Monday, 18 January 2016

पाक से शांती वार्ता :पहले आतंकी संगठनों का जरुरी है दमन

संदीप कुमार मिश्र: संबंधों को बेहर बनाना हमारी प्राथमिकता जरुर होनी चाहिए,जैसा कि हम हमेशा से करते आए हैं।लेकिन अतित को देखते हुए अब अगली शांती वार्ता से पहले जरुरी है कि पाक में फलफूल रहे सभी आतंकी संगठनो का दमन या यूं कहें कि उन्हें नेस्तनाबूत कर देना चाहिए।जिसकी पहल दोनो देशों को करनी चाहिए।ये बात हम सब जानते हैं कि भारत-पाक के बीच संबंधों को बेहतर बनाने के रास्ते में पाक की भारत विरोधी सेना और जैश-ए-मोहम्मद जैसे सभी बड़े आतंकी संगठन रोड़ा अटकाएंगे।जैसा कि पठानकोट के एयरफोर्स बेस पर हुए हमले के बाद देखने को मिला।
दरअसल मसूद अजहर यानि जैश प्रमुख और पाक की नापाक सेना का बड़ा ही पूराना बैर है हमारे देश से।ये दोनो ही हमारे देश को हर बार नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते रहे लेकिन हर बार हमारे जांबाज जवानो ने इन्हें धो डाला।इस बात को भी हम बखुबी जानते हैं कि पाक में लोकतंत्र के क्या माने हैं,ये संभव है कि नवाज अपनी शराफत का परिचय देना ताहते हों भारत से संबंधों को सुधारकर लेकिन ये भी उतना ही अटल सत्य है कि नवाज के प्रयासों में सबसे बड़ी बाधा पाक की सेना आईएसआई और वहां के आतंकी संगठन ही हैं। क्योंकि गलती से भी नवाज आतंकी संगठनो पर कार्यवाही करते हैं तो सेना उन्हें सत्ता से बेदखल कर सकती है।जैसा की पाकिस्तान का इतिहास कहता है। शायद यही वजह है कि नवाज के लिए मौलाना मसूद अजहर या दूसरे आतंकियों से दूरियां बनाना कठिन है।पाक की खुफिया एजेंसी ISI की तरफ से जैश जैसे तमाम आतंकी संगठनों को भारत में दहशत फैलाने के लिए सहयोग दिया जाता रहा है।
पाक की खुफिया एजेंसी ISI चाहता है कि जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी भारत में गुरदासपुर-पठानकोट-और जम्मू सेक्टर में अपना खूनी खेल को बड़े पैमाने पर अंजाम दें।दरअसल, ISI आतंकी संगठन लश्कर-ए-तोयबा पर अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते जैश को नए हथियार के रुप में फिर से खड़ा कर रहा है।हमारे देश के लोकतंत्र के मंदिर हमारी संसद पर हमले के बाद अपनी खूंखार छवि बनाने वाले जैश के पर ISI ने कतरे थे। क्योंकि जैश प्रमुख मौलाना मसूद अजहर ने पाकिस्तान सेना को ही बाद में चुनौती देनी शुरु कर दी थी। कहा जाता है कि, जैश- ए- मोहम्मद तो लश्कर ए तोयबा से भी ज्यादा खतरनाक और खुंखार संगठन है।हमारी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए जैश पर लगाम लगाने के रास्ते में अब सबसे बड़ी चुनौती बन गयी हैपाक की खुफिया एजेंसी ISI का आतंकियों को सहयोग करना।

