगे।

द्रोणाचार्य महर्षि के कहने के अनुसार ऋषिकेश जा पहुंचे और भगवान महादेव की तपस्या में लीन हो गयेद्रोणाचार्य की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिये और वर मांगने को कहाद्रोणाचार्य जी ने शिव जी से धनुर्विद्या का ज्ञान पाना चाहाभगवान शिव ने उन्हें धनुर्धर का ज्ञान दिया और द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी को पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद भी दियाभगवान की कृपा से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुईबालक का नाम अश्वस्थामा रखा गयालेकिन मां कृपी पुत्र को दूध पिलाने में असमर्थ थींइस कारण बालक के लिए दूध का प्रबंध करने के लिए गुरु द्रोण गाय लेने राजा द्रुपद के पास गये।लेकिन राजा ने उन्हें गाय देने से मना कर दियाइस पर गुरु द्रोण निराशा भरे मन से पुत्र अश्वस्थामा को समझाने का प्रयास करते हुए कहा कि समस्त गाय भगवान शिव के पास हैंइसलिए उनकी कृपा से ही तुम्हें दूध की प्राप्ति हो पायेगीतब बालक ने मन में शिव की आराधना करने का दृढ़ निश्चय किया भगवान भोलेनाथ बालक की अराधना से प्रसन्न हुए और जब शिव के सामने बालक रोने लगा और उसके आंसुओं की कुछ बूंदें अनजाने में ही शिवलिंग पर गिरींजिससे शिवलिंग का अभिषेक हो गयाइससे भगवान शिव द्रवित हो गये।कहा जाता है तभी से शिवलिंग के ऊपर की एक चट्टान से जलधारा बहने लगी।

टपकेश्वर महादेव के इस प्राचीन मंदिर की सिढ़ीयों पर चढ़ते हुए श्रद्धालुओं का उद्देश्य सिर्फ भोले बाबा के दर्शन करना हैप्राकृतिक सुंदरता से भरपुर इस मंदिर की सुंदरता देखते ही बनती हैमंदिर का मुख्यद्वार बड़े ही सुंदर तरीके से बनाया गया हैसुनहरे रंग से लिखा हुआ टकेश्वर महादेव का नाम दूर से ही नज़र आने लगता हैमंदिर में आने वाले भक्तों को भोलेनाथ के अनेंको रूप के दर्शन होते हैंयमकेश्वर महादेव,ओंमकारेश्वर महादेव और भी ना जाने महादेव के कितने रूप के दर्शन भक्तों को होते हैंगुफा में चलते हुए भक्त टपकेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं,जो पिंड़ी रूप में यहां विराजमान हैं और साथ में ही एक विशाल त्रिशुल,डमरू भगवान आशुतोष के होने की अनुभूती कराते हैंबड़े श्रद्धा भाव से लोग यहां आकर बाबा को नारियल का प्रसाद चढ़ाते हैं और हाथ जोड़कर बाबा से प्रार्थना करते हैंमहादेव के साथ-साथ मंदिर में और भी देवी देवताओं के मंदिर हैं।

इस मंदिर की एक खास बात ये है कि यहां आने वाले भक्त गुफा में प्रवेश करते ही झुक जाते हैं और सबसे खास बात ये कि गुफा की दिवारों से पानी की बुंदे गिरती रहती हैंये पानी कहां से आता है,ये कोई नहीं जानताआश्चर्य कर देनें वाला ये दृश्य हमारे मन में आस्था और भक्ती को और मजबूत कर देती हैपहाड़ों से गिरती हुई यही पानी की बुंदें महादेव के पिंड़ी रूप पर गिरती है

भगवान भोलेनाथ की महिमा अद्भुत हैहमारी  जितनी आस्था भगवान के उतनें रूप और हर रूप निरालातभी तो उत्तराखण्ड को देवभूमी कहते हैं, जहां देवी-देवताओं का वास होता हैप्राकृतिक रूप से सम्पन्न हिमालय की सुंदर घाटियों में बसे देहरादून में बाबा का ये मंदिर यहां की सुंदरता को और बढ़ा देता है।
यहीं पर स्थित है संतोषी माता का मंदिर।जिसके पास ही एक जगह ऐसी भी है जहां निरंतर बारीष होती रहती है,जो किसी आश्चर्य से कम नहीं हैऐसा अद्भुत नजारा सिर्फ देवभूमी की हरी भरी वादियों में ही देखनें को मिल सकता है। 

