Popular Posts

Sunday, 27 December 2015

सलमान खान का अर्ध शतक : बर्थडे स्पेशल



संदीप कुमार मिश्र: भाईजान यानी सलमान खान। बॉलीवुड के दबंग यानी सल्लु मियां,हर दिल अजीज आज जीवन का अर्ध शतक लगा चुके यानि सलमान खान 50 साल के हो गए है। फिल्म जगत में 'प्रेम' के नाम से अपनी शानदार पहचान बनाने वाले सलमान हर दिल अजाज और नेकदिल इंसान हैं।देस के युवा दिलों की धड़कन हैं सलमान खान। इस बात में किसी को शक नहीं है।जबकि दोस्तों बजरंगी भाईजान की जितनी चर्चा उनकी फिल्मों की वजह से होती है उतनी ही ज्यादा सुर्खियां सलमान खान की व्यक्गित जिंदगी को लेकर भी होती रहती है।50 साल पूरा करने के बावजूद वे बॉलीवुड के अब भी सबसे चहेते कुंवारे बने हुए हैं।जो कभी अपनी पूर्व प्रेमिका ऐश्वर्या राय को थप्पड़ मार देने की वजह से चर्चा में रहे तो कभी शाहरुख से सार्वजनिक रूप से झगड़ करने के कारण।लेकिन जब बिग बॉस के शो में सलमान और शाहरुख एक मंच पर नजर आते हैं तो उनकी दरियादिली और दोस्ती फिर से देखने को मिल जाती है।

दरअसल सलमान खान बॉलीवुड में बस नाम ही काफी है। सलमान खान माया नगरी के ऐसे स्टार हैं, जो पिछले 25 सालों से बॉलीवुड पर लगातार अपना दबदबा बनाए हुए हैं।जिस फिल्म में भाईजान होते हैं वो फिल्म नाम से ही हिट हो जाती है।सलमान खान के पीछे भले ही उनके पिता सलीम खान का नाम हो, लेकिन अपनी मंजिल को तय करने के लिए दबंग खान को बड़ी मेहनत करनी पड़ी। 27 दिसंबर 1965 को जन्मे सलमान खान के पिता सलीम खान फिल्म इंडस्ट्री के जानेमाने स्क्रिप्ट राइटर हैं। जबकि मां का नाम सलमा है। सलमान की मां हिंदू हैं, इसलिए खुद सलमान कई बार कह चुके हैं कि वो आधे हिंदू हैं,और आधे मुस्लिम। उनके घर में एक तरफ जहां दिवाली के दिन पटाखे और दिए जलाए जाते हैं तो वहीं ईद के दिन सेवईयों से घर में खुशबू फैल जाती है।अभिनेता सलमान ने अपनी शुरुआती पढ़ाई ग्वालियर के सिंधिया स्कूल से की जिसके बाद वो मुंबई आ गए और आगे की पढ़ाई की।सिर्फ फिल्मी दुनिया के लोग ही नहीं,सलमान को हर कोई नेक दिल और सच्चा इंसान कहता है।


जहां कामयाबी और शोहरत होती है वहीं कुछ परेशानियां और मुश्किलें भी होती हैं।दरअसल मुश्‍किलें हिट-एंड-रन मामले ने सलमान की परेशानियां लगातार बढ़ाकर रखी।क्योंकि महाराष्‍ट्र सरकार ने सन 2002 के हिट-एंड-रन मामले पर हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला लिया है।उनपर आरोप है कि फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर उन्होंने गाड़ी चढ़ा दी थी,जिसमें एक युवक की मौत हो गयी थी।वहीं काला हिरन के शिकार मामले में भी वह आरोपी हैं।सलमान बीते समय में एक से बढ़कर एक  बुरे दौर से गुजरे। जब फिल्मों में उनकी शुरुआत हुई तो पहली फिल्‍म 'बीबी हो तो ऐसी' की।फिल्म तो ज्यादा नहीं चली लेकिन उसके बाद फिल्‍म 'मैंने प्यार किया' से फैंस के दिलों में सलमान घर कर गए। सन 1988 से फिल्मों में अपना भविष्य देखने वाले सलमान खान ने हर दौर के अनुसार फिल्मों की। सन 2000 के आसपास जब माया नगरी बदलाव के दौर से गुजर रही थी तो उस दौर में आयी सलमान की फिल्में बुरी तरह से पिट रही थी।उनकी 'हैलो ब्रदर', 'दुल्हन हम ले जाएंगे', 'चल मेरे भाई', 'हर दिल जो प्यार करेगा', 'कहीं प्यार न हो जाए', 'तुमको न भूल पाएंगे', 'हम तुम्हारे हैं सनम' जैसी वह फिल्में थी जिनमें सलमान लगभग एक जैसी भूमिकाओं में ‌दिखे और फैंस की उम्मीद पर खरा नहीं उतर पाए।यह सलमान खान के लिए एक बुरे सपने से कम नहीं था।ये वो दौर था जब सलमान अपने फिल्मी सफर के निचले पायदान पर आ चुके थे।


समय का बदलना बदस्तुर जारी रहा और अपने खराब दौरे से गुजर रहे सलमान के लिए 2003 का साल अच्छा रहा।इस वर्ष पर्दे पर उनकी फिल्म 'तेरे नाम' ने धुम मचा कर रख दिया।इस फिल्म ने सफलता का ऐसा झंडा गाड़ा कि 'तेरे नाम' फिल्म में सलमान खान का हेयर स्टाईल लोगों में खुब पसंद किया जाने लगा।तेरे नाम के बाद सलमान खान की हिट फिल्‍मों का दौर शुरु हुआ। इसके बाद की फिल्मों में सलमान के किरदारों में दर्शकों को अनेकों रंग देखने को मिले।जैसे 'मुझसे शादी करोगी', 'दिल ने जिसे अपना कहा', 'मैने प्यार क्यूं किया', 'लकी', 'नो एंट्री', 'क्योंकि', 'जानेमन' और 'पार्टनर' जैसी फिल्मों में सलमान हर उस रुप में नजर आए जिसे लोग देखना चाहते थे।वहीं दबंग फिल्म सीरिज ने उन्हें बॉलीवुड में प्रेम से दबंग बना दिया।