ये अलग बात है कि भारत की साख विश्व पटल पर शांती प्रयासों को लेकर मजबूत हुई है और पाकिस्तान की उतनी ही खराब। भारत की शानदार छवी इस समय संसार में कुछ इस कदर बन कर उभरी है कि अगर निकट भविष्य में भारत आतंकवाद आधारित युद्ध करता है तो संभव है कि विश्व समुदाय शायद ही पाकिस्तान के साथ खड़ा नजर आए।क्योंकि अब हर कोई जान समझ गया है कि पाकिस्तान आतंकवाद की प्रयोगशाला और जन्नत दोनो है। पाकिस्तान के लिए तो अब डुब मरने वाली बात ही है कि उसे सबसे ज्यादा सहयोग देने वाला देश अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी कहा कि पाकिस्तान समेत विश्व के कुछ हिस्से नए आतंकी समूहों के लिए पनाहगाह बन सकते हैं।ऐसे में भारत के लिए चुनौती कितनी बड़ी है ये समझना किसी के लिए भी मुमकिन है।
भारत ने पाक के साथ रिश्तों को मधुर बनाने के हर संभव प्रयास किए।लेकिन पाकिस्तान के हुक्मरान अपनी गोद में बैठे आतंकियों पर जरा भी लगाम नहीं लगा पाए। पठानकोट का गुनहगार मसूद अजहर जिसे 1994 में कश्मीर में फर्जी पासपोर्ट के साथ गिरफ्तार किया गया था।जबकि 1999 में कंधार विमान अपहरण मामले में मौलाना मसूद और दो और पाकिस्तानी आतंकियों को रिहा किया था। रिहा होने के बाद मौलाना मसूद ने कश्मीर में भारत के खिलाफ लड़ने के लिए आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद की शुरुआत की।जिसका मुख्य उद्देश्य कश्मीर को भारत से अलग करना था। अजहर को साल 2001 में भारत के संसद में भी हमला करने का प्रमुख संदिग्ध माना गया था।आपको ये भी बता दें कि अक्टूबर 2001 में जैश के आतंकियों ने ही जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर हमला किया था। यानी इतने खूंखार आतंकी की पाकिस्तान में पठानकोट हमले के बाद गिरफ्तारी से साफ है कि पाकिस्तान कहीं ना कहीं दबाव  में तो जरुर है।
खैर बड़ा सवाल उठता है कि क्या ऐसे हालातों में भारत-पाकिस्तान के संबंध बेहतर बन सकते हैं ? पाक पीएम नवाज भारत से बेहतर संबंध तो चाहते हैं। लेकिन क्या पाक की सेना भी ऐसा सोचती है।आपका जवाब होगा शायद नहीं। कभी नहीं...।पाक सेना का इतिहास तो यही कहता है। जनरल अयूब खान से लेकर राहील शरीफ सभी भारत विरोधी रहे हैं। पाकिस्तान की सेना में पंजाबियों का वर्चस्व साफ है। उसमें 80 फीसद से ज्यादा पंजाबी हैं।जो कि भारत से बेइंतहां नफरत करते हैं। इस भावना के मूल में पंजाब में देश के विभाजन के समय हुए खून-खराबे को देखा जा सकता है।कहीं ना कहीं पाकिस्तान का पंजाब इस्लामिक कट्टरपन की प्रयोगशाला है। वहां पर हर इंसान अपने को दूसरे से बड़ा कट्टर मुसलमान साबित करने की होड़ में लगा रहता है।
इतिहास साक्षी है कि पाकिस्तानी फौज ने ही वहां चार बार सरकारों का तख्तापलट किया। अयूब खान, यहिया खान, जिया उल हक और परवेज मुशर्ऱफ ने पाकिस्तानी सेना को एक माफिया के रूप में विकसित किया। देश में निर्वाचित सरकारों को कभी कायदे से काम करने का मौका ही नहीं दिया. जम्हूरियत की जड़ें जमने नहीं दीं।यही वजह रही कि 1956 तक पाक का संविधान नहीं बन पाया।जब बना भी तो चुनाव नहीं हो पाए और सेना ने सत्ता हथिया ली। 1947 के बाद से पाकिस्तान में लगभग तीस साल तक सैन्य शासन रहा और सेना ने केंद्रीयकरण को बढ़ावा दिया।
अंतत: इस प्रकार हम समझ सकते हैं कि पाक में आतंकी संगठनो का दमन करना कितना कठीन है।लेकिन ये भी सच है कि आतंकियों को नेस्तनाबूत करना ही हौगा,चाहे रास्ता जो भी अख्तियार करना पड़े।