संतोषी माता मंदिर की सिढ़ीयां चढ़ते ही हमें कपिल मुनी महाराज की कुटीया नज़र आ जाती है और मंदिर के मुख्य द्वार पर एक बड़ी विशाल प्रतिमा  महावीर हनुमान की हैजो भगवान शिव के अवतार हैंमारूती नंदन की मुर्ति देखते ही बनती हैमंदिर में होनें वाली महादेव की भव्य आरती देखते ही बनती है।दोस्तों मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए प्रसाद की दुकानें भी यहां पर हैं।जहां पूजा के लिए ज़रूरी सामान भक्तों को मिल जाता है। इसके अलावा यहां की दुकानों पर धार्मिक पुस्तकें भी मौजुद हैंजिसका अध्ययन करके हम यहां के इतिहास से रूबरू हो सकते हैंटपकेश्वर महादेव का ये मंदिर सिद्धपीठ माना जाता हैलोकमान्यता है कि जो कोई श्रद्धालू सच्चे मन से इस स्थान पर विधिवत पूजा कर भगवान शिव से प्रार्थना करता हैउसकी मनोकामना जरूर पूरी होती है

साथियों पर्यटन के साथ अगर दर्शन का सुनहरा अवसर भी मिल जाए तो क्या कहने।फिर देर किस बात की।इस बार छुट्टीयां देहरादून में बीताकर कर देंगे।देवभूमि में देवाधिदेव के दर्शन का मिलेगा सौभाग्य।होगी मनोकामना पूरी और प्रकृति से होगा आपका साक्षात्कार।।



Sunday, 1 November 2015

कुलधरा:कहां गए 84 गांव के लोग...?




संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों ये कहानी सुनने में आपको फिल्मी जरुर लगेगी लेकिन सौ फीसदी सच है। जरा गौर करेंगे-ये दास्तां है उस चमन की,जहां की बस्तियां कभी गुलजार हुआ करती थीं।जहां की उन्नती,तरक्की और खुशहाली औरों को मुंह चिढ़ाती थी।लेकिन ना जाने वो कौन सी मनहुस घड़ी थी,जब इस गुलजार चमन में एक क्रुर माली की नज़र पड़ी और ये बाग अपने ही बागवान की गंदी नज़र से बेजार हो गया।कहते हैं खूबसूरती ईश्वर का दिया हुआ एक वरदान है,लेकिन कभी-कभी यह शाप भी बन जाती है। दरअसल जैसलमेर से लगभग 20 किलोमीटर दूर एक गांव जो इस बात की गवाही देता है जो अब वीरान हो चुका है।अब इस गांव की हर शामे-ए-सुबह उदास है। दोस्तों पत्थरों की इस सुनसान बस्ती में फैला ये सन्नाटा जुर्म का है। कहते हैं वर्षों पहले यहां जिंदगी क्या उजड़ी  परिंदों की परवाज भी थम कर रह गई।बस्ती पर हावी ये खामोशी है जो घुलने के बाद भी आवाज पुर्जा-पुर्जा हो जाती है।ये ना तो श्मशान है,और ना ही कब्रिस्तान।दरअसल जैसलमेर से करीब 20 किलोमीटर की दूरी पर पत्थरों से बनी ये वो 84 बस्तियां हैं या यूं कहें कि 84 गांव हैं जो कभी पालिवाल ब्राह्मणों के गांव  थे।इन पत्थरों में दफन 84 गांवों की वो खौफनाक दास्तां है जो एक रात में ही बस्ती से पत्थर बन गयी।

