Thursday, 7 April 2016

शक्ति की उपासना का पावन पर्व चैत नवरात्र

संदीप कुमार मिश्र: नवरात्र पर्व है शक्ति की उपासना का...अपनी आंतरीक शक्तियों को सिद्ध करने का।जगत जननी मां जगदम्बा की कृपा हम पर बनी रहे जिससे हर प्रकार के संकटों, रोगों, दुश्मनों, प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षित रह सकें। हमारे शारीरिक तेज में वृद्धि हो। मन निर्मल और शांत हो व आत्मिक, दैविक, भौतिक शक्तियों का हमें लाभ मिल सके।
दरअसल चैत्र नवरात्र मां भगवती जगत जननी जगदम्बा को आह्वान कर दुष्टात्माओं का नाश करने के लिए जगाया जाता है।सनातन धर्म में नर-नारी जो हिन्दू धर्म की आस्था से जुड़े हैं वे किसी न किसी रूप में कहीं न कहीं शक्ति की उपासना अवश्य करते हैं। फिर चाहे व्रत रखें, मंत्र जाप करें, अनुष्ठान करें या अपनी-अपनी श्रद्धा-‍भक्ति अनुसार कर्म करते रहें। ऐसे तो मां के दरबार में दोनों ही- चैत्र व अश्विन मास में पड़ने वाले शारदीय नवरात्र की धूमधाम रहती है।
चैत्र नवरात्र में सभी घरों में देवी प्रतिमा-घट स्थापना करते हैं। इसी दिन से नववर्ष की बेला शुरू होती है। महाराष्ट्र में इस दिन को गुड़ी पड़वा के रूप में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। घर-घर में उत्साह का माहौल रहता है। चैत नवरात्र में श्रद्धालू शक्तिपीठों में जाकर अपनी-अपनी सिद्धियों को बल देते हैं। अनुष्ठान, हवन पूजा पाठ करते हैं।   
आइए जानें देवी के नवरूप की महत्ता के बारे में-


1.माता शैलपुत्री
मां दुर्गा अपने पहले स्वरूप में शैलपुत्री के नाम से जानी जाती हैं। पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा।देवी शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की कन्या के रूप में उत्पन्न हुर्इ थीं । उस जन्म में वह पति शिव को पिता के यज्ञ में आमंत्रित न किये जाने तथा उनके प्रति तिरस्कार देखकर क्रोध से योगाग्नि द्वारा उन्होंने अपने प्राणों को आहुती कर दिया। परन्तु अगले जन्म में शैलपुत्री के रूप में पुन भगवान शंकर की अर्द्धागिनी बनीं। शैलपुत्री को माता पार्वती का रूप भी माना जाता है। नवरात्री पूजन में प्रथम दिन इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इन के दर्शन हेतु सुबह से हज़ारों महिलाओं एवं पुरुषों की भिड़ माता के मंदिरों पर लग जाती है। देवी का दिव्य रूप माँगलिक सौभाग्यवर्धक आरोग्य प्रदान करने वाला एवं कल्याणकारी है। इनके पूजन अर्चन से भय का नाश एवं किर्ति,धन, विद्या,यश,आदि की प्राप्ति होती है।ये मोक्ष प्रदान करनेवाली देवी हैं।



2.माता ब्रह्मचारिणी
माँ दुर्गा की नौ शक्तियों का दूसरा स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी अर्थात् तप का चारिणी या तप का आचरण करने वाली है। देवी ब्रह्मचारिणी का स्वरूप पूर्ण ज्योर्तिमय एवं अत्यन्त भव्य है। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बायें हाथ में कमण्डल सुशोभित है। ब्रह्मचारिणी देवी का हिमांचलसुता के रूप में भगवान शिव को पाने के प्रयास में ही माता का स्वरुप ब्रह्मचारिणी हो गया था। मां का यह स्वरूप भक्तों को असिमित व अनंत फल देने वाला है। ब्रह्मचारिणी माता के स्वरूप के आराधक को सहज ही त्याग, वैराग्य एवं सदाचार का अनुग्रह प्राप्त हो जाता है।

3. माता चंद्रघंटा
मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघंटा है। नवरात्री पर्व पर माता दुर्गा की उपासना में तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है। इस दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में प्रविष्ट होता है। मां चंद्रघंटा की कृपा से साधक के समस्त पाप और बाधाएं विनष्ट हो जाते है।मां के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्द्धचंद्र सुशोभित है। इसी कारण इन्हें चंद्रघंटा देवी कहा जाता है। इनकी आभा स्वर्ण के समान है,और माता के दस भुजाओं में क्रमश: खड़ग, त्रिशुल, तोमर, भिण्डीपात्र(भिण्डीपाल), धनुष-वाण आदि अस्त्र-शस्त्र विभुषित रहते हैं। माता चंद्रधंटा की आराधना से साधक भवसागर से पार हो जाता है।
                                                       
