Friday, 16 March 2018

गोरखपु में क्यूं हारी बीजेपी : योगी की घर में ऐसी हार ? 2019 में कैसे जितेगी बीजेपी ? (पूरा विश्लेषण)



संदीप कुमार मिश्र: एक बात तो सच है कि जीत के कई माई-बाप होते हैं, और हार अनाथ होती है।सच भी है,क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो आखिर क्यूं जिस सीट पर बीजेपी पिछले 28 वर्षों से काबिज थी, वहां इतनी आसानी से हार गई और वो भी तब...जब.. जिस योगी आदित्यनाथ को गोरखपुर की जनता लगातार लगभग तीन दशक से संसद में भेजती रही, वही योगी यूपी जैसे बड़े सूबे के मुखिया यानि सीएम है।वहीं जो कांग्रेस की पैतृक सीट पर बंपर वोट से जीतकर संसद में पहुंचता है वो शख्स अब सूबे का उप मुख्यमंत्री है...यानी केशव प्रसाद मौर्या...?
बीजेपी आलाकमान को सोचना तो पड़ेगा ही कि आखिर कैसे ना जाने कई दशकों से सत्ता पर काबिज होने की उम्मीद पाले बैठे सपने 2014 में प्रचंड सत्ता मिलने के मात्र चार वर्ष बाद ही धीरे-धीरे धराशायी होते जा रहे हैं...क्योंकि आज तकरीबन 21 राज्यों में सरकार होने के बाद भी देश में जहां कहीं भी उपचुनाव हो रहें हैं वहां लगातार बीजेपी हार ही रही है,खासकर बात करें उत्तर प्रदेश की तो वहां पर जिस प्रकार से ऐतिहासिक जीत 2017 में मिली थी और योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया था,उसके बाद ऐसा क्या हुआ की एक साल के अंदर ही योगी के गढ़ गोरखपुर में 28 साल बाद शहर के सांसद का पता बदल गया...वो भी दूसरी पार्टी के लिए...जिसकी उम्मीद किसी ने नहीं की थी...?
कुछ मुख्य कारण जो जनता जनार्दन से निकल कर सामने आ रहे हैं वो इस प्रकार से हैं-

1.उदासीन कार्यकर्ता- दरअसल जब से केंद्र या उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनी है तभी से ही सरकार अपने कार्यकर्ताओं की नहीं सुन रही है इसलिए कार्यकर्ताओं की उदासीनता भी हार का मुख्य कारण रही है।
2.अभिमान – एक बात सहर्ष बीजेपी संगठन को और उनके आला नेताओं को ध्यान रखना होगा कि अभिमान स्वयं के स्वाभिमान को पहले खाता है और विपक्ष व अन्य को बाद में।इसलिए अभिमान का परिणाम है कि इस प्रकार की बुरी पराजय मिली।
3.बढ़ती बेरोजगारी- लगातार सरकार रोजगार की बात कर रही है,संभव है इस दिशा में कार्य भी कर रही है,लेकिन धरातल पर काम होता हुआ नजर आ नहीं रहा है या फिर सरकार दिखाने में असफल हो रही है।

4.युवाओं के साथ बोर्ड परीक्षा में अति कड़ाई से पेश आना- ये ठीक है कि शिक्षा का स्तर बेहतर होना चाहिए,जो पढ़ा हो वही पास होना चाहिए,लेकिन परीक्षार्थीयों पर कड़ाई से तब पेश आना चाहिए, जब पढ़ाने की व्यवस्था पहले ठीक कर लें आप।कहां तो स्कूलों में टीचरों की भयंकर कमी,बुनियादी सुविधाएं नदारत और सत्ता पाते ही इतनी कड़ाई कि विद्यार्थी इस डर से परीक्षा छोड़ दें कि पास तो होना नहीं है फिर क्यूं परीक्षा दें।

5.बयानबाजी – विश्व की सबसे बड़ी पार्टी कही जाती है बीजेपी,ऐसे में वाणी पर संयम भी अति आवश्यक है,लेकिन बीजेपी जितनी बड़ी पार्टी है उतने ही बड़े बड़े इस पार्टी में बयानवीर भी हैं,जिनकी जुबान पर कोई लगाम नहीं है,वो कुछ भी कभी भी बयान दे देते हैं,अफसोस तब होता है जब पार्टी के बड़े नेता भी इसी दिशा में आगे बढ़ते हैं।
6.अति आत्मविश्वास- अहंकार और अति आत्म विश्वास ये दोनो बड़े खतरनाक होते है, और यूपी में सत्ता मिलने पर ये दोनो इस प्रकार से बढ़ गए थे कि हार तो निश्चित थी। जबकि इस ऐतिहासिक जीत से विनम्रता आनी चाहिए थी।
7.बबुआ-बुआ का साथ और जातिवाद का बढ़ता प्रभाव- इसमें कोई शक नहीं कि देश के सबसे बड़े सूबे में जातिवाद की जड़ इतनी गहरी है कि जिसे तोड़ पाना शायद मुश्किल ही नहीं असंभव सा जान पड़ता है।तभी तो जो कभी एक दूसरे के धूर विरोधी हुआ करते थे,एक दूसरे के जान के प्यासे हुआ करते थे आज वही मिलकर ऐसा जातिय समीकरण बैठाते हैं कि कल्पनाओं से परे योगी को उन्हीं के घर में हरा देते हैं।