वर्षों पहले यहां भी कभी जिंदगी बसा करती थी।करीब 150 साल तक पूरी तरह आबाद और गुलजार रहे इस गांव को जैसलमेर के दीवान सालम सिंह की नज़र लग गई।ये वो सालिम सिंह था जो एक दिवान होते हुए भी पूरे गांव का बेताज बाहशाह बन बैठा था।जहां से भी वो निकलता वहां के लोग अपने आप को महफूज समझने के लिए दरवाजों को अंदर से  बंद कर लिया करते थे।सालम सिंह की अय्याशियों से यहां का ज़र्रा जर्रा वाकीफ था।कहते हैं जिस पर भी उसकी नजर पड़ जाती,उसे वो किसी भी हालत में अपने हरम में ले ही लेता था।सालिम सिंह के आतंक से हर कोई हैरान परेशान था।तभी दिवान सालिम सिंह की वहशी नजर अचानक गांव की एक सुंदर लड़की पर पड़ गई।जिसे देखकर वो सब कुछ भूल गया और इतना उतावला हो गया कि 50 साल का सालिम उस लड़की को किसी भी हालत में हासिल करना चाहता था।लेकिन कहते है कि लड़की की इज्जत वो चीज है,जो ना तो खरीदी जाती है और ना ही तय की जाती है।उसके लिए तो उसका इमान धर्म सब कुछ उसकी इज्जत ही है,उसकी अस्मत ही है।

कहते है कि मिसालें तो  बहुत मिलती है,पर कुछ मिसालें याद की जाती है। ये मिसाल भी सिर्फ एक शख्स की नहीं,एक घर की नहीं,और एक गांव की भी नही,बल्की पूरे 84 गावों के हजारों लोगों की मिसाल है।सालिम सिंह ने उस ब्राह्मणो के गांव पर अपना दबाव बनाना शुरू कर दिया और लड़की के घर संदेशा भिजवा दिया की अगली पूर्णमासी तक या तो लड़की  को उसके हवाले कर दें नही तो वो सुबह होते ही गांव पर धावा बोल कर लड़की को जबरन उठा ले जाएगा। गांव वालों ने दिये गए समय पर कम और धमकी पर ज्यादा ध्यान दिया।84 गांवों के ब्राह्मणो ने मिलकर गांव में ही मंदिर के पास एक बैठक की क्योंकि एक जवान बेटी को एक अधेड़ उम्र के दिवान को सौपना गांव वालों की गैरत के खिलाफ था। इसलिए गांव वालों ने पंचायत में फैसला किया कि वो अपनी जवान बेटी को एक दिवान को नही देगें।उसके बदले वो पूरे गांव राजस्थान की विरासत से कहीं दूर चले जायेंगे।वो काली रात धिरे-धिरे और गहरी होती गई,और सुरज की किरणें जिस गांव को कभी रौशन किया करती थी,वो सुबह तो हुई लेकिन 84 गांवों ने जो फैसला किया, वो हमेशा के लिए एक मिसाल बन गई।एक ही रात में पूरा गांव खाली हो गया।जुल्मों सितम के खिलाफ ना झुकने की जिद के साथ ही ये एक ऐसी दास्तां थी। जिसमें एक संतान ही नही बल्की एक गांव की इज्जत भी कलंकित होती।इससे पहले कि उनकी इज्जत कंलकित होती।

गांव वालों ने रातों-रात 84 गांव खाली कर दिये और जाते-जाते गांववालो ने एक एसा श्राप  भी दिया कि दोबारा इस गांव में कोई नही बस पायेगा।गांव वाले तो लौटकर कभी नही आये। कई लोगों ने इस गांव को बसाने की कोशिश भी की। लेकिन वो कोशिश नाकाम रही।जो भी उन घरो मे रहने की कोशिश करता या तो वो बर्बाद हो जाता। या तो ऐसी मुसीबत आती कि उसे अपनी जान से हाथ धोना पड़ता।बसा बसाया ये गांव उजड़ने के बाद आबाद तो नही हुआ,पर सरकार की एक कोशिश जरूर पूरी हो गई।सरकार ने तमाम गांवों की घेराबंदी कर  मुख्य दरवाजे पर एक चौकीदार को बैठा दिया। उजड़ने के बाद भी यह गांव पर्यटकों की जेब से पैसे निकालकर सरकार की झोली जरूर भर रहा है।उजड़ने के बाद भी यह पत्थर बिखरा तो है लेकिन टूटा अब भी नही है।घर की बहू बेटी की इज्ज़त की खातिर इन पत्थर के घरो मे रहने वालों ने जो बलिदान दिया वो कोई दूसरा नही दे सकता।