बॉलीवुड के सुपरस्टार सलमान खान के परिवार वालों ने रविवार को उनके लिए कुछ खास करने की योजना बनाई है। क्योंकि 'भाईजान' 50 साल के हो गए हैं। जबकि सलमान ने पहले इशारा दिया था कि वह जश्न के लिए वक्त नहीं दे पाएंगे, क्योंकि वह आनी आने वाली फिल्म 'सुल्तान' में अपनी भूमिका के लिए बॉडी बिल्डिंग में व्यस्त हैं।दोस्तों साल 2015 सलमान के करियर के लिहाज से, यह साल 'दबंग खान' के लिए बहुत ही बढ़िया रहा।क्योंकि उनकी फिल्में 'बजरंगी भाईजान' और 'प्रेम रत्न धन पायो' कामयाब रहीं। वहीं, बंबई हाईकोर्ट ने उन्हें 2002 के हिट एंड रन मामले में बरी कर दिया जो कि सलमान के लिए एक बड़ी राहत है।


अंतत: सलमान खान का हर चाहने वाला यही चाहता है कि जिस तरह से उन्होने सफलता का अर्ध शतक पूरा किया वैसे ही जींदगी को खुशहाली से जीते रहें,अपने चाहने वालों को अच्छी फिल्मों के माध्यम से आनंदित करते रहें।स्वस्थ रहें मस्त रहें और अपनो के चहेते बने रहें।जन्म दिन पर हम सब की शुभकामनाएं उनके साथ हैं...और सुल्तान की कामयाबी के लिए भी..।।

मिर्जा ग़ालिब याद आते हैं


हम आह भी भरते हैं तो हो जाते बदनाम,
वो कत्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती


