Thursday, 13 October 2016

जाने करवा चौथ के व्रत का विधान और पूजा-मुहूर्त

संदीप कुमार मिश्र: करवा चौथ हिन्दू धर्म का एक मुख्य त्योहार है जिसे सुहागन औरते अपने पती की लंबी आयू के लिए रखती हैं। करवा चौथ का व्रत कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के दौरान किया जाता है। इस दिन हमारी भारतिय महिलाएं नीराजल रहकर अपने पती की दीर्घ आयू के लिए शुभ मुहूर्त में भगवान गणेश की पूजा अर्चना करती हैं।साथ ही शादीशुदा महिलाएं भगवान शिव और माता पार्वती और कार्तिकेय की भी पूजा अर्चना करती हैं और चंद्रमा के दर्शन करके और अर्घ देकर अपने व्रत को तोड़ती हैं। करवा चौथ का अत्यंत ही कठोर व्रत होता है।
करवा चौथ समय व मुहूर्त
करवा चौथ पूजा मुहूर्त- 05:43 से 06:59
अवधि – 1 घंटा 16 मिनट्स
करवा चौथ के दिन चन्द्रोदय – 08:51
चतुर्थी तिथि प्रारम्भ – 18/11/2016 को 08:47 बजे
चतुर्थी तिथि समाप्त - 07/11/2016 को 07:32 बजे
करवा चौथ पूजन व्रत विधान
करवा चौथ व्रत के दिन प्रातः नित्यकर्म और स्नानादि से निवृत होकर वाहित महिलाओं को संकल्प लेकर करवा चौथ व्रत शुरु करना चाहिए। गेरू और पिसे चावलों के घोल से करवा बनाना चाहिए। पीली मिट्टी से माँ गौरी और उनकी गोद में गणेशजी को बनाना चाहिए।माता गौरी की मूर्ति के साथ भगवान शिव और गणेशजी को लकड़ी के आसन पर बिठा कर माता गौरी को चुनरी बिंदी आदि सुहाग सामग्री से सजाना चाहिए।साथ ही पूजा स्थल पर जल से भरा हुआ लोटा रखें। रोली से करवा पर स्वस्तिक बनाएं, गौरी-गणेश की पूजा करें और कथा का श्रवण करें। कथा सुनने के बाद करवा पर हाथ घुमाकर अपनी सासुजी के पैर छूकर आशीर्वाद लें और उन्हें करवा भेंट करें। रात्रि में चन्द्रमा निकलने के बाद चन्द्रमा को अर्घ्य देने के बाद पति से आशीर्वाद लेकर व्रत को खोलें।इस प्रकार व्रत पूर्ण होता है।
करवा चौथ पर सरगी का विशेष महत्व
करवा चौथ पर सरगी सास के द्वारा अपनी बहू को दी जाती है।जिसका सेवन महिलाएं सूर्योदय से पहले तारों की छांव में खाकर व्रत की शुरुआत करती हैं।सरगी के रुप में सास अपनी बहू को हर प्रकार के खाने की सामग्री के साथ ही वस्त्र देती हैं। सरगी को हमारे हिन्दू धर्म में सौभाग्य और समृद्धि का प्रतिक माना जाता है।
पौराणिक दृष्टि में करवा चौथ  

करवा चौथ का पौराणिक महत्व महाभारत में भी बताया गया है।एक कथा के अनुसार वनवास के समय अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी पर्वत पर चले जाते हैं।दूसरी तरफ पांडवों पर संकटों का पहाड़ टूट पड़ता है,जिसे देख द्रौपदी चिंता में पड़ जाती है और भगवान श्री श्रीकृष्ण से मुक्ति पाने का उपाय जानने की प्रार्थना करती है।जिसपर भगवान कृष्ण द्रौपदी से कार्तिक कृष्ण चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत करने को कहते हैं।इस प्रकार से द्रौपदी ने पूर्ण निष्ठा और भाव से व्रत किया और पाण्डवो के सभी कष्ट दूर हो गए।तभी से ये परंपरा निरंतर चली आ रही है और महिलाएं अपनी पती दीर्घ आयू के लिए करवा चौथ का व्रत रखती हैं।