 दोस्तों कहते हैं कि सूरज की तपिश कम होते ही शाम अपना आंचल फैलाकर जैसे ही इस हवेली को अपने आगोश में लेती थी तो सारा गांव दहशत में डूब जाता था।हर कोई अपने आप को किसी तरह इस हवेली से कहीं दूर,बहुत दूर ले जाना चाहता था।ताकि कलेजा चीर देने वाली चीखें उसके कानों में न टकराये। बस यूं समझ लिजिए की, अंधेरा होते ही ये हवेली बाकी दुनिया से कट सी जाती थी।क्योंकि ऐसी शायद ही कोई शाम रही होगी,जब जबरन कोई डोली इस हवेली के दरवाजे पर न रूकी हो।कहते हैं शाम को एक डोली इस हवेली के दरवाजे पर जरूर-जरूर रूकती थी।जिसमें सवार होती थी एक मासूम दुल्हन जो रोजाना सालिम सिंह की ऐशगाह में पेश की जाती थी।उसके बाद बाहार की दुनिया क्या होती है।वो लड़की ये जान ही नही पाती थी।जी हां बाहर की दुनिया में दर्द की सिद्दत में डूबी मौत की एक चीख इस हवेली से जरूर उठती थी। 

जैसलमेर से करीब 15 किमी रेत के इस संमुदर के बीच सर उठाए खड़ी इस हवेली के बाहर आने वाली खौफ़नाक चीख तो खत्म नही हुई पर आईये आपको उस शख्स के बारे में बता ही देते है,जिसके नाम से ही वहां के लोगों की आज भी चीख निकल जाती है।वो है वही दिवान सालम सिंह जिसके बारे में हम आपको पहले से ही रूबरू कराते आ रहे है।इस हवेली का मालिक।जिसे लोग नाम से सालिम नही जालिम कहते थे।दिवान सालिम सिंह की इस हवेली में कितनी जवान लड़कियों की चीख दफ़न है।कहना नामुमकिन है।गिनती लगाने वाले गिन-गिन कर थक गए,लेकिन फिर भी ये पता ना लगा पाये।बस यूं समझ लिजिए कि ये हवेली उन हजारों लड़कियों की कब्रगाह है। जिन्हे डोली में बैठाकर यहां लाया जाता था।उन लड़कियों को यहां दिल बहला देने वाले खिलौने की तरह से इस्तेमाल किया जाता था, और जब दिल भर जाता था,तब उनकी चीख एक आखिरी चीख में तब्दील हो जाती थी।कहते है इस विरान हवेली में वो दर्द भरी चीख आखिरी आवाज होती थी।जैसलमेर के नजदीक ये खूबसूरत बेजान हवेली नफरत है ऐसी दिल दहला देने वाली उस आखिरी चीख  की जो हर रोज इस हवेली में खामोश बनकर दफ़न है।

जैसलमेर से करीब अठारह किलोमीटर की दूरी पर बसा ये है कुलधरा गांव।जो कभी पालीवाल ब्रहमणों का गांव हुआ करता था।मेहनती और रईस पालीवाल ब्राम्हणों के कुलधरा गांव को कहते हैं सन 1291 में बसाया गया था।तकरीबन छह सौ घरों वाले इस गांव का नाम पालीवाल का नाम इसलिए पड़ा कि इस गांव में रहने वाले ब्राम्हण राजस्थान के पाली इलाक़े के रहने वाले थे।इन ब्राह्मणों ने पालीवाल ब्राम्हण होते हुए भी अपनी बुद्धि, कौशल और अटूट परिश्रम के रहते धरती पर सोना उगाया था।हैरत की बात ये है कि पाली से कुलधरा आने के बाद पालीवालों ने रेगिस्तानी सरज़मीं के बीचोंबीच इस गांव को बसाते हुए खेती पर केंद्रित समाज की कल्पना की थी। रेगिस्तान में खेती पालीवालों के समृद्धि का रहस्य थी।परत वाली ज़मीन को पहचानना और वहां पर बस जाना।पालीवाल अपनी वैज्ञानिक सोच, प्रयोगों और आधुनिकता की वजह से उस समय में भी इतनी तरक्की कर पाए थे।