संदीप कुमार मिश्र: दोस्तों आज मिर्जा ग़ालिब साहब का जन्म दिन है।याद तो होंगे ही आपको गालिब साब..।हर जबां दिलों की धड़कन,गज़ल गायकों की ज़ुबान हैं गालिब साब।पेरम की उनुठी मिसाल हैं गालिब साब।और क्या कहें जनाब गालिब साब तो बेमिसाल हैं। अब इसे खुदा का शुक्र कहें,या फिर मान लें कि इस दुनिया में कोई ऐसा शायर आया जिसने अपने अल्फ़ाज सें दबी नस्लों में रूहानियत का इक़राम पैदा कर दिया। जिसकी उम्र महज़ 11 साल लेकिन फारसी और उर्दू में पकड़ ऐसी मानों हर बात पर ख़ुद ख़ुदा ही तस्दीक़ कर रहा हो।
दरअसल गालिब साब की शेरो-शायरी की पूरी दुनिया क़ायल है। उर्दू शायरी को जनाब गालिब साब ने ऐसा क्लासिकी मुक़ाम दिया कि उर्दू अदब को उन पर नाज़ है। उनका अन्दाज़ें बयां हर आमो-ख़ास को पसन्द है।वे अपने आप में बेमिसाल हैं।जी हां ऐसे ही थे शायरे आज़म जनाब मिर्जा ग़ालिब साहब।
असद' उस जफ़ा पर बुतों से वफ़ा की, मिरे शेर शाबाश रहमत खुदा की
दोस्तों कहते हैं कि इतिहास वही बनाते हैं, जो दुनिया की सारी सीमाओं को तोड़कर, जज़्बातो के बवंडर से नई सूरत तैयार करते हैं।ऐसी शख्सियतें खुद अपनी सोच के जादू से एक अलग दुनिया रचते हैं।ऐसा शख्स जिसने प्रेम और दर्शन के नए पैमाने तय किए, पर जिसकी जिंदगी खुद ही वक्त और किस्मत के थपेड़ों से लड़ती रही, लेकिन थकी नहीं।गालिब की कलम ने दिल की हर सतह को छुआ, किसी भी मोड़ पर कतराकर नहीं निकले।जिंदगी ने उनकी राह में कांटे ही बोए लेकिन मिर्जा गालिब उनका जवाब अपने लफ्जों के गुलों से देते रहे। गालिब के शेर शब्दों के हुजूम नहीं बल्कि जज्बातों की नक्काशी से बनी मुकम्मल शक्ल है।
हर एक बात  पे कहते हो तुम कि तू क्या है...तुम्ही कहो  कि ये अन्दाज़े ग़ुफ्तगूं क्या है।
रगों में दौड़ते  फिरने के हम नहीं क़ायल...जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।।
कहते हैं कि उन दिनों ग़ालिब के बारे में दो बातें बहुत मशहूर हुआ करती थीं,जिसकी अक्सर चर्चा होती।एक तो वे फ़लसफी शायर थें,दूसरे उनके कलाम बहुत मुश्किल होते थें। मुशायरों, जलसों व महफ़िलों में इनकी मुश्किलगोई के चर्चे आम थे।लोग कहतें कि अच्छा तो कहते हैं पर भई बहुत मुश्किल कहते हैं
मिर्ज़ा असद्दुल्लाह खां, जिन्हें सारी दुनिया मिर्जा 'ग़ालिब' के नाम से जानती है। उनका जन्म 27 दिसम्बर सन् 1797 ई. उनके ननिहाल आगरा के कालामहल में हुआ था। मिर्जा गालिब जब महज़ 5 वर्ष के थे तब उनके वालिद एक लड़ाई में शहीद हो गए।वालिद का साया सर से उठने के बाद चचा नसीरुल्लाह बेग़ खान ने इनका पालन पोषण किया।ग़ालिब के बचपन में अभी और दुःख शामिल होने थे।जब वे 9 साल के थे तब चचा जान भी दुनिया से अलविदा कह गये।मिर्ज़ा तेरह वर्ष के हुए तो उनकी शादी 09 अगस्त 1890 को लोहारू के नवाब अहमद बख्श खां के छोटे भाई मिर्जा इलाही बख्श मारूफकी लड़की उमराव बेगम से हुई।उस वक्त उमराव बेंगम की उम्र केवल 11 वर्ष की थी।गालिब के सात बच्चे भी हुए,पर अफ़सोस की एक के बाद एक उन पर बिजली गिरती चली गई।सातों बच्चे अल्लाह को प्यारे होते गये। मित्रों मिर्जा साब की निजी जिंदगी सचमुच में दर्द की एक लम्बी दास्तां थी।
दिल ही तो है न संगो-खिश्त, दर्द से भर न आए क्यों,
रोयेंगे हम हज़ार बार, कोई हमें सताए क्यों.
आगरा शहर को छोड़ना और दिल्ली में बसने के दौर ने ग़ालिब के जीवन में काफी बदलाव ला दिया दिल्ली में उन दिनों शायराना माहौल था।रोज़ाना महफिलें गुलज़ार होतीं और मुशायरों का दौर चलता था।ग़ालिब का भी उन मुशायरों में जाना होता था।वे दिन-ब-दिन दिल्ली की रंगीन महफिलों में ढ़लने लगे। ग़ालिब साहब बहुत जल्द शोहरत की बुलंदियों पर पहुंच गये।उन्होने उर्दू शायरी को एक नया आयाम दिया।वे उर्दू शायरी को तंग गलियारों,हुस्न और इश्क,गुलो और बुलबुल में न घुट कर शायरी को नई पहचान दी।बल्कि ग़ालिब साहब के शेरों में दर्शन का झलक मिलने लगी।वे सूफी ही नहीं,उनका यह शेर काबिले गौर है-
ये मसायले तसव्वुफ ये तेरा बयान ग़ालिब,
तुझे हम वली समझते जो न बादाखार होता।
हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़े-बयां और।।
आज जानकर हैरान हो जाएंगे कि गालिब साहब का स्वभाव बेहद खर्चिला और उदार था।जिसके चलते अक्सर वे तंगहाल रहते।यहां तक की कभी-कभी पास में फूटी कौडी न होती।कहते हैं कि एक बार उधार की शराब पी कर पैसा न देने पर इन पर मुकदमा चला। मुकदमा मुफ्ती सदरूद्दीन की अदालत में था। आरोप सुनकर इन्होने सिर्फ एक शेर सुनाया-
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लायेगी हमारी फाकामस्ती एक दिन
इतना सुनते ही मुफ्ती साहब ने अपने पास से रूपये निकाल कर दिये और ग़ालिब को जाने दिया। साथियों गालिब साब खुद को नास्तिक मानते थे और कहते भी थे कि- -
हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन,
दिल को खुश  रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है।
ग़ालिब का दाम्पत्य जीवन कभी सुखी नहीं रहा,वह दुःख की एक लम्बी कहानी है जिसमें नायक व नयिका वेदनाओं का बोझ ढ़ोते हुए जिन्दगी पूरा करते हैं।उमराव का अहंकार एक तरफ और ग़ालिब का अहंकार दूसरी तरफ।टकराव बढ़ता गया और दोनों कटते गये।यही कारण था कि घर में दिल की छाया न पाने की वजह से ग़ालिब एक गायिका से दिल लगा बैठे और वह भी इनसे प्यार करने लगी।क्योंकि प्यार की कोई उम्र नहीं होती कोई सीमा नहीं होती।प्यार तो महज़ एक इत्तफाक है जो किया नहीं जाता हो जाता है।जैसा कि गालिब साहब को हो गया।लगातार कई वर्षों तक ग़ालिब का प्यार परवान चढ़ता रहा। अचानक उनका प्यार एक दिन इस दुनिया से गालिब साहब को अलविदा कह गया,और छोड़ गया उनके पास सिर्फ यादें औऱ गम के साये।जिससे ग़ालिब पूरी तरह से टूट गये।उनकी याद में दिल ने जो कहा गालिब साहब की कलम लिखने को मजबूर हो गयी-
तेरे दिल में गर न था आषो-बे-गम का हौसला,
तू ने फिर क्यों की थी गम गुसारी हाय-हाय।
उम्र भर का तू ने पैमाने वफा बाँधा तो क्या,
उम्र भर नहीं है पायदारी हाय-हाय।।
ज़िन्दगी की तल्ख़ियों और मुसीबतों को झेलते-झेलते ग़ालिब साहब इतने सख्त हो गये कि ग़म उन्हे हिला न सका।वे बेहद स्वाभिमानी स्वभाव के शख्स थे।कभी-कभी बेहिसाब मुसिबतों का सामना करना पड़ता और कभी हालात उनपर हाबी होने लगता।लेकिन उन्होने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया।
सन् 1852 ई. में दिल्ली कालेज में फारसी का अध्यापक बनाने का प्रस्ताव भेजकर टामसन ने ग़ालिब साहब को अपने बंगले पर मिलने को बुलवाया।टामसन ने कुछ ऐसी बात कही कि ग़ालिब साहब के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचा। और उन्होने नौकरी करने से इन्कार कर दिया। मुश्किलों से लड़ते-लड़ते एक दिन उन्हें लिखना ही पड़ा-
मुश्किलें मुझपर पड़ी इतना की आसां हो गर्यीं
तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर खुद एक शायर थे,और उनके हुकूमत में शायरों का कद्र था। सो उन्होने ग़ालिब साहब की मुफलिसी पर तरस खाकर उन्हे तैमूर खानदान का इतिहास फारसी में लिखने का काम सौंप दिया।इसी बीच ज़फर साहब के उस्ताद ज़ौक का इन्तकाल हो गया और वे अपना कलाम ग़ालिब को दिखाते। इसपर ग़ालिब ने एक दिन कहा-
हुआ है शाह का मुसाहिब फिरा है इतराता,
ग़ालिब साहब पर जफर का बहुत करम था शायद इसीलिए वे अक्सर उनकी शान में कसीदे पढ़ते रहते।
ग़ालिब वजीफाख्वार हो दो शाह को दुआ,वो दिन गये कि कहते थे कि नौकर नहीं हूँ मैं।
लोग बदले, निजाम बदला...। अगर कुछ नहीं बदला तो मिर्जा गालिब की तकदीर। जी हां निजाम बदलते ही बहादुर शाह ज़फर को कैद कर रंगून भेज दिया गया। साथ ही ग़ालिब की पेंशन भी रोक दी गयी। इन्होने सोचा कि शान्ति होने पर पेंशन चालू होगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।इसके बाद ग़ालिब ने चापलूसी वाला रास्ता अख्तियार किया और महारानी विक्टोरिया के शान में कसीदे गढ़ कर दिल्ली के अधिकारीयो के जरिये भिजवाया।फिर भी बात न बनी और 17 मार्च 1857 को दिल्ली के कमिश्नर ने यह लिख कर वापस कर दिया कि इसमें कोरी प्रशंसा है।हालात दिन-ब-दिन दुष्वार होते गये।यहां तक की घर के कपड़े-लत्ते बेचकर दिन कट रहे थे।जब गरीबी से गाविब साब काफी निराश हो गए तो दिल्ली से बाहर जाने का निर्णय लिया।खैर तय हुआ कि बीबी व बच्चे लोहारू जायें। वे अकेले रहना पसन्द किये और लिखा-
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहां कोई न हो
रामपुर के नवाब गोपाल दास तफ्ता और महेश दास जैसे करीबी दोस्तो के सहारे जिंदगी की आखिरी शाम ढ़लती रही।ग़ालिब दिन-ब-दिन टूटते चले गयें।पहले नातवां थे फिर नीमजान हुए।पेट की अतडियां मरोडे खाने लगीं।हालात ऐसे पड़े कि दो-चार सतर लिखने के बाद हाथ खुद-ब-खुद रूक जाते।फिर वह शाम आयी जिसने ग़ालिब साहब के इकहत्तर साल की लम्बी तड़प को खत्म कर उन्हे मौत के आगोश में हमेशा के लिए सुला दिया। 15 फरवरी 1869 की दोपहर ने इस अजीम शायर को हमेशा के लिए मौत की गहरी नींद की आगोश में ले लिया।नींद की ऐसी प्यास जो कभी खत्म न होने वाली थी।

