Wednesday, 15 November 2017

श्रीमद् भागवत कथा सार भाग-1

श्रीमद् भागवत कथा कलियुग में किसी संजीवनी से कम नहीं है।ऐसे में ये जानना भी सभी भगवत प्रेमियों के लिए आवश्यक है कि आखिर श्रीमद्भागवत कथा ही क्यों ? वेद उपनिषद् या अन्य पौराणिक धर्म ग्रंथ क्यों नहीं ?
ऐसे में विद्वतजन का श्रीमद् भागवत के संबंध में क्या विचार है जानते हैं श्रीमद्भागवत का मूल रहस्य सरल भाव में-

प्रथम दिवस
श्रीमद्भागवत में श्री सूत जी महाराज से जब सनकादिक ऋषियों ने पूछा कि वेदों और उपनिषदों की कथा क्यों नहीं होती ? श्रीमद्भागवत ही क्यों |ऐसे में  श्री सूत जी महाराज ने उन्हें सरल भाव में कहा कि वेद और उपनिषद् सनातन धर्म नामक वृक्ष की जड़ें हैं और श्रीमद् भागवत उस वृक्ष का अमृत फल है।ऐसे में सहज ही उत्तर मिल जाता है कि खाने के लिए तो वृक्ष के फल की ही आवश्यकता होती है,अत: श्रवण योग्य श्रीमद् भागवत ही है ना की वेद और उपनिषद् । और ऐसे भी जिस फल को तोते ने जूठा किया हो उसकी मिठास का क्या कहना। यहां पर विशेष ध्यान रखना चाहिए कि श्रीमद्भागवत की कथा को महाराज सुकदेव जी ने राजा परीक्षित को अपने मुखार्विन्द से सुनाया था ।
एक सवाल जो अक्सर जनसामान्य के मन में उठता है वो ये है कि ईश्वर तो सर्वत्र विद्यमान हैं, इसलिए मंदिर या फिर तीर्थ स्थलों में जाने से क्या लाभ ? बिल्कुल ठीक बात भी है लेकिन ठीक इसी प्रकार  हवा तो सभी जगहों पर विद्यमान है फिर लोगों को पंखे चलाने की क्यों आवश्कता पड़ती है ? सहज ही स्पस्ट हो जाता है कि  जहाँ भगवत कथा हो रही हो वहाँ परमात्मा के सानिध्य का आनंद ही कुछ और होता है।परम आनंद प्राप्त होता है।
मित्रों श्रीमद् भागवत की कथा प्रारंभ में तीन अलग-अलग क्षेत्रों में हुईं। महाराज सुकदेव जी ने कथा को राजा परीक्षित को सुनाया। दोनो ही भगवान के अनन्य भक्त थे। इसलिए यह कथा भक्ति के क्षेत्र में हुई। इसी कथा को महाराज सूत जी ने सनकादिक ऋषियों को सुनाया।जबकि ये सभी परम ज्ञानी थे, इसलिए यह कथा ज्ञान के क्षेत्र में हुई। इसी प्रकार श्रीमद्भागवत की कथा को मैत्र्य ऋषि ने विदुर जी को सुनाया। दोनो ही महान कर्म योगी थे इसलिए यह कथा कर्म के क्षेत्र में हुई।इस प्रकार से हम देखते हैं कि श्रीमद् भागवत की कता में तीनों यानी भक्ति, ज्ञान और कर्म का सहज ही समावेश है।
साथियों भगवान श्रीकृष्ण ने महाराज परीक्षित की रक्षा तब की थी जब वे अपनी माँ उत्तरा के गर्भ में थे अर्थात जो परमात्मा माँ के गर्भ में आपकी रक्षा कर सकता है वह आपकी कहीं भी रक्षा कर सकता है । आवश्यकता है तो उस परम पिता परमात्मा को सच्चे भाव से याद करने की।कहते हैं कि जिस प्रकार से पत्थर पर पत्थर के घर्षण से अग्नि प्रज्वलित हो जाती है,ठीक उसी प्रकार परमेश्वर को सतत याद करने से परमेश्वर कहीं भी प्रकट हो सकते है। एक बार की बात है-मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम जी ने महाबली हनुमान जी महाराज से  पूछा कि हे ज्ञानियों में अग्रगण्य हनुमान जी, मुझे ये बताएं कि दुनिया की सबसे बड़ी विपत्ति कौन सी है ?   हनुमान जी महाराज ने सहज ही भगवान से कहा कि प्रभु संसार में सबसे बड़ी विपत्ति है जब मनुष्य आपका सुमिरन भूल जाए,सत्संग करना छोड़ दे।
ज्ञान और विद्या की देवी हैं माँ सरस्वती। इसीलिए महाराज व्यास जी ने श्रीमद् भागवत की रचना बद्रिकाश्रम में सरस्वती नदी के निर्मल तट पर की थी। माँ सरस्वती जी का वाहन हंस है । स्पष्ट है कि जिस तरह हंस दूध पी लेता है और पानी छोड़ देता है,उसी तरह ज्ञान दोषों के मध्य से गुणों को ग्रहण करने की युक्ति हमें प्रदान करता है।| श्रीमद् भागवत वह कथा है जिसकी रचना माँ सरस्वती की कृपा से हुई थी। इसलिए इसके श्रवण से ज्ञान प्राप्त होता है जो हम अज्ञानी मनुष्य को अंदर से पवित्र कर देता है।
कितना सुंदर प्रसंग है कि जब महाराज गोकरण ने श्रीमद् भागवत की कथा कही उस समय कथा तो सभी श्रवण कर रहे थे लेकिन कथा समापन के अंतिम दिवस पर भगवान का विमान धुंधकारी को ही स्वर्ग ले जाने के लिए आया।प्रश्न उठता है कि आखिर  ऐसा क्यों हुआ ? क्योंकि धुंधकारी तीन घंटे कथा श्रवण करता था और बाकी समय उसका चिंतन करता था और अपने को दीन मानकर अपने सद्गुरु पर श्रद्धा और विश्वास कर रहा था।
क्रमश:........................जारी है...शेष अगले भाग में,

।।बोलिए जय जय श्रीराधे।।