पालीवाल समुदाय हमेशा खेती और मवेशी पालने पर निर्भर रहता था और बड़ी शान से जीता था। और इनकी सबसे दिलचस्प बात ये होती थी कि रेगिस्तान में पालीवालों ने इस सतह पर बहने वाली नदी या ज़मीन पर मौजूद पानी का सहारा नहीं लिया बल्कि रेत में मौजूद पानी का इस्तेमाल किया।कहते हैं पालीवाल अपने गांव ऐसी जगह पर बसाते थे,जहां धरती के भीतर जिप्सम की परत हो।इसी से पालीवाल खेती करते,और उससे जबर्दस्त फसल पैदा करते।पालीवालों ने ऐसी तकनीक विकसित की थी कि बारिश का पानी रेत में गुम नहीं होता था,बल्कि एक खास गहराई पर जमा हो जाता था।कहते हैं कि जैसलमेर के दिवान सालिम सिंह को कुलधरा की ये खासियत बर्दाश्त नहीं हुई और उसने कुलधरा के बाशिंदों पर भारी टैक्स लगा दिये और उन पर रोजाना इतने अत्याचार करने शुरू कर दिए कि वो एक दिन राजस्थान की सरज़मीं को छोड़कर अपनी विरासत से इतनी दूर चले गये कि वो फिर कभी लौटकर नही आये।और एक आबाद गांव बर्बादी के काल के गाल में समां गया....।।।


मित्रों ये थी कुलधरा की दास्तां,जहां एक मनहूस नज़र ने हंसते खेलते चमन को बिरान कर दिया।ये कहानी उतनी ही सच है जितनी मैने कुलधरा जाकर इकट्ठी की है,आपको यकिन ना आए तो कुलधरा जरुर जाएं,आपका एक टूर भी हो जाएगा और ज्ञानवर्धन भी। 

गोवर्धन पर्वत:भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के साक्षी


संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों कहते हैं धर्म,अर्थ काम और मोक्ष की प्राप्ती के लिए भगवान को भी धरती पर अवतार लेना पड़ा,चलिए आपको धर्म यात्रा के एक ऐसे पड़ाव और ऐसी जगह लेकर चलते हैं,जिनका नाम लेते ही मन चंचल हो उठता है,जिसकी लीलाओं के बारे में जानने की जिज्ञासा बढ़ जाती है...ठीक समझे आप,हमा बात कर रहे हैं मथुरा के गोवर्धन पर्वत की। उसी गोवर्धन पर्वत की जो श्याम सलोनें कृष्ण की लीलाओं के साक्षी हैं,यानि कि गिरिराज पर्वत।

मित्रों उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले का गोवर्धन एक एसा स्थान है,जिसके प्रति लोगो में अपार श्रद्धा है।मथुरा के पवित्र गोवर्धन क्षेत्र में ही स्थित है श्रीगिरिराज जी महाराज दानधाटी मंदिर जो एक पवित्र और रमणीक स्थल है।कहते हैं श्रद्धालू ब्रज की परिक्रमा की शुरूआत गिरिराज महाराज के इस मंदिर मे दर्शन करने के बाद ही शुरू करते है। श्रीगिरिराज जी महाराज,दानधाटीमंदिरगोवर्धन,मथुरा।मथुरा के आस पास के चौरासी कोस का क्षेत्र ब्रज भूमि कहलाता है।ब्रज भूमि का कोना कोना श्रीकृष्ण की लीलाओं का साक्षी होने के कारण पवित्र और पूजनीय माना जाता है।श्रीगिरिराजजी के इस मंदिर में श्रद्धालू दर्शन करने के बाद परिक्रमा लगाना शुरू करते हैं।बेहद खूबसूरत और सुन्दर तरीके से बना ये मंदिर बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है।इस मंदिर के बारे में भी अनेंकों कथाऐं प्रचलीत हैं।कहते हैं यही वो जगह है जहां माखनचोर श्रीकृष्ण गोपियों को रोककर उनका माखन खाया करते थे।