अंतत: ज़िंदगी के इकहत्तर साल के लम्बे सफर में ग़ालिब ने उर्दू और फारसी की बेइन्तहां खिदमत कर खूब शोहरत कमायी।अपनी तेज़धार कलम की बदौलत उन्होने उर्दू शायरी को नया मुक़ाम, नई ज़िन्दगी और रवानी दी।उर्दू अदब में भले ही अनेकों शायर हुये हों लेकिन ग़ालिब के कलाम पढ़ने और सुनने वालों के दिलों की कैफ़ियत बदल देती है।ग़ालिब के कलाम आज भी गंगा के रवानी की तरह लोगों के ज़ेहन और ज़ुबान पर कल-कल करती हुई बह रही है और हमेशा लोगों के मष्तिष्क पटल पर ज़िन्दा रहेंगी।ऐसे ही थे मिर्जा गालिब साहब...।




Saturday, 26 December 2015

2015 : विश्व के लिए हादसों भरा साल


संदीक कुमार मिश्र :  साल दर साल विश्व विकास के नए नए किर्तिमान स्थापित कर रहा है।साल 2015 भी कुछ अच्छी यादों के लिए जाना जाएगा तो कुछ कड़वी और दिल दहला देने वाली यादों के लिए भी।जी हां 2015 में विस्व में कुच ऐसी धटनाएं हुई जो भुलाए नहीं भुलेंगी।अपने से अपनो के दुर होने का गम हमेशा कुछ लोगो को ही नहीं मानवता को सालता रहेगा...। कुछ बड़े हादसे जिसने 2015 पर लगा दिए डर और दहशत के दाग।जानते हैं-

पेरिस में चार्ली एब्दो के दफ्तर पर हमला


दोस्तों साल 2015 का आगाज हुआ और विश्व के हर हिस्से में नए साल का स्वागत किया गया।लेकिन फ्रांस की राजधानी पेरिस में 7 जनवरी 2015 को ही मानवता के दुश्मन कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने व्यंग्य-पत्रिका 'चार्ली एब्दो' के दफ्तर पर हमला कर दिया।इस क्रुर हमले में 12 लोग जींदगी रहते मौत की नींद सो गए और कई गंभीर रुप से घायल हुए।इस हमले में चार्ली-एब्दो के संपादक स्टीफन चारबोनियर की भी मौत हो गई। मित्रों इस क्रुर हमले की जिम्मेदारी आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने ली ।

भूकंप से दहला नेपाल


बेहद शांत और चैन से रहने वाले देश नेपाल के लिए साल 2015 इतना बुरा रहा कि जनहानी से लेकर धनहानी लेकर आया। दरअसल 25 अप्रैल को आए भूकंप ने नेपाल को दहला कर रख दिया।भूकंप के ये झटके से पड़ोसी देशों में भी महसूस किए गए। आपको बता दें कि नेपाल में आये भूकम्प की तीव्रता 8.1 मापी गई। नेपाल में आए इस खतरनाक भूकंप से अनेको प्राचीन ऐतिहासिक मंदिर और इमारतें बर्बाद हो गईं।कहते हैं सन 1934 के बाद पहली बार नेपाल में इतना प्रचंड तीव्रता वाला भूकम्प आया था। इस भयंकर भूकंप में तकरिबन 8000 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी।जबकि 2000 हजार से ज्यादा लोग घायल हो गए थे।इस भूकंप का असर इतना ज्यादा था कि इसका प्रभाव चीन, भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी देखने को मिला।जबकि अन्य देशों में इस भूकंप से लगभग 250 लोगों की मौत हो गई थी।नेपाल में आये भूकंप के कारण ही एवरेस्ट पर्वत पर हिमस्खलन हो गया,और 17 पर्वतारोहियों की मौत हो गई थी।