                                                                   4. माता कुष्मांडा
मां दुर्गा के चौथे स्वरूप का नाम कुष्मांडा है। देवी ने अपने मंद हास्य द्वारा ब्रह्माण्ड की उत्पति की थी। जिस कारण इनका नाम कुष्माण्डा पड़ा। अष्ट भुजाओं वाली कुष्मांडा का निवास सुर्य के भितरी लोक में रहता है। फलत: दशों दिशांए इन्हीं की तेज़ से प्रकाशित है। नवरात्र पूजन के चौथे दिन सिंह पर सवार देवी कुष्मांडा के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। शक्ति की आराधना के चौथे दिन साधक का मन अनाहक चक्र में होता है। इसलिए उपासक को अत्यन्त पवित्र एवं उज्जवल मन से देवी के स्वरूप में ध्यान रखकर पूजा-उपासना करनी चाहिए, क्योंकि मां कुष्मांण्डा अत्यल्प सेवा और भक्ति से अपने भक्तों पर प्रसन्न होती हैं। मां की उपासना भवसागर से पार उतारने के लिए सर्वाधिक सुगम और श्रेयष्कर मार्ग है।


5.स्कंदमाता
मां दुर्गा के पांचवे स्वरूप को स्कंदमाता के नाम से जाना जाता है। माता पार्वती ही सृष्टि की प्रथम प्रसूता कही गर्इ है। इसलिए स्कंद अर्थात् कार्तिक की माता होने से ही माता पार्वती जगत में स्कंदमाता के रूप में विख्यात हैं। स्कंदमाता की उपासना नवरात्रि पूजन के पांचवें दिन की जाती है। इस दिन साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होता है। माता के विग्रह में भगवान स्कंद बाल रूप में इनकी गोद में विराजमान रहते हैं। चतुर्भुजी मां  का स्वरूप पूर्णतया शुभ है। मां स्कंदमाता की उपासना से उपासक की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं। सुर्यमंडल के अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक अलौकिक तेज एवं कांति से संपन्न हो जाता है। यह प्रभा मंडल प्रतिक्षण उनके योगक्षेम का निर्वहन करता रहता है।

6.माता कात्यायनी
माता कात्यायनी का यह स्वरूप दिव्य एवं मांगलिक है। माता का यह स्वरूप शौम्यशील एवं मर्यादा का संदेश देते हुए ये बताता है कि शक्ति प्रतिक में होती है। आवश्यकता है उसे अनुभव करने की।माता के नाम के बारे में कर्इ कथाएं प्रचलित हैं। ऐसा कहा जाता है कि महर्षी कात्यायन की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं ऋषिवर की पुत्री बनी और उनके गोत्र का मान बढ़ाया, माता को यह गोत्र इतना भाया कि वह जगत में कात्यायनी के नाम से ही विख्यात हुर्इ।
मां कात्यायनी का यह स्वरूप अमोघ फलदायी है। आदिकाल में जब पृथ्वी पर महिषासुर के अत्याचार से चारों दिशाओं में हाहाकार मचा था, तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने अपने-अपने तेज का अंश देकर देवी का प्रादुर्भाव दैत्यों का वध करने के लिए किया। महिषासुर का अन्त करने के कारण देवी को महिशासुर मर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है। इनका स्वरूप स्वर्ण के समान चमकिला उभास्वर है। मां  कात्यायनी का वाहन सिंह है। इनकी चार भुजाएं दाहिने तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में तथा नीचे वाला हाथ वर मुद्रा में है। बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प सुषोभित है, लेकिन महिषासुर का वध करते समय इनकी दश भुजाएं हो गर्इ थीं। दुर्गापूजा के छठवें दिन देवी कात्यायनी के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन आज्ञा चक्र में स्थित होता है। मां के उपासक को सरलता से धर्म, मोक्ष, काम, अर्थ की प्राप्ति हो जाती है, तथा साधक इस लोक में रहकर भी अलौकिक तेज व प्रभाव से युक्त हो जाता है। उसके, रोग, शोक, संताप और भय आदि सर्वदा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मान्तर के पापों को विनष्ट करने के लिए मां की उपासना से अधिक सरल एवं सुगम मार्ग कोर्इ नहीं है।
ऐसी मान्यता है कि नवरात्री में देवी महिषासुर मर्दिनी ससुराल से मायके आतीं हैं, अर्थात् वह देवलोक से पृथ्वी पर अवतरित होकर प्रतिमा में विराजमान होती हैं। अत: देवी के शुभागमन के पावन दिवस पर सप्तमी, अष्टमी एवं नवमीं को विशेष हर्षोल्लास का वातावरण रहता है तथा पंडाल आदि की सजावट की जाती है। मां आदिशक्ति ने महिषासुर का वध कर हमें उनके अत्याचारों से  मुक्ति दिलवायी थी। अत: महिषासुर मर्दिनी माता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस प्रकार देवी अपने घर में सप्तमी, अष्टमी और नवमीं तक रहकर अपने भक्तों को तृप्त करती हैं।