इस मंदिर की शोभा और भव्यता देखते ही बनती हैं।विराट और आकर्षक दिखने वाले इस मंदिर की नक्कासी भी अद्बुत और अनुठी है।मंदिर के बीच वाले गुम्बद पर एक मनोहारी झांकी बनाई गई है।जिसमें भगवान श्रीकृष्ण एक हाथ में गोवर्धन पर्वत और दूसरे हाथ में बंसी बजाते हुए खड़े हैं और साथ में सभी ग्वालबाल गऊवों के साथ पूरा ब्रजमंडल खडा दिखाई दे रहा है।श्याम सलोने श्रीकृष्ण की ये झांकी श्रीगिरिराज मंदिर की शोभा को और भी बढ़ा देती है।

ये मंदिर मुख्य रूप से श्रीगिरिराज जी महाराज को समर्पीत है लेकिन मंदिर में अन्य देवी देवताओं की भी भव्य झांकियां और मूर्तियां हैं।मंदिर परिसर में श्रीकृष्ण के जन्म की भी बेहद सुन्दर झांकी बनी हुई है।इस मंदिर में शाम होते ही गिरिराज महाराज की भव्य आरती होती है।जिसमें सैकड़ों की संख्या में भक्त शरीक होते हैं और इस मनमोहक आरती का आनंद लेते हैं।इस आरती में शामिल होकर श्रद्धालु आत्मिक शांती का अनुभव करते हैं,और पूण्य लाभ प्राप्त करते हैं।आरती के गूंजते स्वर और घंटीयों की आवाज़ वातावरण को दिव्य बना देती है।

मित्रों गिरिराज जी महाराज को दूध, दही, मक्खन बहुत प्रिय है,इसलिए इन्हें दूध से बनी वस्तुए अर्पीत की जाती हैं।शाम को मंदिर की छटा देखते ही बनती है।ऐसा लगता है मानों ज्ञान रूपी प्रकाश सभी दिशाओं में फैल रहा है।धन्य हैं श्याम सलोनें और धन्य है उनके लीलाओं की नगरी मथुरा और उसका ब्रज क्षेत्र। 

गोवर्धन गिरिराज पर्वत जो की 21 किमी में फैला हुआ है।कहीं समतल तो कहीं ऊंचाईयां गिरिराज पर्वत की देखते ही बनती है।इस पर्वत के बारे में अनेंको कथाए प्रचलित हैं।गर्ग सहिंता में गोवर्धन पर्वत को द्रोनाचल पर्वत का पुत्र कहा गया है। गोवर्धन के मनोहारी रूप को देखकर एक बार पुलस्त्य ऋषि मोहित हो गये और उन्होंने द्रोनाचल से गोवर्धन को काशी ले जाने की इच्छा व्यक्त की और बोले मै अपने तपोबल से इस पर्वत को सूक्ष्म रूप प्रदान करूंगा उसके बाद इसे हथेली पर उठाकर काशी ले जाऊंगा।.ऋषि का मान रखने के लिए गोवर्धन ने अपनी स्वीकृति दे दी लेकिन साथ ही एक शर्त भी रख दी की रास्ते में यदि आप मुझे कहीं रख देंगे तो फिर मैं वहां से नही उठूंगा।ऋषिवर ने गोवर्धन पर्वत की वह शर्त मान ली।उन्होंने अपने योगबल से पर्वत को लघु रूप प्रदान कर दिया और काशी की ओर चल पड़े।ब्रिज मंडल आने पर ऋषि ने पर्वत को लघु शंका लगने के कारण वहीं रख दिए और अपनी शर्त भूल गए।काफी प्रयास करने के बाद भी जब पर्वत नहीं उठा,तब ऋषिवर क्रोधित हो गये और पर्वत को शाप दे दिया की तुम्हारी ऊंचाई रोज़ एक तिल के बराबर घटेगी।तुम तिल तिल कर के जमीन में धंसते चले जाओगे।एक दिन तुम अद्रश्य हो जाओगे।इसी शाप के कारण गोवर्धन पर्वत तिल तिल कर के घट रहा है।कहते है गोवर्धन पर्वत पहले काफी ऊंचा था,इसकी ऊंचाई मथुरा में बहती यमुना पर पड़ती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है।