सऊदी अरब में हज यात्रा के दौरान हादसा


हर साल हज की यात्रा पर लाखों लोग जाते है ।लेकिन सऊदी अरब में साल 2015 की हज यात्रा के बीच मीना में शैतान को कंकड़ी मारने की रस्म के दौरान भगदड़ मची और तकरिबन 750 लोग मारे गए। इन मरने वालों में 14 भारतीय भी थे।आंकड़ों की माने तो हज पर हुए हादसों में ये दूसरा सबसे बड़ा हादसा था।इससे पहले 1990 में हुए हादसे में 1,426 लोग मारे गए थे। एक आंकडे के अनुसार बीते 25 साल में हजयात्रा के दौरान होने वाली भगदड़ की घटनाओं में अब तक 2700 से ज्यादा हज यात्रियों की मौत चुकी है।जो चिंता का विषय है।

मिस्र में हुआ रूसी विमान हादसा


एक और बड़े हादसे ने हर किसी को सकते में डाल दिया।दरअसल रशियन एयरलाइन मेट्रोजेट की उड़ान संख्या KGL 9268 मिस्र में क्रैश हो गई थी।हादसे के दौरान प्लेन मिस्र के लाल सागर के किनारे मौजूद खूबसूरत एयरपोर्ट पर कुछ देर रूकने के बाद फिर से सेंट पीटरबर्ग जाने के लिए हवा में उड़ने लगा था। टेकऑफ के बाद अगले चंद मिनटों में ही प्लेन करीब 30 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ रहा था। लेकिन ठीक 23 मिनट बाद अचानक प्लेन का संपर्क एयर ट्रैफिक कंट्रोल(ATC) से टूट गया। विमान का आखिरी संपर्क तुर्की ATC से हुआ था। जिस दौरान ये हादसा हुआ,उस वक्त विमान के रूट और उससे लगे सभी ATC को खंगाला गया,लेकिन विमान का कोई सुराग नहीं मिला। जहां विमान का संपर्क टूटा था, उन इलाकों की सेना को भी अलर्ट कर दिया गया था।पता चला कि रूसी प्लेन एटीसी से संपर्क खोने के बाद मिस्र में सिनाई की पहाड़ियों में जा गिरा।जिसके बाद आसपास की आबादी ने इस प्लेन क्रैश की खबर सरकारी अधिकारियों को दी।जब मौके पर पहुंचे बचाव दल के सदस्य हवाई जहाज का मलबा देखे तो हैरान रह गए, क्योंकि प्लेन का मलबा पूरे नौ किलोमीटर के इलाके में बिखरा पड़ा था।आपको बता दें कि विमान हादसे के कुछ ही घंटे बाद ISIS ने ये दावा किया कि रूस के यात्री विमान को उसी ने मार गिराया है।इस हादसे में सैकड़ों को जान गंवानी पड़ी।

साल के आखिरी पड़ाव पर फिर पेरिस में हमला


साल 2015 अपने अंतिम पड़ाव पर था।उम्मीद की जा रही थी कि अब विश्व में शांति बनी रहेगी लेकिन फ्रांस की राजधानी पेरिस 13 नवंबर को एक बार फिर धमाकों से गूंज से दहल उठी।दरअसल पेरिस में एक बार फिर आतंकि हमला हुआ था।इस दिलदहला देनेवाले गोलीबारी और धमाकों में 150 से ज्यादा लोग मारे गए थे।आतंकी एक साथ कई जगहों पर हमला किए,इस हिंसक घटनाओं की वजह से फ्रांस की सभी सीमाओं को सील कर दिया गया।साथ ही पेरिस में इमरजेंसी का ऐलान भी कर दिया गया था।



अंतत: मित्रों इसके अलावा भी साल 2015 में कई घटनाएं सुर्खियों में रही।आतंक का खौफ विश्व के सभी देशों में बना रहा।मानवता का क्रुर दुश्मन बनकर ISIS नाम का आतंकी संगठन उभरा।जिसपर लगाम लगाने के लिए विश्व की सभी बड़ी शक्तियां एक साथ आईं।उम्मीद की जानी चाहिए साल 2016 में मानवता का विकास होगा और आतंकी वारदातों में कमी आएगी।




Friday, 25 December 2015

पीएम मोदी को नवाज की पाकिस्तान में शरीफ दावत, मधुर होंगे संबंध...?


संदीप कुमार मिश्र : ऐसा पहली बार हुआ है कि रिश्तों की कड़वाहट को कम करते हुए 11 साल बाद भारत का कोई प्रधानमंत्री पाकिस्तान की सरजमीं पर पहुंचा है।जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं थी,और खासकर तब जब दोनो देशों के रिश्ते बातों से कम गोलियों से ज्यादा हो रहे हों।लगातार सीमा पर पाकिस्तान गोलियां बरसाता है,जिसका जवाब सीमा पर हमारे जवान दे रहे हैं,ऐसे में अचानक पीएम मोदी का पाकिस्तान पहुंच जाना किसी हैरत से कम नहीं है।

दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रुस से वापस लौटते वक्त अपने एक दिवसीय अफगानिस्तान के दौरे पर थे,जिसके बाद मोदी को भारत आना था,लेकिन उन्होंने अचानक लाहौर जाने और पीएम नवाज शरीफ से मुलाकात करने का ऐलान कर दिया।ये खबरे कानोकान मीडिया को नहीं मिली।एक तरफ जहां मोदी के पाक पहुंचे पर दोनो तरफ के राजनीतिक पंड़ितों और विशेषज्ञों को हैरत में डाल दिया वहीं ये उम्मीद भी बंधी कि दोनो देशों के बीच बढ़ी दूरियां शायद कुछ कम हो।

दरअसल दोस्तों दोनों देश कभी एक ही थे,लेकिन दोनो देशों के बंटवारे के बाद रिश्तों में हमेशा कड़वाहट ही रही।कभी भी दोनो देशों के संबंध मधुर नहीं रहे।लगातार संबंधों में उतार-चढाव बना रहा।लेकिन देश की सत्ता में जब केंद्र में मोदी सरकार काबिज हुई जिसके बाद भी दोनों देशों के रिश्ते कभी सुधरते नजर आए, तो कभी बिगड़ते दिखे।