8.सामान्य वर्ग का मतदान ना कर पाना- बीजेपी अपने सामान्य वर्ग के मतदाताओं को समझा ही नहीं पायी कि पहले मतदान फिर जलपान।क्योंकि सपा और बसपा का वोटर पहले ही मतगणना केंद्र पर पहुंचकर मतदान कर देता है और जब बीजेपी का वोटर घर से बाहर निकलता है तब तक देर हो जाती है। 

9.इंसेफेलाइटिस से बच्चों की हुई मौत- ये सही है कि मुख्यमंत्री योगी जी लगातार इंसेफेलाइटिस पर सांसद रहते हुए भी कार्य करते आ रहे हैं लेकिन जवाबदेही तो बनती है कि आखिर उनके गृह जनपद में इतनी भारी संख्या में जब मौत होती है तो आखिर जिम्मेदार कौन है,क्यूं व्यवस्थाएं नहीं बदल रही है,आखिर कब तक ऐसे ही गरीबों के घरों के चिराग बूझते रहेंगे।

10.पूर्व में हुई जीत का दंभ पाल कर रखना- जीत तो विनम्रता सीखाती है लेकिन फिर वही कहना चाहूंगा कि अभिमान और दंभ ने सब सत्यानाश कर दिया।

11. बेलगाम अफसरशाही- पूर्व में सपा की सरकार का रिकार्ड देखें और अब के बीजेपी सरकार की अफसरशाही में जनता को कोई अंतर नजर नहीं आया,तब किसी और जाती विशेष का वर्चस्व था अब किसी और का है।कानून का राज जरुरी है लेकिन कानून के रक्षक भक्षक बन जाएं इस शर्त पर कतई नहीं।समानता सरलता और व्यवहारिकता होनी चाहिए।

इसके अलावा वर्तमान योगी सरकार का यूपी में अपने काम को सही तरीके से नहीं दिखा पाना और ज्यादा कड़ाई से पेश आना।जमीन पर प्रचार का ना पहुंचना और मतदान के लिए प्रेरित ना कर पाना...मतदाताओं की भयंकर उदासीनता और ये सोचना कि गोरखपुर से तो बीजेपी ही जीतेगी...।
एक और चर्चा जो मुख्य रुप से गोरखपुर के मतदाताओं के बीच से निकल कर सामने आई वो ये कि योगी आदित्यनाथ जी चाहते ही नहीं थे कि उपेंद्र दत्त शुक्ल जो कि बीजेपी प्रत्याशी थे वो जीते।क्योंकि गोरखपुर से लोकसभा का टिकट उनके कहने पर नहीं दिया गया था।कहा जा रहा है कि योगी जी चाहते ही नहीं थे कि कोई ब्राम्हण गोरखपुर की सीट से जीते।दरअसल गोरखनाथ मंदिर का प्रभाव कहीं इस जीत से कम ना हो जाए,इस बात का डर सता रहा था योगी जी को।और ऐसे भी पार्टी लाइन से हटकर योगी जी पूर्व में भी ऐसे कई फैसले ले चुके हैं,जिसमें शिव प्रताप शुक्ल की हार और राधामोहन दास अग्रवाल की जीत एक है।  

शायद,किंतु,परन्तु में आप जाएं तो देखने को मिलेगा कि संभव है संगठनात्मक तौर पर ध्यान ना देना,डोर टू डोर प्रचार में कमी,आरएसएस का सक्रिय ना हो पाना,वादे के अनुरुप काम नजर नहीं आने जैसे कई दर्जनो कारण आपको नजर आ जाएंगे।
ऐसे में मोदी नाम हा केवलम- ये कहना गलत नहीं होगा कि अंतत : बिन मोदी सब सून।रणनीति बनानी होगी।सही दिशा में आगे बढ़ना होगा।कार्यों को सही तरीके से जनता को बताना होगा।विश्वास बनाना होगा,भ्रस्टाचार पर लगाम लगानी होगी।आरोपों का धैर्य से जवाब देना होगा।कुछ ऐसे निर्णय लेने होंगे जिसका सूनामी की गति से असर धरातल पर नजर आए।

ये सही है कि कई दशकों से देश को जिस प्रकार से कांग्रेस ने गड्ढ़ा कर के रखा है वो पांच वर्षों में ठीक नहीं किया जा सकता लेकिन आगे के कई पांच सालों तक बीजेपी को सत्ता में बने रहने के लिए काम को इस प्रकार से आगे बढ़ाना होगा जिससे कि जनता का विश्वास निरंतर बढ़ता जाए...क्योंकि जीत की जरुरत के साथ उसे कायम रखने या रख पाने की जरुरत ज्यादा होती है...नहीं तो डर है कि पांच साल के अच्छे काम कहीं शाइनिंग इंडिया की तरह फेल ना हो जाएं...क्योंकि देश की आवाम न्यू इंडिया के अपने पाले हुए सपने को फेल हुए हुए नहीं देखना चाहती है।

नोट: पार्टी कोई भी हो...सत्ता पर कोई बी काबिज हो..एक बात जरुर ध्यान रखना चाहिए कि.....विशेष से....शेष....और फिर अवशेष....बनने में समय नहीं लगता है...कांग्रेस से बड़ा सीखने योग्य उदाहरण इसका और क्या हो सकता है....।