गिरिराज मंदिर के विषय में एक और पौराणिक मान्यता है कि श्री गिरिराज को हनुमान जी उत्तराखंड से ला रहे थे उसी समय एक आकाशवाणी सुनकर वे पर्वत को ब्रज में स्थापित कर देते हैं और भगवान श्री राम के पास लौट जाते हैं।आदि वाराह पुराण के अनुसार,त्रेतायुग में जब भगवान् श्री रामचन्द्रजी समुद्र पर सेतू का निर्माण करवा रहे थे,उस समय हनुमान जी गोवर्धन पर्वत को उठा कर सेतू निर्माण के लिए ला रहे थे।तभी महाबली को आकाशवाणी सुनाई दी कि समुद्र पर सेतू बन गया है।अब शिलाओं की जरुरत नहीं है।इतना सुनते ही हनुमान जी ने पर्वत को वहीं रख दिया। इससे दुखी होकर गोवर्धन ने कहा की आपने मुझे श्री राम के चरण स्पर्श करने के सौभाग्य से वंचित कर दिया अब मेरा क्या होगा।हनुमान जी ने गोवर्धन जी को आश्वासन दिया कि द्वापर युग में श्री कृष्ण अवतार की लीलाओ में आपको स्थान मिलेगा और बाद में यह सच साबित हुआ।जैसा कि हिन्दु धर्मग्रंथो में लिखा गया है।

मथुरा और वृ्न्दावन में भगवान श्री कृ्ष्ण से जुडे अनेकों धार्मिक स्थल है,किसी एक का स्मरण करों तो दूसरे का ध्यान स्वत: ही आ जाता है।मथुरा के इन्हीं मुख्य धार्मिक स्थलों में गिरिराज धाम का नाम आता है।सभी प्राचीन शास्त्रों में गोवर्धन पर्वत का वर्णन किया गया है।गोवर्धन के मह्त्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि गोवर्धन पर्वत गोकुल पर मुकुट में जडित मणि के समान चमकता रहता है।गोवर्धन धाम से जुडी एक अन्य कथा के अनुसार गोकुल में इन्द्र देव की पूजा के स्थान पर गौ और प्रकृ्ति की पूजा का संदेश देने के लिये इस पर्वत को भगवान श्रीकृष्ण ने अंगूली पर उठा लिया था। कहते हैं भगवान श्री कृष्ण ने इन्द्र की परम्परागत पूजा बन्द कर ब्रज में गोवर्धन की पूजा की शुरूआत की थी।ब्रज में प्रत्येक वर्ष इन्द्र देव की पूजा का प्रचलन था। इस पूजा पर ब्रज के लोग अत्यधिक व्यय करते थे जो वहां के निवासियों के सामर्थ्य से कहीं अधिक होता था।यह देख कर भगनान श्रीकृ्ष्ण ने सभी गांव वालों से कहा कि इन्द्र की पूजा के स्थान पर जो वस्तुएं हमें जीवन देती है,भोजन देती है,हमें उन वस्तुओं की पूजा करनी चाहिए। 

भगवान श्रीकृ्ष्ण की बात मानकर ब्रज के लोगों ने उस वर्ष इन्द्र देव की पूजा करने के स्थान पर अपनें पालतु पशुओ, सुर्य, वायु, जल और खेती के साधनों की पूजा की ।इस बात से इन्द्र देव नाराज हो गए और नाराज होकर उन्होनें ब्रज में भयंकर वर्षा की।इससे सारा ब्रजमंडल जलमग्न हो गया।जिसके बाद सभी ब्रजवासी भगवान श्रीकृ्ष्ण के पास आये और इस प्रकोप से बचने की प्रार्थना की। भगवान श्री कृ्ष्ण ने उस समय गोवर्धन पर्वत अपनी अंगूली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की।उसी दिन से गिरिराज धाम की पूजा और परिक्रमा करने का विशेष पुण्य की प्राप्ति होने की बात कही जाती है।इस प्रकार से गिरिराज जी को भगवान के दर्शन भी हो जाते हैं और पवन पुत्र हनुमान जी के वचन भी पूरे हो जाते हैं। 