आईए जानने की कोशिश करते हैं कि मई 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद दोनो देशों के रिश्ते कैसे रहे-

दोस्तों आपको याद होगा कि मई 2014  में जब नरेंद्र मोदी ने केंद्र में सरकार बनायी तो शपथ ग्रहण समारोह में नवाज शरीफ को भी न्योता दिया।ये पहला मौका था जब मोदी-नवाज की मुलाकात हुई थी।वहीं इसके अगले दिन दोनों प्रधानमंत्रीयों के बीच एक औपचारिक मुलाकात भी हुई। लेकिन जब भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिवों ने आपसी बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए अगस्त 2014 में मुलाकात करने का फैसला किया तो भारत के सचिवों का पाकिस्तान जाना तय हुआ। लेकिन उससे पहले ही पाकिस्तान के हाई कमिश्नर ने दिल्ली में कश्मीर के अलगाववादियों से मुलाकात की।जिसपर भारत ने कड़ी आपत्ती जताई थी और विदेश सचिवों की यात्रा रद्द हो गयी थी।और दोनों देशों के बीच फिर से तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी।

इसी कड़ी में नवंबर 2014 में जब नेपाल की राजधानी काठमांडू में हुए 18 वां सार्क सम्मेलन हुआ तो दोनो देशों के प्रधानमंत्रीयों की मुलाकात तो हुई, लेकिन दोनों के बीच द्विपक्षीय वार्ता नहीं हुई।साथ ही दोनों नेताओं ने ही बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने में कोई रुची नहीं दिखाई।इसी क्रम में रूस के ऊफा में भी जब दोनो नेताओं की मुलाकात हुई तो बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने की उम्मीद जताई गई और अगस्त 2015 में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकार (NSA) स्तर की वार्ता पर आम सहमति बनी थी।जो आगे जाकर नहीं हो पाई। क्योंकि अगस्त में NSA स्तर की वार्ता से पहले पाकिस्तान ने पुन: एक बार कश्मीर के मुद्दे को हवा दे दी और कहा कि कश्मीर का मुद्दा उठाए बिना दोनों देशों के बीच वार्ता संभव नही हो सकती।साथ ही पाकिस्तान ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता की बात कहकर अलगाववादी नेताओं से मुलाकात करने की बात कही जो भारत को कतई गंवारा नही था।आकिरकार दोनो देसों के NSA स्तर की वार्ता रद्द हो गई।

वार्ता के क्रम को आगे बढ़ाने के लिहाज से ही 30 नवंबर को पेरिस में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ के बीच फिर मुलाकात हुई और आतंकवाद पर वार्ता के लिए सहमती बनी।इसी कहम को आगे बढ़ाते हुए बैंकॉक में गुपचुप तरिके से NSA स्तर की वार्ता हुई,जिसकी मीडिया को कानोकान खबर नहीं हुई।वार्ता के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए भारतीयविदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान के इस्लामाबाद जाती हैं और द्विपक्षीय वार्ता को आगे बढ़ाने का प्रयास करती हैं। आपको बता दें कि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय वार्ता 2008 में मुंबई हमलों के बाद से रुक गई थी।

अंततखैर पहले रुस की दो दिवसीय यात्रा,फिर अफगानिस्तान की एक दिवसिय यात्रा और अचानक पाकिस्तान का दौरा।जिसकी खबर खुद पीएम मोदी ट्वीट कर बताते हैं कि उन्होंने पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से फोन पर बात की और उन्हें जन्मदिन की बधाई दी और वह लाहौर पहुंच गए।बहरहाल आप कह सकते हैं आने वाले समय में इसके क्या परिणाम निकलेंगे, ये तो भविष्य की बात है लेकिन  दोनों देशों के बीच रिश्तों को सुधारने की ये एक कोशिश जरुर ऐतिहासिक है।
  

2015 में देश ने खोया भारत रत्न,मिसाइल मैन,पूर्व राष्ट्रपति डा. कलाम



संदीप कुमार मिश्र : साल 2015 जब अपने अंतिम पड़ाव पर है,तो तमाम तरह की घटनाएं सुर्खियों में रहेंगी।ऐसे में जिस महान शख्स को देश ने खोया है वो है पूर्व राष्‍ट्रपति और भारत रत्न डा. एपीजे अब्‍दुल कलाम आजाद साब। जिनका 2015 में निधन हो गया। आपको बता दें कि कलाम साब शिलांग के आईआईएम में एक लेक्‍चर देने के लिए गए थे।जब 83 साल के कलाम भाषण देने के दौरान वह बेहोश होकर गिर पड़े थे।कलाम साब के बेहोश होने के बाद उन्हें वहीं के एक अस्‍पताल में 7 बजे भर्ती कराया गया था।कहा गया कि कलाम साब की ब्‍लड प्रेशर और दिल की धड़कन कम हो गई थी, जिस वजह से उन्‍हें आईसीयू में भर्ती करवाया गया।

मित्रों आपको याद होगा कि 18 जुलाई, 2002 को मिसाइल मैन कलाम साब को प्रचंड बहुमत से 'भारत का राष्ट्रपति' चुना गया था और उन्होंने 25 जुलाई 2002 को संसद भवन के अशोक कक्ष में राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी।उस वक्त देश में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार थी।कलाम साब का कार्याकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ। हमारे देश के अब तक के सबसे लोकप्रिय और चहेते राष्ट्रपतियों में से एक डॉ. अबुल पाकिर जैनुल आब्दीन अब्दुल कलाम साब ने तमिलनाडु के एक छोटे से समुद्री किनारे पर बसे शहर रामेश्वरम में अखबार बेचने से लेकर भारत जैसे विशाल देश के प्रथम नागरिक यानि राष्ट्रपति पद तक का लंबा सफर तय किया। महान वैज्ञानिक और इंजीनियर कलाम साब ने 2002 से 2007 तक देश के 11वें राष्ट्रपति के रूप में मनसा वाचा कर्मणा देश की लगातार सेवा की। मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्ध कलाम देश की प्रगति और विकास से जुड़े विचारों से भरे व्यक्ति थे।देस के सच्चे देशभक्त थे कलाम साब..।