7.माता कालरात्रि
मां दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं। इनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। सिर के बाल बिखरे हुए तथा गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं, जो ब्रह्माण्ड के सदृष्य गोल हैं। इनकी नासिका से श्वांस पर सांस से अग्नि की भयंकर ज्वालाएं निकलती रहती हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। मात अपने ऊपर वाले दाहिने हाथ से भक्तों को वर और नीचे वाले हाथ से अभय प्रदान करती हैं। बायीं तरफ के ऊपर वाले हाथ में खड़ग अर्थात् कटार है तथा यह सदैव गर्दव अर्थात् गधे पर सवार रहती हैं। मां कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यनत भयानक है, लेकिन ये सदैव शुभ फल देने वाली हैं। अत: इन्हें शुभंकरी भी कहा जाता है।दानवों से युद्ध के समय देवी ने भगवान शिव को दूत का कार्य सौंपा था। दुर्गापूजा के सातवें दिन कालरात्रि की उपासना का विधान है। इस दिन साधक का मन शास्तरा चक्र में अवस्थित रहता है तथा साधक के लिए समस्त दीयों के द्वार खुलने लगते हैं। मां  कालरात्रि दुष्टों का विनाश करने वाली हैं। दानव, दैत्य, राक्षस, भुत-प्रेत आदि इनकी स्मरण मात्र से ही भयभीत होकर भाग जाते हैं। इनकी उपासक को अग्नि, जल, जन्तु, शत्रु, रात्रि आदि किसी से भय नहीं लगता। इनकी कृपा से भक्त सर्वदा भयमुक्त हो जाते हैं। मां कालरात्रि के स्वरूप को अपने हृदय में अवस्थित करके एकनिष्ठ भाव से इनकी उपासना करनी चाहिए जिससे सदैव शुभ फल प्राप्त होता रहे।



8. माता महागौरी
दुर्गा पूजा के अष्टमी तिथि को मां दुर्गा की अठवीं शक्ति देवी महागौरी की पूजन का विधान है। शास्त्रों में विदित है कि माता पार्वती ने शिवजी को पति रूप में पाने हेतु अत्यन्त कठोर तपस्या की थी, जिससे उनका रंग एकदम काला पड़ गया था। उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके ऊपर गंगाजल का छिड़काव किया जिससे माता का रंग विद्युत प्रभा के समान अत्यन्त कांतिमान गौर हो उठा। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा। वेत वर्णा देवी महागौरी के समस्त वस्त्र एवं आभुषण वेत रंग के हैं।इनकी चार भुजाएं हैं। इनके ऊपर का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशुल है। ऊपर वाले बायें हाथ में डमरू और नीचे का बायां हाथ वर मुद्रा में है। माता का वाहन वृषभ है। अत्यन्त शांत रहने वाली माता महागौरी की उपासना से भक्तों के सभी पाप संताप दैन्य तथा दु:ख स्वयं नष्ट हो जाते हैं। वह सभी प्रकार से अक्षर पुण्यों का अधिकारी हो जाता है।

9.माता सिद्धिदात्रि
मां भगवती का नौवा स्वरूप सिद्धिदात्रि देवी के नाम से जाना जाता है। भगवान शंकर द्वारा प्रदत्त सभी सिद्धियां इनमें निहित है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लहिमा, प्राप्ति, प्राकाम्या, इषक, वशित्र आठ मूख्य सिद्धियां हैं। देवी पुराण के अनुसार भगवान शंकर का अर्द्धनारीष्वर स्वरूप देवी सिद्धिदात्रि का ही है।
देवी का दिव्य मांगलिक स्वरूप अत्यन्त मनोहारी है।इनकी चार भुजाएं हैं। जिनमें क्रमश: चक्र,शंख, गदा तथा कमल पुष्प सुशोभित हैं। एक संग्राम में देवी ने दुर्गम नामक दैत्य का वध किया था। इसी कारण ये मां दुर्गा के नाम से भी विख्यात हैं। मंत्र-तंत्र-यंत्र की अधिष्ठात्री देवी सिद्धिदात्री की उपासना से साधक को समस्त सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। माता अपने भक्तों के संपूर्ण मनोरथ को पूर्ण करती हैं। मां भगवती के परम पद को पाने के उपरान्त अन्य किसी भी वस्तु को पाने की लालसा नहीं रह जाती है।


अंतत: माता शेरावाली आप सभी की मनोकामनाओं को पुर्ण करें,और जीवन पथ पर आप निरंतर आगे बढ़ते रहे।हम तो यही कामना करते हैं।चैत नवरात्र की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई।।जय माता दी।।