कहते हैं गिरिराज महाराज के दर्शन कलयुग में सतयुग के दर्शन करने के समान सुख देते है।यहां अनेक शिलाएं है,उन शिलाओं का प्रत्येक खास अवसर पर श्रंगार किया जाता है।करोडों श्रद्वालु यहां इस श्रृंगार और गोवर्धन के दर्शनों के लिये आते है। गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा कर पूजा करने से मांगी हुई मन्नतें पूरी होती है,जो व्यक्ति 11 एकादशियों को नियमित रुप से गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करता है,इनके दर्शन करता है।उसे मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।  यहां के एक चबूतरे पर विराजमान गिरिराज महाराज की शिला बेहद दर्शनीय है।इसके दर्शनों के लिये भारी संख्या में श्रद्वालू जुटते है।महाराज गिरिराज की शिला को अधिक से अधिक सजाने की यहां श्रद्वालुओं में होड रहती है।भक्त इस शिला पर दुध चढ़ाते हैं,और अपनी उन्नती ,प्रगती की मंगल कामना करते हैं।

एक तरफ जहां ब्रज में गोवर्धन पूजा की धूम मची रहती है तो वहीं गिरिराज महाराज को दूध का अर्घ्य  दिया जाता है।जिसके लिए भक्तों का विशाल जनसमुह हर दिन यहां दर्शन के लिए आता है।ब्रज मे आकर श्रद्धालू दण्डौती परिक्रमा करते हैं।दण्डौती परिक्रमा इस प्रकार की जाती है कि आगे हाथ फैलाकर जमीन पर भक्त लेट जाते हैं और जहां तक हाथ फैलता हैं,वहां तक लकीर खींचकर फिर उसके आगे लेटते हैं।इसी प्रकार लेटते-लेटते या साष्टांग दण्डवत्‌ करते-करते परिक्रमा करते हैं जो एक सप्ताह से लेकर दो सप्ताह में पूरी हो पाती है।7 कोस की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर की होती है।परिक्रमा जहां से शुरु होती है,वहीं पर एक प्रसिद्ध मंदिर भी है।राधाकुण्ड से तीन मील पर गोवर्द्धन पर्वत है जो भी दर्शनार्थी यहां आते हैं वो राधाकुण्ड में स्नान करना नहीं भुलते।कहते हैं जिस तरह से भी आप यहां आकर पूजा करें,भगवान श्री कृष्ण खुश हो जाते हैं।भगवान श्री कृष्ण खुद आकर आपकी अराधना,पूजा को स्वीकार करते हैं।मित्रों संसार में श्रीकृ्ष्ण की उपासना अन्य देवों की तुलना में सबसे अधिक की जाती है।श्रीकृष्ण के विषय में यह मान्यता है कि ईश्वर के सभी तत्व एक ही अवतार अर्थात भगवान श्री कृष्ण में समाहित है।गिरिराज महाराज को भगवान श्रीकृ्ष्ण के जन्म उत्सव के अलावा अन्य मुख्य अवसरों पर 56 भोग का नैवेद्ध अर्पित किया जाता है।

गोवर्धन के महत्व की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना यह है कि यह भगवान कृष्ण के काल का एक मात्र स्थिर रहने वाला चिन्ह है।उस काल का दूसरा चिन्ह यमुना नदी भी है।लेकिन उसका प्रवाह लगातार परिवर्तित होने से उसे स्थाई चिन्ह नहीं कहा जा सकता है।वैष्णव जन गोवर्धन को भगवान् श्री कृष्ण का ही एक स्वरूप मान कर पूजा अर्चना करते है।यदि भक्त श्रद्धा भाव से पर्वत की परिक्रमा करें तो कहते हैं कि उनके सभी मनोरथ पूरे हो जाते है।

जी हां दोस्तों गिरिराज महाराज ही एक ऐसे देवता हैं जो हमें श्रीकृष्ण की लीलाओं की याद दिलाते हैं और ब्रज भुमि को विश्वभर में एक दर्शनीय स्थान के साथ एक रमणीक स्थल का स्वरूप प्रदान करते हैं।धन्य हैं गोवर्धन गिरिराज महराज।



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