साथियों 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में जन्में कलाम साब पेशे से नाविक थे और उनके पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे।कहते हैं अपने पांच भाई और पांच बहनों वाले परिवार को चलाने के लिए पिता के पास पैसे कम पड़ जाते थे,जिस वजह से शुरुआती शिक्षा जारी रखने के लिए कलाम साब को अखबार बेचने का काम किया करते थे।मात्र आठ वर्ष की छोटी उम्र से ही कलाम साब रोज सुबह 4 बचे उठते थे, और नहाकर गणित की पढ़ाई करने चले जाते थे। सुबह नहाकर जाने के पीछे कारण यह था कि प्रत्येक साल पांच बच्चों को मुफ्त में गणित पढ़ाने वाले उनके टीचर बिना नहाए आए बच्चों को नहीं पढ़ाते थे।कलाम साब जब ट्यूशन से वापस आते तो नमाज पढ़ते और इसके बाद वो सुबह आठ बजे तक रामेश्वरम रेलवे स्टेशन और बस अड्डे पर अखबार बांटते थे।

एयरोस्पेस टेक्नोलॉजीमें आने का श्रेय कलाम साब अपने पांचवी क्लास के टीचर सुब्रह्मण्यम अय्यर को देते हैं।कलाम साब कहा करते थे कि उनके गुरु द्वारा समझाई गई बातें उनके अंदर इस कदर समा गई कि उन्हें हमेशा महसूस होने लगा कि उनका करियर उड़ान की दिशा में ही है।जिसके बाद कलाम साब ने फिजिक्स की पढ़ाई की और मद्रास इंजीनियरिंग कॉलेज से एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में पढ़ाई की।

कलाम साब का पूरा जीवन देश को समर्पित था। जब 1962 में कलाम साब इसरो में पहुंचे तो उन्हें इन्हीं के प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहते हुए भारत ने अपना पहला स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान एसएलवी-3 बनाया। 1980 में रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की कक्षा के समीप स्थापित किया गया और भारत अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष क्लब का सदस्य बन गया।देश के प्रति अपने समर्पण भाव को आगे बढ़ाते हुए कलाम साब ने क्रमश: स्वदेशी गाइडेड मिसाइल को डिजाइन किया। देश की रक्षा में मिल का पत्थर साबित करते हुए कलाम साब नें अग्नि और पृथ्वी जैसी मिसाइलें भारतीय तकनीक से बनाईं और दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दिया। 1992 से 1999 तक कलाम रक्षा मंत्री के रक्षा सलाहकार भी रहे। इस दौरान वाजपेयी सरकार ने पोखरण में दूसरी बार न्यूक्लियर टेस्ट भी किए और भारत परमाणु हथियार बनाने वाले देशों में शामिल हो गया। कलाम ने विजन 2020 दिया। इसके तहत कलाम ने भारत को विज्ञान के क्षेत्र में तरक्की के जरिए 2020 तक अत्याधुनिक करने की खास सोच दी गई। कलाम भारत सरकार के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार भी रहे।इस प्रकार से कलाम साब का हर एक कदम,सोच देश को समर्पित थी।

1982 में कलाम को डीआरडीएल (डिफेंस रिसर्च डेवलपमेंट लेबोरेट्री) का डायरेक्टर बनाया गया। उसी दौरान अन्ना यूनिवर्सिटी ने उन्हें डॉक्टर की उपाधि से सम्मानित किया। कलाम ने तब रक्षामंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वीएस अरुणाचलम के साथ इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (आईजीएमडीपी) का प्रस्ताव तैयार किया। स्वदेशी मिसाइलों के विकास के लिए कलाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई। इसके पहले चरण में जमीन से जमीन पर मध्यम दूरी तक मार करने वाली मिसाइल बनाने पर जोर था। दूसरे चरण में जमीन से हवा में मार करने वाली मिसाइल, टैंकभेदी मिसाइल और रिएंट्री एक्सपेरिमेंट लॉन्च वेहिकल (रेक्स) बनाने का प्रस्ताव था। पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग नाम के मिसाइल बनाए गए। कलाम ने अपने सपने रेक्स को अग्नि नाम दिया। सबसे पहले सितंबर 1985 में त्रिशूल फिर फरवरी 1988 में पृथ्वी और मई 1989 में अग्नि का परीक्षण किया गया। इसके बाद 1998 में रूस के साथ मिलकर भारत ने सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाने पर काम शुरू किया और ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की गई। ब्रह्मोस को धरती, आसमान और समुद्र कहीं भी दागी जा सकती है। इस सफलता के साथ ही कलाम को मिसाइल मैन के रूप में प्रसिद्धि मिली और उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया।

देश के विकास में कलाम साब की शानदार भूमिका और समर्पण के लिए ही उन्हें 1981 में भारत सरकार ने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, पद्म भूषण और फिर, 1990 में पद्म विभूषण और 1997 में भारत रत्न का सम्मान प्रदान किया।आपको बता दें कि भारत के सर्वोच्च पद पर नियुक्ति से पहले भारत रत्न पाने वाले डा. एपीजे अब्दुल कलाम साब देश के केवल तीसरे राष्ट्रपति हैं। उनसे पहले यह सम्मान सर्वपल्ली राधाकृष्णन और जाकिर हुसैन साब ने हासिल किया था।

अंतत: साल 2015 में देश ने एक ऐसी शख्सियत को खो दिया,जो सर्वप्रिय थे,लोकप्रिय थे, राष्ट्रभक्त थे।जिनके योगदान को देश कभी नहीं भूला सकता।एक मिसाइलमैन एक राष्ट्रपति और एक शिक्षक के साथ ही देश का सच्चा सेवक शायद ही देश को एक व्यक्ति में मिले। 



अफगानिस्तान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अभिनंदन


संदीप कुमार मिश्र : मित्रों एक बात तो तय है कि आने वाले समय में देश के इतिहास में ही विदेशी सरजमीं पर सबसे ज्यादा सकारात्मक यात्रा करने का रिकार्ड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम रहेगा। जरा कल्पना किजिए विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की सत्ता पर काबिज होने के बाद पीएम मोदी एक के बाद एक लगातार,धुंआदार विदेश की यात्राएं कर रहे हैं,और भारत की छवी को विश्व पटल पर नए ढ़ंग से गढ़ रहे हैं।भारत की शक्ति और सामर्थ्य का एहसास सबको करा हैं।

दरअसल रुस की यात्रा से लौटते वक्त अपने एक दिन के छोटे दौरे पर अफगानिस्तान पहुंचे पीएम मोदी ने अफगानिस्तान के नये संसद भवन का उद्घाटन किया।ये जानना बी आपके लिए बड़ा दिलचस्प होगा कि अपगानिस्तान के इस संसद भवन का निर्माण भारत ने ही करवाया है और इसमें एक ब्लॉक भारत के पूर्व सर्वप्रिय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखा गया है।अफगान संसद की इस नई इमारत का निर्माण नौ करोड अमेरिकी डॉलर की लागत लगी है।

एक बड़े ही खुशनुमा माहौल में पीएम मोदी ने फीता काटकर अफगान संसद की नई इमारत का उद्घाटन किया,और फिर यहां के संसद को संबोधित करते हुए जलालुद्दीन रुमी का जिक्र किया और कहा कि यह अफगानिस्तान के सूफी शायर जलालउद्दीन रूमी की धरती है। उन्होंने कहा था कि 'अपने शब्दों को उठाओ', 'अपनी आवाज नहीं.' यह इस महान भूमि का ज्ञान है। वहीं अपनी आवाज बुलंद करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि बैलेट से बुलेट को हराना चाहिए। यही लोकतंत्र का मूलमंत्र है। यह परिसर भारत-अफगान दोस्ती का मिशाल है। यह संसद लोगों की उम्मीद पर खरा उतरेगी।

अफगान संसद को संबोधित करते हुए पीएम मोदी की यादों अटल जी थे,उन्होंने कहा कि हमारे देश के पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी का आज जन्म दिन है।आपने उनके नाम पर संसद के एक ब्लॉक का नाम रखकर हमारा दिल जीत लिया है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पीएम मोदी ने कहा कि अफगानिस्तान भारत का दोस्त है।हमारी साझेदारी से ग्रामीण समुदायों की महिलाओं और बच्चों को लाभ मिलेगा। दोनों देशों के आपसी सहयोग से स्कूलों, लघु सिंचाई, स्वास्थ्य केन्द्रों और अन्य कल्याणकारी कार्यो को आगे बढाया जाएगा।आपको बता दें कि भारत की मदद से अफगानिस्तान में सड़कों का निर्माण किया जा रहा है ।


पीएम मोदी वाकपटुता के धनी हैं,ये बात हर कोई जानता है।उन्होने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मोदी ने अफगान शहीदों के बच्चों को स्कॉलरशिप देने का एलान किया।मोदी ने कहा कि भारत ही अफगानिस्तान का सच्चा हमदर्द और दोस्त है लेकिन कुछ लोग हमारी दोस्ती से जलते हैं।ये कहने के पीछे निशाना किस देश पर था आप समझ सकते हैं।खैर अमिताभ बच्चन की फिल्‍म जंजीर में शेर खान यानी प्राण पर फिल्माये गए गाने 'यारी है ईमान मेरा...' का मोदी ने जिक्र किया और भारत-अफगान की दोस्ती को और प्रगाढ किया।निश्चित तौर पर मोदी की इस यात्रा से विश्व पटल पर बेहद शानदार और सकारात्मक छवी उभरकर सामने निकलकर आएगी।

मित्रों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अपनी अफगान यात्रा पर काबुल पहुंचे तो वहां के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने मोदी का अपनी सरजमीं पर बड़े ही गर्मजोशी से स्वागत किया।जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति के प्रतिनिधिमंडल ने दिलकोशा पैलेस में नाश्ते के दौरान तमाम तरह की वार्ता की।

दोस्तों लगातार युद्ध से लड़ रहे अफगानिस्तान में भारत की मित्रता की मिसाल के तौर पर बनने वाली संसद का काम सन 2007 में शुरू हुआ था। इस इमारत को भारत की ओर से अफगानिस्तान को लोकतंत्र की प्रतीकात्मक भेंट भी करार दिया जा रहा है।दरअसल नवंबर 2011 में ही अफगानी संसद को बनकर तैयार होना था, लेकिन इसकी तिथि दो बार बढ़ानी पड़ी।आपको बता दें कि इसका डिजाइन मुगल और आधुनिक कला पर आधारित है।पीएम की यह यात्रा अफगानिस्तान को तीन रूसी हेलीकॉप्टर एमआई 25 गनशिप पहुंचाने के दो दिन बाद हो रही है। ये हेलीकॉप्टर मशीन गन, रॉकेट और ग्रेनेड लॉन्चरों से लैस हैं। देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी की यह पहली काबुल यात्रा है, और मोदी से पहले 2011 में मनमोहन सिंह ने काबुल का दौरा किया था।

अंतत: शांति दूत भारत की छवी को बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार प्रयास कर रहे है,जो काबिलेतारीफ है।उनकी विदेश नीति का स्वागत करना चाहिए,और उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले समय में देस बाह्य और आंतरीक दोनो रुप से सशक्त होगा।



वैश्विक बदलावों के बीच भारत: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिकता का समन्वय

 आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ वह अपनी प्राचीन सांस्कृतिक जड़ों को छोड़े बिना आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम महाशक्ति बनने की ओर अ...